Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

Bihar Board Class 12 Chemistry दैनिक जीवन में रसायन Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 16.1
अनिद्राग्रस्त रोगियों को चिकित्सक नींद लाने वाली गोलियाँ लेने का परामर्श देते हैं, परन्तु बिना चिकित्सक से परामर्श लिए इनकी खुराक लेना उचित क्यों नहीं है?
उत्तर:
अधिकतर औषध अनुशंसित मात्रा से अधिक मात्रा में लेने पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं तथा विष का कार्य करती हैं, इसलिए औषध लेने से पहले किसी चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

प्रश्न 16.2
किस वर्गीकरण के आधार पर वक्तव्य, “निटिडीन प्रति-अम्ल है” दिया गया है?
उत्तर:
यह वक्तव्य भेषजगुणविज्ञानीय आधार पर वर्गीकरण की ओर संकेत करता है; क्योकि कोई भी औषध जो अम्ल के आधिक्य का प्रतिकार करेगी, प्रतिअम्ल कहलाएगी।

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प्रश्न 16.3
हमें कृत्रिम मधुरकों की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर:
प्राकृत मधुरक जैसे-सुक्रोम, ग्रहण की गई कैलोरी बढ़ाते हैं; इसलिए बहुत-से लोग कृत्रिम मधुरक प्रयोग करना अधिक पसन्द करते हैं। आर्थो-सल्फोबेन्जीमाइड, जिसे सैकरीन भी कहते हैं, प्रथम लोकप्रिय कृत्रिम मधुरक है। यह सन् 1879 से खोज के समय से ही मधुरक की तरह प्रयोग में लाया जाता रहा है। यह सुक्रोस (cane sugar) से लगभग 550 गुना अधिक मीठी होती है।

यह शरीर से अपरिवर्तित रूप में ही मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाती है। यह सेवन के पश्चात् पूर्णत: अक्रिय और अहानिकारक प्रतीत होती है। इसका प्रयोग मधुमेह के रोगियों एवं उन व्यक्तियों के लिए जिन्हें कैलोरी अन्तर्ग्रहण पर नियन्त्रण की आवश्यकता है, अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 16.4
ग्लिसरिल ओलिएट तथा ग्लिसरिल पामिटेट से सोडियम साबुन बनाने के लिए रासायनिक समीकरण लिखिए। इनके संरचनात्मक सूत्र नीचे दिए गए है –

  1. (C15H31COO)3 C3H5 – ग्लिसरिल पामिटेट
  2. (C17H32COO)3C3H5 – ग्लिसरिल ओलिएट
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उत्तर:
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प्रश्न 16.5
निम्नलिखित प्रकार के अनायनिक अपमार्जक, द्रव अपमार्जकों, इमल्सीकारकों और क्लेदन कारकों (Wetting agents) में उपस्थित होते हैं। अणु में जलरोगी तथा जलविरागी हिस्सों को दर्शाइए। अणु में उपस्थित प्रकार्यात्मक समूह की पहचान कीजिए।
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उत्तर:
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उपर्युक्त अनायनिक अपमार्जक में ईथर तथा ऐल्कोहॉल प्रकार्यात्मक समूह उपस्थित हैं।

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 16.1
हमें औषधों को विभिन्न प्रकार से वर्गीकृत करने की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
औषधों के वर्गीकरण की विशिष्ट उपयोगिता है। अत: औषधों को विभिन्न प्रकार से वर्गीकृत करने की अत्यधिक आवश्यकता है। औषधों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण कर सकते हैं:

1. भेषजगुणविज्ञानीय (फार्मोकोलोजिकल) प्रभाव के आधार पर वर्गीकरण:
यह वर्गीकरण भेषजगुणविज्ञानीय प्रभाव पर आधारित है। यह चिकित्सकों के लिए उपयोगी है; क्योंकि यह उन्हें किसी विशेष उपचार के लिए उपलब्ध पूरी औषध-श्रेणी देता है। उदाहरणार्थ: पीड़ाहारियों (एनलजेसिक) का पीड़ानाशक असर होता है, पूतिरोधी (एन्टीसेप्टिक) सूक्ष्म जीवों को नष्ट करते हैं अथवा वृद्धि को रोकते हैं।

2. औषध के प्रभाव पर आधारित वर्गीकरण:
यह किसी विशेष जैवरासायनिक प्रक्रम पर औषध के प्रभाव पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए – हिस्टैमिन यौगिक, जो कि शरीर में शोथ उत्पन्न करता है, उसके प्रभाव को किसी प्रतिहिस्टैमिन द्वारा कम करते हैं। हिस्टैमिन के प्रभाव को कई प्रकार से कम किया जा सकता है।

3. रासायनिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण:
यह औषध की रासायनिक संरचना पर आधारित है। इस प्रकार से वर्गीकृत औषध समान संरचनात्मक, विशेषताओं की भागीदारी होती हैं और प्रायः इनमें समान भेषजगुणविज्ञानीय क्रियाशीलता होती है।

4. लक्ष्य-अणुओं पर आधारित वर्गीकरण:
औषध साधारणतया जैवअणुओं; जैसे-काबोहाइड्रेट, लिपिड, प्रोटीन और न्यूक्लीक अम्लों से अन्योन्यक्रिया करती हैं, जिन्हें लक्ष्य-अणु अथवा औषध-लक्ष्य कहते हैं। समान संरचनात्मक विशेषताओं वाली औषधों की लक्ष्यों पर क्रियाविधि समान हो सकती है। लक्ष्य-अणुओं पर आधारित वर्गीकरण औषध रसायनज्ञों के लिए सबसे अधिक उपयोगी होता है।

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प्रश्न 16.2
औषध रसायन के पारिभाषिक शब्द, लक्ष्यअणु अथवा औषध लक्ष्य को समझाइए।
उत्तर:
औषध साधारणतया वृहत्-अणुओं जैसेकार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड तथा न्यूक्लीक अम्लों से अन्योन्यक्रिया करती हैं, जिन्हें लक्ष्य-अणु या औषध-लक्ष्य कहते हैं।

वे प्रोटीन जो जैव उत्प्रेरकों के रूप में कार्य करते हैं, एन्जाइम कहलाते हैं तथा जो प्रोटीन शरीर की संचार व्यवस्था में निर्णायक होते हैं, उन्हें ग्राही कहते हैं। वाहक प्रोटीन ध्रुवीय अणुओं को कोशिका-कला के आर-पार ले जाते हैं। न्यूक्लीक अम्लों में कोशिका की सांकेतिक आनुवंशिक जानकारी होती है। लिपिड और कार्बोहाइड्रेट कोशिका-कला की संरचना का हिस्सा हैं।

प्रश्न 16.3
उन वृहद-अणुओं के नाम लिखिए जिन्हें औषध-लक्ष्य चुना जाता है।
उत्तर:
न्यूक्लीक अम्ल, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, एन्जाइम आदि वृहद अणुओं को औषध-लक्ष्य कहा जाता है।

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प्रश्न 16.4
बिना डॉक्टर से परामर्श लिए दवाइयाँ क्यों नहीं लेनी चाहिए?
उत्तर:
जब औषध एक से अधिक ग्राही सतह को आबन्धित कर लेती है तो यह औषध के दुष्प्रभाव का कारण बन जाता है। इसलिए उचित औषध के चयन के लिए डॉक्टर का परामर्श आवश्यक होता है जिससे एक निश्चित ग्राही सतह के लिए औषध की बन्धुता अधिकतम हो तथा उसका वांछित प्रभाव हो सके। औषध की खुराक भी अनुशंति होनी चाहिए; क्योंकि औषध का अनुशंसित मात्रा से अधिक मात्रा में उपयोग किया जाए तो अधिकांश औषध विषकारी प्रभाव छोड़ती हैं तथा मृत्यु का कारण भी बन सकती है।

प्रश्न 16.5
‘रसायन चिकित्सा’ शब्द की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
रसायन विज्ञान की उस शाखा की जिसके अन्तर्गत रोगों के उपचार के लिए विभिन्न रसायनों के उपयोगों का अध्ययन किया जाता है; रसायन चिकित्सा कहते हैं।

प्रश्न 16.6
एन्जाइम की सतह पर औषध को थामने के लिए कौन-से बल कार्य करते हैं?
उत्तर:
एन्जाइम की सतह पर औषध को थामने के लिए अनेक बल कार्य करते हैं; जैसे-आयनिक आबन्ध, हाइड्रोजन आबन्ध, वाण्डवाल्स अन्योन्यक्रिया या द्विध्रुव-द्विध्रुव बल। सेरीन का -OH समूह, ऐस्पार्टिक अम्ल का -COOH समूह तथा फेनलऐनिलीन का फेनिल वलय औषध को एन्जाइम से आबन्धित करने में सहायता प्रदान करता है।

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प्रश्न 16.7
प्रतिअम्ल एवं प्रति-ऐलर्जी औषधि हिस्टैमिन के कार्य में बाधा डालती हैं, परन्तु ये एक-दूसरे के कार्य में बाधक क्यों नहीं होती?
उत्तर:
औषधों को शरीर में किसी एक भाग में हुए रोग के उपचार हेतु अभिकल्पित किया जाता है। ये शरीर के अन्य भागों को प्रभावित नहीं करतीं; क्योंकि. ये विभिन्न ग्राहियों पर कार्य करती हैं। उदाहरणार्थ-हिस्टैमिन का उद्दीपन ऐलर्जी का कारण बनता है। यह आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल निर्मुक्त करने के कारण अम्लता का कारण भी बनता है। चूंकि प्रतिऐलर्जी तथा प्रतिअम्ल औषध विभिन्न ग्राहियों पर कार्य करती हैं; इसलिए प्रतिहिस्टैमिन ऐलर्जी का उपचार करती है, जबकि प्रतिअम्ल अम्लता का उपचार करती है।

प्रश्न 16.8
नॉरऐड्रीनेलिन का कम स्तर अवसाद का कारण होता है। इस समस्या के निदान के लिए किस प्रकार की औषध की आवश्यकता होती है? दो औषधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नॉरऐड्रीनेलिन एक तन्त्रिकीय संचारक (न्यूरोट्रान्समिटर) है जो मनोदशा परिवर्तन में भूमिका निभाती है। यदि किसी कारण से नॉरऐड्रीनेलिन का स्तर (मात्रा) कम हो तो संकेत भेजने की क्रिया धीमी पड़ जाती है तथा व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्रतिअवसादक (antidepresant) औषधों की आवश्यकता पड़ती है।

ये औषध नॉरएड्रीनेलिन का निम्नीकरण उत्प्रेरित करने वाले एन्जाइम को संदमित करती हैं। यदि एन्जाइम संदमित हो जाता है तो यह महत्त्वपूर्ण तन्त्रिकीय संचारक धीरे-धीरे उपापचयित (मेटाबोलाइज) होता है और अपने ग्राही को लम्बे समय तक सक्रिय कर सकता है; अत: अवसाद के प्रभाव का प्रतिकार कर सकता है। इप्रोनाइजिड और फिनल्जिन ऐसी दो औषध हैं।
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प्रश्न 16.9
वृहद-स्पेक्ट्रम जीवाणुनाशी शब्द से आप क्या समझते हैं? समझाइए।
उत्तर:
जीवाणु अथवा अन्य सूक्ष्मजीवियों के उस परास (रेंज) को जिस पर किसी प्रतिजीवाणु का प्रभाव होता है, उस प्रतिजीवाणु के क्रिया स्पेक्ट्रम की तरह अभिव्यक्त करते हैं। जो प्रतिजीवाणु ग्रैम-ग्राही (ग्रैम पॉजिटिव) ओर ग्रैम-अग्राही (ग्रैम नेगेटिव) दोनों प्रकार के जीवाणुओं के विस्तृत परास का विनाश करते हैं अथवा निरोध करते हैं, वृहद-स्पेक्ट्रम जीवाणुनाशी अथवा विस्तृत स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु कहलाते हैं। जैसेटेट्रासाइक्लीन, ऑफ्लोक्सासिन क्लोरैम्फेनिकॉल आदि।

क्लोरैम्फेनिकॉल जो सन् 1947 में पृथक् किया गया एक वृहद् स्पेक्ट्रम वाला प्रतिजीवाणु है, यह जठरांत्र क्षेत्र में अतिशीघ्र अवशोषित हो जाता है। अतः इसे टाइफॉइड, पेचिश, तीव्र ज्वर, कुछ मूत्र संक्रमणों, तन्त्रिका-शोथ (मेनिनजाइट्इस) तथा निमोनिया जैसे रोगों में खिलाया जाता है। वेंकोमाइसिन और ऑफ्लोक्सासिन अन्य महत्त्वपूर्ण वृहद्-स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु हैं। प्रतिजीवाणु डिसिडैजिरिन को कैंसर कोशिकाओं के कुछ प्रभेदों के प्रति अविषालु माना जाता है।

प्रश्न 16.10
पूतिरोधी तथा संक्रमणहारी किस प्रकार से भिन्न हैं? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
पूतिरोधियों को सजीव ऊतकों; जैसे-घाव, चोट, व्रण (अल्सर) और रोगग्रस्त त्वचा की सतह पर लगाया जाता है। फ्यूरासिन (Furacine) सोफ्रामाइसिन (Soframicine) इत्यादि इनके उदाहरण हैं। इन्हें प्रतिजीवाणुओं की तरह खाया नहीं जाता।

साधारणतः प्रयुक्त किया जाने वाला पूतिरोधी डेटॉल (Dettol) क्लोरोजाइलिनॉल (Chloroxylenol) तथा टीनिऑल (Terpineol) का मिश्रण होता है। विसंक्रामियों का प्रयोग निर्जीव वस्तुओं; जैसे-फर्श, नालियों और यन्त्रों इत्यादि पर किया जाता है। सान्द्रता परिवर्तन से यही पदार्थ प्रतिरोधी अथवा विसंक्रामी का कार्य कर सकता है। उदाहरण के लिए-फीनॉल का 0.2 प्रतिशत विलयन पूतिरोधी होता है, जबकि इसका एक प्रतिशत विलयन संक्रमणहारी होता है।

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प्रश्न 16.11
सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन सोडियम हाइड्रोजनकार्बोनट अथवा मैग्नीशियम या ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड की तुलना में श्रेष्ठ प्रतिअम्ल क्यों हैं?
उत्तर:
आमाशय में अम्ल का अत्यधिक उत्पादन उत्तेजना तथा पीड़ा का कारण बनता है, गम्भीर अवस्था में आमाशय में घाव हो जाते हैं। 1970 तक अम्लता का उपचार केवल सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट अथवा मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड द्वारा किया जाता था, परन्तु इनकी अत्यधिक मात्रा के सेवन से आमाशय क्षारीय हो जाता है तथा अधिक अम्ल उत्पादन को प्रेरित करता है। यद्यपि धात्विक हाइड्रॉक्साइड बेहतर उपचार हैं; क्योंकि अघुलनशील होने के कारण ये pH को उदासीनता से आगे नहीं बढ़ने देते।

दोनों ही उपचार केवल रोग के लक्षणों को नियन्त्रित करते है, कारण को नहीं। इसलिए पहले इन धातु लवणों से रोगी का उपचार आसान नहीं होता था। अग्रगत अवस्था में अल्सर (व्रण) के प्राणघातक होने के कारण इसका एकमात्र उपचार आमाशय के रोगग्रस्त हिस्से को निकाल देना था।

अतिअम्लता के उपचार में मुख्य परिवर्तन उस खोज के बाद हुआ जिसके अनुसार रसायन हिस्टैमिन, आमाशय में पेप्सिन के निकलने को उद्दीपित करता है। आमाशय की दीवार में स्थित ग्राही के साथ हिस्टैमिन की अन्योन्यक्रिया रोकने के लिए औषध सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन (जैनटेक) अभिकल्प (डिजाइन) की गई। इसके कारण कम अम्ल निकलता था।

प्रश्न 16.12
एक ऐसे पदार्थ का उदाहरण दीजिए जिसे पूतिरोधी तथा संक्रमणहारी दोनों प्रकार से प्रयोग किया जाता है।
उत्तर:
फीनॉल का 0.2 प्रतिशत विलयन पूतिरोधी होता है, और इसका 1 प्रतिशत विलयन संक्रमणकारी होता है।

प्रश्न 16.13
डेटॉल के प्रमुख संघटक कौन-से हैं?
उत्तर:
किसी उपयुक्त विलायक में क्लोरोजाइलिनॉल (Chloroxylenol) तथा 4-टर्पिनिऑल (α-Terpineol) का मिश्रण डेटॉल कहलाता है। डीटॉल पूतिरोधी औषध का उदाहरण है।

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प्रश्न 16.14
आयोडीन का टिंक्चर होता हैं? इसके क्या उपयोग हैं?
उत्तर:
आयोडीन का ऐल्कोहॉल-जल मिश्रण में 2-3 प्रतिशत घोल आयोडीन का टिंक्चर कहलाता है। यह एक प्रबल पूतिरोधी है। इसे घाव पर लगाया जाता है।

प्रश्न 16.15
खाद्य पदार्थ परिरक्षक क्या होते है?
उत्तर:
खाद्य पदार्थों को सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के कारण होने वाली खराबी से बचाने वाले रासायनिक पदार्थों को खाद्य परिरक्षक कहते हैं। उदाहरण- खाने का नमक, चीनी, सोडियम बेन्जोएट आदि सामान्य रूप से उपयोग में आने वाले परिरक्षक है।

प्रश्न 16.16
ऐस्पार्टेम का प्रयोग केवल ठण्डे खाद्य एवं पेय पदार्थों तक सीमित क्यों है?
उत्तर:
ऐस्पार्टेम का प्रयोग केवल ठण्डे खाद्य एवं पेय पदार्थों तक सीमित है; क्योंकि यह खाना पकाने के तापमान पर अस्थायी होता है।

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प्रश्न 16.17
कृत्रिम मधुरक क्या हैं? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कृत्रिम मधुरक ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं, जो स्वाद में मीठे होते हैं, परन्तु इनके सेवन से शरीर में कैलोरी की मात्रा नहीं बढ़ती है। ये शरीर से अपरिवर्तित रूप में ही मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाते हैं। उदाहरण-सैकरीन, ऐस्पार्टम, सुक्रालोस आदि।

प्रश्न 16.18
मधुमेह के रोगियों के लिए मिठाई बनाने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले मधुरकों के क्या नाम हैं?
उत्तर:
सैकरीन।

प्रश्न 16.19
ऐलिटेम को कृत्रिम मधुरक की तरह उपयोग में लाने पर क्या समस्याएँ होती हैं?
उत्तर:
ऐलिटेम एक अत्यधिक प्रबल मधुरक है। अतः इसका प्रयोग करते समय मिठास नियन्त्रित करना कठिन होता है।

प्रश्न 16.20
साबुनों की अपेक्षा संश्लेषित अपमार्जक किस प्रकार श्रेष्ठ हैं?
उत्तर:
संश्लेषित अपमार्जक मृदु तथा कठोर दोनों प्रकार के जल में उपयोग किए जा सकते हैं; क्योंकि ये कठोर जल में भी झाग बनाते हैं। कुछ अपमार्जक तो बर्फीले जल में भी झाग देते हैं। इसका कारण है कि इनके घटक; सल्फोनिक अम्ल तथा इनके कैल्सियम एवं मैग्नीशियम लवण जल में विलेय होते हैं। दूसरी ओर साबुन में घटक; वसा अम्ल तथा इनके कैल्सियम एवं मैग्नीशियम लवण जल में अविलेय होते हैं; अतः ये कठोर जल में झाग नहीं देते हैं। इसलिए साबुनों की अपेक्षा संश्लेषित अपमार्जक श्रेष्ठ होते हैं।

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प्रश्न 16.21
निम्नलिखित शब्दों को उपयुक्त उदाहरणों द्वारा समझाइए:
(क) धनात्मक अपमार्जक
(ख) ऋणात्मक अपमार्जक
(ग) अनायनिक अपमार्जक
उत्तर:
(क) धनात्मक अपमार्जक:
धनात्मक अपमार्जक ऐमीनो के ऐसीटेट, क्लोराइड या ब्रोमाइड ऋणायनों के साथ बने चतुष्क लवण होते हैं।

उदाहरण: सेटिलट्राइमेथिल अमोनियम क्लोराइड।

(ख) ऋणात्मक अपमार्जक:
ऋणात्मक अपमार्जक लम्बी श्रृंखला वाले ऐल्कोहॉलो अथवा हाइड्रोकार्बनों के सल्फोनेटित व्युत्पन्न होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं –

(i) सोडियम ऐल्किल सल्फेट:

उदाहरण:
सोडियम लॉरिल सल्फेट C11H23CH2OSO3Na.

(ii) सोडियम ऐल्किल बेन्जीन सल्फेट:
सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला घरेलू अपमार्जक सोडियम-4 (-1-डोडेसिल) बेन्जीनसल्फोनेट (SDS) है।
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(ग) अनायनिक अपमार्जक:
अनायनिक अपमार्जक; उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले ऐल्कोहॉलों के साथ वसा अम्लों के एस्टर होते हैं।

उदाहरण:
पोलिएथिलीन ग्लाइकॉल स्टिऐरेट
CH3(CH2)16COO (CH2CH2O), CH2CH2OH.

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प्रश्न 16.22
जैव-निम्ननीकृत होने वाले और जैव-निम्ननीकृत न होने वाले अपमार्जक क्या हैं? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजए।
उत्तर:
जैव-निम्ननीकृत अपमार्जक-ऐसे अपमार्जक जिनमें ऋजु हाइड्रोकार्बन श्रृंखला होती है, सूक्ष्मजीवों द्वारा सरलता से निम्ननीकृत हो जाते हैं, जैव-निम्ननीकृत अपमार्जक कहलाते हैं;

उदाहरण:
साडियम लॉरिल सोडियम-4-(1-डोडेसिल) बेन्जीनसल्फोनेट तथा सोडियम-4-(2-डोडेसिल) बेन्जीनसल्फोनेट।

जैव-निम्ननीकृत न होने वाले अपमार्जक:
ऐसी अपमार्जक हाइड्रोकार्बन शृंखला होती है, सूक्ष्मजीवों द्वारा सरलता से निम्ननीकृत नहीं होते, जैव-निम्ननीकृत न होने वाले अपमार्जक कहलाते हैं।

उदाहरण:
सोडियम-4-(-1. 3, 5, 7-टेट्रामेथिलसेटिल) बेन्जीन सल्फोनेट।

प्रश्न 16.23
साबुन कठोर जल में कार्य क्यों नहीं करता?
उत्तर:
कठोर जल में कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के आयन होते हैं। ये आयन सोडियम अथवा पोटैशियम साबुन को कठोर जल में घोलने पर क्रमश: अघुलनशील कैल्सियम और मैग्नीशियम साबुन में परिवर्तित कर देते हैं।
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यह अघुलनशील साबुन मलफेन (scum) की तरह पानी से अलग हो जाते हैं और शोधन अभिकर्मक के कार्य के लिए बेकार होते हैं। वास्तव में ये अच्छी धुलाई में रुकावट डालते हैं; क्योंकि यह अवक्षेप कपड़ों के रेशों पर चिपचिपे पदार्थ की तरह चिपक जाता है। कठोर जल से धुले बाल इस चिपचिपे पदार्थ के कारण कांतिहीन लगते हैं। कठोर जल और साबुन से धुले कपड़ों में इस चिपचिपे पदार्थ के कारण रंजक एकसमान रूप से अवशोषित नहीं होता।

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प्रश्न 16.24
क्या आप साबुन तथा संश्लेषित अपमार्जकों का प्रयोग जल की कठोरता जानने के लिए कर सकते हैं?
उत्तर:
साबुन कठोर जल के साथ अभिक्रिया करने पर कैल्सियम तथा मैगनीशियम लवणों के अवक्षेप बनाएगा, जबकि संश्लेषित अपमार्जक नहीं करते। अतः साबुन का प्रयोग जल की कठोरता जानने के लिए कर सकते हैं, परन्तु अपमार्जक का नहीं।

प्रश्न 16.25
साबुन की शोधन क्रिया समझाइए।
उत्तरः
साबुन की शोधन क्रिया (Cleansing Action of Soaps):
साबुन का अणु दो भागों का बना होता है। साबुन के अणु का एक भाग तो लम्बो हाइड्रोकार्बन श्रृंखला होती है जो अनायनिक होती है तथा साबुन के अणु का दूसरा भाग छोटा कार्बोक्सिलिक समूह (COONa+) होता है जो आयनिक होता है। साबन के अणु को चित्र द्वारा दर्शाया जाता है जिसमें टेढ़ी-मेढ़ी लम्बी रेखा तो हाइड्रोकार्बन श्रृंखला को निरूपित करती है, जबकि काला गोलीय भाग आयनिक समूह (COO) को निरूपित करता है।

साबुन के अणु का हाइड्रोकार्बन श्रृंखला वाला भाग जल को प्रतिकर्षित करने वाला होता है (या जल-विरोधी होता है), परन्तु वह धूल तथा चिकनाई जैसे मैल के कार्बनिक कणों को अपने साथ जोड़ लेता है। इसलिए मैले कपड़ों की सतह पर उपस्थित धूल तथा चिकनाई के कण साबुन के अणु के हाइड्रोकार्बन वाले भाग से जुड़ जाते हैं।

साबुन के अणु का आयनिक भाग (COO) जलस्नेही होता है जो जल के अणुओं की ओर आकर्षित होता है और अपने हाइड्रोकार्बन भाग में चिपके धूल तथा चिकनाई के कणों को अपने साथ खींचकर जल में ले आता है। इस प्रकार मैले कपड़े की सतह पर लगे धूल तथा चिकनाई के सारे कण साबुन के अणुओं के साथ लगकर जल में आ जाते हैं तथा मैला कपड़ा साफ हो जाता है।
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जब साबुन को जल में घोलते हैं तो वह मिसेल (micelles) बनाती है [चित्र (क)]। इस मिसेल में साबुन के अणु अरीय (radially) ढंग से व्यवस्थित होते हैं जिसमें हाइड्रोकार्बन शृंखला वाला भाग केन्द्र की ओर होता है तथा जल को आकर्षित करने वाला कार्बोक्सिलिक भाग बाहर की ओर रहता है जैसा कि [चित्र-(क)] में दिखाया गया है।
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चित्र-साबुन का सफाई कार्य समझाने के लिए चित्र

जब साबुन के पानी में धूल तथा चिकनाई लगा मैला कपड़ा डालते हैं तो मिसेलों के हाइड्रोकार्बन शृंखलाओं वाले सिर मैले कपड़े की सतह पर उपस्थित धूल तथा चिकनाई के कणों के साथ जुड़े रहते हैं तथा उन्हें अपने बीच फँसा लेते हैं।

इसके बाद – मिसेलों के बाहर की ओर वाले आयनिक सिरे जल के अणुओं की ओर आकर्षित होते हैं जिससे हाइड्रोकार्बन वाले सिरों में फंसे मैल के कण कपड़े की सतह से खिंचकर जल में आ जाते हैं तथा कपड़ा साफ हो जाता है। सफाई में साबुन का प्रभाव निम्नांकित चित्र द्वारा दर्शाया गया है –
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प्रश्न 16.26
यदि जल में कैल्सियम हाइड्रोजन कार्बोनेट घुला हो तो आप कपड़े धोने के लिए साबुन एवं संश्लेषित अपमार्जकों में से किस का प्रयोग करेंगे?
उत्तर:
कैल्सियम हाइड्रोजन कार्बोनेट जल को कठोर बनाता है। साबुन कठोर जल के साथ अभिक्रिया करके कैल्सियम लवण के रूप में अवक्षेपित हो जायेगा। दूसरी ओर संश्लेषित अपमार्जक कठोर जल में विलेय होता है और कठोर जल में अवक्षेपित नर्ह होता। अतः कैल्सियम हाइड्रोजन कार्बोनेट युक्त जल में कपड़े धोने के लिए संश्लेषित अपमार्जक का प्रयोग करना चाहिए।
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प्रश्न 16.27
निम्नलिखित यौगिकों में जलरागी एवं जल विरागी भाग दर्शाइए –
(क) CH3(CH2)10 CH2SO3 Na+
(ख) CH3(CH2)15 N+(CH3)3 Br
(ग) CH3(CH2)16 COO (CH2CH2O)n CH2CH2OH
उत्तर:
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Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry बहुलक Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 15.1
बहुलक और एकलक पदों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘बहुलक’ (पॉलिमर) शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘पॉली अर्थात् अनेक और ‘मर’ अर्थात् इकाई अथवा भाग से हुई है। बहुलको को बहुत वृहत् अणु की भाँति परिभाषित किया जा सकता है, जिनका द्रव्यमान अतिउच्च (103 – 1027 u) होता है। इन्हें वृहदणु भी कहा जाता है, जो कि पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयों के वृहत् पैमाने पर जुड़ने से बनते हैं। पुरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ कुछ सरल और क्रियाशील अणुओं से प्राप्त होती हैं, जो एकलक कहलाती हैं। ये इकाइयाँ एक-दूसरे के साथ सहसंयोजक बन्धों द्वारा जुड़ी होती हैं।

उदाहरण:
पॉलिथीन, नाइलॉन-6, 6 बैकेलाइट, रबर आदि।

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प्रश्न 15.2
संरचना के आधार पर बहुलकों का वर्गीकरण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
संरचना के आधार पर बहुलक अग्र तीन प्रकार के होते हैं:
1. रैखिक बहुलक:
इन बहुलकों में लम्बी और रेखीय श्रृंखलाएँ होती हैं। उच्च घनत्व पॉलिथीन, पॉलिवाइनिल क्लोराइड आदि इसके उदाहरण हैं। इन्हें निम्नानुसार निरूपित करते हैं:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-1

2. शाखित श्रृंखला बहुलक:
इन बहुलकों में रेखीय शृंखलाओं में कुछ शाखाएँ होती हैं।
उदाहरण: निम्न घनत्व पॉलिथीन। इन्हें निम्नांकित प्रकार से चित्रित करते हैं:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-2

3. तिर्यकबन्धित अथवा जालक्रम बहुलक:
यह साधारणतः
द्विक्रियात्मक और त्रिक्रियात्मक समूहों वाले एकलकों से बनते हैं तथा विभिन्न रेखीय बहुलक श्रृंखलाओं के बीच प्रबल सहसंयोजक बन्ध होते हैं।

उदाहरणार्थ:
बैकलाइट, मेलैमीन आदि। इन बहुलकों को व्यवस्थात्मक रूप में अग्रलिखित प्रकार से प्रदर्शित करते हैं:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-3

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

प्रश्न 15.3
निम्नलिखित बहुलकों को बनाने वाले एकलकों के नाम लिखिए:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-4
उत्तर:

  1. हेक्सामेथिलीनडाइऐमीन [H2N – (CH2)6 – NH2] तथा ऐडिपिक अम्ल [HOOC – (CH2)4 – COOH)
  2. कैप्रोइक अम्ल।
  3. टेट्राफ्लुओरोएथीन।

प्रश्न 15.4
निम्नलिखित को योगज और संघनन बहुलकों में वर्गीकृत कीजिए:
टेरिलीन, बैकालाइट, पॉलिवाइनिल क्लोराइड, पॉलिथीन।
उत्तर:
योगज बहुलक:
पॉलिवाइनिल क्लोराइड, पॉलिथीन।

संघनन बहुलक: टेरिलीन, बैकालाइट।

प्रश्न 15.5
ब्यूना-N और ब्यूना-S के मध्य अन्तर समझाइए।
उत्तर:
ब्यूना-N; 1, 3-ब्यूटाडाईन और ऐक्रिलोनाइ – ट्राइल का सहबहुलक है, जबकि ब्यूना-S; 1, 3-ब्यूटाडाईन और स्टाइरीन का सहबहुलक है।

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प्रश्न 15.6
निम्न बहुलकों को उनके अन्तरा-आण्विक बलों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए:

  1. नाइलॉन-6, 6, ब्यूना-S, पॉलिथीन
  2. नाइलॉन-6, निओप्रीन, पॉलिवाइनिल क्लोराइड।

उत्तर:
दिए गए बहुलकों को उनके अन्तराआण्विक बलों के बढ़ते क्रम में निम्नवत् व्यवस्थित किया जा सकता है –

  1. ब्यूना-S; पॉलिथीन; नाइलॉन-6, 6
  2. निओप्रीन; पॉलिवाइनिल क्लोराइड; नाइलॉन-6

Bihar Board Class 12 Chemistry बहुलक Additional Important Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 15.1
बहुलक और एकलक पदों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बहुलक:
उच्च आण्विक द्रव्यमान वाला वृहदणु है, जिसमें एकलक से व्युत्पित पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ पाई जाती हैं।

उदाहरणार्थ:
पॉलिथीन, नाइलॉन-6, 6, बैकालाइट, रबर आदि।

एकलक:
एक सरल अणु है, जो बहुलकीकृत होने में सक्षम है और इससे संगत बहुलक बनता है।
उदाहरणार्थ:
वाइनिल क्लोराइड, एथीन, फॉर्मेल्डिहाइड तथा ऐक्रिलोनाइट्राइल, फीनॉल आदि।

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प्रश्न 15.2
प्राकृतिक और संश्लिष्ट बहुलक क्या हैं? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक बहुलक:
उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले वृहदणु हैं। ये पादपों और जन्तुओं में पाए जाते हैं। प्रेटीन, स्टार्च, सेलुलोस, रेजिन, रबर और न्यूक्लीक अम्ल इसके उदाहरण हैं।

संश्लिष्ट बहुलक:
मानव-निर्मित उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले वृहदणु हैं। संश्लिष्ट प्लास्टिक, रेशे और रबर इसके अन्तर्गत आते हैं। दो विशिष्ट उदाहरण पॉलिथीन और डेक्रॉन हैं।

प्रश्न 15.3
समबहुलक और सहबहुलक पदों (शब्दों) में विभेद कर प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
समबहुलक:
ऐसे बहुलक जिनकी पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ केवल एक प्रकार की एकलक इकाइयों से व्युत्पन्न होती हैं, समबहुलक कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ:
पॉलिथीन, टेफ्लॉन, पॉलिस्टाइरीन, नाइलॉन-6 आदि।

सहबहुलक:
दो भिन्न प्रकार के एकलकों के योगात्मक बहुलकन से बनने वाले बहुलक सहबहुलक कहलाते हैं।

उदाहरण:
ब्यूना-S, ब्यूना-N, नाइलॉन-6-6 आदि।

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प्रश्न 15.4
एकलक की प्रकार्यात्मकता को आप किस प्रकार समझाएँगे?
उत्तर:
एकलक की प्रकार्यात्मकता एक अणु में आबन्धी स्थितियों की संख्या है।

उदाहरण:
एथीन प्रोपीन, स्टाइरीन, ऐक्रिलोनाइट्राइल की प्रकार्यात्मकता एक है तथा एथिलीन ग्लाइकाल 1, 3-ब्यूटाइडाईन, ऐडिपिक अम्ल, हेक्सामेथिलीनडाइऐमीन की प्रकार्यात्मकता दो होती है।

प्रश्न 15.5
बहुलकन पद (शब्द) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
एक अथवा अधिक एकलकों की सहसंयोजक बन्धों द्वारा पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयों के एक साथ शृंखलित होने से बनने वाले उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले बहुलक बनने की प्रक्रिया बहुलकन (polymerization) है।

प्रश्न 15.6
(NH-CHR-CO)n एक समबहुलक है या सहबहुलक?
उत्तर:
चूँकि [NH-CHR-CO]n इकाई एकल एकलक इकाई से प्राप्त होती है, अतः यह एक समबहुलक है।

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प्रश्न 15.7
आण्विक बलों के आधार पर बहुलक किन संवर्गों में वर्गीकृत किए जाते हैं?
उत्तर:
विभिन्न बहुलकों की श्रृंखलाओं के मध्य उपस्थित आण्विंक बलों के आधार पर बहुलकों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है:

  1. प्रत्यास्थ बहुलक,
  2. रेशे,
  3. तापसुघट्य बहुलक और,
  4. तापदृढ़ बहुलका।

प्रश्न 15.8
संकलन और संघनन बहुलकन के मध्य आप किस प्रकार विभेद करेंगे?
उत्तर:
संकलन और संघनन बहुलकन के मध्य विभेद (Difference between Addition and Condensation Polymerization):
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-5

प्रश्न 15.9
सहबहुलकन पद (शब्द) की व्याख्या कीजिए और दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सहबहुलकन एक बहुलकन अभिक्रिया है जिसमें एक से अधिक प्रकार की एकलक स्पीशीज के मिश्रण का बहुलकन एक सहबहुलक बनाने के लिए किया जाता है। सहबहुलक को न केवल श्रृंखला वृद्धि बहुलकन से बनाया जा सकता है, अपितु पदश: वृद्धि बहुलकन से भी बनाया जा सकता है। अतः सहबहुलक में एक ही बहुलकन शृंखला में प्रत्येक एकलक की अनेक इकाइयाँ होती हैं।

उदाहरण:
ब्यूना-S; 1, 3-ब्यूटाडाईन तथा स्टाइरीन का सहबहुलक है, और ब्यूना-N; 1, 3-ब्यूटाडाईन तथा ऐक्रिलोनाइट्राइल का सहबहुलक है।

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प्रश्न 15.10
एथीन के बहुलकन के लिए मुक्त मूलक क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-6

प्रश्न 15.11
तापसुघट्य और तापदृढ़ बहुलकों को प्रत्येक के दो उदाहरण के साथ परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
तापसुघट्य बहुलक-ये रेखीय या किंचित शाखित लम्बी श्रृंखला अणु होते हैं, जिन्हें बार-बार तापन द्वारा मृदुलित और शीतलन द्वारा कठोर बनाया जा सकता है। इन बहुलकों के अन्तराआण्विक आकर्षण बल प्रत्यास्थ बहुलकों और रेशों के मध्यवर्ती होते हैं। पॉलिथीन, पॉलिस्टाइरीन, पॉलिवाइनिल क्लोराइड आदि कुछ सामान्य तापसुघट्य हैं।

तापदृढ़ बहुलक-ये बहुलक तिर्यकबद्ध अथवा अत्यधिक शाखित अणु होते हैं, जो साँचों में तापन से विस्तीर्ण तिर्यकबन्ध हो जाते हैं और दोबारा दुर्गलनीय बन जाते हैं। इनका दोबारा उपयोग नहीं किया जा सकता। कुछ सामान्य उदाहरणबैकलाइट, यूरिया-फॉर्मेल्डिहाइड रेजिन आदि हैं।

प्रश्न 15.12
निम्नलिखित बहुलकों को प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त एकलक लिखिए:

  1. पॉलिवाइनिल क्लोराइड
  2. टेफ्लॉन
  3. बैकेलाइट।

उत्तर:

  1. पॉलिवाइनिल क्लोराइड का एकलक CH2 = CH – Cl (वाइनिल क्लोराइड) है।
  2. टेफ्लॉन का एकलक CF2 = CF2 (टेट्राफ्लुओरोएथिलीन) है।
  3. बैकालाइट के बनने में प्रयुक्त होने वाले एकलक HCHO (फॉर्मेल्डिहाइड) और C6H5OH (फीनॉल) हैं।

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प्रश्न 15.13
मुक्त मूलक योगज बहुलकन में प्रयुक्त एक सामान्य प्रारम्भक का नाम और संरचना लिखिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-7

प्रश्न 15.14
रबर अणुओं में द्विबन्धों की उपस्थिति किस प्रकार उनकी संरचना और क्रियाशीलता को प्रभावित करती है?
उत्तर:
संरचना की दृष्टि से प्राकृतिक रबर एक रेखीय सिस-1, 4-पॉलिआइसोप्रीन है तथा इसे आइसोप्रीन इकाइयों के 1,4-बहुलकन से प्राप्त किया जाता है। इस बहुलक में द्विआबन्ध आइसोप्रीन इकाइयों के C2 और C3 के मध्य स्थित होते हैं। द्विआबन्ध का सिस अभिविन्यास दुर्बल अन्तराआण्विक बलों द्वारा प्रभावी आकर्षण के लिए शृंखलाओं को समीप नहीं आने देता। अत: प्राकृतिक रबर अर्थात् सिस-पॉलिआइसोप्रीन की कुण्डलित संरचना होती है और वह प्रत्यास्थता प्रदर्शित करता है।
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प्रश्न 15.15
रबर का वल्कनीकरण के मुख्य उद्देश्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
रबर का वल्कनीकरण:
प्राकृतिक रबर उच्च ताप (>335K) पर नर्म और निम्न ताप (<283K) पर भंगुर हो जाता है एवं उच्च जल अवशोषण क्षमता प्रदर्शित करता है।

यह अध्रुवीय विलायकों में घुलनशील है और ऑक्सीकरण कर्मकों के आक्रमण के प्रति प्रतिरोधी नहीं है। इन भौतिक गुणों में सुधार के लिए वल्कनीकरण की प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में अपरिष्कृत रबर को सल्फर और उपयुक्त योगजों के साथ 373K से 415K के ताप परास के मध्य गर्म किया जाता है। वल्कनीकरण से द्विबन्धों की अभिक्रियाशील स्थितियों पर सल्फर तिर्यक बन्ध बनाता है और इस प्रकार रबर कठोर हो जाता है।

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प्रश्न 15.16
नाइलॉन-6 और नाइलॉन-6, 6 में पुनरावृत्त एकलक इकाइयाँ क्या हैं?
उत्तर:
नाइलॉन-6 की पुनरावृत्त एकलक इकाई [NH(CH2)5-CO] है। नाइलॉन-6 ,6 बहुलक की पुनरावृत्त एकलक इकाई दो एकलकों हेक्सामेथिलीनडाइऐमीन और ऐडिपिक अम्ल से व्युत्पित होती है जिसकी संरचना निम्नवत् होती है:
[NH – (CH2)6 – NH – CO(CH2)4 – CO]

प्रश्न 15.17
निम्नलिखित बहुलकों के एकलकों का नाम और संरचना लिखिए:

  1. ब्यूना-S,
  2. ब्यूना-N,
  3. डेक्रॉन,
  4. निओप्रीन।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-9

प्रश्न 15.18
निम्नलिखित बहुलक संरचनाओं के एकलक की पहचान कीजए:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-10
उत्तर:
बहुलक बनाने वाले एकलक निम्नलिखित हैं:

1. डेकेनोइक अम्ल [HOOC(CH2)8 COOH] और हेक्सा मेथिलीनडाइऐमीन [H2N(CH2)6NH2]
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-11

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प्रश्न 15.19
एथीन ग्लाइकॉल और टेरेफ्थैलिक अम्ल से डेक्रॉन किस प्रकार प्राप्त किया जाता है?
उत्तर:
एथिलीन ग्लाइकॉल और टेरेपथैलिक अम्ल के बहुलीकरण द्वारा 420-460K पर जिंक ऐसीटेट तथा ऐन्टिमनी ट्राइऑक्साइड के उत्प्रेरकीय मिश्रण की उपस्थिति कराने पर डेक्रॉन बनाया जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 15 बहुलक img-12

प्रश्न 15.20
जैवनिम्नीय बहुलक क्या हैं? एक जैवनिम्नीय ऐलिफैटिक पॉलिएस्टर का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ऐसे बहुलकों को जो एक समय बाद जीवाण्विक निम्नीकरण के फलस्वरूप स्वयं ही विघटित हो जाते हैं; जैवनिम्नीय बहुलक कहते हैं।

उदाहरण:
पॉलि-β-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट-को-β-हाइड्रॉक्सी-वैलेरेट (PHBV):
यह 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनोइक अम्ल और 3-हाइड्रॉक्सीपेन्टेनोइक अम्ल के सहबहुलकन से प्राप्त होता है। PHBV का उपयोग विशिष्ट पैकेजिंग, अस्थियों में प्रयुक्त युक्तियों और औषधों के नियन्त्रित मोचन में भी होता है। पर्यावरण में PHVB का जीवाण्विक निम्नीकरण हो जाता है।
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Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry जैव-अणु Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1
ग्लूकोस तथा सुक्रोस जल में विलेय हैं, जबकि साइक्लोहेक्सेन अथवा बेन्जीन (सामान्य छह सदस्यीय वलय युक्त यौगिक) जल में अविलेय होते हैं। समझाइए।
उत्तर:
ग्लूकोस में पाँच -OH समूह तथा सुक्रोस में आठ -OH समूह होते हैं। ये -OH समूह जल के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बनाते हैं। इस विस्तीर्ण अन्तराअणुक हाइड्रोजन आबन्ध के कारण ग्लूकोस तथा सुक्रोस जल में विलेय होते हैं, अपितु इनके आण्विक द्रव्यमान उच्च अर्थात् क्रमशः 180 amu तथा 342 amu हैं।

दूसरी ओर बेन्जीन (आण्विक द्रव्यमान = 78) तथा साइक्लोहेक्सेन (आण्विक द्रव्यमान = 84) कम आण्विक द्रव्यमान वाले सरल अणु होते हैं, परन्तु ये जल में अविलेय होते हैं। इसका कारण यह है कि इन यौगिकों में -OH समूह नहीं होते हैं, इसलिए इनमें जल के साथ हाइड्रोजन आबन्ध नहीं बनते।

इसके अतिरिक्त विलेयता के सामान्य नियम के अनुसार “समान समान को घोलता है।” अत: बेन्जीन तथा साइक्लोहेक्सेन जो कि अध्रुवी अणु हैं, ध्रुवी जल अणुओं में नहीं घुलते हैं।

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प्रश्न 14.2
लैक्टोस का जलअपघटन से किन उत्पादों के बनने की अपेक्षा करते हैं?
उत्तर:
जलअपघटन पर लैक्टोस मोनोसैकेराइड के दो अणु देता है। इसके उत्पाद D – ग्लूकोस तथा D – गैलेक्टोम हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु img-1

प्रश्न 14.3
D – ग्लूकोस के पेन्टाएसीटेट में आप ऐल्डिहाइड समूह की अनुपस्थिति को कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
चूँकि ग्लूकोस के पेन्टाऐसीटेट में C1 में मुक्त -OH समूह नहीं होता, अतः यह जलीय विलयन में जल अपघटित नहीं होता और ऐल्डिहाइड समूह नहीं बनता। अतः ग्लूकोस पेंटाऐसीटेट NH2OH के साथ अभिक्रिया करके ग्लकोस आक्सिम नहीं बनाता है।
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अतः ग्लूकोस पेन्टाऐसीटेट में ऐल्डिहाइड समूह नहीं होता।

प्रश्न 14.4
ऐमीनो अम्लों की गलनांक एवं जल में विलेयता सामान्यतः संगत हैलो अम्लों की तुलना में अधिक होती है। समझाइए।
उत्तर:
ऐमीनो अम्लों में ज्विटर आयन (\(\left(\mathrm{N}^{+} \mathrm{H}-\mathrm{CR}-\mathrm{CO} \overline{\mathrm{O}}\right)\)) होते हैं, जिनकी प्रकृति द्विध्रुवी होती है। प्रबल द्विध्रुवीय संयोजन के कारण ऐमीन अम्लों (ठोस) के गलनांक उच्च होते हैं।

ये जल में अधिक घुलनशील होते हैं, क्योंकि ये जल के अणुओं के साथ अन्तरा आणुविक हाइड्रोजन आबन्ध में प्रयुक्त होते हैं। दूसरी ओर हैलोअम्ल द्विध्रुवीय नहीं होते और जल के अणुओं के हाइड्रोजन आबन्ध में प्रयुक्त होते हैं किन्तु हैलोजन परमाणु के साथ नहीं। अत: हैलोअम्ल कम गलनांक वाले तथा जल में कम विलेयशील होते हैं। अतः ऐमीनों अम्ल के गलनांक एवं जल में विलेयता संगत हैलोअम्लों की तुलना में अधिक होती है।

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प्रश्न 14.5
अण्डे को उबालने पर उसमें उपस्थित जल कहाँ चला जाता है?
उत्तर:
अण्डे को उबालने पर इसमें प्रोटीनों का विकृतिकरण हो जाता है। इसमें उपस्थित जल विकृतिकृत प्रोटीनों में सम्भवतः हाइड्रोजन आबन्ध द्वारा अवशोषित या अधिशोषित हो जाता है तथा विलुप्त हो जाता है।

प्रश्न 14.6
हमारे शरीर में विटामिन C संचित क्यों नहीं होता?
उत्तर:
विटामिन C जल में विलेय होता है, अतः यह मूत्र के साथ सरलता से उत्सर्जित हो जाता है तथा शरीर में संचित नहीं होता है। अतः इसकी नियमित मात्रा लेना हमारे लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.7
यदि DNA के थायमीन युक्त न्यूक्लिओटाइड का जलअपघटन किया जाए तो कौन-कौन से उत्पाद बनेंगे?
उत्तर:
जलअपघटन पर, DNA से थायमीन के अतिरिक्त, दो उत्पाद 2-डिऑक्सी-D-राइबोस तथा फॉस्फोरिक अम्ल हैं।

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प्रश्न 8
जब RNA का जलअपघटन किया जाता है तो प्राप्त क्षारकों की मात्राओं के मध्य कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह तथ्य RNA की संरचना के विषय में क्या संकेत देता है?
उत्तर:
DNA अणु में दो कुण्डलिनियों (strands) में चार पूरक क्षारक परस्पर युग्म बनाए रखते हैं; जैसे – साइटोसीन (C) सदैव ग्वानीन (G) के साथ युग्म बनाता है, जबकि थायमीन (T) सदैव ऐडेनीन के साथ युग्म बनाता है। इसलिए जब एक DNA अणु जलअपघटित होता है, तब साइटोसीन की मोलर मात्राएँ सदैव ग्वानीन के तुल्य तथा इसी प्रकार ऐडेनीन सदैव थायमीन के तुल्य होती है।

RNA में भी चार क्षारक होते हैं, जिनमें प्रथम तीन DNA के समान, परन्तु चौथा क्षारक यूरेसिल (U) होता है। चूँकि RNA में प्राप्त चारों क्षारकों (C, G, A तथा U) की मात्राओं के मध्य कोई सम्बन्ध नहीं होता है, इसलिए क्षारक-युग्मन सिद्धान्त (अर्थात् A के साथ U तथा C के साथ G का युग्म) का पालन नहीं होता है; अत: DNA के विपरीत RNA में एक कुण्डलिनी होती है।

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1
मोनोसैकेराइड क्या होते हैं?
उत्तर:
मोनोसैकेराइड:
वे कार्बोहाइड्रेट जिनको पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन के और अधिक सरल यौगिकों में जल-अपघटित नहीं किया जा सकता, मोनोसैकेराइड कहलाते हैं। लगभग 20 मोनोसैकेराइड प्रकृति में ज्ञात हैं। इसके कुछ सामान्य उदाहरण ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस आदि हैं।

कार्बन परमाणुओं की संख्या एवं प्रकार्यात्मक समूह के आधार पर मोनोसैकेराइड को पुन: वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि मोनोसैकेराइड में ऐल्डिहाइड समूह है, तो उसे ऐल्डोस और यदि उसमें कीटों का समूह है, तो उसे कीटोस कहते हैं। मोनोसैकेराइड में निहित कार्बन परमाणुओं की संख्या को भी नाम से सम्मिलित किया जाता है, जो कि निम्नांकित सारणी में दिए गए उदाहरणों से स्पष्ट है।

सारणी: विभिन्न प्रकार के मोनोसैकेराइड –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु img-3

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प्रश्न 14.2
अपचायी शर्करा क्या होती है?
उत्तर:
वे सभी कार्बोहाइड्रेट जो फेहलिंग विलयन को Cu2O के लाल अवक्षेप में अथवा टॉलेन अभिकर्मक को धात्विक Ag में अपचयित कर देते हैं, अपचायी शर्करा कहलाते हैं। सभी मोनोसैकेराइड (ऐल्डोस तथा कीटोस दोनों) तथा डाइसैकेराइड, सुक्रोस को छोड़कर, अपचायी शर्करा होते हैं।

प्रश्न 14.3
पौधों में कार्बोहाइड्रेटों के दो मुख्य कार्यों को लिखिए।
उत्तर:

  1. पौधों की कोशिका भित्ति सेलुलोस की बनी होती हैं।
  2. पॉलिसैकेराइड स्टार्च पौधों में प्रमुख संचित खाद्य पदार्थ के रूप में होता है।

प्रश्न 14.4
निम्नलिखित को मोनोसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड में वर्गीकृत कीजिए:
राइबोस, 2-डिऑक्सीराइबोस, माल्टोस, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस तथा लैक्टोस
उत्तर:
मोनोसैकेराइड:
राइबोस, 2-डिऑक्सी- राइबोस, गैलेक्टोस तथा फ्रक्टोस।

डाइसैकेराइड:
माल्टोस, लैक्टोस।

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प्रश्न 14.5
ग्लाइकोसाइडी बन्ध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
डाइसैकेराइड तनु अम्ल तथा एन्जाइम की उपस्थिति में जलअपघटन द्वारा समान अथवा असमान मोनोसैकेराइड्स के दो अणु देते हैं। दोनों मोनोसैकेराइड इकाइयाँ, जल के एक अणु के निष्कासन के उपरान्त बने ऑक्साइड बन्ध द्वारा जुड़ी रहती हैं। परमाणु के द्वारा दो मोनोसैकेराइड इकाइयों में इस प्रकार के आबन्ध को ग्लाइकोसाइडी बन्ध (glycosidic linkage) कहते हैं।
उदाहरणार्थ:
सुक्रोस एक सामान्य डाइसैकेराइड है, जो जलअपघटन पर सममोलर मात्रा में D-(+)-ग्लूकोस तथा D-(-)-फ्रक्टोस देता है।
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ये दोनों मोनोसैकेराइड इकाइयाँ α-ग्लूकोस के C1 तथा β-ग्लूकोस C2 के मध्य ग्लाइकोसाडी बन्ध द्वारा जुड़ी रहती हैं। चूँकि ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस का अपचायक समूह ग्लाइकोसाइडी बन्ध निर्माण में प्रयुक्त होता है; अत: सुक्रोस एक अनअपचायी शर्करा है।
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प्रश्न 14.6
ग्लाइकोजन क्या होता है तथा ये स्टार्च से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
ग्लाइकोजन (Glycogen):
प्राणी शरीर में कार्बोहाइड्रेट, ग्लाइकोजन के रूप से संगृहीत रहता है। चूंकि इसकी संरचना ऐमिलोपेक्टिन के समान होती है; अत: इसे प्राणी स्टार्च भी कहा जाता है एवं यह ऐमिलोपेक्टिन से अधिक शाखित होता है। यह यकृत मांसपेशियों तथा मस्तिष्क में उपस्थित रहता है। जब शरीर को ग्लूकोस की आवश्यकता होती है, एन्जाइम ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में तोड़ देते हैं। ग्लाइकोजन यीस्ट तथा कवक में भी मिलता है।

स्टार्च (Starch):
स्टार्च पौधों में मुख्य संगृही पॉलिसैकेराइड है। यह मनुष्यों के लिए आहार का मुख्य स्रोत है। दाल, जड़, कन्द तथा कुछ सब्जियों में स्टार्च प्रचुर मात्रा में मिलता है। यह 4-ग्लूकोस का बहुलक है तथा दो घटकों ऐमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन से मिलकर बनता है। ऐमिलोस जल में घुलनशील अवयव है तथा यह स्टार्च का 15-20% भाग निर्मित करता है। रासायनिक रूप से ऐमिलोस 200-1000 C-D (+)-ग्लूकोस इकाइयों की अशाखित श्रृंखला होती है, जो C1 – C4 ग्लाइकोसाडी बन्ध द्वारा जुड़ी रहती हैं।
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ऐमिलोपेक्टिन जल में अविलेय होती है तथा यह स्टार्च का 80-85% भाग बनाती है। यह तथा ग्लाइकोजन दोनों α-D (+)-ग्लूकोस इकाइयों की शाखित श्रृंखला होती है, जिसमें C1 – C4 ग्लाइकोसाइडी बना होते हैं, जबकि शाखित C1 – C6 ग्लाइकोसाइडी बन्ध द्वारा होता है।

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प्रश्न 14.7
(अ) सुक्रोस तथा (ब) लैक्टोस के जलअपघटन से कौन-से उत्पाद प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
सुक्रोस तथा लैक्टोस दोनों डाइसैकेराइड हैं। सुक्रोस जलअपघटन पर ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस का एक-एक अणु देता है, जबकि लैक्टोस जलअपघटन पर ग्लूकोस तथा गैलेक्टोस का एक-एक अणु देता है।
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प्रश्न 14.8
स्टार्च तथा सेलुलोस में मुख्य संरचनात्मक अन्तर क्या है?
उत्तर:
स्टार्च दो घटकों ऐमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन से मिलकर बनता है। ऐमिलोस α-D-ग्लूकोस का रेखीय बहुलक होता है, जबकि सेलुलोस β-D-ग्लूकोस बनी रेखीय बहुलक पॉलीसैकेराइड होता है। ऐमिलोस में एक ग्लूकोस इकाई का 9 अन्य ग्लूकोस इकाई के C4 से α-ग्लाइकोसाइडी बन्ध द्वारा होता है। पॉलीसैकेराइड में इन्हें निम्न चित्र से दर्शाया जा सकता है:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु img-8
सेलुलोस सेलुलोस, β-D-ग्लूकोस से बनी ऋजु श्रृंखलायुक्त पॉलिसैकेराइड है, जिसमें एक ग्लूकोस इकाई के C1 तथा दूसरी ग्लूकोस इकाई के C4 के मध्य ग्लाइकोसाइडी बन्ध बनता है।

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प्रश्न 14.9
क्या होता है जब D – ग्लूकोस की अभिक्रिया निम्नलिखित अभिकर्मकों से करते हैं?

  1. HI
  2. ब्रोमीन जल
  3. HNO3

उत्तर:
1. यह HI के साथ अधिक गर्म किए जाने पर n-हेक्सेन बनाता है जिससे ज्ञात होता है कि सभी कार्बन परमाणु एक सीधी श्रृंखला में जुड़े रहते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु img-9

2. ग्लूकोस ब्रोमीन जल जैसे दुर्बल आक्सीकरण कर्मक द्वारा आक्सीकरण से छह कार्बन परमाणुयुक्त कार्बोक्सिलिक अम्ल (ग्लूकोनिक अम्ल) देता है। यह सिद्ध करता है कि ग्लूकोस का कार्बोनिल समूह एल्डिहाइड समूह के रूप में उपस्थित है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु img-10

3. ग्लूकोस तथा ग्लूकोनिक अम्ल दोनों ही नाइट्रिक अम्ल द्वारा आक्सीकरण से एक डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल, सैकेरिक अम्ल बनाते हैं। यह ग्लूकोस में प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक समूह की उपस्थिति को दर्शाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-11

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प्रश्न 14.10
ग्लूकोस की उन अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए जो इसकी विवृत श्रृंखला संरचना के द्वारा नहीं समझाई जा सकतीं।
उत्तर:
निम्नलिखित अभिक्रियाएँ ग्लूकोस को विवृत श्रृंखला संरचना के द्वारा नहीं समझाई जा सकती हैं, इन्हें बॉयर ने प्रस्तावित किया था –

1. ऐल्डिहाइड समूह उपस्थित होते हुए भी ग्लूकोस 2, 4-DNP परीक्षण तथा शिफ-परीक्षण नहीं देता एवं यह NaHSO3 के साथ हाइड्रोजन सल्फाइड योगज उत्पाद नहीं बनाता।

2. ग्लूकोस का पेन्टाऐसीटेट, हाइड्रॉक्सिऐमीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता जो मुक्त -CHO समूह की अनुपस्थिति को इंगित करता है।

3. जब D-ग्लूकोस को शुष्क हाइड्रोजन क्लोराइड गैस की उपस्थिति में मेथेनॉल के साथ अभिकृत कराया जाता है, तब यह दो समावयव मोनोमेथिल व्युत्पन्न देता है, जिन्हें α-D-ग्लूकोसाइड तथा मेथिल β-D-ग्लूकोसाइड के नाम से जाना जाता है। ये ग्लूकोसाइड फेहलिंग विलयन को अपचयित नहीं करते तथा हाइड्रोजन सायनाइड अथवा हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ अभिक्रिया नहीं करते हैं तथा मुक्त -CHO समूह की अनुपस्थिति को इंगित करते हैं।

प्रश्न 14.11
आवश्यक तथा अनावश्यक ऐमीनो अम्ल क्या होते हैं? प्रत्येक प्रकार के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ऐमीनो अम्ल जो जीवों के स्वास्थ्य तथा उनकी वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं, परन्तु शरीर में संश्लेषित नहीं होते हैं, आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं; जैसे-वैलीन, ल्यूसीन, आर्जिनीन आदि।

अनावश्यक ऐमीनो अम्ल:
ऐमीनों अम्ल जो जीवों के स्वास्थ्य तथा उनकी वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं तथा शरीर में संश्लेषित हो सकते हैं, अनावश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं; जैसे-ग्लाइसीन, ऐलैनीन, ऐस्पार्टिक अम्ल आदि।

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प्रश्न 14.12
प्रोटीन के सन्दर्भ में निम्नलिखित को परिभाषित कीजिए:

  1. पेप्टाइड बन्ध
  2. प्राथमिक संरचना
  3. विकृतीकरण।

उत्तर:
1. पेप्टाइड बन्ध:
रासायनिक रूप से पेप्टाड आबन्ध, -COOH समूह तथा -NH2 समूह के मध्य बना एक आबन्ध होता है। दो एक जैसे अथवा भिन्न ऐमीनो अम्लों के अणुओं के मध्य अभिक्रिया एक अणु के ऐमीनों समूह तथा दूसरे अणु के कार्बोक्सिल समूह के मध्य संयोग से होती है जिसके फलस्वरूप एक जल का अणु मुक्त होता है तथा पेप्टाइड आबन्ध -CO-NH- बनता है।

चूँकि उत्पाद दो ऐमीनो अम्लों के द्वारा बनता है; अत: इसे डाइपेप्टाइड कहते हैं। उदाहरणार्थ-जब ग्लाइसीन का कार्बोक्सिल समूह, एलैनीन के ऐमीनो समूह के साथ संयोग करता है तो हमें एक डाइपेप्टाइड, ग्लाइसिलऐलैनीन प्राप्त होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-12

2. प्राथमिक संरचना:
प्रोटीन में एक अथवा अनेक पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएँ उपस्थित हो सकती हैं। किसी प्रोटीन के प्रत्येक पॉलिपेप्टाइड में ऐमीनो अम्ल एक विशिष्ट क्रम में संयुक्त होते हैं। ऐमीनो अम्लों का यह विशिष्ट क्रम प्रोटीन्स की प्राथमिक संरचना बनाता है। प्राथमिक संरचना में किसी भी प्रकार का परिवर्तन अर्थात् ऐमीनो अम्लों के क्रम में परिवर्तन से भिन्न प्रोटीन उत्पन्न होते हैं।

3. विकृतीकरण:
जैविक निकाय में पाई जाने वाली विशेष त्रिविमा संरचना तथा जैविक सक्रियता वाले प्रोटीन, प्राकृत प्रोटीन कहलाते हैं। जब प्राकृत प्रोटीन में भौतिक परिवर्तन करते हैं; जैसे-ताप में परिवर्तन अथवा रासायनिक परिवर्तन करते हैं (जैसे – pH में परिवर्तन आदि किया जाता है) तो हाइड्रोजन आबन्धों में अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो जाती है, जिसके कारण गोलिका (ग्लोब्यूल) खुल जाती है तथा हेलिक्स अकुण्डलित हो जाती है तथा प्रोटीन अपनी जैविक सक्रियता को खो देता है।

इसे प्रोटीन का विकृतीकरण कहते हैं। विकृतीकरण के दौरान 2° तथा 3° संरचनाएँ नष्ट हो जाती हैं, परन्तु 1° संरचना अप्रभावित रहती है। उबालने पर अण्डे की सफेदी का स्कन्दन विकृतीकरण का एक सामान्य उदाहरण है। एक अन्य उदाहरण दही का जमना है, जो दूध में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा लैक्टिक अम्ल उत्पन्न होने के कारण होता है।

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प्रश्न 14.13
प्रोटीन की द्वितीयक संरचना के सामान्य प्रकार क्या हैं?
उत्तर:
किसी प्रोटीन की द्वितीयक संरचना का सम्बन्ध उस आकृति से है, जिसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला विद्यमान होती है। यह दो भिन्न प्रकार की संरचनाओं में विद्यमान होती हैं – α-हेलिक्स तथा β-प्लीटेड शीट संरचना । ये संरचनाएँ पेप्टाइड आबन्ध के image 13 समूह के मध्य हाइड्रोजन आबन्ध के कारण पॉलिपेप्टाइड की मुख्य श्रृंखला के नियमित कुण्डलन में उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 14.14
प्रोटीन की -हेलिक्स संरचना के स्थायीकरण में कौन-से आबन्ध सहायक होते हैं?
उत्तर:
α-हेलिक्स संरचना एक ऐसी संरचना है, जिसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला में सभी सम्भव हाइड्रोजन आबन्ध बन सकते हैं। इसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला दक्षिणावर्ती पेंच के समान मुड़ी रहती है फलस्वरूप प्रत्येक ऐमीनों अम्ल के अवशिष्ट का -NH समूह, कुण्डली के अगले मोड़ पर स्थित >C = 0 समूह के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बनाता है।

प्रश्न 14.15
रेशेदार तथा गोलिकाकार (globular) प्रोटीन को विभेदित कीजिए।
उत्तर:
1. रेशेदार प्रोटीन (Fibrous Proteins):
जब पॉलिपेप्टाइड शृंखलाएँ समानान्तर होती हैं तथा हाइड्रोजन एवं डाइसल्फाइड आबन्धों द्वारा संयुक्त रहती हैं तो रेशासम (रेशे जैसी) संरचना बनती है। इस प्रकार के प्रोटीन सामान्यतः जल में अविलेय होते हैं। रेशेदार प्रोटीन जन्तु ऊतकों के प्रमुख संरचनात्मक पदार्थ होते हैं। कुछ सामान्य उदाहरण किरेटिन (बाल, ऊन तथा रेशम में उपस्थित) तथा मायोसिन (मांसपेशियों में उपस्थित) आदि हैं।

2. गोलिकाकार प्रोटीन (Globular Proteins):
जब पॉलिपेप्टाइड की श्रृंखलाएँ कुण्डली बनाकर गोलाकृति प्राप्त कर लेती हैं तो ऐसी संरचनाएँ प्राप्त होती हैं। ये सामान्यत: जल में विलेय होती हैं; क्योंकि इनके अणु दुर्बल अन्तराअणुक बलों द्वारा जुड़े रहते हैं। इन्सुलिन तथा ऐल्बुमिन इनके सामान्य उदाहरण हैं।

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प्रश्न 14.16
ऐमीनो अम्लों की उभयधर्मी प्रकृति को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
ऐमीनो अम्ल सामान्यत:
रंगीन क्रिस्टलीय टोस होने हैं। ये जल-विलेय तथा उच्च गलनांकी ठोस होते हैं, जो सामान्य ऐमीनो तथा कार्बोक्सिलिक अम्लों की भाँति व्यवहार नहीं करते. अपितु लवणों की भाँति गुण दर्शाते हैं। इसका कारण एक ही अणु में अम्लीय (कार्बोक्सिल समूह) तथा क्षारकीय (ऐमीनो समूह) समूहों की उपस्थिति है।

जलीय विलयन में कार्बोक्सिल समूह एक प्रोटॉन मुक्त कर सकता है, जबकि एमीनो समूह एक प्रोटॉन ग्रहण कर सकता है, जिसके फलस्वरूप एक द्विध्रुवीय आयन बनता है, जिसे ज्विटर आयन अथवा उभयविष्ट आयन कहते हैं। यह उदासीन होता है परन्तु इसमें धनावेश तथा ऋणावेश दोनों ही उपस्थित है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-13
उभयविष्ट आयनिक रूप में ऐमीनो अम्ल उभयधर्मी प्रकृति दर्शाते हैं तथा वे अम्लों एवं क्षारकों दोनों के साथ अभिक्रिया करते हैं।

प्रश्न 14.17
एन्जाइम क्या होते हैं?
उत्तर:
एन्जाइम जैव-उत्प्रेरक होते हैं। जीवधारियों में होने वाली विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं में समन्वयन के कारण ही जीवन सम्भव होता है। उदाहरणार्थ: भोजन का पाचन, उपयुक्त अणुओं का अवशोषण तथा अन्ततः ऊर्जा का उत्पादन। इस प्रक्रम में अभिक्रियाएँ एक अनुक्रम में होती हैं तथा ये सभी अभिक्रियाएँ शरीर में मध्यम परिस्थितियों में सम्पन्न होती हैं। यह कुछ जैव-उत्प्रेरकों की सहायता से होता है।

इन्हीं जैव-उत्प्रेरकों को एन्जाइम कहा जाता है। लगभग सभी एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन होते हैं। एन्जाइम किसी विशेष अभिक्रिया अथवा विशेष क्रियाधार के लिए विशिष्ट होते हैं अर्थात् प्रत्येक एन्जाइम केवल एक रासायनिक अभिक्रिया को उत्प्रेरित करता है। ये अत्यन्त क्रियाशील होते हैं। इनकी अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा की आवश्यकता होती है। ये अनूकूलतम ताप (25° – 40°C) और अनूकूलतम pH (6 – 7.7) पर सबसे अच्छा कार्य करते हैं।

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प्रश्न 14.18
प्रोटीन की संरचना पर विकृतीकरण का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
विकृतीकरण के दौरान प्रोटीन की 2° तथा 3° संरचनाएँ नष्ट हो जाती हैं, परन्तु 1° संरचना अप्रभावित रहती है! विकृतीकरण के कारण गोलिकाकार प्रोटीन रेशेदार प्रोटीन में परिवर्तित हो जाती है, जिससे उनकी जैविक प्रकृति नष्ट हो जाती है। उबालने पर अण्डे की सफेदी का स्कंदन, दही का जमना आदि उदाहरण हैं।

प्रश्न 14.19
विटामिन्स को किसी प्रकार वगीकृत किया गया है? रक्त के थक्के जमने के लिए जिम्मेदार विटामिन का नाम दीजिए।
उत्तर:
जल तथा विलेय के आधार पर विटामिन्स को दो समूहों में वगीकृत किया गया है:
1. वसा विलेय विटामिन:
इस वर्ग में उन विटामिनों को रखा गया है, जो वसा तथा तेल में विलेय होते हैं परन्तु जल में अविलेय। ये विटामिन A, D, E तथा K हैं। ये यकृत तथा एडीपोस ऊतक में संग्रहित रहते हैं।

2. जल में विलेय विटामिन:
B वर्ग के विटामिन तथा विटामिन C जल में विलेय होते हैं, अतः इन्हें एक साथ इस वर्ग में रखा गया है। जल में विलेय विटामिनों की पूर्ति हमारे आहार में नियमित रूप से होनी चाहिए क्योंकि ये आसानी से मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाते हैं तथा हमारे शरीर में (विटामिन B12 के अतिरिक्त) संचित नहीं किया जा सकता है। रक्त के थक्के जमने के लिए विटामिन K उत्तरदायी होता हैं।

प्रश्न 14.20
विटामिन A और C हमारे लिए आवश्यक क्यों हैं? उनके महत्त्वपूर्ण स्रोत दीजिए।
उत्तर:
विटामिन A हमारे लिए आवश्यक है क्योंकि इसकी कमी से जीरॉफ्थैल्मिया (आँख के कॉर्निया का कठोरीकरण) तथा रात्रि-अन्धता रोग हो जाते हैं। इसके महत्त्वपूर्ण स्रोत मछली के यकृत का तेल, गाजर, मक्खन तथा दूध हैं। विटामिन C हमारे लिए आवश्यक है; क्योंकि इसकी कमी से स्कर्वी (मसूडों से रक्त बहना) तथा पायरिया (दाँतों का ढीलापन तथा रक्त-स्राव) रोग हो जाते हैं। इसके महत्वपूर्ण स्रोत नींबूवंशीय (सिट्रस) फल, आँवला तथा हरे पत्ते वाली सब्जियाँ हैं।

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प्रश्न 14.21
न्यूक्लीक अम्ल क्या है? इनके दो महत्त्वपूर्ण कार्य लिखिए।
उत्तर:
ऐसे वे जैव-अणु जो सभी जीवित कोशिकाओं के नाभिकों में न्यूक्लिओप्रोटीन अथवा क्रोमोसाम के रूप में पाए जाते हैं, न्यूक्लीक अम्ल कहलाते हैं। न्यूक्लीक अम्ल मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-डऑक्सीराइबोस न्यूक्लीक अम्ल (DNA) तथा राइबोसन्यूक्लीक अम्ल (RNA)। चूँकि न्यूक्लीक अम्ल न्यूक्लिओटाइडों की लम्बी श्रृंखला वाले बहुलक होते हैं; अतः इन्हें पॉलिन्यूक्लिओटाइड भी कहते हैं।

न्यूक्लीक अम्लों के दो जैविक कार्य निम्नवत् हैं:

1. DNA आनुवंशिकता का रासायनिक आधार है तथा इसे आनुवंशिक सूचनाओं के संग्राहक के रूप में जाना जाता है। DNA लाखों वर्षों से किसी जीव की विभिन्न प्रजातियों की पहचान बनाए रखने के लिए विशिष्ट रूप से उत्तरदायी है। कोशिका विभाजन के समय एक DNA अणु स्वप्रतिकरण (self-replication) में सक्षम होता है तथा पुत्री कोशिका में समान DNA रज्जुक का अन्तरण होता है।

2. न्यूक्लीक अम्ल (DNA तथा RNA) का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य कोशिका में प्रोटीन का संश्लेषण है। वास्तव में कोशिका में प्रोटीन का संश्लेषण विभिन्न RNA अणुओं द्वारा होता है, परन्तु किसी विशेष प्रोटीन के संश्लेषण का सन्देश DNA में उपस्थित होता है।

प्रश्न 14.22
न्यूक्लिओसाइड तथा न्यूक्लिओटाइड में क्या अन्तर है?
उत्तर:
किसी क्षारक के शर्करा की 1 स्थिति पर जुड़ने से निर्मित इकाई को न्यूक्लिओसाइड कहते हैं। अत: सामान्य रूप में न्यूक्लिओसाइड को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-शर्करा-क्षारक। उदाहरणार्थ-निम्नलिखित संरचना (क) न्यूक्लिओसाइड को प्रदर्शित करती है:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-14
न्यूक्लिओटाइड में न्यूक्लीक अम्ल के तीनों मुख्य यौगिक अर्थात् एक फॉस्फोरिक अम्ल समूह, एक पेन्टोस शर्करा तथा एक नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं। इन्हें पेन्टोस शर्करा के C5 – OH समूह के फॉस्फोरिक अम्ल द्वारा एस्टरीकरण से प्राप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ–उपर्युक्त संरचना (ख) न्यूक्लिओटाइड को प्रदर्शित करती है। प्यूरीन तथा पिरिमिडीन न्यूक्लिओटाइड में पाये जाने नाइट्रोजन युक्त क्षारक हैं।

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प्रश्न 14.23
DNA के दो रज्जुक समान नहीं होते, अपितु एक-दूसरे के पूरक होते हैं। समझाइए।
उत्तर:
DNA अणु में दो रज्जुक, एक रज्जुक के प्यूरीन क्षारक तथा अन्य के पिरिमिडीन क्षारक के मध्य या इसके विपरीत के मध्य हाइड्रोजन आबन्धों के द्वारा जुड़े रहते हैं। क्षारकों के विभिन्न आकारों एवं ज्यामितियों के कारण DNA में एकमात्र सम्भव युग्मन G (ग्वानीन) तथा C (साइटोसीन) के मध्य तीन हाइड्रोजन आबन्धों द्वारा हो सकता है। दूसरे शब्दों में क्षारकों A (ऐडेनीन) तथा T (थायमीन) के मध्य दो हाइड्रोजन-आबन्धों द्वारा युग्मन सम्भव होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-15
इस क्षारक-युग्मन सिद्धान्त के कारण एक रज्जुक में क्षारकों का अनुक्रम दूसरे रज्जुक में क्षारकों के अनुक्रम को स्वत: व्यवस्थित कर देता है। अत: DNA के दो रज्जुक समान नहीं होते, अपितु एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-16

प्रश्न 14.24
DNA तथा RNA में महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक एवं क्रियात्मक अन्तर लिखिए।
उत्तरः
संरचनात्मक अन्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-17

क्रियात्मक अन्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 14 जैव-अणु  img-18

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प्रश्न 14.25
कोशिका में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के RNA कौन-से हैं?
उत्तर:
कोशिका में पाये जाने वाले तीन प्रकार के RNA होते हैं, जो इस प्रकार है:

  1. संवेशवाहक RNA (m-RNA)
  2. राइबोसोमल RNA (r-RNA)
  3. स्थानान्तरण RNA (r-RNA)

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry ऐमीन Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.1
निम्नलिखित ऐमीनों को प्राथमिक, द्वितीयक अथवा तृतीयक ऐमीनों में वर्गीकृत कीजिए –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-1
(iii) (C2H5) CHNH2
(iv) (C2H5)2 NH
उत्तर:
(i) प्राथमिक ऐमीन
(ii) तृतीयक ऐमीन
(iii) प्राथमिक ऐमीन
(iv) द्वितीयक ऐमीन

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प्रश्न 13.2
(i) अणुसूत्र C4H11N से प्राप्त विभिन्न समावयवी ऐमीनों की संरचना लिखिए।
(ii) सभी समावयवों के आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए।
(iii) विभिन्न युग्मों द्वारा कौन-से प्रकार की समावयवता प्रदर्शित होती है।
उत्तर:
(i) अणुसूत्र C4H11N से प्राप्त विभिन्न समावयव ऐमीन निम्नलिखित हैं –
प्राथमिक ऐमीन –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-2

द्वितीयक ऐमीन –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-3

तृतीयक ऐमीन –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-4

(ii) समावयवों के आई० यी० पी० ए० सी० नाम –
(क) ब्यूटेने-1-ऐमीन
(ख) ब्यूटेन-2-ऐमीन
(ग) 2-मेथिल-1-ऐमीन
(घ) 2-मेथिल प्रोपेन-2-ऐमीन
(ङ) N-एथिल एथेनामीन
(च) N-मेथिल प्रोपेनेमीन
(छ) N-मेथिल, प्रोपेन-2-ऐमीन
(ज) N, N-डाइमेथिल एथेनेमीन

(iii) समावयवता के प्रकार –

श्रृंखला समावयवता:
(क) तथा (ग), (ख) तथा (घ), (क) तथा (घ)

स्थान समावयवता:
(क) तथा (ख),(ङ) तथा (च)

मध्यावयवता:
(ङ) तथा (च)

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प्रश्न 13.3
आप निम्नलिखित परिवर्तन कैसे करेंगे?
(i) बेन्जीन से एनिलीन
(ii) बेन्जीन से N, N-डाइमेथिलऐनिलीन
(iii) Cl-(CH2) – Cl से हेक्सेन-1, 6-डाइऐमीन
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-5

प्रश्न 13.4
निम्नलिखित को उनके बढ़ते हुए क्षारकीय प्रबलता के क्रम में लिखिए –
(i) C2H5NH2, C6H5NH2, NH3, C6H5CH2NH2 तथा (C2H5)2NH
(ii) C2H5NH2, (C2H5)2 NH, (C2H5)NH2
(iii) CH3NH2, (CH3)2 NH, (CH3)3 N, C6H5NH2, C6H5CH2NH2
उत्तर:
(i) C6H6NH2 < NH3 < C6H5CH2NH2
< C2H5NH2 < (C2H5)2 NH
(ii) C6H5NH2 < C2H5NH2 < (C2H5)3N < (C2H5)2 NH
(iii) C6H5NH2 < C6H5CH2NH2 < (CH3)3N < CH3NH2 < (CH3NH2 < (CH3)2NH

प्रश्न 13.5
निम्नलिखित अम्ल-क्षारक अभिक्रिया को पूर्ण कीजिए तथा उत्पादों के नाम लिखिए –
(i) CH3 CH2 CH2 NH2 + HCl →
(ii) (C2H5)3N + HCL →
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-6

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प्रश्न 13.6
सोडियम कार्बोनेट विलयन की उपस्थिति में मेथिल आयोडाइड के आधिक्य द्वारा ऐनिलीन के ऐल्किलन में उत्पन्न होने वाले उत्पादों के लिए अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
ऐनिलीन Na2CO3 विलयन की उपस्थिति में मेथिल आयोडाइड आधिक्य में अभिक्रिया करके N, N, N – ट्राइमेथिल ऐनिलीनियम कार्बोनेट बनायेगी।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-7

प्रश्न 13.7
ऐनिलीन की बेन्जोइल क्लोराइड के साथ रासायनिक अभिक्रिया द्वारा उत्पन्न उत्पादों के नाम लिखिए।
उत्तर:
N – फेनिल बेन्जेमाइड बनता है। यह क्रिया जलीयक्षार की उपस्थिति में होती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-8

प्रश्न 13.8
अणुसूत्र C3H9N से प्राप्त विभिन्न समावयवों की संरचना लिखिए। उन समावयवों के आई० यू० पी० ए० सी० नाम लिखिए, जो नाइट्रस अम्ल के साथ नाइट्रोजन गैस मुक्त करते हैं।
उत्तर:
अणुसूत्र C3H9N से चार समावयवी ऐलीफैरिक ऐमीन सम्भव हैं जिनकी संरचना निम्न प्रकार है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-9
केवल प्राथमिक ऐमीन नाइट्रस अम्ल के साथ अभिक्रिया करके नाइट्रोजन गैस निष्कासित होगी।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-10

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प्रश्न 13.9
निम्नलिखित परिवर्तन कीजिए –
(i) 3-मेथिलऐनिलीन से 3-नाइट्रोटॉलूईन
(ii) ऐनिलीन से 1, 3, 5-ट्राइब्रोमोबेन्जीन।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-11

Bihar Board Class 12 Chemistry ऐमीन Additional Important Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.1
निम्नलिखित यौगिकों को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों में वर्गीकृत कीजिए तथा इनके आई० यू० पी० ए०सी० नाम लिखिए –

  1. (CH3)2CHNH2
  2. CH3(CH2)2NH2
  3. CH3NHCH(CH3)2
  4. (CH3)3CNH2
  5. C6H5NHCH3
  6. (CH3CH2)2NCH3
  7. m-BrC6H4NH2

उत्तर:

  1. 1-मेथिलएथेनेमीन (प्राथमिक)
  2. प्रोपेन-1-ऐमीन (प्राथमिक)
  3. N-मेथिल-2-मेथिलएथेनेमीन (द्वितीयक)
  4. 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऐमीन (तृतीयक)
  5. N-मेथिलबेन्जीनेमीन या N-मेथिलऐनिलीन (द्वितीयक)
  6. N-एथिल-N- मेथिलएथेनेमीन (तृतीयक)
  7. 3-ब्रोमोऐनिलीन या 3-ब्रोमोबेन्जीनेमीन (प्राथमिक)

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प्रश्न 13.2
निम्नलिखित युगलों के यौगिकों में विभेद के लिए एक रासायनिक परीक्षण दीजिए –

  1. मेथिलऐमीन एवं डाइमेथिलऐमीन
  2. द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन
  3. एथिलऐमीन एवं ऐनिलीन
  4. ऐनिलीन एवं ऐन्जिलऐमीन
  5. ऐनिलीन एवं N-मेथिलऐनिलीन।

उत्तर:
1. मेथिल ऐमीन एवं डाइमेथिल ऐमीनमेथिल ऐमीन एक प्राथमिक ऐमीन है, अत: यह क्लोरोफार्म और ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म करने पर दुर्गंधयुक्त मेथिल आइसोसायनाइड अथवा कर्बिलऐमीन परीक्षण देती है, जबकि डाइमेथिल ऐमीन है और यह परीक्षण नहीं देती।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-12

2. द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन:
द्वितीयक ऐमीन लिबरमैन नाइट्रोसो ऐमीन परीक्षण देती है जबकि तृतीयक ऐमीन यह परीक्षण नहीं देती है। द्वितीयक ऐमीन HNO2 से अभिक्रिया करके पीले रंग का N – नाइटोऐमीन बनाती है जो सान्द्र H2SO4 तथा फीनॉल के क्रिस्टलों के साथ गर्म करने पर हरा विलयन बनाती है। यह जलीय NaOH विलयन के साथ गाढ़ा नीला रंग देती है, जो तनुकरण करने पर लाल हो जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-13

3. एथिल ऐमीन तथा ऐनिलीन:
ऐनिलीन NaNO2 तथा तनु HCl के साथ 273-278 K पर अभिक्रिया करके बेन्जीन डाइऐजोनियम क्लोराइड बनाती है जो β – नेफ्थॉल के क्षारीय विलयन के साथ गहरे नारंगी रंग का रंजक बनता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-14
एथिल ऐमीन यह परीक्षण नहीं देती।

4. ऐनिल एवं बेन्जिल ऐमीन:
ऐनिलीन डाइऐजोटीकरण युग्म अभिक्रिया देती है, जबकि बेन्जिल ऐमीन नहीं।

5. ऐनिलीन एवं N-मेथिल ऐनिलीन:
ऐनिलीन कार्बलऐमीन अभिक्रिया देती है, जबकि N – के लिए ऐनिलीन यह परीक्षण नहीं देती।
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Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन

प्रश्न 13.3
निम्नलिखित के कारण बताइए –

  1. ऐनिलीन का pKb मेथिल ऐमीन की तुलना में अधिक होता है।
  2. एथिल ऐमीन जल में विलेय है, जबकि ऐनिलीन नहीं है।
  3. मेथिल ऐमीन फेरिक क्लोराइड के साथ जल में अभिक्रिया करने पर जलयोजित फेरिक ऑक्साइड का अवक्षेप देता है।
  4. यद्यपि ऐमीनों समूह इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में आर्थो एवं पैरा-निर्देशक होता है, फिर भी ऐनिलीन नाइट्रीकरण द्वारा यथेष्ट मात्रा में मेटानाइट्रोऐनिलीन देती है।
  5. ऐनिलीन फ्रीडेल क्राफ्ट्स अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती।
  6. ऐरोमैटिक ऐमीनों के डाइऐजोनियम लवण ऐलीफैटिक ऐमीनों से प्राप्त लवण से अधिक स्थाई होता है।
  7. प्राथमिक ऐमीन के संश्लेषण में गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण को प्राथमिकता दी जाती है।

उत्तर:
1. चूँकि ऐनिलीन कम क्षारीय होता है, अतः ऐनिलीन की PKb में मेथिल ऐमीन से अधिक होती है। ऐनिलीन में N – परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेन्जीन रिंग के साथ संयुग्मन में प्रयुक्त होता है। जिससे नाइट्रोजन पर इलेक्ट्रॉन-घट जाता है। मेथिल ऐमीन में CH3 का +I प्रभाव N-परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है। अतः ऐनिलीन का PKb मेथिल ऐमीन से अधिक होता है।

2. एथिल ऐमीन हाइड्रोजन आबन्ध के कारण जल में विलेय है जैसा कि निम्न प्रकार प्रदर्शित है –
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दूसरी ओर ऐनिलीन में फेनिल समूह बड़े आकार का तथा -I प्रभाव वाला हाता है जिससे जल के साथ हाइड्रोजन आबन्ध घट जाता है। अत: ऐनिलीन जल में अविलेय है।

3. मेथिल ऐमीन जल के साथ घुलनशील हाइड्राक्साइड बनाता है और OH आयन मुक्त करती है। ये OH आयतन फेरिक क्लोराइड के Fe3+ आयनों से संयुक्त होकर जलयोजित फेरिक ऑक्साइड का भूरा अवक्षेप देते हैं।
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4. नाइट्रोकरण सान्द्र H2SO4 तथा सान्द्र HNO3 के मिश्रण द्वारा होता है। प्रबल अम्लीय माध्यम में ऐनिलीन प्रोटॉन ग्रहण करके ऐनिलीनियम आयन बनाती है। अब एनिलीन में ऐमीनों (-NH2) समूह आर्थों एवं पैरा निर्देशक होता है, जबकि ऐनीलियम आयन में मेटा-निर्देशक असक्रिया होता है। अतः नाइट्रोकरण में ऐनिलीन पैरा-नाइट्रोऐनिलीन देता है और ऐनिलीनियम का मैटा-नाइट्रोऐनिलीन देता है।
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अतः ऐनिलीन का नाइट्रोकरण ऐमीनों समूह के प्रोटानीकरण द्वारा यथेष्ट मात्रा में मेटा-नाइट्रोऐनिलीन देता है।

5. ऐनिलीन लूइस क्षार होने के कारण AlCl3 के साथ अभिक्रिया करके एक संकट बनाता है जो एक लूइस अम्ल होता है।
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फलतः
ऐनिलीन का N-परमाणु धन आवेश ग्रहाण कर लेता है जो कि इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के लिए सक्रिय कार्य नहीं कर सकता। अतः ऐनिलीन फ्रीडल-क्राफ्ट अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती।

6. ऐरोमैटिक ऐमीनों के डाइऐजोनियम लवण ऐलिफैटिक ऐमीनों के डाइऐजोनियम लवण से अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि ये अनुनादी रूप में स्थाई होते हैं। इन्हें निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है –
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7. गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण शुद्ध अवस्था में प्राथमिक ऐमीन देता है। अतः प्राथमिक ऐमीनों के संश्लेषण में गैब्रिएल संश्लेषण को प्राथमिकता दी जाती है।

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प्रश्न 13.4
निम्नलिखित को क्रम में लिखिए –
(i) pKb मान के घटते क्रम में –
C2H5NH2, C6H5NHCH3, (C2N5)2NH एवं C6H5NH2

(ii) क्षारकीय प्राबल्य के घटते क्रम में –
C6H5NH2, C6H5N(CH3)2, (C2H5)2NH एवं CH3NH2

(iii) क्षारकीय प्राबल्य के बढ़ते क्रम में –
(क) ऐनिलीन, पैरा-नाइट्रोऐनिलीन एवं पैरा-टॉलूडीन
(ख) C6H5NH2, C6H5NHCH3, C6H5CH2NH2

(iv) गैस अवस्था में घटते हुए क्षारकीय प्राबल्य के क्रम में –
C2H5NH2, (C2H5)2NH, (C2H5)3N एवं NH3

(v) क्वथनांक के बढ़ते क्रम में –
C2H5OH, (CH3)2 NH, C2H5NH2

(vi) जल में विलेयता के बढ़ते क्रम में –
C6H5NH2, (C2H5)2 NH, C2H5NH2
उत्तर:
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प्रश्न 13.5
इन्हें आप कैसे परिवर्तित करेंगे –
(i) एथेनोइक अम्ल को मेथेनेमीन में
(ii) हेक्सेननाइट्राइल को 1-ऐमीनोपेन्टेन में
(iii) मेथेनॉल को एथेनोइक अम्ल में
(iv) एथेनेमीन को मेथेनेमीन में
(v) एथेनोइक अम्ल को प्रोपेनोइक अम्ल में
(vi) मेथेनेमीन को एथेनेमीन में
(vii) नाइट्रोमेथेन को डाइमेथिलऐमीन में
(viii) प्रोपेनाइक अम्ल को एथेनोइक अम्ल में?
उत्तर:
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प्रश्न 13.6
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों की पहचान की विधि का वर्णन कीजिए। इन अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी लिखिए।
उत्तर:
बेन्जीन सल्फोनिल क्लोराइड (C6H5SO2Cl), जिसे हिन्सबर्ग अभिकर्मक भी कहा जाता है, प्राथमिक और द्वितीयक ऐमीनों से अभिक्रिया करके सल्फोनेमाइड बनाता है।

(i) बेन्जीनसल्फोनिल क्लोराइड और प्राथमिक ऐमीन की अभिक्रिया से N – एथिलबेन्जीन-सल्फोनिल ऐमाइड प्राप्त होते हैं।
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सल्फोनेमाइड की नाइट्रोजन से जुड़ी हाइड्रोजन प्रबल इलेक्ट्रॉन खीचने वाले सल्फोनिल समूह की उपस्थिति के कारण प्रबल अम्लीय होती है। अत: यह क्षार में विलेय होते हैं।

(ii) द्वितीयक ऐमीन की अभिक्रिया से N, N – डाइएथिलबेन्जीनसल्फोनेमाइड बनता है।
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N, N – डाइएथिल बेन्जीनसल्फोनेमाइड में कोई भी हाइड्रोजन परमाणु नाइट्रोजन परमाणु से नहीं है अतः यह अम्लीय नहीं होता तथा क्षार में अविलेय होता है।

(iii) तृतीयक ऐमीन बेन्जीनसल्फोनिल क्लोराइड से अभिक्रिया नहीं करती। विभिन्न वर्गों के ऐमीन का यह गुण जिसमें वे बेन्जीनसल्फोनिल क्लोराइड से भिन्न-भिन्न प्रकार से अभिक्रिया करती हैं, प्राथमिक द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों में विभेद करने एवं इन्हें मिश्रण से पृथक् करने में प्रयुक्त होता है। यद्यपि आजकल बेन्जीनसल्फोनिल क्लोराइड के स्थान पर p – टॉलूईनसल्फोनिल क्लोराइड का प्रयोग होता है।

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प्रश्न 13.7
निम्नलिखित पर लघु टिप्पणी लिखिए –
(i) कार्बिलऐमीन अभिक्रिया
(ii) डाइऐजोकरण
(iii) हॉफमान ब्रोमेमाइड अभिक्रिया
(iv) युग्मन अभिक्रिया
(v) अमोनीअपघटन
(vi) ऐसीटिलन
(vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण।
उत्तर:
(i) कार्बिल ऐमीन अभिक्रिया-ऐथिल ऐमीन को कलोरोफार्म और ऐल्कोहॉलीय पोटेशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर ऐथिल आइसो सायनाइड (ऐथिल कार्बिल ऐमीन) बनता है जिसकी गन्ध बहुत अरुचिकर होती है। यह अभिक्रिया काबिल ऐमीन अभिक्रिया कहलाती है।
उदाहरण –
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(ii) डाइऐजीकरण अभिक्रिया:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन NaNO2 तथा तनु HCl के साथ 273 – 278 K ताप ऐमीनो समूह को डाइएजो समूह में परिवर्तित होने को डाइऐजोकरण अभिक्रिया कहते हैं।

उदाहरण:
ऐनिलीन को NaNO2 तथा तनु HCl के साथ 273 – 278 K ताप पर अभिक्रिया द्वारा बेन्जीन डाइऐजोनियम क्लोराइड बनता है।
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(iii) हॉफमैन ब्रोम-ऐमाइड अभिक्रिया:
इस अभिक्रिया की सहायता से -CONH2 समूह को -NH2 समूह में परिवर्तित किया जाता है। जब किसी ऐमाइड को Br2 तथा कॉस्टिक पोटाश विलयन के साथ गर्म करते हैं तो एमीन बनती है।
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इस अभिक्रिया से ऐसेट-प्रोपिऑन-ऐमाइड तथा बेन्जऐमाइड को क्रमशः मेथिल ऐमीन, एथिल एमीन और ऐनिलीन में परिवर्तित किया जा सकता है।
उदाहरण –
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(iv) युग्मन अभिक्रिया:
बेन्जीन डाइऐजोनियम क्लोराइड फीनॉल से अभिक्रिया करने पर इसके पैरा स्थान पर युग्मित होकर पैरा हाइड्रॉक्सीऐजोबेन्जीन बनाता है। इसी प्रकार की अभिक्रिया को युग्मन अभिक्रिया कहते हैं। इसी प्रकार से डाइऐजोनियम लवण की ऐनिलीन से अभिक्रिया द्वारा पैरा-ऐमीनोऐजोबेन्जीन बनती है। यह एक इलेक्ट्रॉनरागी अभिक्रिया का उदाहरण है।
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(v) अमोनी अपघटन:
ऐल्किल अथवा बेन्जिल हैलाइडों में कार्बन-हैलोजन आबन्ध नाभिकरागी द्वारा सरलता से विदलित हो जाता है, इसलिए ऐल्किल अथवा बेन्जिल हैलाइड अमोनिया के एथेनॉलिक विलयन से नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया करते हैं, जिसमें हैलोजन परमाणु ऐमीनो (-NH2) समूह से प्रतिस्थापित हो जाता है। अमोनिया अणु द्वारा C-X आबन्ध के विदलन की प्रक्रिया को अमोनीअपघटन (ammonolysis) कहते हैं। यह अभिक्रिया 373 K ताप पर सील बन्द नलिका में कराते हैं। इस प्रकार से प्राप्त प्राथमिक ऐमीन नाभिकरागी की तरह व्यवहार करती है और पुनः ऐल्किल हैलाइड से अभिक्रिया करके द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन तथा अन्तत: चतुष्क, अमोनियम लवण बना सकती है।
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इस अभिक्रिया में हैलाइडों को ऐमीनों से अभिक्रियाशीलता का क्रम Ri > RBr > RCl होता है। अमोनियम लवण से मुक्त ऐमीन प्रबल क्षार द्वारा अभिक्रिया से प्राप्त की जा सकती है।
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अमोनीअपघटन में यह असुविधा है कि इससे प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन तथा चतुष्क अमोनियम लवण का मिश्रण प्राप्त होता है। यद्यपि अमोनिया आधिक्य में लेने पर प्राप्त मुख्य उत्पाद प्राथमिक ऐमीन हो सकता है।

(vi) ऐसीटिलन या ऐसीटिलीकरण:
OH या NH2 समूह के हाइड्रोजन परमाणु का ऐसीटिल (CH3CO) समूह द्वारा विस्थापन ऐसीटिलन या ऐसीटिलीकरण कहलाता है।
उदाहरण –
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(vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण:
गैब्रिएल संश्लेषण का प्रयोग प्राथमिक ऐमीनों के विरचन के लिए कियाजाता है। थैलिमाइड एथेनॉलिक पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया द्वारा थैलिमाइड का पोटैशियम लवण बनाता है जो ऐल्किल हैलाइड के साथ गर्म करने के पश्चात् क्षारीय जलअपघटन द्वारा संगत प्राथमिक ऐमीन उत्पन्न करता है।
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ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन इस विधि से नहीं बनाई जा सकती; क्योंकि ऐरिल हैलाइड थैलिमाइड से प्राप्त ऋणायन के साथ नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया नहीं कर सकते।

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प्रश्न 13.8
निम्नलिखित परिवर्तन निष्पादित कीजिए –
(i) नाइट्रोबेन्जीन से बेन्जोइक अम्ल
(ii) बेन्जीन से m-ब्रोमोफीनॉल
(iii) बेन्जोइक अम्ल से ऐनिलीन
(iv) ऐनिलीन से 2, 4, 6-ट्राइब्रोमोफ्लुओरोबेन्जीन
(v) बेन्जिल क्लोराइड से 2-फेनिलएथेनेमीन
(vi) क्लारोबेन्जीन से p-क्लारोऐनिलीन
(vii) ऐनिलीन से p-ब्रोमोऐनिलीन
(viii) बेन्जेमाइड से टॉलूईन
(ix) ऐनिलीन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल।
उत्तर:
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प्रश्न 13.9
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में A, B तथा C की संरचना दीजिए:
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उत्तर:
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प्रश्न 13.10
एक ऐरोमैटिक यौगिक ‘A’ जलीय अमोनिया के साथ गर्म करने पर यौगिक ‘B’ बनाता है जो Br2 एवं KOH के साथ गर्म करने पर अणु सूत्र C6H7N वाला यौगिक ‘C’ बनाता है। A, B एवं C यौगिकों की संरचना एवं इनके आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए।
उत्तर:
चूँकि यौगिक ‘B’को Br2 व KOH के साथ गर्म करने पर यौगिक ‘C’ (अणुसूत्र C6H7N) बनता है, अतः ‘B’ एक ऐमाइड (बेन्जामाइड) तथा ‘C’ एक ऐमीन (ऐनिलीन) होने चाहिए। यौगिक ‘A’ को जलीय अमोनिया के साथ गर्म करने पर यौगिक ‘B’ बनाता है, अत: यौगक ‘A’ एक ऐरोमैटिक अम्ल होना चाहिए। यह बेन्जोइक अम्ल है। इसके लिए अभिक्रियायें निम्न प्रकार हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-37

प्रश्न 13.11
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए:
(i) C6H5NH2 + CHCl3 + (ऐल्कोहॉली) KOH →
(ii) C6H5N2Cl + H3PO2 + H2O →
(iii) C6H5NH2 + H2SO4 (सान्द्र) →
(iv) C6H5N2Cl + C2H5OH →
(v) C6H5NH2 + Br2(aq) →
(vi) C6H5NH2 + (CH3CO)2O →
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उत्तर:
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प्रश्न 13.12
ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन को गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण से क्यों नहीं बनाया जा सकता?
उत्तर:
गैब्रिएल थैलिमाइड अभिक्रिया में, थैलिमाइड ऐल्कोहॉलिक KOH से अभिक्रिया द्वारा थैलिमाइड का पोटैशियम लवण बनाता है। यह ऐल्किल हैलाइड के साथ संगत ऐल्किल व्युत्पन्न देता है।
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ऐल्किल थैलिमाइड ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन इस विधि से नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि ऐरिल हैलाइड थैलिमाइड से प्राप्त ऋणायन के साथ नाभिकरागी प्रतिस्थापन, अभिक्रिया नहीं कर सकते।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-41

प्रश्न 13.13
ऐलिफैटिक एवं ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीनों की नाइट्रस अम्ल से अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
ऐलीफैटिक प्राथमिक ऐमीन नाइट्रस अम्ल के साथ कम ताप पर अभिक्रिया करके प्राथमिक ऐल्कोहॉल बनाते हैं और N2 गैस मुक्त होती है। जैसे –
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ऐरोमैटिक ऐमीन नाइट्रस अम्ल के साथ अत्यधिक ठंडे ताप अभिक्रिया करके डाइऐजोनियम लवण बनाती है। जैसे –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-43

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प्रश्न 13.14
निम्नलिखित में प्रत्येक का सम्भावित कारण बताइए –
(i) समतुल्य अणु द्रव्यमान वाले ऐमीनों की अम्लता ऐल्कोहॉलों से कम होती है।
(ii) प्राथमिक ऐमीनों का क्वथनांक तृतीयक ऐमीनों से अधिक होता है।
(iii) ऐरोमैटिक ऐमीनों की तुलना में ऐलिफैटिक ऐमीन प्रबल क्षारक होते हैं।
उत्तर:
(i) किसी ऐमीन से एक प्रोटॉन निकलने पर ऐमाइड आयन प्राप्त होता है, जबकि ऐल्कोहॉल से एक प्रोटॉन निकलने पर ऐल्कॉक्साइड आयन प्राप्त होता है जैसा कि निम्नवत् दर्शाया गया है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 13 ऐमीन img-44
चूँकि N की तुलना में 0 अधिक विद्युतऋणात्मक है, इसलिए ROΘ पर ऋणावेश RNHΘ की तुलना में अधिक सरलता से रह सकता है। दूसरे शब्दों में ऐमीन ऐल्कोहॉल से कम अम्लीय होती हैं।

(ii) प्राथमिक ऐमीनों के N – परमाणुओं पर दो हाइड्रोजन-परमाणुओं की उपस्थिति के कारण ये विस्तीर्ण अन्तराअणुक हाइड्रोजन आबन्ध दर्शाती हैं, जबकि तृतीय एमीन में नाइट्रोजन पर हाइड्रोजन अणुओं के अभाव के कारण अन्तराआण्विक संघन नहीं होता। इसलिए प्राथमिक ऐमीनों का क्वतनांक तृतीयक ऐमीनों से अधिक होता है। उदाहरणार्थ-1-ब्यूटिलऐमीन का क्वथनांक (351 K) तृतीयक ब्यूटिलैमीन (क्वथनांक 319 K) से अधिक होता है।
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(iii) ऐरोमैटिक एमीनों की तुलना में ऐलिफैटिक ऐमीन प्रबल क्षारक होते हैं; क्योंकि –
(क) ऐरोमैटिक ऐमीनों में अनुनाद के कारण नाइट्रोजन परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म बेन्जीन-वलय पर विस्थानीकृत हो जाते हैं, इसलिए ये प्रोटॉनीकरण के लिए सरलतापूर्वक उपलब्ध हो जाते हैं।
(ख) ऐरिल ऐमीन आयनों का स्थायित्व संगत ऐरिल ऐमीनों की तुलना में कम होता है अर्थात् ऐरोमैटिक ऐमीनों का प्रोटॉनीकरण उपयुक्त नहीं होता है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 12.1
निम्नलिखित योगिकों की संरचना लिखिए –

  1. (i) α – मेथॉक्सीप्रोपिऑनऐल्डिहाइड
  2. (ii) 3 – हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल
  3. (ii) 2 – हाइड्रॉक्सीसाइक्लोपेन्टेन कार्बेल्डिहाइड
  4. (iv) 4 – ऑक्सोपेन्टेनलं
  5. डाइ – द्वितीयक ब्यूटिल कीटोन
  6. 4 – क्लोरोऐसीटोफोनोन

उत्तर:
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प्रश्न 12.2
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के उत्पादों की संरचना लिखिए –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-2
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-3

प्रश्न 12.3
निम्नलिखित यौगिकों को उनके क्वथनांकों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
CH3CHÓ, CH3CH2OH, CH3OCH3, CH3CH2CH3
उत्तर:
CH3 – CH2 – CH3 < CH3 – O CH3 – CH3 < CH3 – CHO < CH3 CH2OH

प्रश्न 12.4
निम्नलिखित यौगिकों को नाभिकरागी योगज अभिक्रियाओं में उनकी बढ़ती हुई अभिक्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
(क) एथेनल, प्रोपेनल, प्रोपेनोन, ब्यूटेनोन
(ख) बेन्जैल्डिहाइड, p – टॉलूऐल्डिहाइड, p – नाइट्रोबेन्जैल्डिहाइड, ऐसीटोफीनोन।
उत्तर:
(क) ब्यूटेनोन < प्रोपेनोन < प्रोपेनल < एथेनल
(ख) ऐसीटोफीनोन < n – टॉलूऐल्डिहाइड < बेन्जैल्डिहाइड < p – नाइट्रोबेन्जेल्डिहाइड

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प्रश्न 12.5
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के उत्पादों को पहचानिए –
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उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-5

प्रश्न 12.6
निम्नलिखित यौगिकों के आई० यू० पी० ए० सी० नाम दीजिए –
(i) PhCH2CH2COOH
(ii) (CH3)2C = CHCOOH
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-6
उत्तर:
(i) 3-फेनिलप्रोपेनोइक अम्ल
(ii) 3-मेथिलब्यूट-2-इलोइक अम्ल
(iii) 2-मेथिलसाइक्लोपेन्टेनकार्बोक्सिलिक अम्ल
(iv) 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल

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प्रश्न 12.7
निम्नलिखित यौगिकों का बेन्जोइक अम्ल में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है?
(i) एथिलबेन्जीन
(ii) ऐसीटोफीनोन
(iii) ब्रोमोबेन्जीन
(iv) फेनिलएथीन (स्टाइरीन)।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-7

प्रश्न 12.8
नीचे प्रदर्शित अम्लों के प्रत्येक युग्म में कौन-सा अम्ल अधिक प्रबल है?
(i) CH3CO2H अथवा CH2FCO2H
(ii) CH2FCO2H अथवा CH2ClCO2H
(iii) CH2FCH2CH2CO2II अथवा CH3CHF CH2CO2H
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उत्तर:
(i) तथा (ii) युग्मों में F परमाणु की – I प्रभाव की उपस्थिति के कारण अम्लीय प्रबलता अधिक है।
(iii) युम में दो अम्लों में F परमाणु के सापेक्ष स्थान के कारण अधिक अम्लीय प्रबलता है। अतः
(i) तथा (ii) में CH2FCO2H प्रबल अम्ल है।
(iii) CH3CH2FCH2CO2H प्रबल अम्ल है।
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-CF3 का -I प्रभाव प्रबल होता है, यह ऋणावेश को फैलाकर कार्बोक्सिलेट आयन को स्थायित्व प्रदान करता है।
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-CH3 का +I प्रभाव दुर्बल होता है, यह ऋणावेश को सघन करके कार्बोक्सिलेट आयन को अस्थायी कर देता है।
इसलिए CH3 – C6H4COO (p) आयन से F3C – C6H4 – COO (p) आयन के अधिक स्थायी होने के कारण F3C – C6H5 – COOH(p) अधिक प्रबल है।

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 12.1
निम्नलिखित पदों (शब्दों) से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।

  1. सायनोहाइड्रिन
  2. ऐसीटल
  3. सेमीकार्बेजोन
  4. ऐल्डोल
  5. हेमीऐसीटल
  6. ऑक्सिम
  7. कीटैल
  8. इमीन
  9. 2, 4 – DNP व्युत्पन्न
  10. शिफ-क्षारक।

उत्तर:
1. सायनोहाइड्रिन-ऐल्डिहाइड तथा कीटोन हाइड्रोजन सायनाइड से अभिकृत होकर संगत सायनोहाइड्रिन (cyanohydrins) होते हैं। शुद्ध HCN के साथ यह अभिक्रिया बहुत धीमी होती है; अतः यह क्षार द्वारा उत्प्रेरित की जाती है तथा जनित सायनाइड (CN) आयन प्रबल नाभिकस्नेही काबेंनिल यौगिकों पर संयोजित होकर संगत सायनोहाइड्रिन देते हैं। सायनोहाइड्रिन उपयोगी संश्लेषित मध्यवर्ती होते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 12 ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल img-11

2. ऐसीटल:
जैम-डाइऐल्कॉक्सी यौगिक को जिनमें दो ऐल्कॉक्सी समूह टर्मिनल कार्बन पर स्थित हो, ऐसीटल कहते हैं। ये ऐल्डिहाइड की मोनोहाइड्रिक के साथ शुष्क HCl की उपस्थिति में क्रिया द्वारा बनते हैं।
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3. सेमीकार्बेजोन:
ये ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों के व्युत्पन्न होते हैं जो उन पर सेमीकार्बेजाइड द्वारा बनते हैं।
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सेमी कार्बेजोन का उपयोग ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों की पहचान के लिए किया जाता है।

4. ऐल्डोल:
जिन ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों में कमसे-कम एक α – हाइड्रोजन विद्यमान होता है, वे तनु क्षार के उत्प्रेरक के रूप में उपस्थिति के साथ एक अभिक्रिया द्वारा क्रमशः β – हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोल) अथवा β – हाइड्रॉक्सी कीटोन (कीटोल) प्रदान करते हैं। इस अभिक्रिया को ऐल्डोल अभिक्रिया (Aldol Reaction) कहते हैं।
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उत्पाद में विद्यमान दो प्रकार्यात्मक समूहों, ऐल्डिहाइड व ऐल्कोहॉल के नामों से ऐल्डोल का नाम व्युत्पन्न होता है। ऐल्डोल व कीटोल आसानी से जल निष्कासित करके ,B-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक देते हैं, जो ऐल्डोल संघनन उत्पाद है और यह अभिक्रिया ऐल्डोल संघनन कहलाती है।

5. हेमीऐसीटल:
जैम-ऐल्कॉक्सी ऐल्कोहॉल को हेमीऐसीटल कहते हैं जो मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल के साथ शुष्क HCl की उपस्थिति में अभिक्रिया द्वारा बनते हैं।
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6. ऑक्सिम:
ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों की हाइड्राक्सिल ऐमीन के साथ अभिक्रिया से बनने वाले यौगिकों को ऑक्सिम कहते हैं।
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7. कीटैल:
जैम-ऐल्काक्सीऐल्केन को कीटैल कहते हैं। ये दो ऐल्काक्सी समूह श्रृंखला के कार्बन पर स्थित होते हैं। इन्हें कीटोन को एथिलीन ग्लाइकॉल के साथ शुष्क HCL या p – टालूईन सल्फोनिक (PTS) की उपस्थिति में गर्म करके प्राप्त करते हैं।
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कीटैल कीटैल जलीय खनिज अम्लों के साथ जल अपघटित हो कर कीटोन देते हैं। अतः इन्हें कार्बनिक संश्लेषण में कीटों समूह के रक्षण के लिए प्रयुक्त करते हैं।

8. इमीन:
C = NH समूह वाले यौगिकों को इमीन कहते हैं। इन्हें ऐल्हाइडों अथवा कीटोनों की अमोनिया व्युत्पन्नों के साथ अभिक्रिया से बनाते हैं।
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9. 2, 4 – DNP व्युत्पन्न:
ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन (दुर्बल माध्यम) में 2, 4 – डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्राजीन के साथ अभिक्रिया के फलस्वरूप 2, 4 – डाइनाइट्रोफेनिल हाइड्राजोन (2, 4 – DNP व्युत्पन्न) प्राप्त होते हैं।
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10. शिफ-क्षारक:
ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन प्राथमिक ऐलिफैटिक अथवा ऐरोमैटिक ऐमीनों से अभिक्रिया करके बने यौगिक को शिफ-क्षारक कहते हैं।
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प्रश्न 12.2
निम्नलिखित यौगिकों के आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) नामपद्धति में नाम लिखिए –

  1. CH3CH(CH3)CH2CH2CHO
  2. CH3CH2COCH(C2H5)CH2CH2Cl
  3. CH3CH = CHCHO
  4. CH3COCH2COCH3
  5. CH3CH(CH3)CH2C(CH3)2COCH3
  6. (CH3)2 CCH2COOH
  7. OHCC6H4CHO – p

उत्तर:

  1. 4-मेथिलपेन्टेनल
  2. 6-क्लोरो-4-एथिलहेक्सेन-3-ओन
  3. ब्यूट-2-इनल
  4. पेन्टेन-2, 4-डाइओन
  5. 3, 3, 5-ट्राइमेथिलहेक्सेन-2-ओन
  6. 3, 3-डाइमेथिलब्यूटेनोइक अम्ल
  7. बेन्जीन-1, 4-डाइकार्बेल्डिहाइड

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प्रश्न 12.3
निम्नलिखित यौगिकों की संरचना बनाइए –

  1. 3-मेथिलब्यूटेनल
  2. p-नाइट्रोप्रोपिओफीनोन
  3. p-मेथिलबेन्जैल्डिहाइड
  4. 4-मेथिलपेन्ट-3-ईन-2-ओन
  5. 4-क्लोरोपेन्टेन-2-ओन
  6. 3-ब्रोमो-4-फेनिल पेन्टेनोइक अम्ल
  7. p, P-डाइहाइड्रॉक्सीबेन्जोफीनोन
  8. हेक्स-2-ईन-4-आइनोइक अम्ल

उत्तर:
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प्रश्न 12.4
निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) नाम लिखिए और जहाँ सम्भव हो सके साधारण नाम भी दीजिए।
(i) CH3CO(CH2)4 CH3
(ii) CH3CH2CHBrCH2CH(CH3)CHO
(iii) CH3(CH2)5 CHO
(iv) Ph – CH = CH – CHO
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(vi) PhCOPh
उत्तर:
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प्रश्न 12.5
निम्नलिखित व्युत्पन्नों की संरचना बनाइए –
(i) बेन्जैल्डिहाइड का 2, 4-डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्रेजोन
(ii) साइक्लोप्रोपेनोन ऑक्सिम
(iii) ऐसीटेल्डिहाइडडाइमेथिलऐसीटल
(iv) साइक्लोब्यूटेनोन का सेमीकार्बेजोन
(v) हेक्सेन-3-ओन का एथिलीन कीटैल
(vi) फॉर्मेल्डिहाइड का मेथिल हेमीऐसीटल।
उत्तर:
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प्रश्न 12.6
साइक्लोहेक्सेनकार्बेल्डिहाइड की निम्नलिखित अभिकर्मकों के साथ अभिक्रिया से बनने वाले उत्पादों को पहचानिए –
(i) PhMgBr एवं तत्पश्चात् H3O+
(ii) टॉलेन अभिकर्मक
(iii) सेमीकार्बेजाइड एवं दुर्बल अम्ल
(iv) एथेनॉल का आधिक्य तथा अम्ल
(v) जिंक अमलगम एवं तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल।
उत्तर:
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प्रश्न 12.7
निम्नलिखित में से कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा, किनमें कैनिजारो अभिक्रिया होगी और किनमें उपर्युक्त में से कोई क्रिया नहीं होगी? ऐल्डोल संघनन तथा कैनिजारो अभिक्रिया में सम्भावित उत्पादों की संरचना लिखिए –

  1. मेथेनल
  2. 2-मेथिलपेन्टेनल
  3. बेन्जेल्डिहाइड
  4. बेन्जोफीनोन
  5. साइक्लोहेक्सेनोन
  6. 1-फेनिलप्रोपेनोन
  7. फेनिलऐसीटेल्डिहाइड
  8. ब्यूटेन-1-ऑल
  9. 2, 2-डाइमेथिलब्यूटेनल।

उत्तर:
1. मेथेनल-यह कैनिजारो अभिक्रिया देगा जबकि ऐल्डोल संघनन नहीं देगा। इस यौगिक द्वारा प्रदर्शित कैनिजारो अभिक्रिया तथा सम्भावित उत्पाद की संरचना निम्न प्रकार है –
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2. 2-मेथिलपेन्टेनल-यह ऐल्डोल संघनन देगा किन्तु कैनिजारो अभिक्रिया नहीं देगा। इस यौगिक द्वारा ऐल्डोल संघनन अभिक्रिया तथा सम्भावित उत्पाद की संरचना निम्नलिखित है –
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3. बेन्जैल्डिहाइड:
यह कैनिजारो देगा, जबकि ऐल्डोल संघनन नहीं देगा।
सम्भावित उत्पाद और उनकी संरचना निम्न प्रकार है –
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4. बेन्जोफीनोन:
चूँकि इसमें कोई 2-हाइड्रोजन नहीं है, अतः यह कैनिजारो अभिक्रिया तथा ऐल्डोल संघनन नहीं देगा।

5. साइक्लोहेक्सेनोन:
यह ऐल्डोल संघनन देगा, जबकि कैनिजारो अभिक्रिया नहीं देगा।

इसमें सम्भावित उत्पाद तथा उनकी संरचना निम्नलिखित है –
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6. 1-फेनिल प्रोपेनोन-यह ऐल्डोल संघनन देगा, और कैनिजारो अभिक्रिया नहीं देगा। इसमें सम्भावित उत्पाद और उनकी संरचना निम्नलिखित हैं –
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7. फेनिल ऐसीटेल्डिहाइड:
यह ऐल्डोल संघनन देगा, जबकि कैनिजारो अभिक्रिया नहीं देगा। सम्भावित उत्पाद और इसकी संरचना निम्नवत् है –
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8. ब्यूटेन-1-ऑल:
चूँकि यह एक ऐल्कोहॉल है, अतः यह कैनिजारो अभिक्रिया तथा ऐल्डोल संघनन नहीं देगा।

9. 2, 2-डाइमेथिलब्यूटेनल:
यह कैनिजारो अभिक्रिया देगा जबकि ऐल्डोल संघनन नहीं देगा। सम्भावित उत्पाद और उनकी संरचना निम्न प्रकार है –
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प्रश्न 12.8
एथेनल को निम्नलिखित यौगिकों में कैसे परिवर्तित करेंगे?
(i) ब्यूटेन-1, 3-डाइऑल
(ii) ब्यूट-2-ईनल
(iii) ब्यूट-2-ईनोइक अम्ल।
उत्तर:
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प्रश्न 12.9
प्रोपेनल एवं ब्यूटेनल के ऐल्डोल संघनन से बनने वाले चार सम्भावित उत्पादों के नाम एवं संरचना सूत्र लिखिए। प्रत्येक में बताइए कि कौन-सा ऐल्डिहाइड नाभिकरागी और कौन-सा इलेक्ट्रॉनरागी होगा?
उत्तर:
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प्रश्न 12.10
एक कार्बनिक यौगिक जिसका अणुसूत्र C9H10O है 2, 4 – DNP व्युत्पन्न बनाता है टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है तथा कैनिजारो अभिक्रिया देता है। प्रबल ऑक्सीकरण पर वह 1, 2-बेन्जीनडाइकार्बोक्सिलिक अम्ल बनाता है। यौगिक को पहचानिए।
उत्तर:
1. चूँकि यह 2, 4 – DNP व्युत्पन्न बनाता है तथा टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है, अत: यह एक ऐल्डिहाइड है।

2. पुन: चूँकि यह कैनिजारो अभिक्रिया देता है, – CHO समूह सीधे बेन्जीन वलय से जुड़ा हुआ है।

3. चूँकि प्रबल ऑक्सीकरण पर यह 1, 2-बेन्जोनडाइकार्बोक्सिलिक अम्ल देता है, अतः यह एक ऑथों-प्रतिस्थापी बेन्जैल्डिहाइड है। अतः दिये हुए अणुसूत्र वाला यौगिक ऑर्थो-एथिल बेन्जैल्डिहाइड है।
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प्रश्न 12.11
एक कार्बनिक यौगिक ‘क’ (आण्विक सूत्र, C8H16O2) को तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ जलअपघटित करने के उपरान्त एक कार्बोक्सिलिक अम्ल ‘ख’ एवं एक ऐल्कोहॉल ‘ग’ प्राप्त हुए। ‘ग’ को क्रोमिक अम्ल के साथ ऑक्सीकृत करने पर ‘ख’ उत्पन्न होता है। ‘ग’ निर्जलीकरण पर ब्यूट-1-ईन देता है। अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होने वाली सभी रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर:
दिए हुए आँकड़ों से यह पता चलता है कि ‘क’ एक एस्टर है जो जलअपघटन पर अम्ल ‘ख’ तथा ऐल्कोहॉल ‘ग’ देते हैं। ‘ग’ को क्रोमिक अम्ल के साथ ऑक्सीकृत करने पर ‘ख’ बनता है। ‘ग’ निर्जलीकरण पर ब्यूट-1-ईन देता है, अतः यह ब्यूटेन-1-ऑल होगा। अम्ल ‘ख’ जो ‘ग’ के ऑक्सीकरण पर प्राप्त होता है, ब्यूटनोइक अम्ल होगा और एस्टर ‘क’ ब्यूटेनल ब्यूटेनोएट होगा। इसकी अभिक्रियायें निम्न प्रकार से है –
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प्रश्न 12.12
निम्नलिखित यौगिकों को उनसे सम्बन्धित (कोष्ठको में दिए गए) गुणधर्मों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. ऐसीटेल्डिहाइड, ऐसीटोन, डाइ-तृतीयक ब्यूटिलकीटोन, मेथिल तृतीयक-ब्यूटिलकीटोन (HCN के प्रति अभिक्रियाशीलता)
  2. CH3CH2CH(Br)COOH, CH3 CH(Br) CH2COOH, (CH3)2 CHCOOH, CH3CH2CH2COOH (अम्लता के क्रम में)
  3. बेन्जोइक अम्ल; 4-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल; 3, 4-डाइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल; 4-मेथॉक्सी बेन्जाइक अम्ल (अम्लता की सामर्थ्य के क्रम में)।

उत्तर:
1. HCN के प्रति अभिक्रियाशीलता का बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
डाइ-तृतीयक-ब्यूटिल कीटोन < मेथिल-तृतीयक- ब्यूटिल कीटोन < ऐसीटोन < ऐसीटेल्डिहाइड

2. अम्लता का बढ़ता क्रम इस प्रकार है –
(CH3)2CHOOH < CH3CH2CH2COOH < CH3 CH(Br) CH2COOH < CH3CH2CH(Br) COOH

3. अम्ल की सामर्थ्य का बढ़ता हुआ निम्नलिखित है –
4-मेथॉक्सीबेन्जोइक अम्ल < बेन्जोइक अम्ल < 4नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल < 3,4-ड्राइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल

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प्रश्न 12.13
निम्नलिखित यौगिक युगलों में विभेद करने के लिए सरल रासायनिक परीक्षणों को दीजिए –

  1. प्रोपेनल एवं प्रोपेनोन
  2. ऐसीटोफीनोन एवं बेन्जोफीनोन
  3. फीनॉल एवं बेन्जोइक अम्ल
  4. बेन्जोइक अम्ल एवं एथिलबेन्जोएट
  5. पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑन
  6. बेन्जैल्डिहाइड एवं ऐसीटोफीनोन
  7. एथेनल एवं प्रोपेनल।

उत्तर:
1. प्रोपेनल एवं प्रोपेनोन:
प्रोपेनल फेहलिंग विलयन के Cu2O का लाल अवक्षेप देता है और टॉलेन, अभिकर्मक के साथ रजत दर्पण देता है।
प्रोपेनोन क्रिया नहीं करता।
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2. ऐसीटोफीनोन एवं बेन्जोफीनोन-ऐसीटोफीनोन आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है जबकि बेन्जोफीनोन नहीं देता।
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3. फीनॉल एवं बेन्जोइक अम्ल:
बेन्जोइक अम्ल NaHCO3 के जलीय विलयन से अभिक्रिया करके बुदबुदाहट के साथ CO2 गैस देता है, परन्तु फीनॉल नहीं देता।
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फीनॉल Br2 जल के साथ 2, 4, 6 ट्राइब्रोमोफीनॉल का सफेद अवक्षेप देता है, जबकि बेन्जोइक अम्ल नहीं देता।
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4. बेन्जोइक अम्ल एवं एथिल बेन्जोएट:
बेन्जोइक अम्ल सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ अभिक्रिया पर तीव्र बुदबुदाहट के साथ CO2 गैस देता है। परन्तु एथिल बेन्जोएट नहीं देगा।
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5. पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑन:
पेन्टेन2-ऑन आयोडोफार्म परीक्षण देता है, जबकि पेन्टेन-3-ऑन नहीं देता।
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6. बेन्जैल्डिहाइड एवं ऐसीटोफीनोन:
ऐसीटोफीनोन आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है, जबकि बेन्जैल्डिहाइड अभिक्रिया नहीं करता।
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7. एथेनल एवं प्रोपेनल:
एथेनल आयडोफॉर्म परीक्षण देता है, परन्तु प्रोपेनल नहीं।
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प्रश्न 12.14
बेन्जीन से निम्नलिखित यौगिकों का विरचन आप किस प्रकार करेंगे? आप कोई भी अकार्बनिक अभिकर्मक एवं कोई भी कार्बनिक अभिकर्मक, जिसमें एक से अधिक कार्बन न हो, का उपयोग कर सकते हैं।
(i) मेथिल बेन्जोएट
(ii) m – नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल
(iii) p – नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल
(iv) फेनिलऐसीटिक अम्ल
(v) p – नाइट्रोबेन्जैल्डिहाइड।
उत्तर:
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प्रश्न 12.15
आप निम्नलिखित रूपान्तरणों को अधिकतम दो चरणों में किस प्रकार से सम्पन्न करेंगे?

  1. प्रोपेनोन से प्रोपीन
  2. बेन्जोइक अम्ल से बेन्जैल्डिहाइड
  3. एथेनॉल से 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल
  4. बेन्जीन से m-नाइट्रोऐसीटोफीनोन
  5. बेन्जेल्डिहाइड से बेन्जोफीनोन
  6. ब्रोमोबेन्जीन से 1-फेनिलएथेनॉल
  7. बेन्जैल्डिहाइड से 3-फेनिलप्रोपेन-1-ऑल
  8. बेन्जैल्डिहाइड से -हाइड्रॉक्सीफेनिल- ऐसीटिक अम्ल
  9. बेन्जोइक अम्ल से m-नाइट्रोबेन्जिल ऐल्कोहॉल।

उत्तर:
1. प्रोपेनोन से प्रोपीन:
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2. बेन्जोइक अम्ल से बेन्जैल्डिहाइड:
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3. एथेनॉल से 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल:
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4. बेन्जीन से m-नाइट्रोऐसीटोफीनोन:
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5. बेन्जैल्डिहाइड से बेन्जोफीनोन:
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6. ब्रोमोबेन्जीन से 1-फेनिलएथेनॉल:
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7. बेन्जैल्डिहाइड से 3-फेनिलप्रोपेन-1-ऑल:
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8. बेन्जैल्डिहाइड से व-हाइड्रॉक्सीफेनिल- ऐसीटिक अम्ल:
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9. बेन्जोइक अम्ल से m-नाइट्रोबेन्जिल ऐल्कोहॉल:
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प्रश्न 12.16
निम्नलिखित पदों (शब्दों) का वर्णन कीजिए –

  1. ऐसीटिलिनन
  2. कैनिजारो अभिक्रिया
  3. क्रॉस ऐल्डोल संघनन
  4. विकार्बोक्सिलन।

उत्तर:
1. ऐसीटिलिनन:
ऐल्कोहॉलों, फीनॉलों या ऐमीनों के एक हाइड्रोजन का एक ऐसिल (-RCO) समूह द्वारा प्रतिस्थापन ऐसीटिलिनन कहलाता है। यह प्रतिस्थापन किसी क्षारक, जैसे पिरीडीन अथवा ड्राइमेथिल ऐमीन की उपस्थिति में कराया जाता है।

उदाहरण:
(क) पिरिडीन की उपस्थिति में ऐसीटिल क्लोराइड की क्रिया से एथिल ऐल्कोहॉल एथिल ऐसीटेट में परिवर्तित हो जाता है।
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(ख) पिरिडीन की उपस्थिति में ऐसीटिक ऐनहाइड्राइड की क्रिया से फीनॉल फेनिल ऐसीटेट में परिवर्तित हो जाता है।
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2. कैनिजारो अभिक्रिया:
ऐल्डिहाइड, जिनमें α – हाइड्रोजन परमाणु नहीं होते, सान्द्र क्षार की उपस्थिति में स्वऑक्सीकरण व अपचयन (असमानुपातन) की अभिक्रिया प्रदर्शित करते हैं। इस अभिीक्रया में ऐल्डिहाइड का एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित होता है, जबकि दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।
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3. क्रॉस ऐल्डोल संघनन:
जब दो भिन्न-भिन्न ऐल्डिहाइड और/या कीटोन के मध्य ऐल्डोल संघनन होता है तो उसे क्रॉस ऐल्डोल संघनन कहते हैं। यदि प्रत्येक में α – हाइड्रोजन हो तो ये चार उत्पादों का मिश्रण देते हैं। इसे निम्नलिखित एथेनल वप्रोपेनल के मिश्रण की ऐल्डोल संघनन अभिक्रिया द्वारा समझाया गया है –
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क्रॉस ऐल्डोल उत्पाद क्रॉस ऐल्डोल संघनन में कीटोन भी एक घटक के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं –
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4. विकार्बेक्सिलन:
कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम लवणों को सोडालाइम (NaOH तथा CaO, 3 : 1 के अनुपात में) के साथ गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकल जाती है एवं हाइड्रोकार्बन प्राप्त होते हैं। यह अभिक्रिया विकार्बोक्सिलन (Decarboxylation) कहलाती है।
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कार्बोक्सिलिक अम्लों के क्षार धातु लवणों के जलीय विलयन का विद्युतअपघटन द्वारा विकार्बोक्सिलन हो जाता है तथा ऐसे हाइड्रोकार्बन निर्मित होते हैं जिसमें कार्बन परमाणुओं की संख्या, अम्ल के ऐल्किल समूह में उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या से दुगुनी होती है। इस अभिक्रिया को कोल्बे विद्युत्-अपघटन (Kolbe electrolysis) कहते हैं।

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प्रश्न 12.17
निम्नलिखित प्रत्येक संश्लेषण में छूटे हुए प्रारम्भिक पदार्थ, अभिकर्मक अथवा उत्पादों को लिखकर पूर्ण कीजिए –
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उत्तर:
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(iii) H2NNHCONH2 का अधिक नाभिकरागी NH2NH भाग अभिक्रिया करके सेमीकार्बेजोन बनाता है।
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प्रश्न 12.18
निम्नलिखित के सम्भावित कारण दीजिए –
(i) साइक्लोहेक्सेनोन अच्छी लब्धि में सायनोहाइडिन बनाता है, परन्तु 2, 2, 6-ट्राइमेथिलसाइक्लोहेक्सेनोन ऐसा नहीं करता।
(ii) सेमीकार्बेजाइड में दो -NH2 समूह होते हैं, परन्तु केवल एक -NH2 समूह ही सेमीकार्बेजोन विरचन में. प्रयुक्त होता है।
(iii) कार्बोक्सिलिक अम्ल एवं ऐल्कोहॉल से अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में एस्टर के विरचन के समय जल अथवा एस्टर जैसे ही निर्मित होता है, उसको निकाल दिया जाना चाहिए।
उत्तर:
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2, 4, 6-ट्राइमेथिलसाइक्लोहेक्सेनोन – 2, 4, 6-ट्राइमेथिल साइक्लोहेक्सानोन +I प्रभाव के कारण तीन CH3 समूह इलेक्ट्रॉन मुक्त करते हैं तथा > C = 0 के कार्बन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व को बढ़ाते हैं और नाभिकरागी अभिक्रिया नहीं हो पाती। साइक्लोहेक्सनोन में, CN आयन (नाभिकरागी) का आक्रमण कार्बन परमाणु पर आसानी से हो जाता है तथा साइक्लोहेक्सेनोन सायनोहाइड्रिन उत्पाद के रूप में प्राप्त हो जाता है।

(ii) यद्यपि सेमीकार्बेजाइड में दो:
NH2 समूह ऋण इलेक्ट्रॉन युग्म रखते हैं परन्तु इनमें एक इलेक्ट्रॉन निकालने वाले >C = 0 समूह संरूपण में होता है और यह नाभिकरागी की भाँति कार्य नहीं कर सकता है। अतः केवल एक -NH2 समूह सेमीकाबेंजोन के बनने में सम्मिलित होता है।

(iii) एक कार्बोक्सिलिक अम्ल और ऐल्कोहॉल से अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में एस्टर बनना एक उत्क्रमणीय अभिक्रिया होती है।
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अतः साम्य की अग्रदिशा के लिए उत्पाद के रूप में जल या एस्टर को तुरन्त हटा लेना चाहिए।

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प्रश्न 12.19
एक कार्बनिक यौगिक में 69.77% कार्बन, 11.63% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। यौगिक का आण्विक द्रव्यमान 86 है। यह टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करता, परन्तु सोडियम हाइड्रोजनसल्फाट के साथ योगज यौगिक देता है तथा आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है। प्रबल ऑक्सीकरण पर एथेनोइक तथा प्रोपेनोइक अम्ल देता है। यौगिक की सम्भावित संरचना लिखिए।
गणना:
सरल सूत्र की गणना:
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मूलानुपाती सूत्र = G5H10O
मूलानुपाती द्रव्यमान = 5 × 12 + 10 × 1 + 1 × 16 = 86
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= \(\frac{86}{86}\) = 1
∴ यौगिक का अणुसूत्र = C5H10O
चूंकि दिया गया यौगिक सोडियम हाइड्रोजन सल्फाइट के साथ योगज यौगिक बनाता है। अतः एक ऐल्डिहाइड अथवा मेथिल कीटोन होने की सम्भावना है। पुन: चूँकि यह टॉलेन अभिकर्मक नहीं करता तथा आयोडोफार्म परीक्षण देता है, अतः दिया गया यौगिक मेथिल कीटोन है और ऐल्डिहाइड नहीं हो सकता। चूँकि दिया गया यौगिक प्रबल ऑक्सीकरण पर एथेनोइक अम्ल तथा प्रोपेनोइक अम्ल देता है, इसलिए मेथिल कीटोन पेन्टेन-2-ओन है। इसकी संरचना निम्नवत् है।
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सम्भावित अभिक्रायें निम्न प्रकार से है –
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प्रश्न 12.20
यद्यपि फीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाएँ कार्बोक्सिलेट आयन की तुलना में अधिक हैं, परन्तु कार्बोक्सिलिक अम्ल फीनॉल की अपेक्षा प्रबल अम्ल है। क्यों?
उत्तर:
कार्बोक्सिलेट आयन में ऋणावेश दो आक्सीजन परमाणुओं पर विस्थानित होता है, जबकि फीनॉक्साइड आयन में ऋणावेश एक आक्सीजन परमाणु पर ही विस्थानित होता है; इसलिए फीनॉक्साइड आयन की तुलना में कार्बोक्सिलेट आयन अधिक होता है। फलस्वरूप कार्बोक्सिलिक अम्ल फीनॉल की अपेक्षा प्रबल अम्ल होते हैं।

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पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 11.1
निम्नलिखित को प्राथमिक, द्वितीकय एवं तृतीयक ऐल्कोहॉल में वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:
प्राथमिक ऐल्कोहॉल (i), (ii), (iii)
द्वितीयक ऐल्कोहॉल (iv) तथा (v)
तृतीयक ऐल्कोहॉल (vi)

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प्रश्न 11.2
उपर्युक्त उदाहरणों में से ऐलिलिक ऐल्कोहॉलों को पहचानिए।
उत्तर:
ऐलिलिक ऐल्कोहॉल (ii) तथा (vi)

प्रश्न 11.3
निम्नलिखित यौगिकों के आइ०यू०पी० ए०सी० (IUPAC) नाम पद्धति से नाम दीजिए –
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उत्तर:

  1. 3 – क्लोरोमेथिल – 2 – आइसोप्रोपिल-पेन्टेन – 1 – ऑल
  2. 2, 5 – डाइमेथिलहेक्सेन – 1, 3 – डाइऑल
  3. 3 – ब्रोमोसाइक्लोहेक्सेन – 1 – ऑल
  4. हेक्स – 1 – ईन – 3 – ऑल
  5. 2 – ब्रोमो – 3 – मेथिलब्यूट – 2 – ईन – 1 – ऑल

प्रश्न 11.4
दर्शाइए कि मेथेनल पर उपर्युक्त ग्रीन्यार अभिकर्मक से अभिक्रिया द्वारा निम्नलिखित ऐल्कोहॉल कैसे विरचित किए जाते हैं?
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उत्तर:
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प्रश्न 11.5
निम्नलिखित अभिक्रिया के उत्पादों की संरचना लिखिए –
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उत्तर:
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2. NaBH4 एक दुर्बल अपचायक है, यह कीटोन समूह को द्वितीयक ऐल्कोहालिक समूह में अपचयित कर सकता है, परन्तु एस्टर को नहीं।
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प्रश्न 11.6
यदि निम्नलिखित एल्कोहॉल क्रमशः
(क) HCl – ZnCl2
(ख) HBr
(ग) SOCl2 से अभिक्रिया करें तो आप अपेक्षित उत्पादों की संरचनाएँ दीजिए।
(i) ब्यूटेन – 1 – ऑल
(ii) 2 – मेथिलब्यूटेन – 2 – ऑल
उत्तर:
(क) HCl – ZnCl2 (ल्यूकास अभिकर्मक) के साथ [With HCl – ZnCl2 (Lucas reagent)]:
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(ख) HBr के साथ (With HBr):
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प्रश्न 11.7

  1. 1 – मेथिलसाइक्लोहेक्सेनॉल और
  2. ब्यूटेन – 1 – ऑल के अम्ल उत्प्रेरित निर्जलन के मुख्य उत्पादों की प्रागुक्ति कीजिए।

उत्तर:
1. 1 – मेथिलसाइक्लोहेक्सेनॉल अम्ल द्वारा उत्प्रेरित निर्जलन पर दो उत्पाद, I तथा II देता है। चूंकि उत्पाद (I) अधिक प्रतिस्थापित है, अत: सेजफ नियम से यह मुख्य उत्पाद है।
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2. ब्यूटेन – 1 – ऑल का अम्ल उत्प्रेरित निर्जलन पर ब्यूटेन – 2 – ईन मुख्य उत्पाद देता है। ऐल्कोहॉलों का निर्जलन कार्बोकैटायन माध्यमिकों के द्वारा होता है। अत: यह दो प्रोटॉन निकालकर ब्यूट – 2 – ईन या ब्यूट – 1 – ईन बनाता है। सेजफ के नियम से मुख्य उत्पाद ब्यूट – 2 – ईन है क्योंकि यह अधिक स्थाई है।
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प्रश्न 11.8
ऑर्थो तथा पैरा-नाइट्रो फीनॉल, फीनॉल से अधिक अम्लीय होती हैं। उनके संगत फीनॉक्साइड आयनों की अनुनादी संरचनाएँ बताइए।
उत्तर:
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O – नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाएँ
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p – नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाएँ
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नाइट्रो प्रतिस्थापित फिनॉक्साइड की अनुनादी संरचनाओं में ऋणात्मक आवेश उस कार्बन परमाणु पर है जिससे इलेक्ट्रॉन लेने वाला नाइट्रो समूह जुड़ा है। अतः ये अम्लीय प्रकृति अन्य अनुनादी संरचनाओं भी अधिक होती है। फलत: अर्थों तथा पैरा नाइट्रोफीनॉल से अधिक अम्लीय होते हैं।

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प्रश्न 11.9
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में सम्मिलित समीकरण लिखिए –

  1. राइमर – टीमैन अभिक्रियाओं
  2. कोल्बे अभिक्रिया

उत्तर:
1. रीमर तथा टीमैन अभिक्रिया (Reimer and Tiemann’s Reaction):
यह हाइड्राक्सी ऐल्डिहाइड्रों और अम्लों के बनाने की प्रमुख विधि है। -CHO तथा -COOH समूह OH समूह से O – तथा p – स्थानों पर प्रवेश करता है। इस अभिक्रिया में फिनोल को क्लोरोफार्म व जलीय NaOH के साथ गर्म करने पर सेलिसिलिक ऐल्डिहाइड या सौलिसिलिक अम्ल बनते हैं।
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2. कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe Reaction):
यह हाइड्राक्सी बनाने की अभिक्रिया है। फीनॉल के बेन्जीन न्यूक्लियस -OH समूह के O – तथा p – स्थानों पर -COOH प्रवेश करता है। जब शुष्क सोडियम फार्मेट को 140°C पर अधिक दाब पर CO2 के साथ गर्म करने पर सैलिसिलिक अम्ल बनता है।
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प्रश्न 11.10
एथेनॉल एवं 3-मेथिलपेन्टेन-2-ऑल से प्रारम्भ कर 2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन के विलियमसन संश्लेषण की अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
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प्रश्न 11.11
1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेन्जीन के विरचन के लिए निम्नलिखित अभिकारकों में से कौन-सा युग्म उपलब्ध है और क्यों?
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उत्तर:
1. प्रथम युग्म 1-मेथाक्सी-4-नाइट्रोबेन्जीन के विचारण के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि अनुनाद के कारण C = Br के मध्य द्विआबन्ध गुण विद्यमान होता है जिससे इसका टूटना कठिन है।

2. दूसरे युग्म में मेथिल ब्रोमाइड पर 4-नाइट्रोफिनाक्सॉइड आयन द्वारा नाभिकरागी क्रिया से ईथर बनता है।
विलयमसन संश्लेषण से बना उत्पाद निम्न है।
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अतः इस विचरण के लिए दूसरा युक्त उपयुक्त है।

प्रश्न 11.12
निम्नलिखित अभिक्रियाओं से प्राप्त उत्पादों का अनुमान लगाइए –
1. CH3 – CH2 – CH2 – O – CH3 + HBr →
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उत्तर:
1. ऑक्सीजन से जुड़े दोनों ऐल्किल समूह प्राथमिक हैं, इसलिए Br आयन की अभिक्रिया छोटे ऐल्किल समूह (मेथिल समूह) से होगी तथा प्रोपेन-1-ऑल तथा ब्रोमोमेथेन का निर्माण होगा।
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2. अनुनाद के कारण, C6H5 – O आबन्ध में कुछ द्विआबन्ध गुण विद्यमान होता है, इसलिए यह O – C2H5 आबन्ध से प्रबल होता है। अतः दुर्बल O – C2H5 आबन्ध का विदलन होता है तथा फीनॉल एवं ब्रोमोएथेन प्राप्त होते हैं।
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3. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन में, ऐल्कॉक्सी समूह ऐरोमैटिक वलय को सक्रिय बनाता है तथा प्रवेश करने वाले समूह को O – तथा p – स्थितियों की ओर निर्दिष्ट करता है। इसलिए एथॉक्सीबेन्जीन का नाइट्रीकरण 2-तथा 4-नाइट्रोएथॉक्सीबेन्जीन का मिश्रण देता है जिसमें 4-नाइट्रोएथॉक्सीबेन्जीन 2-स्थिति पर त्रिविमीय बाधा के कारण मुख्य उत्पाद होता है।
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4. चूँकि एथिल काबोंकैटायन की तुलना में तृतीयक-ब्यूटिल कार्बोकैटायन अत्यधिक स्थायी होता है। इसीलिए अभिक्रिया \(\mathrm{S}_{\mathrm{N}^{1}}\) क्रियाविधि द्वारा होती है तथा तृतीयक-ब्यूटिल आयोडाइड एवं एथेनॉल निम्नलिखित प्रकार बनते हैं –
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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 11.1
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी० ए०सी (IUPAC) नाम लिखिए –
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उत्तर:

  1. 2, 2, 4 – ट्राइमेथिलपेन्टेन-3-ऑल
  2. 5 – एथिलंहेप्टेन-2, 4-डाइऑल
  3. ब्यूटेन-2, 3-डाइऑल
  4. प्रोपेन-1, 2, 3-ट्राइऑल
  5. 2 – मेथिलफीनॉल
  6. 4 – मेथिलफीनॉल
  7. 2, 5 – डाइमेथिलफीनॉल
  8. 2, 6 – डाइमेथिलफीनॉल
  9. 1 – मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
  10. एथॉक्सीबेन्जीन
  11. 1 – फीनॉक्सीहेप्टेन
  12. 2 – एथॉक्सीब्यूटेन

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प्रश्न 11.2
निम्नलिखित आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) नाम वाले यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए –

  1. 2 – मेथिलब्यूटेन-2-ऑल
  2. 1-फेनिलप्रोपेने-2-ऑल
  3. 3, 5-डाइमेथिलहेक्सेन-1, 3, 5-ट्राइऑल
  4. 2, 3-डाइएथिलफीनॉल
  5. 1-एथॉक्सीप्रोपेन
  6. 2-एथॉक्सी -3-मेथिलपेन्टेन
  7. साइक्लोहेक्सिलमेथेनॉल
  8. 3-साइक्लोहेक्सिलपेन्टेन-3-ऑल
  9. साइक्लोपेन्टेन-3-ईन-1-ऑल
  10. 3-क्लोरोमेथिलपेन्टेन-1-ऑल

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-26

प्रश्न 11.3

  1. C5H12O आणविक सूत्र वाले ऐल्कोहॉलों के सभी समावयवों की संरचना लिखिए एवं उनके आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) नाम दीजिए।
  2. प्रश्न 11.3 (i) के समावयवी ऐल्कोहॉलों को प्राथमिक, द्वितीकय एवं तृतीयक ऐल्कोहॉलों में वर्गीकृत कीजिए।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-27

2. प्राथमिक ऐल्कोहॉल – (क), (घ),(ङ),(छ)।
द्वितीयक ऐल्कोहॉल – (ख), (ग), (ज)।
तृतीयक ऐल्कोहॉल – (च)।

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प्रश्न 11.4
समझाइए कि प्रोपेनॉल का क्वथनांक, हाइड्रोकार्बन ब्यूटेन से अधिक क्यों होता है?
उत्तर:
हाइड्रोकार्बन ब्यूटेन के अणु दुर्बल वाण्डरवाल्स आकर्षण बलों द्वारा जुड़े होते हैं, जबकि प्रापेनॉल में ये प्रबल अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्धन द्वारा जुड़े रहते हैं।
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अतः प्रोपेनॉल का क्वथनांक (391 K) हाइड्रोकार्बन ब्यूटेन (309 K) से अधिक होता है।

प्रश्न 11.5
समतुल्य आण्विक भार वाले हाइड्रोकार्बनों की अपेक्षा ऐल्कोहॉल जल में अधिक विलेय होते हैं। इस तथ्य को समझाइए।
उत्तर:
चूँकि ऐल्कोहॉल अणु जल अणुओं के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बना सकते हैं तथा इससे जल अणुओं में पहले से उपस्थित हाइड्रोजन-आबन्ध टूट जाते हैं। अतः ऐल्कोहॉल जल में विलेय होते हैं। दूसरी ओर हाइड्रोकार्बन जल अणुओं के साथ हाइड्रोजन आबन्ध नहीं बनाते, अत: जल में अघुलनशील होते हैं।

प्रश्न 11.6
हाइड्रोबोरॉनन-ऑक्सीकरण अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं? इसे उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
हाइड्रोबोरॉनन-ऑक्सीकरण अभिक्रिया:
डाइबोरेन (BH3)2 ऐल्कीनों से अभिक्रिया करके एक योगज उत्पाद ट्राइऐल्किल बोरेन बनाता है जो जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में हाइड्रोजन परऑक्साइड द्वारा
ऑक्सीकृत होकर ऐल्कोहॉल देता है। यह अभिक्रिया हाइड्रोबोरॉनन-ऑकसीकरण अभिक्रिया कहलाती है।
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द्विआबन्ध पर बोरेन का योजन इस प्रकार होता है कि बोरॉन परमाणु उस sp2 संकरित कार्बन परमाणु पर जुड़ता है जिस पर पहले से ही अधिक हाइड्रोजन परमाण उपस्थित होते हैं। इस प्रकार प्राप्त ऐल्कोहॉल ऐसा दिखता है जैसे कि यह ऐल्कोनों से मार्कोनीकॉफ के नियम के विपरीत जलयोजन से बना हो। इस अभिक्रिया में ऐल्कोहॉलों की लब्धि उत्तम होती है।

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प्रश्न 11.7
आणविक सूत्र C7H8O वाले मोनोहाइड्रिक फीनॉलों की संरचनाएँ तथा आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम लिखिए।
उत्तर:
आण्विक सूत्र C7H8O वाले मोनोहाइड्रिक फीनॉल के तीन समावयवों की संरचनाएँ तथा IUPAC नाम निम्नांकित है –
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प्रश्न 11.8
ऑर्थो तथा पैरा-नाइट्रोफीनॉलों के मिश्रण को भाप-आसवन द्वारा पृथक् करने में भाप-वाष्पशील समावयवी का नाम बताइए। इसका कारण दीजिए।
उत्तर:
ऑथों-नाइट्रोफीनॉल कीलेशन के कारण भाप-वाष्पशील है अतः जबकि p – नाइट्रोफीनॉल नहीं इसे p – नाइट्राफीनॉल से भाप-आसवन द्वारा पृथक्कृत किया जा सकता है; क्योंकि p – नाइट्रोफीनॉल अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्धन के कारण भाप-वाष्पशील नहीं है।

प्रश्न 11.9
क्यूमीन से फीनॉल बनाने की अभिक्रिया का समीकरण दीजिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-31

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प्रश्न 11.10
क्लोरोबेन्जीन से फीनॉल बनाने की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-32

प्रश्न 11.11
एथीन के जलयोजन से एथेनॉल प्राप्त करने की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
एथीन को सर्वप्रथम सान्द्र H2SO4 में प्रवाहित करने पर एथिल हाइड्रोजन सल्फेट बनता है।
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एथिल हाइड्रोजन सल्फेट को जल के साथ उबालने पर एथेनॉल बनता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-34

प्रश्न 11.12
आपको बेन्जीन, सान्द्र H2SO4 और NaOH दिए गए हैं। इन अभिकर्मकों के उपयोग द्वारा फीनॉल के विरचन की समीकरण लिखिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-35

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प्रश्न 11.13
आप निम्नलिखित को कैसे संश्लेषित करेंगे? दर्शाइए।

  1. एक उपयुक्त ऐल्कीन से 1-फेनिल एथेनॉल
  2. \(\mathbf{S}_{\mathbf{N}} \mathbf{2}\) अभिक्रिया द्वारा ऐल्किल हैलाइड के उपयोग से साइक्लोहेक्सिल मेथेनॉल
  3. एक उपयुक्त ऐल्किल हैलाइड के उपयोग से पेन्टेन-1-ऑल।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-36

प्रश्न 11.14
ऐसी दो अभिक्रियाएँ दीजिए जिनसे फीनॉल की अम्लीय प्रकृति प्रदर्शित होती हो, फीनॉल की अम्लता की तुलना एथेनॉल से कीजिए।
उत्तर:
फीनॉल की अम्लीय प्रकृति प्रदर्शित करने वाली अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
1. सोडियम से अभिक्रिया (Reaction with sodium):
फीनॉल सक्रिय धातुओं; जैसे-सोडियम से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन देता है।
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2. NaOH से अभिक्रिया (Reaction with NaOH):
फीनॉल NaOH में घुलकर फोनॉक्साइड तथा जल बनाता है।
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फीनॉल तथा एथेनॉल की अम्लता की तुलना:
फोनॉल की अम्लीय प्रकृति जलीय विलयन में मुक्त प्रोटॉन के कारण होती है जिसके कारण फोनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त कर लेता है, जबकि एथाक्साइड आयन स्थाई नहीं होता है।
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प्रश्न 11.15
समझाइए कि ऑर्थो-नाइट्रोफीनॉल, ऑर्थो-मेथॉक्सीफीनॉल से अधिक अम्लीय क्यों होता है?
उत्तर:
नाइट्रो (NO2) समूह इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने वाला समूह है जबकि मेथॉक्सी (OCH3) समूह इलेक्ट्रॉन त्यागने वाला समूह है। अतः ऑर्थो-नाइट्रोफिनॉल में H+ आसानी से मुक्त हो जाता है और यह आथों-मेथॉक्सीफिनॉल में कठिन है। ऑर्थो-नाइट्रोफिनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करके के आथों-नाइट्रोफिनॉल को प्रबल अम्ल बनाता है। इसके विपरीत एक प्रोटॉन निकल जाने के बाद आथोंमेथाक्सीफिनाक्सॉइड आयन अनुनाद द्वारा अस्थाई हो जाता है।
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अतः ऑर्थो-नाइट्रोफिनॉल, ऑर्थो-मेथॉक्सीफिनॉल से अधिक अम्लीय है।

प्रश्न 11.16
समझाइए कि बेन्जीन वलय से जुड़ा – OH समूह उसे इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापनों कैसे सक्रियित करता है?
उत्तर:
फीनॉल को निम्नांकित संरचनाओं का अनुनादी संकर माना जा सकता है –
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अतः -OH समूह का +R प्रभाव, बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है जो इलेक्ट्रॉन अभिक्रिया को सरल कर देता है। दूसरे शब्दों में -OH समूह की उपस्थिति बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉन प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति सक्रियित कर देती है। पुनः चूँकि दो ऑर्थो-तथा एक पैरा-स्थिति पर इलेक्ट्रान घनत्व उच्च होता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन मुख्यतया ऑथों- तथा पैरा-स्थितियों पर ही होता है।

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प्रश्न 11.17
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए –

  1. प्रोपेन-1-ऑल का क्षारीय KMnO4 के साथ ऑक्सीकरण
  2. ब्रोमीन की CS2 में फीनॉल के साथ अभिक्रिया
  3. तनु HNO3 की फीनॉल से अभिक्रिया
  4. फीनॉल की जलीय NaOH की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया।

उत्तर:
1. CH3CH2CH2OH + 2[O]
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-42

प्रश्न 11.18
निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए –

  1. कोल्बे अभिक्रिया
  2. राइमर-टीमैन अभिक्रिया
  3. विलियमसन ईथर संश्लेषण
  4. असममित ईथर।

उत्तर:
1. तथा

2. के लिए पाठ्यनिहित प्रश्न 11.9 का उत्तर देखें।

3. विलियमसन ईथर संश्लेषण–यह सममित और असममित ईथरों को बनाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि: है। इस विधि से ऐल्किल हैलाइड की सोडियम ऐल्कॉक्साइड के साथ अभिक्रिया कराई जाती है।
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प्रतिस्थापित (द्वितीयक अथवा तृतीयक) ऐल्किल समूह युक्त ईथर भी इस विधि द्वारा बनाई जा सकती हैं। इस अभिक्रिया में प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड पर ऐल्कॉक्साइड आयन को (\(\mathbf{S}_{\mathbf{N}} \mathbf{2}\)) अक्रमण होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-44

यह ऐल्किल हैलाइड प्राथमिक होता है तो अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक ऐल्किल हैलाइडों की अभिक्रिया में विलोपन, प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्थापन से आगे होता है। यदि तृतीयक ऐल्किल हैलाइड का उपयोग किया जाए तो उत्पाद के रूप में केवल ऐल्कीन प्राप्त होती है तथा कोई ईथर नहीं बनती। उदाहरणार्थ – CH3ONa की (CH3)3C – Br के साथ अभिक्रिया द्वारा केवल 2 – मेथिलप्रोपीन प्राप्त होती है।
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4. असममित ईथर-यदि ऑक्सीजन परमाणु से जुड़े ऐल्किल या ऐरिल समूह भिन्न-भिन्न हों तो ईथर को असममित ईथर कहते हैं। जैसे-एथिल मेथिल ईथर, मेथिल फेनिल ईथर आदि।
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प्रश्न 11.19
एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
क्रियाविधि एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि निम्न प्रकार है –
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प्रश्न 11.20
निम्नलिखित परिवर्तनों को किस प्रकार किया जा सकता है?

  1. प्रोपीन → प्रोपेन-2-ऑल
  2. बेन्जिल क्लोराइड → बेन्जिल ऐल्कोहॉल
  3. एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड → प्रोपेन1-ऑल
  4. मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड → 2- मेथिलप्रोपेन-2-ऑल

उत्तर:
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प्रश्न 11.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में प्रयुक्त अभिकर्मकों के नाम बताइए –

  1. प्राथमिक ऐल्कोहॉल का कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकरण
  2. प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऐल्डिहाइड में ऑक्सीकरण
  3. फीनॉल का 2, 4, 6-ट्राइब्रोमोफीनॉल में ब्रोमीनन
  4. बेन्जिल ऐल्कोहॉल से बेन्जोइक अम्ल
  5. प्रोपेन-2-ऑल का प्रोपीन में निर्जलन
  6. ब्यूटेन-2-ऑन से ब्यूटेन-2-ऑल।

उत्तर:

  1. अम्लीय या उदासीन K2Cr2O7, अम्लीय या क्षारीय KMnO4
  2. पिरिडीन क्लोरोक्रोमेट (Pcc) या पिरिडीन डाइक्रोमेट
  3. ब्रोमीन जल (Br2/H2O)
  4. अम्लीय या क्षारीय KMnO4
  5. 373 K पर 60% H2SO4
  6. क्षारीय NaBH4 या LiAlH4

प्रश्न 11.22
कारण बताइए कि मेथॉक्सीमेथेन की तुलना में एथेनॉल का क्वथनांक उच्च क्यों होता है?
उत्तर:
एथेनॉल विद्युतऋणात्मक ऑक्सीजन परमाणु से जुड़े हाइड्रोजन की उपस्थिति के कारण अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्धन प्रदर्शित करता है। जबकि मेथाक्सी मेथेन हाइड्रोजन आबन्ध नहीं बनाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-49
इन हाइड्रोजन आबन्धों को तोड़ने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, अतः एथेनॉल का क्वथनांक मेथॉक्सीमेथेन की तुलना में उच्च होता है।

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प्रश्न 11.23
निम्नलिखित ईथरों के आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) नाम दीजिए –
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उत्तर:

  1. 1-एथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
  2. 2-क्लोरो-1-मेथॉक्सीएथेन
  3. 4-नाइट्रोऐनिसॉल
  4. 1-मेथॉक्सीप्रोपेन
  5. 1-एथॉक्सी-4, 4-डाइमेथिलसाइक्लोहेक्सेन
  6. एथॉक्सीबेन्जीन

प्रश्न 11.24
निम्नलिखित ईथरों को विलियमसन संश्लेषण द्वारा बनाने के लिए अभिकर्मकों के नाम एवं समीकरण लिखिए –

  1. 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
  2. एथॉक्सीबेन्जीन
  3. 2-मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
  4. 1-मेथॉक्सीएथेन

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-51

प्रश्न 11.25
कुछ विशेष प्रकार के ईथरों को विलियमसन संश्लेषण द्वारा बनाने की सीमाओं को उदाहरणों से समझाइए।
उत्तर:
विलियमसन संश्लेषण को तृतीयक ऐल्किल हैलाइडों को बनाने में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे ईथर के स्थान पर ऐल्कीन प्राप्त होते हैं। उदाहरणार्थ – CH3ONa की (CH3)3C – Br के साथ अभिक्रिया द्वारा केवल 2-मेथिलप्रोपीन प्राप्त होती है।
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ऐसा इसलिए होता है; क्योंकि ऐल्कॉक्साइड न केवल नाभिकरागी होते हैं, अपितु प्रबल क्षारक भी होते हैं। वे ऐल्किल हैलाइडों के साथ विलोपन अभिक्रिया करते हैं।

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प्रश्न 11.26
प्रोपेन-1-ऑल से 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन को किसी प्रकार बनाया जाता है? इस अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
प्रोपेन-1-ऑल से 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन को निम्नलिखित दो विधियाँ द्वारा बनाया जा सकता है –
(क) विलियमसन संश्लेषण द्वारा –
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1. 3CHCH, CH2OH + PBr3 →
प्रोपेन-1-ऑल

प्रश्न 11.27
द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉलों के अम्लीय निर्जलन द्वारा ईथरों को बनाने की विधि उपयुक्त नहीं है। कारण बताइए।
उत्तर:
प्राथमिक ऐल्कोहॉल के अम्लीय निर्जलन द्वारा ईथर बनाने की अभिक्रिया \(\mathrm{S}_{\mathrm{N}} 2\) क्रियाविधि से होती है जिसमें प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल अणु पर ऐल्कोहॉल अणु की नाभिकरागी अभिक्रिया होती है।
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यद्यपि इन परिस्थितियों के अन्तर्गत द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉल ईथरों के स्थान पर ऐल्कीन देते हैं। इसका कारण यह है कि त्रिविमीय बाधा के कारण प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल अणु पर ऐल्कोहॉल अणु की नाभिकरागी अभिक्रिया नहीं होती है। इसके स्थान पर द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉल एक जल-अणु निकालकर स्थायी द्वितीयक तथा तृतीयक कार्बोकैटायन बनाते हैं। ये कार्बोकैटायन एक प्रोटॉन निकालकर ऐल्कीन बनाने को वरीयता देते हैं न कि ऐल्कोहॉल अणु की अभिक्रिया द्वारा ईथर बनाना।
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इसी प्रकार तृतीयक ऐल्कोहॉल ऐल्कीन देते हैं, ईथर नहीं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-56

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प्रश्न 11.28
हाइड्रोजन आयोडाइड की निम्नलिखित के साथ अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखिए –

  1. 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
  2. मेथॉक्सीबेन्जीन तथा
  3. बेन्जिल एथिल ईथर।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-57

प्रश्न 11.29
ऐरिल ऐल्किल ईथरों में निम्नलिखित तथ्यों की व्याख्या कीजिए –

  1. ऐल्कॉक्सी समूह बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति सक्रियित करता है तथा
  2. यह प्रवेश करने वाले प्रतिस्थापियों को बेन्जीन वलय की ऑर्थों एवं पैरा स्थितियों की ओर निर्दिष्ट करता है।

उत्तर:
1. ऐरिल ऐल्किल ईथरों में ऐल्कॉक्सी समूह (-OR) का + R-प्रभाव बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है जिससे बेन्जीन वलय इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति सक्रियित है।
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2. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ मुख्यतया O – तथा p – स्थितियों पर ही होती हैं। क्योंकि m – स्थितियों की तुलना में दो O – तथा एक p – स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक बढ़ जाता है।
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ऐरोमैटिक ईथर फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण तथा ऐसिलीकरण अभिक्रियाएँ भी देते हैं।
उदाहरणार्थ –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-60

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प्रश्न 11.30
मेथॉक्सीमेथेन की HI के साथ अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
मेथॉक्सीमेथेन की HI के साथ अभिक्रिया की क्रिया विधि निम्नलिखित है – ईथर अणु आरम्भ में HI द्वारा प्रोटॉनीकृत होता है जो टूट कर I आयन देता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-61
फिर प्रोटॉनीकृत ईथर पर हैलाइड आयन (I) द्वारा आक्रमण किया जाता है जो नाभिक स्नेही की भाँति कार्य करता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-62
जब अभिक्रिया HI अधिकता में तथा उच्च ताप पर होती है तब बना मेथेनॉल निम्नलिखित क्रिया विधि से मेथिल आयोडाइड बनता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-63

प्रश्न 11.31
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए –

  1. फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया-ऐनिसोल का ऐल्किलन
  2. ऐनिसोल का नाइट्रीकरण
  3. एथेनोइक अम्ल माध्यम में ऐनिसोल का ब्रोमीनन
  4. ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलन।

उत्तर:
1. फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया:
ऐनिसोल फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया देता है अर्थात् ऐलुमीनियम क्लोराइड (एक लुईस अम्ल) की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइड तथा ऐसिल हैलाइड से अभिक्रिया से ऐल्किल और ऐसिल समूह ऑर्थो तथा पैरा स्थितियों पर निर्देशित होते हैं। उदाहरण –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 11 ऐल्कोहॉल, फ़िनॉल एवं ईथर img-64

2. ऐनिसोल का नाइट्रीकरण:
ऐनिसोल के नाइट्रीकरण से ऑथों तथा पैरा-नाइट्रोऐनिसोल का मिश्रण बनता हैं।
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3. एथेनोइक अम्ल माध्यम में ऐनिसोल का ब्रोमीनन (हैलोजेनीकरण):
फेनिल ऐल्किल ईथर बेन्जीन वलय में हैलोजेनीकरण दिखाते हैं। जैसे-ऐनीसोल आयरन (II) ब्रोमाइड उत्प्रेरक की अनुपस्थिति में भी एथेनोइक अम्ल माध्यम में ब्रोमीन के साथ ब्रोमीनन प्रदर्शित करता है।
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4. ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलन-इससे 2-मेथाक्सी ऐसीटोफीनॉन तथा 4-मेथाक्सी ऐसीटोफीनॉन प्राप्त होते हैं।
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प्रश्न 11.32
उपयुक्त ऐल्कीनों से आप निम्नलिखित ऐल्कोहॉलों का संश्लेषण कैसे करेंगे?
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उत्तर:
अम्लीय माध्यम में ऐल्कीन के जल योजन द्वारा सभी ऐल्कोहॉलों का संश्लेषण कर सकते हैं। ऐल्कीन से H2O का अम्ल-उत्प्रेरित योग मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार होता है।
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प्रश्न 11.33
3-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल को HBr से अभिकृत कराने पर निम्नलिखित अभिक्रिया होती है –
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इस अभिक्रिया की क्रियाविधि दीजिए।
उत्तर:
दी हुई अभिक्रिया की क्रिया विधि निम्नलिखित है –
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Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 10.1
निम्नलिखित यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए:

  1. 2-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन
  2. 1-क्लोरो-4-एथिलसाइक्लोहेक्सेन
  3. 4-तृतीयक-ब्यूटिल-3-आयोडोहेप्टेन
  4. 1, 4-डाइब्रोमोब्यूट-2-ईन
  5. 1-ब्रोमो-4-द्वितीयक-ब्यूटिल-2-मेथिलेबेन्जीन

उत्तर:
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प्रश्न 10.2
ऐल्कोहॉल तथा KI की अभिक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग क्यों नहीं करते?
उत्तर:
ऐल्कोहॉल के ऐल्किल आयोडाइड में परिवर्तन के लिए KI के साथ H2SO4 का प्रयोग नहीं किया जा सकता; क्योंकि यह KI की संगत HI में परिवर्तित कर देता है, फिर इसे IL2 में ऑक्सीकृत कर देता है।

प्रश्न 10.3
प्रोपेन के विभिन्न डाइहैलोजेन व्युत्पन्नों की संरचना लिखिए।
उत्तर:

  1. ClCH2CH2CH2Cl
  2. ClCH2CHClCH3
  3. Cl2CHCH2CH3
  4. CH3CCl2CH3

प्रश्न 10.4
C5H12 अणुसूत्र वाले समावयवी ऐल्केनों में से उसको पहचानिए जो प्रकाश रासायनिक क्लोरीन पर देता है:

  1. केवल एक मोनोक्लोराइड
  2. तीन समावयवी मोनोक्लोराइड
  3. चार समावयवी मोनोक्लोराइड।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 2
चूँकि सभी हाइड्रोजन परमाणु समतुल्य हैं, अत: किसी भी हाइड्रोजन परमाणु के प्रतिस्थापन पर समान उत्पाद (केवल एक मोनोक्लोराइड) बनेगा।

2. CaH3Cb H2C c H2Cb H2CaH3
समतुल्य हाइड्रोजनों को a, b, c से निर्देशित किया गया है। समतुल्य हाइड्रोजनों के प्रतिस्थापन पर समान उत्पाद (तीन समावयवी मोनोक्लोराइड) बनेंगे।

3.
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 3
इस प्रकार समतुल्य हाइड्रोजनों को a, b, c तथा d से निर्देशित किया गया है। अत: चार समावयवी उत्पाद सम्भव हैं।

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प्रश्न 10.5
निम्नलिखित प्रत्येक अभिक्रिया के मुख्य मोनोहैलो उत्पाद की संरचना बनाइए –
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उत्तर:
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केवल ऐल्कोहॉलीय OH – समूह HCl के साथ गर्म करने पर Cl से प्रतिस्थापित हो जाते हैं, परन्तु फीनॉलिक – OH समूह ऐसा नहीं करते हैं।
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प्रश्न 10.6
निम्नलिखित यौगिकों को क्वथनांकों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. ब्रोमोमेथेन, ब्रोमोफॉर्म, क्लोरोमेथेन, डाइब्रोमोमेथेन
  2. 1-क्लोरोप्रोपेन, आइसोप्रोपिल क्लोराइड, 1-क्लोरोब्यूटेन।

उत्तर:
1. चूँकि अणुभार बढ़ने से क्वथनांक बढ़ता है, अत: बढ़ता क्रम निम्नवत् है:
क्लोरोमेथेन < ब्रोमोमेथेन < डाइब्रोमोमेथेन < ब्रोमोफॉर्म

2. चूँकि आइसोप्रोपिल क्लोराइड का गलनांक 1-क्लरोप्रोपेन से कम होता है, अत: बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
आइसोप्रोपिल क्लोराइड < 1-क्लोरोप्रोपेन < 1-क्लोरोब्यूटेन
(शाखित होने के कारण आइसोप्रोपिल क्लोराइड का गलनांक 1-क्लोरोप्रोपेन से कम होगा।)

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प्रश्न 10.7
निम्नलिखित युगलों में से आप कौन-से ऐल्किल हैलाइड द्वारा SN2 क्रियाविधि से अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करने की अपेक्षा करते हैं? अपने उत्तर को समझाइए।
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उत्तर:
(i) CH3CH2CH2CH2Br
प्राथमिक हैलाइड होने के कारण कोई त्रिविम बाधा नहीं होगी।
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द्वितीयक हैलाइड, तृतीयक हैलाइड की तुलना में अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करता है।
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मेथिल समूह हैलाइड समूह के निकट होने के कारण त्रिविम बाधा अधिक होगी तथा अभिक्रिया का वेग कम होगा।

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प्रश्न 10.8
हैलोजेन यौगिकों के निम्नलिखित युगलों में से कौन-सा यौगिक तीव्रता से अभिक्रिया करेगा?
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उत्तर:
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तृतीयक कार्बोकैटायनं का स्थायित्व अधिक होने के कारण तृतीयक हैलाइड को अभिक्रियाशीलता द्वितीयक हैलाइड से अधिक होगी।

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प्राथमिक कार्बोकैटायन की तुलना में द्वितीयक कार्बोकैटायन का स्थायित्व अधिक होने के कारण।

प्रश्न 10.9
निम्नलिखित में A, B, C, D, E, R तथा R1 को पहचानिए –
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उत्तर:
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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 10.1
निम्नलिखित हैलाइडों के नाम आई० यू० पी० ए० सी० (IUPAC) पद्धति से लिखिए तथा उनका वर्गीकरण, ऐल्किल, ऐलिलिक, बेन्जिलिक (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक), वाइनिल अथवा ऐरिल हैलाइड के रूप में कीजिए –

  1. (CH3)2CHCH(Cl)CH3
  2. CH3CH2CH(CH3)CH(C2H5)Cl
  3. CH3CH2C(CH3)2CH2I
  4. (CH3)3CCH2CH(Br)C6H5
  5. CH3CH(CH3)CH(Br)CH3
  6. CH3C(C2H5)2CH2Br
  7. CH3C(Cl)(C2H5)CH2CH3
  8. CH3CH = C(Cl)CH2CH(CH3)2
  9. CH3CH = CHC(Br)(CH3)2
  10. p – ClC6H4CH2CH(CH3)2
  11. m – ClCH2C6H4CH2C(CH3)3
  12. 0 – Br – C6H4CH(CH3) CH2CH3

उत्तर:

  1. 2- क्लोरो-3-मेथिलब्यूटेन, 2° ऐल्किल हैलाइड
  2. 3-क्लोरो-4-मेथिलहेक्सेन, 2° ऐल्किल हैलाइड
  3. 1-आयोडो-2, 2-डाइमेथिलब्यूटेन, 1° ऐल्किल हैलाइड
  4. 1-ब्रोमो-3, 3-डाइमेथिल-1-फनिलब्यूटेन, 2° बेन्जिलिक हैलाइड
  5. 2-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन, 2° ऐल्किल हैलाइड
  6. 1-ब्रोमो-2-एथिल-2-मेथिलब्यूटेन, 1° ऐल्किल हैलाइड
  7. 3-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन, 3° ऐल्किल हैलाइड
  8. 3-क्लोरो-5-मेथिलहेक्स-2-ईन, वाइनिलिक हैलाइड
  9. 4-ब्रोमो-4-मेथिलपेन्ट-2-ईन, ऐलिलिक हैलाइड
  10. 1-क्लोरो-4-(2-मेथिलप्रोपिल) बेन्जीन, ऐरिल हैलाइड
  11. 1-क्लोरोमेथिल-3-(2, 2-डाइमेथिलप्रोपिल) बेन्जीन, 1° बेन्जिलिक हैलाइड
  12. 1-ब्रोमो-2-(1-मेथिलप्रोपिल) बेन्जीन, ऐरिल हैलाइड

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प्रश्न 10.2
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम दीजिए:

  1. CH3CH(CI)CH(Br)CH3
  2. CHF2CBrCIF
  3. CICH2C = CCH2Br
  4. (CCl3)3CCl
  5. CH3C(p – ClC6H4)2CH(Br)CH3
  6. (CH3)3CCH = ClC6H4I – p

उत्तर:

  1. 2-ब्रोमो-3-क्लोरोब्यूटेन
  2. 1-ब्रोमो-1-क्लोरो-1, 2, 2-ट्राइफ्लुओरोएथेन
  3. 1-ब्रोमो-4-क्लोरोब्यूट-2-आइन
  4. 2-(ट्राइक्लोरोमेथिल)-1, 1, 1, 2, 3, 3, 3-हेप्टाक्लोरोप्रोपेन
  5. 2-ब्रोमो-3, 3-बिस (4-क्लोरोफेनिल) ब्यूटेन
  6. 1-क्लोरो-1-64-आयोडोफेनिल)-3, 3-डाइमेथिलब्यूट-1-ईन

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

प्रश्न 10.3
निम्नलिखित कार्बनिक हैलोजेन यौगिकों की संरचना दीजिए –

  1. 2-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन
  2. p-ब्रोमोक्लोरो बेन्जीन
  3. 1-क्लोरो-4-एथिलसाइक्लोहेक्सेन
  4. 2-(2-क्लोरोफेनिल)-1-आयोडोऑक्टेन
  5. परफ्लुओरोबेन्जीन
  6. 4-तृतीयक-ब्यूटिल-3-आयोडोहेप्टेन
  7. 1-ब्रोमो-4-द्वितीयक-ब्यूटिल-2-मेथिल बेन्जीन
  8. 1, 4-डाइब्रोमोब्यूट-2-ईन।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 16

प्रश्न 10.4
निम्नलिखित में से किसी द्विध्रुव आघूर्ण सर्वाधिक होगा?

  1. CH2Cl2
  2. CHCl3
  3. CCl4

उत्तर:
चूँकि CCl4 समिताकार है, अतः इसमें द्विध्रुव आघूर्ण शून्य है। चूँकि CHCl3 में C – Cl द्विध्रुवों का परिणामी C – H तथा C – Cl आबन्ध के परिणाम अधिक होता है, अतः CHCl3 में द्विध्रुव आघूर्ण 1.03D है। CH2Cl2 में द्विध्रुव आघूर्ण (1.62D) CHCl3 से अधिक है क्योंकि CH2Cl2 में दो C – Cl द्विध्रुव का परिणामी दो CH द्विध्रुवों के परिणामी से प्रतिबलित होता है। अतः दिये गये तीनों यौगिकों में CH2Cl2 का द्विध्रुव आघूर्ण सर्वाधिक है।

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प्रश्न 10.5
एक हाइड्रोकार्बन C5H10 अँधेरे में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता, परन्तु सूर्य के तीव्र प्रकाश में केवल एक मोनोक्लोरो यौगिक C5H9Cl देता है। हाइड्रोकार्बन की संरचना क्या है?
उत्तर:

  1. आण्विक सूत्र C5H10 के साथ हाइड्रोकार्बन साइक्लोऐल्केन या ऐल्कीन हो सकता है।
  2. चूँकि हाइड्रोकार्बन अँधेरे में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता; अत: यह साइक्लोऐल्केन हो सकता है।
  3. चूँकि यह (साइकलोऐल्केन) सूर्य के तीव्र प्रकाश की उपस्थिति में Cl2 से अभिक्रिया करके एक मोनोक्लोरो यौगिक, C5H9Cl देता है; अत: साइक्लोऐल्केन, साइक्लोपेन्टेन है।
    BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 17

प्रश्न 10.6
C6H9Br सूत्र वाले यौगिक के सभी समावयवी लिखिए।
उत्तर:
C6H9Br के निम्नलिखित चार समावयव हैं –
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प्रश्न 10.7
निम्नलिखित से 1-आयोडोब्यूटेन प्राप्त करने की समीकरण दीजिए –

  1. 1-ब्यूटेनॉल
  2. 1-क्लोरोब्यूटेन
  3. ब्यूट-1-ईन

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 19

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प्रश्न 10.8
उभयदन्ती नाभिकरागी क्या होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
ऐसे नाभिकरागी को जो दो विभिन्न स्थानों से अभिक्रिया कर सकते हैं, उभयदन्ती नाभिकरागी कहते हैं। उदाहरणार्थ: सायनाइड आयन निम्नलिखित दो संख्याओं का एक अनुनाद संकर है:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 20
यह कार्बन परमाणु से जुड़ने से ऐल्किल आइसोसायनाइड बनाता है।

प्रश्न 10.9
निम्नलिखित प्रत्येक युगलों में से कौन यौगिक OH के साथ SN2 अभिक्रिया में अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करेगा?

  1. CH3Br अथवा CH3I
  2. (CH3)3CCl CH3Cl

उत्तर:

  1. चूँकि Br आयन की तुलना में I आयन अच्छा अवशिष्ट समूह है, अतः SN2 अभिक्रिया में, CH3Br की तुलना में, CH3I अधिक तीव्रता से OH आयन से अभिक्रिया करता है।
  2. चूँकि त्रिविम प्रभाव के आधार पर, SN2 अभिक्रियाओं में 1° ऐल्किल हैलाइड, तृतीयक ऐल्किल हैलाइडों से अधिक क्रियाशील होते हैं। अतः SN2 अभिक्रिया में CH3Cl, OH आयन के साथ अधिक तीव्र अभिक्रिया करता है।

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प्रश्न 10.10
निम्नलिखित हैलाइडों के एथेनॉल में सोडियम हाइड्रॉक्साइड द्वारा विहाइड्रोहैलोजनन के फलस्वरूप बनने वाली सभी ऐल्कीनों की संरचना लिखिए। इसमें से मुख्य ऐल्कीन कौन-सी होगी?

  1. 1-ब्रोमो-1-मेथिलसाइक्लाहेक्सेन
  2. 2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन
  3. 2, 2, 3-ट्राइमेथिल-3-ब्रोमोपेन्टेन।

उत्तर:
1. 1-ब्रोमो-1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन में Br परमाणु के प्रत्येक ओर स्थित B-हाइड्रोजन एकसमान होते हैं, अतः केवल 1-ऐल्कीन बनता है।
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2. चूंकि 2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन में सभी 98-हाइड्रोजन एकसमान होते हैं, इसलिए C2H5HONa C2H5OH के साथ अभिकृत किए जाने पर यह एकल ऐल्कीन देता है।
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3. 2, 2, 3 ट्राइमेथिल-3-ब्रोमोपेन्टेन दो ऐल्कीन (I तथा II) देता है क्योंकि इस में दो β – हाइड्रोजनों के दो भिन्न समूह होते हैं। सेजफ नियमानुसार अधिक उच्च प्रतिस्थापी ऐल्कीन (II) अधिक स्थाई होने के कारण मुख्य उत्पाद है।
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प्रश्न 10.11
निम्नलिखित परिवर्तन आप कैसे करेंगे?

  1. एथेनॉल से ब्यूट-1-आइन
  2. एथीन से ब्रोमोएथेन
  3. प्रोपीन से 1-नाइट्रोप्रोपीन
  4. टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल
  5. प्रोपीन से प्रोपाइन
  6. एथेनॉल से एथिल फ्लु ओराइड
  7. ब्रोमोमेथेन से प्रोपेनोन
  8. ब्यूट-1-ईन से ब्यूट-2-ईन
  9. 1-क्लोरोब्यूटेने से n-ऑक्टेन
  10. बेन्जीन से बाइफेनिल।

उत्तर:
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प्रश्न 10.12
समझाइए, क्यों –

  1. क्लोरोबेन्जीन का द्विध्रुव आघूर्ण साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम होता है?
  2. ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय होते हुए भी जल में अमिश्रणीय हैं?
  3. ग्रीन्यार अभिकर्मक का विरचन निर्जलीय अवस्थाओं में करना चाहिए?

उत्तर:
1. sp2 – संकरित कार्बन, s – गुण अधिक होने के कारण, sp3 – संकरित कार्बन से अधिक विद्युतऋणात्मक होता है। अत: क्लोरोबेन्जीन में C – Cl आबन्ध के sp2 – संकरित कार्बन में, साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड के sp3 – संकरित कार्बन से, Cl पर इलेक्ट्रॉन विमोचित करने की प्रवृत्ति कम होती है।
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अतः क्लोरोबेन्जीन में C – Cl आबन्ध साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम ध्रुवी होता है। अन्य शब्दों में, क्लोरोबेन्जीन के Cl परमाणु पर ऋणावेश का परिमाण अर्थात् δ, साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम होता है। अब बेन्जीन वलय पर Cl परमाणु के एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्मों के विस्थानीकरण के कारण क्लोरोबेन्जीन का C – Cl आबन्ध कुछ द्विआबन्ध गुण ग्रहण कर लेता है, जबकि साइक्लोहेक्सिल का C – Cl आबन्ध शुद्ध एकल आबन्ध ही होता है। अतः क्लोरोबेन्जीन में C – Cl आबन्ध साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में छोटा होता है।
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चूँकि द्विध्रुव आघूर्ण, आवेश तथा दूरी का गुणनफल होता है, इसलिए Cl परमाणु पर ऋणावेश परिमाण तथा C – Cl दूरी कम होने के कारण क्लोरोबेन्जीन, में द्विध्रुव आघूर्ण साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम होता है।

2. ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय अणु होते हैं, इसलिए इनके अणु द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण द्वारा परस्पर रहते हैं। H2O के अणु हाइड्रोजन आबन्धों द्वारा जुड़े होते हैं। अब चूँकि जल तथा ऐल्किल हैलाइड अणु बीच उत्पन्न हुए नए आकर्षण बल, ऐल्किल हैलाइड-ऐल्किल हैलाइड अणुओं तथा जल-जल अणुओं से पहले से ही उपस्थित आकर्षण बलों की तुलना में दुर्बल होते हैं, इसलिए ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय होते हैं। जल में अमिश्रणीय होते हैं।

3. ग्रीन्यार अभिकर्मक अत्यन्त क्रियाशील होते हैं। ये उपकरणों अथवा प्रारम्भिक पदार्थों (R – Mg) में उपस्थित नमी से अभिक्रिया कर लेते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 31
अतः ग्रीन्यार अभिकर्मक का विरचन निर्जलीय अवस्थाओं में करना चाहिए।

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प्रश्न 10.13
फ्रेऑन-12, DDT, कार्बनटेट्राक्लोराइड तथा आयोडोफार्म के उपयोग दीजिए।
उत्तर:
फ्रेऑन के उपयोग:
यह ऐरोसॉल प्रणोदक, प्रशीतक तथा वायु शीतलन में उपयोग करने के लिए उत्पादित किए जाते हैं।

DDT के उपयोग:
DDT का उपयोग कीटनाशी के रूप में किया जाता है, परन्तु जीवों में इसके सतत् अन्तर्ग्रहण से उत्पन्न विषैले प्रभावों के कारण इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है।

कार्बन टेट्राक्लोराइड के उपयोग –

  1. इस का उपयोग घर एवं उद्योग दोनों में शोधक के रूप है।
  2. इसका उपयोग प्रशीतकों, एयेरासॉल के नोदक तथा औषधियों के निर्माण में किया जाता है।
  3. यह वसा, तेल, मोम तथा रेजिन के लिए उपयोगी विलायक है।
  4. आयोडाइड तथा ब्रोमाइड के क्लोरीन जल परीक्षण में भी यह विलायक के रूप में प्रयुक्त होता है।
  5. इससे फ्रेऑन-12 भी प्राप्त होता है।
  6. इसका उपयोग पाइरीन नाम से अग्निशामक के रूप में। होता है। इसकी प्रकृति अज्वलनशील होती है। और ऑक्सीजन या। वायु को जलते पदार्थ के सम्पर्क में आने से रोकते हैं।

आयोडोफॉर्म के उपयोग:
इसका उपयोग प्रारम्भ में पूर्तिरोधी (ऐण्टिसेप्टिक) के रूप में किया जाता था, परन्तु आयोडोफॉर्म का यह पूर्तिरोधी गुण अयोडोफॉर्म के कारण स्वयं नहीं, बल्कि मुक्त हुई आयोडीन के कारण होता है। इसकी अरुचिकर गन्ध के कारण अब इसके स्थान पर आयोडीनयुक्त अन्य दवाओं का उपयोग किया जाता है।

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प्रश्न 10.14
निम्नलिखित प्रत्येक अभिक्रिया में बनने वाले मुख्य कार्बनिक उत्पाद की संरचना लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 10.15
निम्नलिखित अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 34
उत्तर:
KCN निम्नलिखित दो अंशदायी संरचनाओं का अनुनादी संकर है –
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अत: CN एक उभयदन्ती नाभिकरागी होने के कारण यह n – BuBr में C – Br आबन्ध के कार्बन परमाणु से C अथवा N के द्वारा अभिक्रिया करता है। चूँकि C – N आबन्ध से C – C आबन्ध प्रबल होता है, अतः यह C के द्वारा अभिक्रिया करके n – ब्यूटिल/सायनाइड बनाता है।
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प्रश्न 10.16
SN2 प्रतिस्थापन के प्रति अभिक्रियाशीलता के आधार पर इन यौगिकों के समूहों को क्रमबद्ध कीजिए।

  1. 2-ब्रोमो-2 मेथिलब्यूटेन, 1-ब्रोमोपेन्टेन, 2-ब्रोमोपेन्टेन
  2. 1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन, 2-ब्रोमो- 2-मेथिलब्यूटेन, 3-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन
  3. 1-ब्रोमोब्यूटेन, 1-ब्रोमो-2, 2-डाइमेथिलप्रोपेन, 1-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन, 1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन।

उत्तर:
1. SN2 अभिक्रियाओं में अभिक्रियाशीलता त्रिविम अवरोध पर निर्भर करती है। त्रिविम अवरोध अधिक होने पर अभिक्रिया मन्द होती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 37
त्रिविम कारकों के कारण SN2 अभिक्रियाओं में क्रियाशीलता का क्रम -1° > 2° > 3° है, इसलिए दिए गए ऐल्किल ब्रोमाइडों की अभिक्रियाशीलता का क्रम इस प्रकार होगा –
1-ब्रोमोपेन्टेन > 2-ब्रोमोपेन्टेन > 2-ब्रोमो- 2-मेथिलब्यूटेन
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 38
त्रिविम प्रभाव के कारण SN2 अभिक्रियाओं में ऐल्किल हैलाइडों की अभिक्रियाशीलता का क्रम 1° > 2° > 3° है, इसलिए दिए गए

ऐल्किल ब्रोमाइडों की अभिक्रियाशीलता का क्रम निम्न प्रकार होगा –
1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन > 3-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन > 2-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटैन
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 39
चूँकि 1° ऐल्किल हैलाइडों की स्थिति में त्रिविम अवरोध इस प्रकार बढ़ता है –
n – ऐल्किल हैलाइड, β – स्थिति से अन्य किसी स्थिति पर प्रतिस्थापीयुक्त ऐल्किल हैलाइड, β – स्थिति पर एक प्रतिस्थापी, β – स्थिति पर दो प्रतिस्थापी। इसलिए अभिक्रियाशीलता भी इसी क्रम में घटेगी। अतः दिए गए ऐल्किल ब्रोमाइडों की अभिक्रियाशीलता का क्रम इस प्रकार होगा –
1-ब्रोमोब्यूटेन > 1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन > 1-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन > 1-ब्रोमो-2, 2-डाइमेथिलप्रोपेन

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प्रश्न 10.17
C6H5CH2Cl तथा C6H5CHClC6H5 में से कौन-सा यौगिक जलीय KOH से शीघ्रता से जल-अपघटित होगा?
उत्तर:
C6H5CH2Cl एक 1° ऐरिलऐल्किल हैलाइड है तथा C6H5CHClC6H5 एक 2° ऐरिलऐल्किल हैलाइड है। SN1 अभिक्रियाओं में क्रियाशीलता कार्बोकैटायनों के स्थायित्व पर निर्भर करती है।

चूंकि C6H5 – C6H5ClC6H5 SN1 से व्युत्पन्न कार्बोकेटायन C6H5CH2Cl से अधिक स्थायी होता है, अत: C6H5CH2Cl परिस्थितियों के अन्तर्गत C6H5CH2Cl की तुलना में अधिक सरलता से जल-अपघटित होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 40
चूँकि SN2 के अन्तर्गत त्रिविम अवरोध निर्भर करती है, अतः SN2 के अन्तर्गत C6H5CH2Cl का जल अपघटन C6H5CHClC6H5 से अधिक आसानी से हो जाता है।

प्रश्न 10.18
0 – तथा m – समावयवियों की तुलना में p – डाइक्लोरोबेन्जीन का गलनांक उच्च होती है, विवेचना कीजिए।
उत्तर:
p – समावयव की संरचना समितकार होती है। इसके फलस्वरूप ये अण ठोस अवस्था में संगत o – तथा m – समावयवों की तुलना में अधिक निविड संकुलित (closely packed) होते हैं। आकर्षण बल अधिक होने के कारण इन का गलनांक 0-तथा m-डाइक्लोरो बेन्जीन की तुलना में उच्च होता है।

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प्रश्न 10.19
निम्नलिखित परिवर्तन कैसे सम्पन्न किए. जा सकते हैं?

  1. प्रोपीन से प्रोपेन-1-ऑल
  2. एथेनॉल से ब्यूट-1-आइन
  3. 1-ब्रेमोप्रोपेन से 2-ब्रोमोप्रोपेन
  4. टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल
  5. बेन्जीन से 4-ब्रोमोनाइट्रोबेन्जीन
  6. बेन्जिल ऐल्कोहॉल से 2-फेनिल एथेनोइक अम्ल
  7. एथेनॉल से प्रोपेन नाइट्राइल
  8. ऐनिलील में क्लोरोबेन्जीन
  9. 2-क्लोरोब्यूटेन से 3, 4-डाइमेथिलहेक्सेन
  10. 2-मेथिल-1-प्रोपीन से 2-क्लोरो- 2-मेथिलप्रोपेन
  11. एथिल क्लोराइड से प्रोपेनोइक अम्ल
  12. ब्यूट-1-ईन से n-ब्यूटिल आयोडाइड
  13. 2-क्लोरोप्रोपेन से 1-प्रोपेनॉल
  14. आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल से आयोडोफॉर्म
  15. क्लोरोबेन्जीन से p-नाइट्रोफीनॉल
  16. 2-ब्रोमोप्रोपेन से 1-ब्रोमोप्रोपेन
  17. क्लोरोएथेन से ब्यूटेन
  18. बेन्जीन से डाइफेनिल
  19. तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड से आइसो-ब्यूटिल ब्रोमाइड
  20. ऐनिलीन से फेनिलआइसोसायनाइड।

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन img 41
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प्रश्न 10.20
ऐल्किल क्लोराइड की जलीय KOH से अभिक्रिया द्वारा ऐल्कोहॉल बनता है, लेकिन ऐल्कोहॉलिक KOH की उपस्थिति में ऐल्कीन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। समझाइए।
उत्तर:
जलीय विलयन में KOH आयनित होकर OH आयन देता है जो प्रबल नाभिरागी होने के कारण ऐल्किल हैलाइडों पर प्रतिस्थापन द्वारा ऐल्कोहॉल बनाते हैं जबकि KOH के ऐल्कोहॉलीय विलयन में ऐल्कॉक्साइड (RO) आयन हैं जो OH प्रबल क्षारीय होने के कारण ऐल्किल क्लोराइड से ऐल्कीन बनाते हैं।

प्रश्न 10.21
प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड C4H9Br
(क), ऐल्कोहॉलिक KOH में अभिक्रिया द्वारा यौगिक
(ख) देता है। यौगिक ‘ख’ HBr के साथ अभिक्रिया से यौगिक ‘ग’ देता है जो कि यौगिक ‘क’ का समावयवी है। जब यौगिक’क’ की अभिक्रिया सोडियम धातु से होती है तो यौगिक ‘घ’ C8H18 बनता है, जोकि ब्यूटिल ब्रोमाइड की सोडियम से अभिक्रिया द्वारा बने उत्पाद से भिन्न है। यौगिक ‘क’ का संरचना सूत्र दीजिए तथा सभी अभिक्रियाओं की समीकरण दीजिए।
उत्तर:
आण्विक सूत्र C4H9Br दो प्राथमिक हैलाइड निम्नलिखित हो सकते हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 44
अतः यौगिक (क) या तो n – ब्यूटिल क्लोराइड है या आइसोब्यूटिल क्लोराइड। चूँकि यौगिक ‘क’ की अभिक्रिया सोडियम धातु से होने पर यौगिक ‘घ’ (आण्विक सूत्र C8H18) होता है जो कि n – ब्यूटिल ब्रोमाइड की अभिक्रिया सोडियम धातु से होने पर प्राप्त यौगिक से भिन्न है, इस यौगिक ‘क’ आइसोब्यूटिल क्लोराइड होना चाहिए तथा यौगिक ‘घ’ 2, 5 – डाइमेथिलहेक्सेन होना चाहिए।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 45
अब यदि यौगिक ‘क’ आइसोब्यूटिल क्लोराइड है तो यौगिक ‘ख’, जो यौगिक ‘क’ की ऐल्कोहॉलिक KOH से अभिक्रिया द्वारा प्राप्त होता है, 2-मेथिल-1-प्रोपीन होना चाहिए।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 46
यौगिक ‘ख’ HBr के साथ अभिक्रिया से मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार यौगिक ‘ग’ देता है। इसीलिए यौगिक ‘ग’ तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड है जो यौगिक ‘क’ (आइसोब्यूटिल ब्रोमाइड) का एक समावयव है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 47
इस प्रकार,
‘क’ आइसोब्यूटिल क्लोराइड,
‘ख’ 2-मेथिल-1-प्रोपीन,
‘ग’ तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड
‘घ’ 2, 5-डाइमेथिलहेक्सेन है।

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प्रश्न 10.22
तब क्या होता है जब:

  1. n-ब्यूटिल क्लोराइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ अभिकृत किया जाता है?
  2. शुष्क ईथर की उपस्थिति में ब्रोमोबेन्जीन की अभिक्रिया मैग्नीशियम से होती है?
  3. क्लोरोबेन्जीन का जल-अपघटन किया जाता है?
  4. एथिल क्लोराइड की अभिक्रिया जलीय KOH से होती है?
  5. शुष्क ईथर की उपस्थिति में मेथिल ब्रोमाइड की अभिक्रिया सोडियम से होती है?
  6. मेथिल क्लोराइड की अभिक्रिया KCN से होती है?

उत्तर:
1. ब्यूट-1-इन बनता है।
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2. फेनिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड (ग्रिगनार्ड अभिकर्मक बनता है)
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3. फिनॉल बनता है।
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4. एथिल ऐल्कोहॉल बनता है।
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5. वु अभिक्रिया के फलस्वरूप एथेन बनता है।
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6. मेथिल सायनाइड बनता है।
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Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

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पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 9.1
निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए:

  1. टेट्राऐम्मीनडाइऐक्वाकोबाल्ट (III) क्लोराइड
  2. पोटैशियम टेट्रासायनोनिकिलेट (II)
  3. ट्रिस (एथेन – 1, 2 – डाइऐमीन) क्रोमियम (III) क्लोराइड
  4. ऐम्मीनब्रोमिडोक्लोरिडोनाइट्रिटो – N – प्लैटिनेट (II)
  5. डाइक्लोरोबिस (एथेन – 1, 2 – डाइऐमीन) प्लैटिनम (IV) नाइट्रेट
  6. आयरन (III) हेक्सासायनोफेरेट (II)

उत्तर:

  1. [Co(NH3)4(H2O)2]Cl3
  2. K2[Ni(CN)4]
  3. [Cr(en)3]Cl3
  4. [Pt(NH3) BrCl(NO2)]
  5. [PtCl2(en)2] (NO3)2
  6. Fe4[Fe(CN)6]3

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

प्रश्न 9.2
निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए –

  1. [Co(NH3)6]Cl3
  2. [Co(NH3)5Cl]Cl2
  3. K3[Fe(CN)6]
  4. K3[Fe(C2O4)3]
  5. K2[PaCl4]
  6. [Pt(NH3)2 CI(NH2CH3)]Cl

उत्तर:

  1. हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट (III) क्लोराइड
  2. पेन्टाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट (III) क्लोसइड
  3. पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट (III)
  4. पोटैशियम ट्राइऑक्सेलेटोफेरेट (III)
  5. पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
  6. डाइऐम्मीनक्लोरिडो (मेथिलऐमीन) प्लैटिनम (II) क्लोराइड।

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प्रश्न 9.3
निम्नलिखित संकुलों द्वारा प्रदर्शित समावयवता का प्रकार बतलाइए तथा इन समावयवों की संरचनाएँ बनाइए:

  1. K[Cr(H2O)2 (C2O4)2]
  2. [Co(en)3] Cl3
  3. [Co(NH3)5(NO2)](NO3)2
  4. [Pt(NH3)(H2O)Cl2]

उत्तर:
(i) (क) सिस के लिए ज्यामितीय (सिस – ट्रान्स) तथा प्रकाशिक समावयव हो सकते हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 1

(ख) सिस के प्रकाशिक समावयव (d- तथा l-)
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 2

(ii) दो प्रकाशिक समावयव हो सकते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 3

(iii) आयनन समावयव:
दस समावयव सम्भव हैं (ज्यामितीय, आयनन तथा बन्धनी समावयव सम्भव हैं)।
[Co(NH3)5(NO2)](NO3)2, [Co(NH3)5(NO3)] (NO2)(NO3)

बन्धनी समावयव:
[Co(NH3)5(NO2)] (NO3)2, [Co(NH3)5 (ONO)] (NO3)2

(iv) ज्यामितीय समावयव (सिस-, ट्रान्स-) हो सकते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 4

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प्रश्न 9.4
इसका प्रमाण दीजिए कि [Co(NH3)5Cl] SO4 तथा [Co(NH3)5SO4]Cl आयनन समावयव हैं।
उत्तर:
आयनन समावयव जल में घुलकर भिन्न आयन देते हैं, इसलिए विभिन्न अभिकर्मकों से भिन्न – भिन्न अभिक्रियाएँ करते हैं।
[Co(NH35Cl)SO4 + Ba2+ → BaSO4(s)
[Co(NH3)5SO4] + Ba2+ → कोई अभिक्रिया नहीं
[Co(NH3)5Cl]SO4 + Ag+ → कोई अभिक्रिया नहीं
[Co(NH3)SO4]Cl + Ag+ → AgCl(s)

प्रश्न 9.5
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर समझाइए कि वर्ग समतलीय संरचना वाला [Ni(CN)4]2- आयन प्रतिचुम्बकीय है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति वाला [NiC4]2- आयन अनुचुम्बकीय है।
उत्तर:
[Ni(CN)4]2- का चुम्बकीय व्यवहार (Magnetic behaviour of [Ni(CN)4]2-: Ni का परमाणु क्रमांक 28 है। Ni, Ni2+ तथा [Ni(CN)4]2- में निकिल की अवस्था के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित हैं:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 5
संकरण संकुल आयन [Ni(CN)4]2- प्रतिचुम्बकीय है, चूंकि इसमें अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं।

[NiCl4]2- का चुम्बकीय व्यवहार (Magnetic behaviour of [NiCl42-): इसमें Cl दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड है तथा यह इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं करता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 6
संकुल आयन Co[NiCl4]2- में इसके d – उपकोश में अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए यह अनुचुम्बकीय होता है।

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प्रश्न 9.6
[NiCl4]2- अनुचुम्बकीय है, जबकि [Ni(CO)4] प्रतिचुम्बकीय है यद्यपि दोनों चतुष्फलकीय हैं।
उत्तर:
[Ni(CO)4] में निकिल शून्य ऑक्सीकरण अवस्था में है, जबकि [NiCl4]2- में यह +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है। Co लिगेण्ड की उपस्थिति में निकिल के अयुगलित d – इलेक्ट्रॉन युगलित हो जाते हैं, परन्तु Cl दुर्बल लिगेण्ड होने के कारण अयुगलित इलेक्ट्रॉनों को युगलित करने योग्य नहीं होता है। चूँकि [Ni(CO)4] में कोई अयुगमित इलेक्ट्रॉन नहीं है, अतः यह प्रतिचुम्बकीय है और [NiCl4]2- में अयुगमित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है।

प्रश्न 9.7
[Fe(H2O6)]3+ प्रबल अनुचुम्बकीय है, जबकि [Fe(CN)6]3- दुर्बल अनुचुम्बकीय। समझाइए।
उत्तर:
CN (एक प्रबल लिगेण्ड) की उपस्थिति में, 3d – इलेक्ट्रॉन युगलित होकर केवल एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं। d2sp3 संकरण आन्तरिक कक्षक संकुल बनाता है, इसलिए [Fe(CN)6]3- दुर्बल अनुचुम्बकीय होता है। H2O (एक दुर्बल लिगेण्ड) की उपस्थिति में 3d – इलेक्ट्रॉन युगलित नहीं होते। संकरण sp3d2 है जो बाह्य कक्षक संकुल, जिसमें पाँच अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं, बनाता है, इसलिए [Fe(H2O)6]3+ प्रबल अनुचुम्बकीय होता है।

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प्रश्न 9.8
समझाइए कि [Co(NH3)6]3+ एक आन्तरिक कक्षक संकुल है, जबकि [Ni(NH3)6]2- एक बाह्य कक्षक संकुल है।
उत्तर:
NH3 की उपस्थिति में 3d – इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर दो रिक्त d – कक्षक छोड़ते हैं जो [Co(NH3)6]2+ की स्थिति में आन्तरिक कक्षक संकुल बनाने वाले d2sp3 संकरण में सम्मिलित होते हैं।

Ni(NH3)6]2+ में निकिल +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है तथा इसका d8 विन्यास है। इसमें बाह्य कक्षक संकुल बनाने वाला sp3d2 संकरण सम्मिलित होता है।

प्रश्न 9.9
वर्ग समतली [Pt(CN)4]2- आयन में अयुगलित इलेक्ट्रॉन की संख्या बतलाइए।
उत्तर:
तत्व 78Pt वर्ग 10 में स्थित है तथा इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 5d9 6s1 है। अत: Pt2+ का विन्यास d8 है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 7
वर्ग समतली संरचना के लिए संकरण dsp2 होता है। चूँकि 5d में अयुगलित इलेक्ट्रॉन युगलित होकर रिक्त dsp2 कक्षक संकरण के लिए एक रिक्त कर देते हैं अतः इसमें अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं है।

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प्रश्न 9.10
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त को प्रयुक्त करते हुए समझाइए कि कैसे हेक्साऐक्वा मैंगनीज (II) आयन में पाँच अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि हेक्सासायनो आयन में केवल एक ही अयुगलित इलेक्ट्रॉन है।
उत्तर:
उत्तर-ऑक्सीकरण अवस्था +2 में Mn का विन्यास 3d5 होता है। लिगण्ड के रूप में H2O की उपस्थिति में इन पाँच इलेक्ट्रॉनों का वितरण \(t_{2 g}^{3} e_{g}^{2}\) होते हैं अर्थात् उच्च प्रचक्रण संकुल के कारण सभी इलेक्ट्रॉन अयुगलित रह जाते हैं। लिगेण्ड के रूप में CN की उपस्थिति में इन इलेक्ट्रॉन का वितरण \(t_{2 g}^{5} e_{g}^{0}\) है अर्थात् दो t2g कक्षकों में युगलित इलेक्ट्रॉन है, जबकि तीसरे t2g कक्षक में एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन होता है।

प्रश्न 9.11
[Cu(NH3)4]2+ संकुल आयन के β4 का मान 2.1 × 1013 है, इस संकुलन के समग्र वियोजन स्थिरांक के मान की गणना कीजिए।
गणना:
समग्र वियोजन स्थिरांक, समग्र स्थायित्व स्थिरांक का व्युत्क्रम होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 8
= 4.7 × 10-14

Bihar Board Class 12 Chemistry उपसहसंयोजन यौगिक Additional Important Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 9.1
वर्नर की अभिधारणाओं के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबन्धन को समझाइए।
उत्तर:
उपसहसंयोजन यौगिकों में आबन्धन को समझाने के लिए वर्नर ने सन् 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की मुख्य अभिधारणाएँ निम्नलिखित हैं:

1. उपसहसंयोजन यौगिकों में धातुएँ दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाती हैं प्राथमिक तथा द्वितीयक।

2. प्राथमिक संयोजकताएँ सामान्य रूप से धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था से सम्बन्धित होती हैं तथा आयननीय होती हैं। ये संयोजकताएँ ऋणात्मक आयनों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं।

3. द्वितीयक संयोजकताएँ धातु परमाणु की उपसहसंयोजन संख्या से सम्बन्धित होती हैं। द्वितीयक संयोकजताएँ अनआयननीय होती हैं। ये उदासीन अणुओं अथवा ऋणात्मक आयनों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं। द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है तथा इसका मान किसी धातु के लिए सामान्यत: निश्चित होता है।

4. धातु से द्वितीयक संयोजकता से आबन्धित आयन समूह विभिन्न उपसहसंयोजन संख्या के अनुरूप दिक्स्थान में विशिष्ट रूप से व्यवस्थित रहते हैं। आधुनिक सूत्रीकरण में इस प्रकार की दिक्स्थान व्यवस्थाओं को समन्वय बहुफलक (coordination polyhedra) कहते हैं। गुरुकोष्ठक में लिखी स्पीशीज संकुल तथा गुरुकोष्ठक के बाहर लिखे आयन प्रति आयन (counter ions) कहलाते हैं।

उन्होंने यह भी अभिधारणा दी कि संक्रमण तत्वों के समन्वय यौगिकों में सामान्यतः अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय व वर्ग समतली ज्यामितियाँ पाई जाती हैं। इस प्रकार [Co(NH3)6]3+, [CoCl(NH3)5]2+ तथा [CoCl2(NH3)4]+ की ज्यामितियाँ अष्टफलकीय हैं, जबकि [Ni(CO)4] तथा [PtCl4]2- क्रमशः चतुष्फलकीय तथा वर्ग समतली हैं।

उपर्युक्त अभिधारणाओं से वर्नर, जिसने निम्नलिखित यौगिको को कोबाल्ट (III) क्लोराइड की NH3 से अभिक्रिया करके बनाया, ने इन यौगिकों (उपसहसंयोजक) की संरचना की सफलतापूर्वक व्याख्या की जिसका वर्णन निम्नलिखित है –

CoCl3.6NH3 नारंगी
CoCl3.5NH3.H2O गुलाबी
CoCl3.5NH3 बैंगनी CoCl3.3NH3 हरा
CoCl3.4NH3 के विभिन्न रंगों का कारण यह है कि ये समपक्ष तथा विपक्ष समावयव होते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 9
– प्राथमिक संयोजकता या ऑक्सीकरण अवस्था
– द्वितीयक संयोजकता या उपसहसंयोजन संख्या

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प्रश्न 9.2
FeSO4 विलयन तथा (NH4)2SO4 विलयन का 1:1 मोलर अनुपात में मिश्रण Fe2+ आयन का परीक्षण देता है, परन्तु CuSO4 व जलीय अमोनिया का 1:4 मोलर अनुपात में मिश्रण Cu2+ आयनों का परीक्षण नहीं देता। समझाइए क्यों?
उत्तर:
FeSO4 विलयन तथा (NH4)2SO4 विलयन का 1:1 मोलर अनुपात में मिश्रण द्विक लवण –

जो विलयन में आयनित होकर Fe2+ आयन देता है। अतः यह Fe2+ आयनों का परीक्षण देता है। CuSO4 व जलीय विलयन का 1:4 मोलर अनुपात में मिश्रण संकर लवण [Cu(NH3)4] SO4 बनाता है। संकुल आयन, [Cu(NH3)4]2+ आयनित होकर Cu2+ आयन नहीं देता है। अतः यह Cu2+ आयन के परीक्षण नहीं देता।

प्रश्न 9.3
प्रत्येक के दो उदाहरण देते हुए निम्नलिखित को समझाइए समन्वय समूह, लिगेण्ड, उपसहसंयोजन संख्या, उपसहसंयोजन बहुफलक, होमोलेप्टिक तथा हेटेरोलेप्टिक।
उत्तर:
1. उपसहसंयोजन सत्ता या समन्वय समूह:
केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन से किसी एक निश्चित संख्या में आबन्धित आयन. अथवा अणु मिलकर एक उपसहसंयोजन सत्ता का निर्माण करते हैं। उदाहरणार्थ: [CoCl3(NH3)3] एक उपसहसंयोजन सत्ता है जिसमें कोबाल्ट आयन तीन अमोनिया अणुओं तथा तीन क्लोराइड आयनों से घिरा है। अन्य उदाहरण हैं –
[Ni(CO)4], [PtCl2(NH3)2], [Fe(CN6]4-, [Co(NH3)6]3+ आदि।

2. लिगेण्ड:
उपसहसंयोजन सत्ता में केन्द्रीय परमाणु/आयन से परिबद्ध आयन अथवा अणु लिगेण्ड कहलाते हैं। ये सामान्य आयन हो सकते हैं; जैसे – Cl छोटे अणु हो सकते हैं; जैसे – H2O या NH3, बड़े अणु हो सकते हैं;
H2NCH2CH2NH2N(CH2CH2NH2)3 वृहदाणु भी हो सकते हैं; जैसे-प्रोटीन।

3. उपसहसंयोजन संख्या:
एक संकुल में धातु आयन की उपसहसंयोजन संख्या (CN) उससे आबन्धित लिगण्डों के उन दाता परमाणुओं की संख्या के बराबर होती है जो सीधे धातु आयन से जुड़े हों।

उदाहरणार्थ:
संकुल आयनों [PtCl6]2- तथा [Ni(NH3)4]2+ में Pt तथा Ni की उपसहसंयोजन संख्या क्रमश: 6 तथा 4 हैं। इसी प्रकार संकुल आयनों [Fe(C2O4)3]3- और [Co(en)3] + में Fe और Co दोनों की समन्वय संख्या 6 हैं; क्योंकि \(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4}^{2-}\) तथा en (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) द्विदन्तुर लिगेण्ड हैं।

उपसहसंयोजन संख्या के सन्दर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि केन्द्रीय परमाणु/आयन की उपसहसंयोजन संख्या केन्द्रीय परमाणुःआयन तथा लिगेण्ड के मध्य बने केवल (σ) (सिग्मा) आबन्धों की संख्या के आधार पर ही निर्धारित की जाती है। यदि लिगेण्ड तथा केन्द्रीय परमाणु/आयन के मध्य π (पाई) आबन्ध बने हों तो उन्हें नहीं गिना जाता।

4. उपसहसंयोजन बहुफलक:
केन्द्रीय परमाणु/ आयन से सीधे जुड़े लिगेण्ड परमाणुओं की दिक्स्थान व्यवस्था (special arrangement) को उपसहसंयोजन बहुफलक कहते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 11
चित्र – विभिन्न उपसहसंयोजन बहुफलकों की आकृतियाँ – M केन्द्रीय परमाणु/आयन को तथा L एकदन्तुर

लिगेण्ड को प्रदर्शित करता है इनमें अष्टफलकीय, वर्ग समतलीय तथा चतुष्फलकीय मुख्य हैं। उदाहरणार्थ: [Co(NH3)6]3+ अष्टफलकीय है, [Ni(CO)4] चतुष्फलकीय है तथा [PtCl4]2- वर्ग समतलीय है। चित्र में विभिन्न उपसहसंयोजन बहुफलकों की आकृतियाँ दर्शाई गई हैं।

5. होमोलेप्टिक:
संकुल जिनमें धातु परमाणु केवल एक प्रकार के दाता समूह से जुड़ा रहता है, होमोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ: [Co(NH3)6]3+ तथा [Fe(CN)6]2+

6. हेटरोलेप्टिक:
संकुल जिनमें धातु परमाणु एक से अधिक प्रकार के दाता समूहों से जुड़ा रहता है, हेटरोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ – [Co(NH3)4Cl2]+ तथा [Pt(NH3)5Cl]3+

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प्रश्न 9.4
एकदन्तुर, द्विदन्तुर तथा उभयदन्तुर लिगेण्ड से क्या तात्पर्य है? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
जब एक लिगेण्ड धातु आयन से एक दाता परमाणु द्वारा परिबद्ध होता है; जैसे – Cl H2O या NH3 तो लिगेण्ड एकदन्तुर (unidentate) कहलाता है। जब लिगेण्ड दो दाता परमाणुओं द्वारा परिबद्ध हो सकता है; जैसे – H2NCH2CH2NH2 (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) अथवा C2O2-4 (ऑक्सेलेट) तो ऐसा लिगेण्ड द्विदन्तुर कहलाता है।

वह लिगेण्ड जो दो भिन्न परमाणुओं द्वारा जुड़ सकता है, उसे उभयदन्ती संलग्नी या उभयदनी लिगेण्ड कहते हैं। ऐसे लिगेण्ड के उदाहरण हैं – NO2, तथा SCN आयन। NO2 आयन केन्द्रीय धातु परमाणु/आयन से या तो नाइट्रोजन द्वारा अथवा ऑक्सीजन द्वारा संयोजित हो सकता है। इसी प्रकार SCN आयन सल्फर अथवा नाइट्रोजन परमाणु द्वारा संयोजित हो सकता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 12

प्रश्न 9.5
निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में धातुओं के ऑक्सीकरण संख्या का उल्लेख कीजिए –

  1. [Co(H2O)(CN)(en)2]2+
  2. [CoBr2(en)2]+
  3. [PtCl4]2-
  4. K3[Fe(CN6)]
  5. [Cr(NH3)3Cl3]

गणना:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 13

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प्रश्न 9.6
IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के लिए सूत्र लिखिए –

  1. टेट्राहाइड्रोऑक्सोजिंकेट (II)
  2. पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
  3. डाइऐम्मीनडाइक्लोरिडोप्लैटिनम (II)
  4. पोटैशियम टेट्रासायनोनिकिलेट (II)
  5. पेन्टोऐम्मीननाइट्रिटो-0-कोबाल्ट (III)
  6. हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट (III)) सल्फेट
  7. पोटैशियम ट्राइ (ऑक्सेलेटो) क्रोमेट (III)
  8. हेक्साऐम्मीनप्लैटिनम (IV)
  9. टेट्राबोमिडोक्यूप्रेट (II)
  10. पेन्टाऐम्मीननाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III)

उत्तर:

  1. [Zn(OH)4]2-
  2. K2[PdCl4]
  3. [Pt(NH3))2Cl2]
  4. K2[Ni(CN)4]
  5. [Co(NH3)5(ONO)2+
  6. [Co(NH3)6]2 (SO4)3
  7. K3[Cr(C2O4)3]
  8. [Pt(NH3)6]4+
  9. [CuBr4]2-
  10. [Co(NH3)5 (NO2)]2+

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प्रश्न 9.7
IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के सुव्यवस्थित नाम लिखिए:

  1. [Co(NH3)6]Cl3
  2. [Pt(NH3)2 Cl(NH2CH3)]Cl
  3. [Ti(H2O)6]3+
  4. [Co(NH3)4 Cl(NO2)]Cl
  5. [Mn(H2O)6]2+
  6. [NiCl4]2-
  7. [Ni(NH3)6]Cl2
  8. [Co(en)3]3+
  9. [Ni(CO)4]

उत्तर:

  1. हेक्साऐमीनकोबाल्ट (III) क्लोराइड
  2. डाइऐमीनक्लोरिडो (मेथिलऐमीन) प्लैटिनम (II)क्लोराइड
  3. हेक्साऐक्वाटाइटेनियम (III) आयन
  4. टेट्राऐमीनक्लोरिडोनाइट्रिटो – N – कोबाल्ट (III) क्लोराइड
  5. हेक्साऐक्वामैंगनीज (II) आयन
  6. टेट्राक्लोरिडोनिकिलेट (II) आयन
  7. हेक्साऐमीनिकिल (II) क्लोराइड
  8. ट्रिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) कोबाल्ट (III) आयन
  9. टेट्राकार्बोनिलनिकिल (0)।

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प्रश्न 9.8
उपसहसंयोजन यौगिकों के लिए सम्भावित विभिन्न प्रकार की समावयवताओं को सूचीबद्ध कीजिए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उपसहसंयोजन यौगिकों में दो प्रमुख प्रकार की समावयवताएँ ज्ञात हैं। इनमें से प्रत्येक को पुनः प्रविभाजित किया जा सकता है।

1. त्रिविम समावयवता:
(क) ज्यामितीय समावयवता; जैसे –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 14
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 14a

2. संरचनात्मक समावयवता:
(क) बन्धनी समावयवता; जैसे –
[Co(NH3)5(NO2)] Cl2
तथा [Co(NH3)5(ONO)] Cl2

(ख) उपसहसंयोजन समावयवता; जैसे –
[Co(NH3)6] [Cr(CN)6]
तथा [Cr(NH3)6] [Co(CN)6]

(ग) आयनन समावयवता; जैसे –
[Co(NH3)4 Cl2] NO2
तथा [Co(NH3)4 (NO2Cl)] Cl

(घ) विलायकयोजन समावयवता; जैसे –
[Cr(H2O)6] Cl3
तथा [Cr(H2O)5 Cl] Cl2.H2O

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प्रश्न 9.9
निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में कितने ज्यामितीय समावयव सम्भव हैं?
(क) [Cr(C2O4)3]
(ख) [Co(NH3)3 Cl3]
उत्तर:
(क) कोई ज्यामितीय समावयव सम्भव नहीं है।
(ख) दो ज्यामितीय समावयव फलकीय तथा रेखांशिक समावयव सम्भव हैं।

प्रश्न 9.10
निम्नलिखित के प्रकाशिक समावयवों की संरचनाएँ बनाइए –

  1. [Cr(C2O4)3]3-
  2. [PtCl2(en)2]2+
  3. [Cr(NH3)2Cl2(en)]+

उत्तर:
1. [Cr(C2O4)3]3-
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 15

2. [PtCl2(en)2]2+
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 16

3. [Cr(NH3)2Cl2(en)]+
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 17

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प्रश्न 9.11
निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व ध्रुवण) की संरचनाएँ बनाइए –

  1. [CoCl2(en)2]+
  2. [Co(NH3)Cl(en)2]2+
  3. [Co(NH3)2Cl2(en)]+

उत्तर:
1. [CoCl2(en)2]+
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 18

2. [Co(NH3)Cl(en)2]2+
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 19

3. [Co(NH3)2Cl2(en)2]2+
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 20

प्रश्न 9.12
[Pt (NH3) (Br)(CI) (Py)] के सभी ज्यामितीय समावयव लिखिए। इनमें से कितने ध्रुवण समावयवता दर्शाएँगे?
उत्तर:
इसके तीन ज्यामितीय समावयव सम्भव हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 21
ये समायव ध्रुवण समावयवता नहीं दर्शाते हैं। ध्रुवण समावयवता वर्ग समतली अथवा चतुष्फलकीय संकुलों में पाई जाती है जबकि इनमें असममिताकार कीलेटिंग लीगेंड हैं।

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प्रश्न 9.13
जलीय कॉपर सल्फेट विलयन (नीले रंग का), निम्नलिखित प्रेक्षण दर्शाता है –

  1. जलीय पोटैशियम फ्लुओराइड के साथ हरा रंग
  2. जलीय पोटैशियम क्लोराइड के साथ चमकीला हरा रंग। उपर्युक्त प्रायोगिक परिणामों को समझाइए।

उत्तर:
जलीय CusO4 विलयन [Cu(H2O)4]2+ SO42-, H2O के रूप में पाया जाता है जिसका नीला रंग [Cu(H2O)4]2+ आयनों के कारण होता है।

1. जब पोटैशियम फ्लुओराइड मिलाया जाता है, तब दुर्बल H2O लिगेण्ड F लिगेण्डों द्वारा प्रतिस्थापित होकर [CuF4]2- आयन बनाते हैं जो एक हरा अवक्षेप होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 22

2. जब पोटैशियम क्लोराइड (KCl) मिलाया जाता है, तब Cl लिगेण्ड दुर्बल H2O लिगेण्डों को प्रतिस्थापित करके [CuCl4]2- आयन बनाते हैं जिसका चमकीला हरा रंग होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 23

प्रश्न 9.14
कॉपर सल्फेट के जलीय विलयन में जलीय KCN को आधिक्य में मिलाने पर बनने वाली उपसहसंयोजन सत्ता क्या होगी? इस विलयन में जब H2S गैस प्रवाहित की जाती है तो कॉपर सल्फाइड का अवक्षेप क्यों नहीं प्राप्त होता?
उत्तर:
कॉपर सल्फेट के जलीय विलयन में जलीय KCN विलयन मिलाने पर पोटैशियम टेट्रासाइनो क्यूप्रेट (II) का संकुल बनता है।
2 CuSO4(aq) + 10KCN (aq) → 2K3 [Cu(CN)4](aq) + 2K2SO4(aq)
चूँकि CN एक प्रबल लिगेण्ड है, अत: संकुल स्थाई होता है। H2S गैस को प्रवाहित करने पर यह विखण्डित नहीं होता है तथा CuS का कोई अवक्षेप नहीं बनता।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

प्रश्न 9.15
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में आबन्ध की प्रकृति की विवेचना कीजिए –
(क) [Fe(CN)64-
(ख) [FeF6]3-
(ग) Co(C2O4)3]3-
(घ) [CoF6]3-
उत्तर:
(क) [Fe(CN)6]4- इस संकुल आयन में आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है।
Fe का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d6 4s2
Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d6
छह सायनाइड आयनों से छह इलेक्ट्रॉन युग्मों को स्थान देने के लिए आयरन (II) आयन को छह रिक्त कक्षक उपलब्ध करने चाहिए। ऐसा निम्नलिखित संकरण पद्धति के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जिसमें d – उपकोश के इलेक्ट्रॉन युगलित हो जाते हैं, चूँकि CN आयन प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 24
अतः छह सायनाइड आयनों से छड़ इलेक्ट्रॉन युग्म आयरन (II) आयन के छह संकरित कक्षकों को अध्यासित कर लेते हैं। इस प्रकार किसी भी कक्षक में अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं, इसलिए [Fe(CN)6]4- प्रतिचुम्बकत्व दर्शाता है। अतः [Fe(CN)6]4- प्रतिचुम्बकीय तथा अष्टफलकीय है।

(ख) [FeF6]3-:
यह संकुल उच्च चक्रण (या चक्रण मुक्त) या बाह्य संकुल है, चूँकि केन्द्रीय धातु आयन, Fe (III) संकरण के लिए nd-कक्षकों का प्रयोग करता है। यह एक ङ्केअष्टफलकीय संकुला है जिसमें sp3 d2 संकरण होता है। प्रत्येक कक्षक में छह फ्लुओराइड आयनों से एक-एक एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म स्थान प्राप्त करता है जैसा कि निम्नांकित चित्र में दर्शाया गया है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 25
चूँकि संकुल में पाँच अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं, यह अनुचुम्बकीय है।

(ग) [Co(C2O4)3-:
Co(Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: [Ar] 4s2 3d7
Co3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: [Ar] 4s0 4d6
C2O42- प्रबल क्षेत्रीय लिगेण्ड है, जिसके कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 26
अतः स्पष्ट है कि [Co(C2O4)3]3- प्रतिचुम्बकीय, अष्टफलकीय संकुल है।

(घ) [CoF6]3- – Co(27): [Ar] 4s2 3d7 Co3+: [Ar] 4s0 3d6

F एक दुर्बल लिगेण्ड होने के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कर सकता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 27
अतः [CoF6]3- अनुचुम्बकीय तथा अष्टफलकीय संकुल है।

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प्रश्न 9.16
अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के विपाटन को दर्शाने के लिए चित्र बनाइए।
उत्तर:
माना छह लिगण्ड कार्तिक अक्षों के अनुदिश सममित रूप में स्थित हैं तथा धातु परमाणु मूल बिन्दु पर है। लिगेण्ड के निकट पर d – कक्षकों की ऊर्जा में मुक्त आयनों की तुलना में अपेक्षित वृद्धि होती है जैसा कि गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र की स्थिति में होता है।

अक्षों के अनुदिश कक्षक (dz2 तथा \(d_{x}^{2}-y^{2}\)) dxy, dyz तथा dzx कक्षकों की तुलना में अधिक प्रबलता से प्रतिकर्षित होते हैं तथा इनमें अक्षों के मध्य निर्देशित पालियाँ (lobes) होती गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र में औसत ऊर्जा की अपेक्षा dz2 तथा \(d_{x}^{2}-y^{2}\) कक्षक ऊर्जा में बढ़ जाते हैं तब dxy, dyz, dxz कक्षक ऊर्जा में न्यून हो जाते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 28
चित्र – अष्टफलीय क्रिस्टल क्षेत्र में d – कक्षकों का विघटन
अतः d – कक्षकों का समभ्रंश समूह (degenerate set) दो समूहों में विघटित हो जाता है – निम्न ऊर्जा कक्षक समूह t2g तथा उच्च ऊर्जा कक्षक समूह eg ऊर्जा ∆0 द्वारा पृथक्कृत होती

प्रश्न 9.17
स्पेक्ट्रमीरासायनिक श्रेणी क्या है? दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड तथा प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
स्पेक्ट्रमीरासायनिक श्रेणी:
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन, ∆0 लिगेण्ड तथा धातु आयन पर विद्यमान आवेश से उत्पन्न क्षेत्र पर निर्भर करता है। कुछ लिगेण्ड प्रबल क्षेत्र उत्पन्न कर सकते हैं तथा ऐसी स्थिति में विपाटन अधिक होता है, जबकि अन्य दुर्बल क्षेत्र उत्पन्न करते हैं जिसके फलस्वरूप d – कक्षकों का विपाटन कम होता है। सामान्यत: लिगेण्डों को उनके बढ़ती हुई क्षेत्र प्रबलता के क्रम में एक श्रेणी में निम्नानुसार व्यवस्थित किया जा सकता है –
IBr < SCN < Cl < S2- < F < OH C2
O42- < H2O < NCS <edta4- < NH3 < en < CN < Co इस प्रकार की श्रेणी स्पेक्ट्रमीरासायनिक श्रेणी (spectrochemical series) कहलाती है।

यह विभिन्न लिगेण्डों के साथ बने संकुलों द्वारा प्रकाश के अवशोषण पर आधारित प्रायोगिक तथ्यों द्वारा निर्धारित श्रेणी हैं। प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड के मध्य अन्तर ऐसे लिगेण्ड को जिनकी क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (CFSE), ∆0 का मान कम होता है, दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड कहते हैं।

दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता तथा. ये उच्च चक्रण संकुल बनाते हैं। ऐसे लिगेण्ड को जिनकी क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा, ∆0 का मान अधिक होता है, प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड कहते हैं। प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन होता है तथा ये निम्न चक्रण संकुल बनाते हैं।

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प्रश्न 9.18
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा क्या है? उपसहसंयोजन सत्ता में d – कक्षकों का वास्तविक विन्यास ∆0 के मान के आधार पर कैसे निर्धारित किया जाता है?
उत्तर:
जब लिगेण्ड संक्रमण धातु आयन के निकट जाता है, तब d – कक्षक दो समुच्चयों में विपाटित हो जाते हैं, एक निम्न ऊर्जा के साथ तथा दूसरा उच्च ऊर्जा के साथा कक्षकों के इन दो समुच्चयों के बीच ऊर्जा का अन्तर अष्टफलकीय क्षेत्र के लिए क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ∆0 कहलाता है।

यदि ∆0 < P (युग्मन ऊर्जा) तो चौथा इलेक्ट्रॉन किसी एक eg कक्षक में प्रवेश करता है तथा \(t_{2 g}^{3} e_{g}^{1}\) विन्यास देकर उच्च चक्रण संकुल बनाता है। ऐसे लिगेण्ड (जिनके लिए, ∆0 < P) दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड कहलाते हैं।
यदि ∆0 < P, तो चौथा इलेक्ट्रॉन किसी एक t2g कक्षक में युग्मित होता है तथा \(t_{2 g}^{4} e_{g}^{0}\) विन्यास देकर अल्प चक्रण संकुल बनाता है। ऐसे लिगेण्ड (जिनके लिए, ∆0 > P) प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड कहलाते हैं।

प्रश्न 9.19
[Cr(NH3)6]3+ अनुचुम्बकीय है, जबकि [Ni(CN)4]2- प्रतिचुम्बकीय, समझाइए क्यों?
उत्तरः
[Cr(NH3)6]3+ का निर्माण:
[Cr(NH3)6]3+ आयन में क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 4s1 है। संकरण को निम्न प्रकार से दिखाया गया है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 29
Cr3+ आयन अमोनिया के छह अणुओं से छह इलेक्ट्रॉन युग्मों के लिए यह रिक्त कक्षक उपलब्ध हैं। इसके फलस्वरूप संकुल [Cr(NH36)3+ में d2sp3 संकरण अष्टफलकीय होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 30
संकुल में इन अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह वर्ग समतल संकुलों के संकरण d sp2 है जिसे निम्नवत् दर्शाया जा सकता है। प्रत्येक संकरित कक्षक सायनाइड आयन से एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है, जिससे अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति [Ni(CN)4]2- के प्रतिचुम्बकीय व्यवहार की पुष्टि होती है।

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प्रश्न 9.20
[Ni(H2O)6]2+ का विलयन हरा है, परन्तु [Ni(CN)4]2- का विलयन रंगहीन है। समझाइए।
उत्तर:
चूँकि H2O दुर्बल लिगण्डों को निरूपित करता है, अतः ये कोई इलेक्ट्रान नहीं बनाते हैं। [Ni(H2O)6]2+ में Ni, 3d8 विन्यास के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है अर्थात् संकुल में दो अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं, अत: यह रंगीन होता है। d-d संक्रमण लाल प्रकाश अवशोषित करके पूरक हरा रंग उत्सर्जित करता है।

[Ni(CN)4]2- में भी Ni, 3d8 विन्यास के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है, परन्तु प्रबल CN लिगेण्ड की उपस्थिति में 3d – कक्षक में दो अयुगलित इलेक्ट्रॉन गलित हो जाते हैं। अतः कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं होता; अत: यह रंगहीन होता है।

प्रश्न 9.21
[Fe(CN)6]4- तथा [Fe(H2O)6]2+ के तनु विलयनों के रंग भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
दोनों संकलों में, Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है अर्थात् इसमें चार अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं। दुर्बल H2O लिगण्ड की उपस्थिति में ये युगलित नहीं हो पाते हैं जबकि CN प्रबल लिगण्ड की उपस्थिति में ये युग्मित होकर कोई अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं छोड़ते हैं। अत: अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति में अन्तर के कारण इनके तनु विलयनों में भिन्न रंग होते हैं।

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प्रश्न 9.22
धातु कार्बोनिलों में आबन्ध की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धातु कार्बोनिलों में आबन्ध की प्रकृति:
धातु कार्बोनिलों के धातु कार्बन आबन्ध में s तथा p के गुण पाये जाते हैं। M – C सिग्मा (σ) आबन्ध कार्बोनिल समूह के कार्बन में उपस्थित इलेक्ट्रॉन युगल को धातु के रिक्त कक्षक में दान करने से बनता है।

π – अतिव्यापन जिसमें पूरित धातु d – कक्षकों से इलेक्ट्रॉनों का CO के रिक्त प्रतिआबन्धन π* आण्विक कक्षकों में दान निहित होता है, इसके परिणामस्वरूप M → Cπ आबन्ध बनता है। धातु से लिगेण्ड का आबन्ध एक सहक्रियाशीलता का प्रभाव उत्पन्न करता है जो CO व धातु के मध्य आबन्ध को मजबूत बनाता है।

धातु कार्बोनिलों में आबन्धन निम्न प्रकार से प्रदर्शित है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 31
चित्र-कार्बोनिल संकुल में सहक्रियाशीलता आबन्धन अन्योयक्रिया का उदाहरण

प्रश्न 9.23
निम्नलिखित संकुलों में केन्द्रीय धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था, d – कक्षकों का अधिग्रहण एवं उपसहसंयोजन संख्या बतलाइए –

  1. K3[C2O43]
  2. समपक्ष – [Cr(en)2Cl2]Cl
  3. (NH4)2[CoF4] ङ्के
  4. [Mn(H2O)6]SO4

उत्तर:
1. संकुल:
K3[Co(C2O4)3]
ऑक्सीकरण अवस्था –
1 + x + 3(-2) = 0
x = +3
उपसहसंयोजन संख्या: 6 (∵\(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4}^{2-}\) द्विदुन्तर है)
d – कक्षक अध्यासन : 3d6 = \(t_{2 g}^{6} e_{g}^{0}\)

2. संकुल समपक्ष:
[Cr(en)2Cl2]Cl
ऑक्सीकरण अवस्था:
या x + 0 + 2(-1) = +1 या
x = +3

उपसहसंयोजन संख्या: 6

d – कक्षक अध्यासन:
3d3 = \(t_{2 g}^{3}\)

3. संकुल (NH4)2 [CoF4]:
थैऑक्सीकरण अवस्था:
x + 4(-1) = -2
x = +2
उपसहसंयोजन संख्या: 4

d – कक्षक अध्ययासन:
3d7 = \(e_{g}^{4} t_{2 g}^{3}\)

4. संकुल [Mn(H2O)6] SO4
ऑक्सीकरण अवस्था:
x + 0 = +2
x = +2

उपसहसंयोजन संख्या: 6

d – कक्षक अध्यासन:
3d5 = \(t_{2 g}^{3} e_{g}^{2}\)

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प्रश्न 9.24
निम्नलिखित संकलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दर्शाइए। संकुल का त्रिविम रसायन तथा चुम्बकीय आघूर्ण भी बतलाइए –

  1. K[Cr(H2O)2 (C2O4)2].3H2O
  2. [CrCl3(Py)3]
  3. [Co(NH3)5Cl]Cl2
  4. Cs[FeCl4]
  5. K4[Mn(CN)6]

उत्तर:
1. K[Cr(H2O)2 (C2O4)2].3H2O का IUPAC
नाम-पोटैशियम डाइऐक्वाऑक्सेलेटो क्रोमेट (III) हाइड्रेट
K[Cr(H2O)(C2O4)2].3H2O में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था,
+ 1 + x + 0 – 4 = 0
x = +3
क्रोमियम की उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
Cr(24) : 4s1 3d5
Cr3+ : 4s0 3d3
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 32

2. [CrCl3(Py)3] का IUPAC
नाम-ट्राइक्लोरिडोट्राइपिरिडीन क्रोमियम (III)
क्रोमियम की उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
[CrCl3 (Py)3] में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 33
चुम्बकीय आघूर्ण (µ) = \(\sqrt{3×5}\) = \(\sqrt{15}\) = 3.87 BM

3. [Co(NH3)5 Cl]Cl2 का IUPAC
पेन्टाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
Co की ऑक्सीकरण संख्या +3 है।
Co की उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
Cr (27) : 4s2 3d7
Cr3+ : 4s03d6
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 34
चुम्बकीय आघूर्ण (µ) = 0

4. Cs[FeCl4] का IUPAC नाम –
सीजियम टेट्राक्लोरोफेरेट (III)
Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
Fe की उपसहसंयोजन संख्या 4 है।
Fe (26) : 4s2 3d6
Fe3+ : 4s0 3d5
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 35
यह 5 – अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण अनुचुम्बकीय है।
चुम्बकीय आघूर्ण
(µ) = \(\sqrt{n(n+2)}\) = \(\sqrt{5×7}\) = \(\sqrt{35}\) = 5.92 BM

5. K4[Mn(CN)6] का IUPAC नाम –
पोटैशियम हेक्सासायनोमैंगनीज (II) Mn की ऑक्सीकरण संख्या +2 है।
Mn की उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
Mn(25) : 4s2 3d5
Mn2+ : 4s0 3d5
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 36
चुम्बकीय आघूर्ण
(µ) = \(\sqrt{n(n+2)}\) = \(\sqrt{1(1+2)}\) = \(\sqrt{3)}\) = 1.732 BM.

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प्रश्न 9.25
उपसहसंयोजन यौगिक के विलयन में स्थायित्व से आप क्या समझते हैं? संकुलों का स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विलयन में उपसहसंयोजन यौगिकों का स्थायित्व (Stability of Coordination of Compounds in Solution):
अधिकांश संकुल अत्यधिक स्थायी होते हैं। धातु आयन तथा लिगेण्ड के बीच अन्योन्यक्रिया को लूइस अम्ल-क्षार अभिक्रिया के समान माना जाता है।

यदि अन्योन्यक्रिया प्रबल होगी तो बनने वाला संकुल ऊष्मागतिकीय रूप से अत्यधिक स्थायी होगा। विलयन में संकुल के स्थायित्व का अर्थ है-साम्य् अवस्था पर भाग ले रही दो स्पीशीज के मध्य संगुणन की मात्रा का मान। संगुणन के लिए साम्य स्थिरांक (स्थायित्व या विरचन) का परिमाण गुणात्मक रूप को स्थायित्व को प्रकट करता है। इस प्रकार यदि हम निम्नांकित प्रकार की अभिक्रिया को लें –
M + 4L ⇄ ML4
K = \(\frac{\left[\mathrm{ML}_{4}\right]}{[\mathrm{M}][\mathrm{L}]^{4}}\)
साम्य स्थिरांक का मान जितना अधिक होगा, ML4 की विलयन में मात्रा उतनी ही अधिक होगी। विलयन में मुक्त धातु आयनों का अस्तित्व नगण्य होता है। अतः M सामान्यतः विलायक अणुओं से घिरा होगा जो लिगेण्ड अणुओं, L, से प्रतिस्पर्धा करेंगे तथा धीरे – धीरे उनसे प्रतिस्तापित हो जाएंगे।

संकलों के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting the Stability of a Complex):
संकुलों का स्थायित्व निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है –

(1) केन्द्रीय आयन की प्रकृति (Nature of Central Ion):

(i) केन्द्रीय धातु आयन पर आवेश (Charge on central metal ion):
सामान्यतया केन्द्रीय आयन पर आवेश घनत्व जितना अधिकर होता है, इसके संकुलों का स्थायित्व भी उतना ही अधिक होता है। दूसरे शब्दों में किसी आयन पर आवेश अधिक तथा आकार छोटा होने पर अर्थात् आयन का आवेश/त्रिज्या अनुपात अधिक होने पर इसके संकुलों का स्थायित्व अधिक होता है। उदाहरणार्थ – Fe2+ आयन की तुलना में Fe3+ आयन उच्च आवेश वहन करते हैं, परन्तु इनके आकार समान होते हैं।

इसलिए Fe2+ आयन की तुलना में Fe3+ पर आवेश घनत्व उच्च होता है, इसलिए Fe3+ आयन के संकुल अधिक स्थायी होते हैं।
Fe3+ + 6CN → [Fe(CN)6]3-; K = 1.2 × 1031
Fe2+ + 6CN → [Fe(CN)6]4-; K = 1.8 × 106

(ii) धातु आयन का आकार (Size of metal ion):
धातु आयन का आकार घटने पर संकुल का स्थायित्व बढ़ता है। यदि हम द्विसंयोजी धातु आयन पर विचार करें तो इनके संकुलों का स्थायित्व केन्द्रीय धातु आयन की आयनिक त्रिज्या बढ़ने के साथ बढ़ता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 38
इसलिए स्थायित्व का क्रम इस प्रकार है –
Mn21 < Fe2+ < Co2+ < Ni2+ < Cu2+ < Zn2+ यह क्रम इरविंग विलियम का स्थायित्व क्रम कहलाता है।

(iii) धातु आयन की विद्युतऋणात्मकता या आवेश वितरण (Electronegativity or Charge distribution of metal ion):
संकुल आयन का स्थायित्व धातु आयन पर इलेक्ट्रॉन आवेश वितरण से भी सम्बन्धित होता है। आरलेण्ड, चैट तथा डेविस के अनुसार धातु आयनों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

(क) वर्ग ‘a’ ग्राही (Class ‘a’ acceptors):
ये पूर्णतया विद्युतधनात्मक धातुएँ होती हैं तथा इनमें वर्ग 1 तथा 2 की धातुएँ सम्मिलित होती हैं। इनके अतिरिक्त आन्तरसंक्रमण धातुएँ तथा संक्रमण श्रेणी के पूर्व सदस्य (वर्ग 3 से 6 तक), जिनमें अक्रिय गैस विन्यास से कुछ इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं, भी इस वर्ग में सम्मिलित होते हैं। ये N, O तथा F दाता परमाणुओं से युक्त लिगण्डों के साथ अत्यधिक स्थायी उपसहसंयोजक सत्ता बनाते है।

(ख) वर्ग ‘b’ ग्राही (Class ‘b’ acceptors):
ये बहुत कम विद्युतधनात्मक होते हैं। इनमें भारी धातुएँ; जैसे – Rh, Pd, Ag, Ir, Pt, Au, Hg, Pb आदि, जिनमें भरित d – कक्षक होते हैं, सम्मिलित होती हैं। ये उन लिगण्डों के साथ स्थायी संकुल बनाती हैं जिनमें N, O तथा F वर्ग के भारी सदस्य दाता परमाणु होते हैं।

(iv) कीलेट प्रभाव (Chelate effect):
स्थायित्व कीलेट वलयों के निर्माण पर भी निर्भर करता है। यदि L एक एकदन्तुर लिगेण्ड तथा L – L द्विदन्तुर लिगेण्ड हो तथा यदि L तथा L – L के दाता परमाणु एक ही तत्त्व के हों, तब L – L, L को प्रतिस्थापित कर देगा। कीलेशन के कारण यह स्थायित्व कीलेट प्रभाव कहलाता है। 5 तथा 6 सदस्यीय वलयों में कीलेट प्रभाव अधिकतम होता है। सामान्य रूप में वलय संकुल को अधिक स्थायित्व प्रदान करती है।

(v) वृहदचक्रीय प्रभाव (Macrocyclic effect):
यदि एक बहुदन्तुर लिगेण्ड चक्रीय है तथा कोई अनपयुक्त त्रिविम प्रभाव नहीं है तो बनने वाला संकुल बिना चक्रीय लिगेण्ड के सम्बन्धित संकुल की तुलना में अधिक स्थायी होगा। यह वृहदचक्रीय प्रभाव कहलाता है।

(2) लिगेण्ड की प्रकृति (Nature of Ligand):

(i) क्षारीय सामर्थ्य (Basic strength):
लिगेण्ड जितना अधिक क्षारीय होगा, उतनी ही अधिक सरलता से अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म को दान देने में होगी, इसलिए इससे बनने वाले संकुल उतने ही अधिक स्थायी होंगे। अत: CN तथा F आयन एवं NH3, जो प्रबल क्षार हैं, अच्छे लिगेण्ड भी हैं तथा अनेक स्थायी संकुल बनाते हैं।

(ii) लिगण्डों का आकार तथा आवेश (Size and charge of ligands):
ऋणायनी लिगण्डों के लिए आवेश उच्च तथा आकार छोटा होने पर बनने वाला संकुल अधिक स्थायी होता है। अत: F अधिक स्थायी संकतुल देता है, परन्तु Cl आयन नहीं।

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प्रश्न 9.26
कीलेट प्रभाव से क्या तात्पर्य है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
जब एक द्विदन्तुर या बहुदन्तुर लिगेण्ड में दाता परमाणु इस प्रकार स्थित होते हैं कि जब वे केन्द्रीय धातु आयन से उपसहसंयोजित होते हैं, तब एक पाँच या छ: सदस्यीय वलय बनती है तो इस प्रभाव को कीलेट प्रभाव कहते हैं।
उदाहरण:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 39

प्रश्न 9.27
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए:

  1. जैव-प्रणालियाँ
  2. विश्लेषणात्मक रसायन
  3. औषध रसायन
  4. धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म।

उत्तर:
1. जैव प्रणालियाँ:
उपसहसंयोजन यौगिक जैव-तन्त्र में बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। प्रकाश-संश्लेषण के लिए उत्तरदायी वर्णक, क्लोरोफिल मैग्नीशियम का उपसहसंयोजन यौगिक हैं। रक्त का लाल वर्णक हीमोग्लोबिन, जो कि ऑक्सीजन का वाहक है, आयरन का एक उपसहसंयोजन यौगिक है।

विटामिन B12 सायनोकोबालऐमीन, प्रतिप्राणाली अरक्तता कारक (antipernicious anaemia factor), कोबाल्ट का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। जैविक महत्त्व के अन्य धातु आयन युक्त उपसहसंयोजन यौगिक; जैसे- कार्बोक्सीपेप्टिडेज – A (carboxypeptidase A) तथा कार्बोनिक एनहाइड्रेज (carbonic anhydrase) (जैव-प्रणाली के उत्प्रेरक) एन्जाइम हैं।

2. विश्लेषणात्मक रसायन:
गुणात्मक (qualitative) तथा मात्रात्मक (quantitative) रासायनिक विश्लेषणों में उपसहसंयोजन यौगिकों के अनेक उपयोग हैं। अनेक परिचित रंगीन अभिक्रियाएँ जिनमें धातु आयनों के साथ अनेक लिगण्डों (विशेष रूप से कीलेट लिगण्ड) की उपसहसंयोजन सत्ता बनने के कारण रंग उत्पन्न होता है, चिरसम्मत (classical) तथा यान्त्रिक (instrumental) विधियों द्वारा धातु आयनों की पहचान व उनके मात्रात्मक आकलन का आधार हैं। ऐसे अभिकर्मकों के उदाहरण हैं – EDTA, DMG (डाइमेथिल ग्लाइऑक्सिम), α – नाइट्रोसो – β – नैफ्थॉल आदि।

3. औषध रसायन:
औषध रसायन में कीलेट चिकित्सा के उपयोग में अभिरुचि बढ़ रही है। इसका एक उदाहरण है-पौधे/जीव-जन्तु निकायों में विषैले अनुपात में विद्यमान धातुओं के द्वारा उत्पन्न समस्याओं का उपचार।

इस प्रकार कॉपर तथा आयरन की अधिकता को D – पेनिसिलऐमीन तथा डेसफरीऑक्सिम B लिगण्डों के साथ उपसहसंयोजन यौगिक बनाकर दूर किया जाता है। EDTA को लेड की विषाक्तता के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है। प्लैटिनम के कुछ उपसहसंयोजन यौगिक ट्यूमर वृद्धि को प्रभावी रूप से रोकते हैं। उदाहरण हैं-समपक्ष-प्लैटिन (cis-platin) तथा सम्बन्धित यौगिका।

4. धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म:
धातुओं की कुछ प्रमुख निष्कर्षण विधियों में; जैसे-सिल्वर तथा गोल्ड के लिए संकुल विचन का उपयोग होता है। उदाहरणार्थ: ऑक्सीजन तथा जल की उपस्थिति में गोल्ड सायनाइड आयन से संयोजित होकर जलीय विलयन में उपसहसंयोजन सत्ता, [Au(CN)2] बनाता है। इस विलयन में जिंक मिलाकर गोल्ड को पृथक् किया जा सकता हैं।

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प्रश्न 9.28
संकुल [Co(NH3)6] Cl2 से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे –

  1. 6
  2. 4
  3. 3
  4. 2

उत्तर:
संकुल [Co(NH3)6] Cl2 विलयन में तीन आयनों में वियोजित होता है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक img 40
अतः सही विकल्प (iii) है।

प्रश्न 9.29
निम्नलिखित आयनों में से किसके चुम्बकीय आघूर्ण का मान सर्वाधिक होगा?

  1. [Cr(H2O)6]3+
  2. [Fe(H2O)6]2+
  3. [Zn(H2O6]2+

उत्तर:

  1. Cr3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 3d3; अयुगमित इलेक्ट्रॉन = 3
  2. Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 3d6; अयुगमित इलेक्ट्रॉन = 4
  3. Zn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 3d10; अयुगमित इलेक्ट्रॉन = 0

चूँकि n = 4 सबसे अधिक है, अत: इसके लिए चुम्बकीय आघूर्ण सर्वाधिक होगा। अतः सही विकल्प (ii) है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

प्रश्न 9.30
K[Co(CO)4] में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण संख्या है:

  1. +1
  2. +3
  3. -1
  4. -3

उत्तर:
माना K [Co(CO)4]-1 में Co की आ० सं० x है।
x + 0 = -1 या x = -1
अतः सही विकल्प (iii) है।

प्रश्न 9.31
निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी संकुल है:

  1. [Fe(H2O)6]2+
  2. [Fe(NH3)6]3+
  3. [Fe(C2O4)3]3-
  4. [FeCl6]3-

उत्तर:
दिये गए संकुलों में Fe की आ० सं० +3 है। चूंकि तीन \(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4}^{2-}\) आयन कीलेटलिगेण्ड हैं, अत: यह संकुल एक कीलेट है। अतः सही विकल्प (iii) है।

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प्रश्न 9.32
निम्नलिखित के लिए दृश्य प्रकाश में अवशोषण की तरंगदैर्ध्य का सही क्रम क्या होगा?
[Ni(NO2)6]2-, [Ni(NH3)6]2+, [Ni(H2O)2+
उत्तर:
चूँकि इन सभी संकुलों में धातु आयन (Ni2+) है अत: स्पेक्ट्रमी रासायनिक श्रेणी के अनुसार उपस्थित लिगण्डों के बढ़ते क्षेत्र सामर्थ्य निम्न प्रकार है:
H2O < NH3 < NO2
अत: उत्तेजन हेतु अवशोषित ऊर्जाओं का क्रम निम्नवत् है:
[Ni(H2O)6]2+ < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(NO2)6]4-
चूँकि E = \(\frac{hc}{λ}\) अर्थात् E ∝ \(\frac{1}{λ}\) अत: अवशोषित तरंदैर्ध्य विपरीत क्रम में होगी।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

Bihar Board Class 12 Chemistry d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.1
सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण भरित d कक्षक (4d10) है। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है।
उत्तर:
सिल्वर (Z = 47) + 2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित कर सकता है जिसमें उसके 4d कक्षक अपूर्ण भरे हुए है। अतः यह संक्रमण तत्व है।

प्रश्न 8.2
श्रेणी, Sc (Z = 21) से Zn (Z = 30) में जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम होता है, अर्थात् 126 kJ mol-1; क्यों?
उत्तर:
Zn के 3d – कक्षकों के इलेक्ट्रॉन धात्विक आबन्धन से प्रयुक्त नहीं होते हैं जबकि 3d – श्रेणी के शेष सभी धातुओं के d – कक्षक के इलेक्ट्रॉन धात्विक आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। अतः श्रेणी में Zn की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम होता है।

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प्रश्न 8.3
संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी का कौन-सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है एवं क्यों?
उत्तर:
Mn (Z = 25) के परमाणु में सर्वाधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं। अतः यह +2 से +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है, जो सबसे बड़ी संख्या है।

प्रश्न 8.4
कॉपर के लिए \(\mathbf{E}_{\left(\mathbf{M}^{2+} \mid \mathbf{M}\right)}^{\Theta}\) का मान धनात्मक (+ 0.34 V) है। इसके सम्भावित कारण क्या हैं?
उत्तर:
किसी धातु के लिए \(\mathbf{E}_{\left(\mathbf{M}^{2+} \mid \mathbf{M}\right)}^{\Theta}\), निम्नलिखित पदों में होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन के योग से सम्बद्ध होता है –
M(s) + ∆a → M(g) (∆a H = परमाण्विक एन्थैल्पी)
M(g) + ∆iH → M2+ (g) (∆i = आयनन एन्थैल्पी)
M2+ (g) + (aq) → M2+ (aq) + ∆hyd H (∆iH = जलयोजन एन्थैल्पी)
कॉपर की परमाण्विक एन्थैल्पी उच्च तथा जलयोजन एन्थैल्पी कम होती है। इसलिए \(E_{\left(\mathrm{Cu}^{2+} \mid \mathrm{Cu}\right)}^{\Theta}\) धनात्मक है। Cu (s) के Cu2+ (aq) में रूपान्तरण की उच्च ऊर्जा इसकी जलयोजन एन्थैल्पी द्वारा सन्तुलित नहीं होती है।

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प्रश्न 8.5
संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी (प्रथम और द्वितीय) में अनियमित परिवर्तन को आप कैसे समझाएंगे?
उत्तर:
आयनन एन्थैल्पी में अनियमित परिवर्तन विभिन्न 3d विन्यासों के स्थायित्व की क्षमता में भिन्नता के कारण है (उदाहरण: d0, d5, d10 असमान्य रूप से स्थाई हैं)।

प्रश्न 8.6
कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में क्यों प्रदर्शित होता है?
उत्तर:
छोटे आकार एवं उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीकरण अथवा फ्लुओरीन, धातु को उसके उच्च ऑक्सीकरण अवस्था तक आक्सीकृत कर सकते हैं।

प्रश्न 8.7
Cr2+ और Fe2+ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
उत्तर:
Fe2+ की एक प्रबल अपचायक है।

कारण:
Cr2+ से Cr3+ बनने में d4 → d3 परिवर्तन होता है किन्तु Fe2+ से Fe2+ में d6 → d5 में परिवर्तन होता है। जल जैसे माध्यम में d5 की तुलना में d3 अधिक स्थायी है।

प्रश्न 8.8
M2+ (aq) आयन (Z = 27) के लिए ‘प्रचक्रण-मात्र’ चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
गणना:
M परमाणु (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d7 4s2 है।
∴ M2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d7
या
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 1
∴ इसमें तीन अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं।
∴ M2+ (aq) आयन के लिए ‘प्रचक्रण-मात्र’ चुम्बकीय आघूर्ण (µ)
= \(\sqrt{n(n + 2)}\) B.M.
= \(\sqrt{3(3 + 2)}\) B.M.
= 3.87 B.M.

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प्रश्न 8.9
स्पष्ट कीजिए कि Cu+ आयन जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्यों? समझाइए।
उत्तर:
जलीय विलयन में Cu+ (aq) निम्नलिखित प्रकार से असमानुपात करके Cu2+ आयन बनाता है –
2Cu+ (aq) → Cu2+ (aq) + Cu (s)
इस का कारण यह है कि कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है, परन्तु Cu2+ (aq) के लिए ∆hyd, Cu+ (aq) की तुलना में अधिक ऋणात्मक होती है। अतः यह कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी को संतुष्ट करती है। इस प्रकार Cu2+ (aq) आयन Cu2+ (aq) आयन में परिवर्तित हो जाता है जो अधिक स्थाई होता है।

प्रश्न 8.10
लैन्थेनाइड आंकुचन की तुलना में एक तत्व से दूसरे तत्व के बीच ऐक्टिनाइड आंकुचन अधिक होता है, क्यों?
उत्तर:
5d इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश से प्रभावी रूप से परिरक्षित कहते हैं। दूसरे शब्दों में, 5d इलेक्ट्रॉनों का श्रेणी में एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर जाने पर दुर्बल परिलक्षित होता है।

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.1
निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए:

  1. Cr3+
  2. Pm3+
  3. Cu+
  4. Ce4+
  5. Co2+
  6. Mn2+
  7. Th4+

उत्तर:

  1. Cr3+ = [Ar] 3d3
  2. Pm3+ = [Xe] 4f4
  3. Cu+ = [Ar] 3d10
  4. Ce4+ = [Xe]
  5. Co2+ = [Ar] 3d7
  6. Lu2+ = [Xe] 4f14 5d1
  7. Mn2+ = [Ar] 3d5
  8. Th4+ = [Rn]

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प्रश्न 8.2
+ 3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के सन्दर्भ में Mn2+ के यौगिक Fe2+ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
उत्तर:
Mn2+ तथा Fe2+ के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्रमश: 3d5 और 3d6 हैं। अत: Mn की +2 की ऑक्सीकरण अवस्था हुण्ड के नियम से Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +3 से अधिक स्थाई है।

प्रश्न 8.3
संक्षेप में स्पष्ट कीजिए कि प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था कैसे अधिक स्थायी होती जाती है?
उत्तर:
प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ IE1 तथा IE2 का योग बढ़ता है अतः मानक अपचायक विभव (EΘ) कम तथा ऋणात्मक होता है, जिससे M2+ आयन बनाने की प्रवृत्ति घटती है। Mn2+ में अर्द्धपूरित d – उपकोशों (d5 ) के कारण Zn2+ में पूर्णपूरित d – उपकोशों (d10 ) के कारण तथा निकिल में उच्च ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी के कारण +2 ऑक्सीकरण अवस्था का अधिक स्थायित्व होता है।

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प्रश्न 8.4
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस सीमा तक ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करते हैं? उत्तर को उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा उनकी ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निम्न तालिका में दिखाया गया है:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 2
तत्व की +2 ऑक्सीकरण अवस्था बहुत अधिक स्थाई होती है क्योंकि Mn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सभी पाँचों 34-कक्षक अर्द्ध भरे होने के कारण उच्च समितीय होता है।

प्रश्न 8.5
संक्रमण तत्वों की मूल अवस्था में नीचे दिए गए d – इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों में कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होगी?
3d3, 3d5, 3d8 तथा 3d4
उत्तर:
स्थाई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ –
3d3 (वैनेडियम) – +2, +3, + 4, +5
3d5 (क्रोमियम) – +3, +4, +6
3d5 (मैंगनीज) – + 2, +4, +6, +7
3d4 (कोबाल्ट) – +2, +3 (संकुलों में)
3d4 मूल अवस्था में 3d4 विन्यास नहीं होता है।

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प्रश्न 8.6
प्रथम संकमण श्रेणी के आक्सोधातु ऋणायनों का नाम लिखिए, जिसमें धातु संक्रमण श्रेणी की वर्ग संख्या के बराबर आक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती है।
उत्तर:
प्रथम संक्रमण श्रेणी के आक्सो-ऋणायन निम्न है –
वैनेडेट \(\mathrm{VO}_{3}^{-}\) जिसमें V की आक्सीकरण अवस्था 5 है जो वर्ग संरचना के बराबर है।
क्रोमेट \(\mathrm{CrO}_{4}^{-}\), जिसमें Cr की आक्सीकरण अवस्था 6 है जो वर्ग संख्या के बराबर है। परमैंगनेट \(\mathrm{MNO}_{4}^{-}\) जिसमें Mn की आक्सीकरण अवस्था 7 है जो वर्ग संख्या के बराबर है।

प्रश्न 8.7
लैन्थेनायड आंकुचन क्या है? लैन्थेनायड आकुंचन के परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
लैन्थेनाइड श्रेणी के तत्त्वों में आयनिक तथा परमाणवीय त्रिज्या में बाईं से दाईं ओर होने वाली कमी लैंथेनाइड आकुंचन कहलाती है। लैंथेनाइड में इलेक्ट्रॉन 4f उपकोश में इलेक्ट्रॉन प्रवेश करते हैं।

इन f – इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव बहुत कम होता है जबकि परमाणु क्रमांक की वृद्धि के साथ नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है। इस कम प्रभाव के कारण यह f – इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश के प्रभाव को इतना कम नहीं कर पाते जिससे संयोजी इलेक्ट्रॉन नाभिक के द्वारा अधिक बल के साथ आकर्षित होते हैं।

1. भौतिक गुणों में भिन्नता:
गलनांक, क्वथनांक, कठोरता आदि परमाणु संख्या की वृद्धि के साथ बढ़ते हैं, ऐसा परमाणओं के मध्य आकर्षण बल में वद्धि के कारण होता है क्योंकि आकार घटता है।

2. मानक अपचयन विभव में भिन्नता:
अपचयन अभिक्रिया के लिए मानक अपचयन में वृद्धि लैंथेनाइड संकुचन के कारण होती है।

3. लैंथेनाइड में समानता:
आकार में थोड़े परिवर्तन के कारण सब लैंथेनाइड रासायनिक गुणों के कारण इनमें परस्पर समानता होती है।

4. क्षारीय सामर्थ्य में भिन्नता:
हाइड्रॉक्साइडों की आयनिक त्रिज्याओं और सहसंयोजकता के घटने की क्षारीय सामर्थ्य Ce(OH)3 से Lu(OH)3 तक बढ़ती है। इसके फलस्वरूप परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्या बायें से दायें जाने पर घटती है जो कि लैंथेनाइड आकुंचन रूप में होती है।

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प्रश्न 8.8
संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती है? d – ब्लॉक के तत्वों में कौन-से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
उत्तरः
संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण:

  1. इनमें धात्विक गुण होता है। ये सभी तत्व ऊष्मा तथा विद्युत के सुचालक होते हैं।
  2. इनके आयन तथा यौगिक रंगीन होते हैं।
  3. ये तत्व और इनके यौगिक उत्प्रेरक गुण प्रदर्शित करते
  4. ये संकर आयन बनाने की प्रकृति रखते हैं। जैसे –
    [Fe(CN)6]3-, [Cu(NH3)]2+ आदि।
  5. ये तत्व अधिकतर अनुचुम्बकीय होते हैं।
  6. ये अन्य धातुओं के साथ मिश्रधातु बनाते हैं।
  7. ये कुछ तत्वों के साथ अन्तराक्षी यौगिक बनाते हैं।
  8. ये अनेक आक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
  9. इनमें संकुल बनाने की प्रवृत्ति अधिक है।

d – ब्लॉक तत्व संक्रमण तत्व हैं:
चूँकि ये तत्व अधिक विद्युतधनात्मक s – ब्लॉक तत्वों और कम विद्युत-धनात्मक p – ब्लॉक तत्वों के मध्य में हैं, अतः इन्हें संक्रमण तत्व कहते हैं। Zn, Cd तथा Hg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n – 1) d10 ns2 है। चूंकि ये आक्सीकरण अवस्था में पूर्ण पूरित हैं, अतः ये तत्व संक्रमण तत्व नहीं कहे जा सकते।

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प्रश्न 8.9
संक्रमण धातुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस प्रकार असंक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से भिन्न हैं?
उत्तर:
संक्रमण धातुओं से अपूर्ण d – उपकोश होते हैं, इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n – 1) d1-10 ns1-2 होता है, जबकि असंक्रमण तत्वों में d – उपकोश नहीं होते हैं तथा इनके बाहरी कोश का विन्यास ns1-2 या ns2, np1-6 होता है।

प्रश्न 8.10
लैन्थेनाइडों द्वारा कौन-कौन सी आक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित की जाती हैं।
उत्तर:
लैन्थेनाइडों की आक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States of Lanthanides):
आवर्त सारणी के वर्ग 3 के सदस्यों से प्रत्याशित होता है कि लैन्थेनाइडों की एकसमान +3 आक्सीकरण अवस्था उनकी एक विशेषता है। त्रिधनात्मक आक्सीकरण अवस्था 6s2 इलेक्ट्रॉन और एकाकी 5d – इलेक्ट्रॉन अथवा यदि कोई 5d – इलेक्ट्रॉन उपस्थित न हो तो f – इलेक्ट्रॉनों में से एक के उपयोग के अनुसार होती है। प्रथम तीन आयनन एन्थैल्पियों का योग अपेक्षाकृत निम्न होता है जिससे ये तत्व उच्च धनविद्युती होते हैं और तत्परता से +3 आयन बना लेते हैं।

यद्यपि जलीय विलयन में तथा ठोस अवस्था में सीरियम (Ce4+) तथा सैमेरियम, यूरोपियम और इटर्बियम (Sm2+, Eu2+ Yb2+) आयन दे सकते हैं। अन्य तत्व ठोस अवस्था में +4 अवस्था दे सकते हैं। MX3 का अपचयन न केवल MX2 अपितु विशेष स्थिति में जटिल अपचयित भी दे सकता है।

लैन्थेनाइडों के लिए +3 आक्सीकरण अवस्था की धारणा पर्याप्त दृढ़ हो गई है तथा अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं को प्रायः ‘असंगत’ कहा जाता है। विभिन्न लैन्थेनाइडों की ऐसी असंगत ऑक्सीकरण अवस्था निम्नांकित प्रकार प्रदर्शित की गई हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 3
चित्र – लैन्थेनम तथा लैन्थेनाइडों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ। बिन्दुवत रेखाएँ संदिग्ध या अल्पस्थायी संयोजकताएँ प्रदर्शित करती है –

यदि हम यह मान लें कि रिक्त, अर्द्धपूर्ण या पूर्ण f – उपकोश के साथ विशेष स्थायित्व सम्बन्धित होता है जो एक निश्चित सीमा तक +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाओं की उपस्थिति का इलेक्ट्रॉनिक संरचनाओं के साथ सामंजस्य किया जा सकता है। इस प्रकार La, Gd और Lu केवल त्रिधनात्मक आयन निर्मित करते हैं; क्योंकि तीन इलेक्ट्रॉनों के निष्कासन में La3+ आयन में उत्कृष्ट गैस का विन्यास बन जाता है।

Gd3+ तथा Lu3+ आयनों में क्रमश: स्थाई 4f7 तथा 4f14 इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन नहीं होता; क्योंकि M3+ आयनों की अपेक्षा M2+ अथवा M+ आयनों की जालक अथवा जलयोजन ऊर्जाएँ लघु M3+ आयनों के लवणों की योगात्मक जालक या जलयोजन ऊर्जाओं की अपेक्षा कम होगी।

सबसे अधिक स्थायी द्वि या चतुर्धनात्मक आयन उन तत्वों द्वारा निर्मति होते हैं जो ऐसा करके f9, f7 तथा f14 विन्यास प्राप्त कर सकते हो। इस प्रकार सीरियम तथा इटर्बियम +4 ऑक्सीकरण अवस्था में आकर क्रमशः f0 तथा f14 विन्यास प्राप्त करते हैं। यूरोपियम तथा इटर्बियम +2 ऑक्सीकरण अवस्था में क्रमश: f7 तथा f7 विन्यास प्राप्त कर लेते हैं।

ये तथ्य इस धारणा का समर्थन करते प्रतीत होते हैं कि लैन्थेनाइडों के लिए +3 के अतिरिक्त दूसरी ऑक्सीकरण अवस्थाओं का अस्तित्व निर्धारित करने में f0, f7 तथा तथा f14 विन्यासों का विशेष स्थायित्व महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह तर्क कम निर्णयात्मक हो जाता है जब हम देखते हैं कि सैमेरियम और धूलियम और f13 विन्यास रखते हुए M2+ आयन बनाते हैं, M+ आयन नहीं। साथ प्रेजियोडिमियम एवं नियोडिमियम f1 तथा f2 विन्यासों के साथ M4+ आयनन बनाते हैं, परन्तु कोई पंच या षट-संयोजक प्रकार के आयन नहीं बनाते।

इसमें सन्देह नहीं है कि Sm (II) और विशेषकर Tm (II), Pr (IV) तथा Nd (IV) अवस्थाएँ बहुत अस्थायी हैं, परन्तु यह विचार भी संदिग्ध है कि f0, f7 या 14 विन्यास के केवल समीप पहुँच जाना भी स्थायित्व के लिए सहायक होता है चाहे ऐसा कोई विन्यास वस्तुतः प्राप्त नहीं भी हो।

Nd2+ (f4) का अस्तित्व यह विश्वास करने के लिए विशेष निर्णयात्मक प्रमाण है कि यद्यपि f0, f7, f14 विन्यास का स्थायित्व ऑक्सीकरण अवस्थाओं का स्थायित्व निर्धारण करने में एक घटक हो सकता है, यद्यपि अन्य ऊष्मागतिकीय तथा गतिकीय घटक विशेष भी हैं जिनका समान या अधिक महत्त्व है।

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प्रश्न 8.11
कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –

  1. संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय हैं।
  2. संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं।
  3. संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं।
  4. संक्रमण धातुएँ तथा इनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।

उत्तर:
1. पदार्थों में अनुचुम्बकत्व की उत्पत्ति, अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होती है। प्रतिचुम्बकीय पदार्थ वे होते हैं जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युगलित होते हैं। संक्रमण धातु आयनों में प्रतिचुम्बकत्व तथा अनुचुम्बकत्व दोनों होते हैं अर्थात् इनमें दो विपरीत प्रभाव पाए जाते हैं, इसलिए परिकलित चुम्बकीय आघूर्ण इनका परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण माना जाता है।

d0 (Sc3+, Ti4+) या d10 (Cu+, Zn2+) विन्यासों को छोड़कर, संक्रमण धातुओं के सभी सरल आयनों में इनके (n – 1) d उपकोशों में अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं; अत: ये अधिकांशत: अनुचुम्बकीय होते हैं। ऐसे अयुगलित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण, प्रचक्रण कोणीय संवेग तथा कक्षीय कोणीय संवेग से सम्बन्धित होता है।

प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं के यौगिकों में कक्षीय कोणीय संवेग का योगदान प्रभावी रूप से शमित (quench) हो जाता है, इसलिए इसका कोई महत्त्व नहीं रह जाता। अतः इनके लिए चुम्बकीय आघूर्ण का निर्धारण उसमें उपस्थित अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के आधार पर किया जाता है तथा इसकी गणना निम्नलिखित ‘प्रचक्रण मात्र’ सूत्र द्वारा दी जाती है –
µ = \(\sqrt{n(n+2)}\)।
यहाँ n अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है तथा µ चुम्बकीय आघूर्ण है जिसका मात्रक बोर मैग्नेटॉन (BM) है। एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण 1.73 BM होता है।

2. संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं; क्योंकि इनके परमाणुओं में अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इस कारण इनमें प्रबल अन्तरापरमाण्विक अन्योन्य-क्रियाएँ होती हैं तथा इसीलिए परमाणुओं के मध्य प्रबल आबन्ध उपस्थित होते हैं।

3. अधिकांश संक्रमण धातु आयन विलयन तथा ठोस अवस्थाओं में रंगीन होते हैं। ऐसा दृश्य प्रकाश के आंशिक अवशोषण के कारण होता है। अवशोषित प्रकाश इलेक्ट्रॉन को समान d – उपकोश के एक कक्षक से दूसरे कक्षक पर पहुँचा देता है। चूँकि इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण धातु आयनों के d – कक्षकों में होते हैं; इसलिए did संक्रमण कहलाते हैं। संक्रमण धातु आयनों में दृश्य प्रकाश को अवशोषित करके होने वाले d-d संक्रमणों के कारण ही ये रंगीन दिखाई देते हैं।

4. संक्रमण धातुएँ तथा इनके यौगिक उत्प्रेरकीय सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। संक्रमण धातुओं का यह गुण इनकी परिवर्तनशील संयोजकता एवं संकुल यौगिक के बनाने के गुण के कारण है। वेनेडियम (V) ऑक्साइइड (संस्पर्श प्रक्रम में), सूक्ष्म विभाजित आयरन (हेबर प्रक्रम में) और निकिल (उत्प्रेरकीय हाइड्रोजन में) संक्रमण धातुओं के द्वारा उत्प्रेरण के कुछ उदाहरण हैं। उत्प्रेरक के ठोस पृष्ठ पर अभिकारक के अणुओं तथा उत्प्रेरक की सतह के परमाणुओं के बीच आबन्धों की रचना होती है।

आबन्ध बनाने के लिए प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुएँ 3d एवं 4s इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करती हैं। परिणामस्वरूप उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारक की सान्द्रता में वृद्धि हो जाती है तथा अभिकारक के अणुओं में उपस्थित आबन्ध दुर्बल हो जाते हैं। सक्रियण ऊर्जा का मान घट जाता है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तन हो सकने के कारण संक्रमण धातुएँ उत्प्रेरक के रूप में अधिक प्रभावी होती हैं।

उदाहरणार्थ:
आयरन (III), आयोडाइड आयन तथा परसल्फेट आयन के बीच सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया का उत्प्रेरित करता है।
2I + S2O82- → I2 ↑+ 2SO42-

इस उत्प्रेरकीय अभिक्रिया का स्पष्टीकरण इस प्रकार है –
2Fe3+ + 2I → 2Fe2+ + I2
2Fe2+ + S2O82- → 2Fe3+ + 2SO42-

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प्रश्न 8.12
अन्तराकाशी यौगिक क्या हैं? इस प्रकार के यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात क्यों हैं?
उत्तर:
ऐसे यौगिकों को जिनके क्रिस्टल जालक में अन्तराकाशी स्थलों को छोटे आकार वाले परमाणु अध्यासित कर लेते हैं, अन्तराकाशी यौगिक कहते हैं। अन्तराकाशी यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए ज्ञात होते हैं; क्योंकि संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालकों में उपस्थित रिक्तियों में छोटे आकार वाले परमाणु; जैसे – H, N या C सरलता से सम्पाशित हो जाते है।

प्रश्न 8.13
संक्रमण धातुओं की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता असंक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता से किस प्रकार भिन्न है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ संक्रमण धातुओं की एक प्रमुख विशेषता है। इसका कारण है, अपूर्ण d – कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का इस प्रकार से प्रवेश करना जिससे इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में एक का अन्तर बना रहता है। इसका उदाहरण, VII, VIII, VIV, VV है। दूसरी ओर असंक्रमण तत्वों में विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में सामान्यतया दो का अन्तर पाया जाता है।

प्रश्न 8.14
आयरन क्रोमाइट अयस्क से पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन पर pH बढ़ाने से क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तरः
पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि:
क्रोमाइट अयस्क (FeCr2O4) को जब वायु की उपस्थिति में सोडियम या पोटैशियम कार्बोनेट के साथ संगलित किया जाता है तो क्रोमेट प्राप्त होता है।
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 → 8Na2CrO4 + 2Fe2O3 + 8CO2

सोडियम क्रोमेट के पीले विलयन को छानकर उसे सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा अम्लीय बना लिया जाता है जिसमें से नारंगी सोडियम डाइक्रोमेट, Na2CrO4 + 2H+ → Na2Cr2O7 + 2Na+ + H2O

सोडियम डाइक्रोमेट की विलेयता, पोटैशियम डाइक्रोमेट से अधिक होती है। इसलिए सोडियम डाइक्रोमेट के विलयन में पोटैशियम क्लोराइड डालकर पोटैशियम डाइक्रोमेट प्राप्त कर लिया जाता है।
Na2Cr2O7 + 2KCI → K2Cr2O7 + 2NaCl

पोटैशियम डाइक्रोमेट के नारंगी रंग के क्रिस्टल, क्रिस्टलीकृत हो जाते हैं। जलीय विलयन में क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट का अन्तरारूपान्तरण होता है जो विलयन के pH पर निर्भर करता है। क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट में क्रोमियम की ऑक्सीकरण संख्या समान है।
\(2 \mathrm{CrO}_{4}^{2-}\) + 2H+ → \(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + H2O
\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + 2OH → \(2 \mathrm{CrO}_{4}^{2-}\) + H2O
अब PH बढ़ाने पर डाइक्रोमेट आयन (नारंगी रंग) क्रोमेट आयनों में परिवर्तित हो जाते हैं तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है।

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प्रश्न 8.15
पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रिया का उल्लेख कीजिए तथा निम्नलिखित के साथ आयनिक समीकरण लिखिए:

  1. आयोडाइड आयन
  2. [आयरन (II) विलयन]
  3. H2S

उत्तर:
पोटैशियम डाइक्रोमेट प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसका उपयोग आयतनमितीय विश्लेषण में प्राथमिक मानक के रूप में किया जाता है। ऊष्मीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन की ऑक्सीकरण क्रिया निम्नलिखित प्रकार से प्रदर्शित की जा सकती हैं –
\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + 14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O
(EΘ = 1.33V)

आयनिक अभिक्रियाएँ (Ionic Reactions):
1. आयोडाइड आयन के साथ:
आयोडीन मुक्त होती है –
\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + 14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O + 3I 2

2. आयरन (II) विलयन के साथ:
आयरन (II) लवण में ऑक्सीकृत करेगा।
\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + 14H+ + 6Fe2+ → 2Cr3+ + 7H2O + 6Fe3+

3. H2S के साथ:
S में ऑक्सीकृत करता है।
\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) + 8H+ + 3H2S → 2Cr3+ + 7H2O + 3S ↓

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प्रश्न 8.16
पोटैशियम परमैंगनेट को बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट किस प्रकार –

  1. [आयरन (II) आयन]
  2. SO2 तथा
  3. ऑक्सैलिक अम्ल से अभिक्रिया करता है? अभिक्रियाओं के लिए आयनिक समीकरण लिखिए।

उत्तर:
पोटैशियम परमैंगनेट, KMnO4 (Potassium Permanganate, KMnO4):

बनाने की विधि (Methods of Preparation):
पोटैशियम परमैंगनेट को निम्नलिखित विधि से बनाया जा सकता है:

1. पोटैशियम परमैंगनेट को प्राप्त करने के लिए MnO2 को क्षारीय धातु हाइड्रॉक्साइड तथा KNO3 जैसे ऑक्सीकारक के साथ संगलित किया जाता है। इससे गाढ़े हरे रंग का उत्पाद K2MnO4 प्राप्त होता है जो उदासीन या अम्लीय माध्यम में असमानुपातिक होकर पोटैशियम परमैंगनेट देता है।
2MnO2 + 4KOH + O2 → 2K2MnO4 + 2H2O
\(3 \mathrm{MnO}_{4}^{2-}\) + 4H+ → 2MnO4 + MnO2 + 2H2O

2. औद्योगिक स्तर पर इसका उत्पादन MnO2 के क्षारीय ऑक्सीकरणी संगलन के पश्चात्, मैंगनेट (VI) के विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 4

3. प्रयोगशाला में मैंगनीज (II) आयन के लवण परऑक्सीडाइसल्फेट द्वारा ऑक्सीकृत होकर परमैंगनेट बनाते हैं।
2Mn2+ + 5S2O2-8 + 8H2O → 2MnO2-4 + 10SO2-4 + 16H+

रासायनिक अभिक्रियाएँ –
अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट की रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

1. [आयरन (II) आयन के साथ]:
Fe2+ आयन (हरा) का Fe3+ (पीले) में परिवर्तन होता है।
MnO2-4 + 8H+ + 5e2+ → Mn2+ + 4H2O + 5Fe3+

2. SO2 के साथ:
SO2-4 तथा Mn2+ आयन बनते हैं।
2MnO2-4 + 2H2O + 5SO2 → 2Mn2+ + 4H+ + 5SO2-4

3. ऑक्सैलिक अम्ल के साथ:
CO2 तथा H2O में ऑक्सीकृत करता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 5

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प्रश्न 8.17
M2+/M तथा M3+/M2+ निकाय के सन्दर्भ में कुछ धातुओं के EΘ के मान नीचे दिए गए हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 6
उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए:

  1. अम्लीय माध्यम में Cr3+ या Mn3+ की तुलना में Fe3+ का स्थायित्व।
  2. समान प्रक्रिया के लिए क्रोमियम अथवा मैंगनीज धातुओं की तुलना में आयरन के ऑक्सीकरण में सुगमता।

उत्तर:
1. चूँकि Cr3+/cr2+ का अपचयन विभव ऋणात्मक (-0.4V) है। अत: Cr3+, Cr2+ में अपचयित नहीं हो सकता अर्थात् Cr3+ अधिक स्थायी है। Mn3+/Mn2+ का EΘ मान ऑक्सीकरण (+ 1.5 V) है। अत: Mn3+ सरलता से Mn3+ में अपचयित हो सकता है और Mn3+ कम स्थायी है। अतः विभिन्न आयनों की सापेक्षिक स्थिरता का क्रम निम्न है –
Mn3+ < Fe3+ < Cr3+

2. क्रोमियम, मैंगनीज तथा आयरन के ऑक्सीकरण विभव +0.9 V, +1.2V तथा + 0:4 V होंगे। अतः इनके ऑक्सीकरण का क्रम निम्नवत् है:
Mn > Cr > Fe

प्रश्न 8.18
निम्नलिखित में कौन-से आयन जलीय विलयन में रंगीन होंगे?
Ti3+, V3+, Cu+, Sc3+, Mn2+, Fe3+ तथा Co2+ प्रत्येक के लिए कारण बताइए।
उत्तर:
Sc3+ को छोड़कर, अभारित d – कक्षकों की उपस्थिति के कारण अन्य सभी जलीय विलयन में रंगहीन होंगे तथा d – d संक्रमण देगा।

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प्रश्न 8.19
प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं की +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व की तुलना कीजिए।
उत्तर:
प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पियों का योग बढ़ता है। अत: मानक अपचायक विभव (EΘ) कम तथा ऋणात्मक होता है, इसलिए M2+ आयन बपनाने की प्रवृत्ति घटती है। +2 ऑक्सीकरण अवस्था का अधिक स्थायित्व, Mn2+ में अर्द्धपूरित d – उपकोशों (d5) के कारण, Zn2+ में पूर्णपूरित d – उपकोशों (d10) के कारण तथा निकिल में उच्च ऋणात्मक जलयोजन एन्थैलल्पी के कारण होता है।

प्रश्न 8.20
निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
  2. परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
  3. ऑक्सीकरण अवस्था
  4. रासायनिक अभिक्रियाशीलता।

उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration):
लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]86 5f1-14 6d0-1 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।

2. परमाण्वीय एवं आयनिक आकार (Atomic and ionic sizes):
लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड दोनों +3 ऑक्सीकरण अवस्था में अपने परमाणुओं अथवा आयनों के आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं। लैन्थेनाइडों में यह कमी लैन्थेनाइड आकुंचन कहलाती है, जबकि ऐक्टिनाइडों में यह ऐक्टिनाइड आकुंचन कहलाती है। यद्यपि ऐक्टिनाइडों में एक तत्व से दूसरे तत्व तक 5f – इलेक्ट्रॉनों द्वारा अत्यन्त कम परिरक्षण प्रभाव के कारण आकुंचन उत्तरोत्तर बढ़ता है।

3. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation states):
लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+ 2, +3, + 4) प्रदर्शित करते हैं, जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। दूसरी ओर ऐक्टिनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं; क्योंकि 5f, 6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।

4. रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical reactivity):

लैन्थेनाइड (Lanthanides):
सामान्य रूप से श्रेणी के आरम्भ वाले सदस्य अपने रासायनिक व्यवहार में कैल्सियम की तरह बहुत क्रियाशील होते हैं, परन्तु बढ़ते परमाणु क्रमांक के साथ ये ऐलुमिनियम की तरह व्यवहार करते हैं।
अर्द्ध-अभिक्रिया Ln3+ (aq) + 3e → Ln (s) के लिए EΘ का मान -2.2 से -2.4 V के परास में है। EΘ के लिए EΘ का मान -2.0 V है।

निस्सन्देह मान में थोड़ा-सा परिवर्तन है, हाइड्रोजन गैस के वातावरण में मन्द गति से गर्म करने पर धातुएँ हाइड्रोजन से संयोग कर लेती हैं। धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करने पर कार्बाइड – Ln3C, Ln2C3 तथा LnC2 बनते हैं।

ये तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं तथा हैलोजन के वातावरण में जलने पर हैलाइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड M2O3 तथा हाइड्रॉक्साइड M(OH)3 बनाती हैं। हाइड्रॉक्साइड निश्चित यौगिक हैं न कि केवल हाइड्रेटेड ऑक्साइड। ये क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की भाँति क्षारकीय होते हैं। इनकी सामान्य अभिक्रियाएँ चित्र में प्रदर्शित की गई हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 7
चित्र-लैन्थेनाइडों की रासायनिक अभिक्रियाएँ।

ऐक्टिनाइड (Actinides):
ऐक्टिनाइड अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ हैं, विशेषकर जब वे सूक्ष्मभाजित हों। इन पर उबलते हुए जल की क्रिया से ऑक्साइड तथा हाइड्राइड का मिश्रण प्राप्त होता है और अधिकांश अधातुओं से संयोजन सामान्य ताप पर होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सभी धातुओं को प्रभावित करता है, परन्तु अधिकतर धातुएँ नाइट्रिक अम्ल द्वारा अल्प प्रभावित होती हैं, कारण यह है कि इन धातुओं ऑक्साइड की संरक्षी सतह बन जाती है। क्षारों का इन धातुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

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प्रश्न 8.21
आप निम्नलिखित को किस प्रकार से स्पष्ट करेंगे:

  1. d4 स्पीशीज़ में से Cr2+ प्रबल अपचायक है, जबकि मैंगनीज (III) प्रबल ऑक्सीकारक है।
  2. जलीय विलयन में कोबाल्ट (II) स्थायी है, परन्तु संकुलनकारी अभिकर्मकों की उपस्थिति में यह सरलतापूर्वक ऑक्सीकृत हो जाता है।
  3. आयनों का d1 विन्यास अत्यन्त अस्थायी है।

उत्तर:
1. चूँकि Cr3+/Cr2+ के लिए EΘ मान ऋणात्मक (-0.41 V) होता है और Mn3+/Mn2+ के लिए EΘ मान धनात्मक (+ 1.57 V) होता है; अतः Cr आयन चूँकि ऑक्सीकृत होकर Cr+ आयन देते हैं, अत: Cr2+ प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है। चूँकि Mn3+ सरलता से अपचयित होकर Mn2+ आयन देते हैं, चूँकि मैंगनीज (III) प्रबल आक्सीकरण है।

2. चूँकि Co (II) की तुलना में Co (III) में उपसहसंयोजक संकुल बनाने की प्रवृत्ति अधिक होती है, अतः लिगण्डों की उपस्थिति में Co (II) का Co (III) में सरलतापूर्वक ऑक्सीकरण हो जाता है।

3. d1 विन्यास के आयनों में d – उपकोश में उपस्थित एकल इलेक्ट्रॉन को खोकर स्थायी d0 विन्यास प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है। अतः ये अस्थायी होते हैं तथा असमानुपातन प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 8.22
असमानुपातन से आप क्या समझते हैं? जलीय विलयन में असमानुपातन अभिक्रियाओं के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ऐसी अभिक्रियाएँ जिनमें एक ही पदार्थ का ऑक्सीकरण तथा अपचयन होता है, असमानुपातन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। असमानुपातन अभिक्रियाओं में सम्मिलित तत्व की ऑक्सीकरण संख्या के घटने तथा बढ़ने पर दो भिन्न उत्पाद बनते हैं।
उदाहरण:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 8

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प्रश्न 8.23
प्रथम संक्रमण श्रेणी में कौन-सी धातु बहुधा तथा क्यों + 1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती हैं?
उत्तर:
कॉपर का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d10 4s1 है। यह एक इलेक्ट्रॉन खोकर स्थायी d10 विन्यास देता है। अतः यह बहुधा +1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती है।

प्रश्न 8.24
निम्नलिखित गैसीय आयनों में अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की गणना कीजए:
Mn3+, Cr3+, V3+ Ti3+ इनमें से कौन-सा जलीय विलयन में अतिस्थायी है?
गणना:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 9
इन में Cr3+ जलीय विलयन अस्थाई है क्योंकि इसमें अर्द्धपूरित t28 स्तर होता है।

प्रश्न 8.25
उदाहरण देते हुए संक्रमण धातुओं के रसायन के निम्नलिखित अभिलक्षणों का कारण बताइए –

  1. संक्रमण धातु का निम्नतम ऑक्साइड क्षारकीय है, जबकि उच्चतम ऑक्साइड उभयधर्मी अम्लीय है।
  2. संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था ऑक्साइडों तथा फ्लुओराइडों में प्रदर्शित होती है।
  3. धातु के ऑक्सोऋणायनों में उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित होती है।

उत्तर:
1. संक्रमण धातु का निम्नतम ऑक्साइड क्षारकीय होता है; क्योंकि धातु परमाणु निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में होता है। निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में आयनिक आबन्ध बनते हैं। निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में आबन्ध बनने के दौरान कम इलेक्ट्रॉन भाग लेते हैं; इसलिए प्रभावी नाभिकीय आवेश बहुत उच्च नहीं होता है। ऑक्साइड इलेक्ट्रॉनों का दान करके क्षार के समान व्यवहार करते हैं। धातुएँ विद्युत-धनात्मक होती हैं तथा क्षारकीय ऑक्साइड बनाती हैं।

संक्रमण धातु का उच्चतम ऑक्साइड उभयधर्मी अम्लीय होता है; क्योंकि धातु परमाणु उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में होता है। उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में सहसंयोजी आबन्ध बनते हैं। उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में आबन्धन में अधिक इलेक्ट्रॉन भाग लेते हैं, जिस कारण प्रभावी नाभिकीय आवेश उच्च होता है। धातु ऑक्साइड इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सकते हैं तथा लूइस अम्लों के समान व्यवहार करते हैं, इसलिए ऑक्साइड अम्लीय होते हैं।

2. संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था ऑक्साइडों तथा फ्लुओराइडों में प्रदर्शित होती है। क्योंकि ऑक्सीजन तथा फ्लुओरीन उच्च विद्युतऋणात्मक तत्व हैं तथा आकार में छोटे होते हैं। ये प्रबल ऑक्सीकारक होते हैं। उदाहरणार्थ-ऑस्मियम, OsF6 में +6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है तथा वेनेडियम, V2O5 में +5 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

3. धातु ऑक्सोऋणायनों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित होती है; जैसे – \(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\), में Cr को ऑक्सीकरण अवस्था +6 है, जबकि MnO4 में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 है। धातु का ऑक्सीजन से संयोग का कारण यह है कि ऑक्सीजन उच्च विद्युतऋणात्मक तथा ऑक्सीकारक तत्व है।

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प्रश्न 8.26
निम्नलिखित को बनाने के लिए विभिन्न पदों का उल्लेख कीजिए:

  1. क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7
  2. पाइरोलुसाइट से KMnO4

उत्तर:
1. क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7:
क्रोमाइट अयस्क (FeCr2O4) को जब वायु की उपस्थिति में सोडियम या पोटैशियम कार्बोनेट के साथ संकलित किया जाता है तो क्रोमेट प्राप्त होता है, क्रोमाइट को साडियम कार्बोनेट के साथ अभिक्रिया निम्नलिखित प्रकार होती है:
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 → 8Na2CrO4 + 2Fe2O3 + 8CO2

सोडियम क्रोमेट के पीले विलयन को छानकर उसे सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा अम्लीय बना लिया जाता है, जिसमें से नारंगी सोडियम डाइक्रोमेट, Na2Cr2O7.2H2O को क्रिस्टलित कर लिया जाता है।
2Na2CrO4 + 2H+ → Na2Cr2O7 + 2Na+ + H2O

सोडियम डाइक्रोमेट की विलयेता, पोटैशियम डाइक्रोमेट से अधिक होती है। इसलिए सोडियम डाइक्रोमेट के विलयन में पोटैशियम क्लोराइड डालकर पोटैशियम डाइक्रोमेट प्राप्त कर लिया जाता है।
Na2Cr2O7 + 2KCl → K2Cr2O7 + 2NaCl

2. पाइरोलुसाइट से KMnO4:
औद्योगिक स्तर पर KMnO4 का उत्पादन पाइरोलुसाइट, MnO2 के क्षारीय ऑक्सीकरणी संगलन के पश्चात् मैंगनेट (VI) के विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 10

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प्रश्न 8.27
मिश्रातुएँ क्या हैं? लैन्थेनाइड धातुओं से युक्त एक प्रमुख मिश्रधातु का उल्लेख कीजिए। इसके उपयोग भी बताइए।
उत्तर:
मिश्रातु या मिश्रधातु (alloy) विभिन्न धातुओं का सम्मिश्रण होते हैं जो कि धातुओं के समिश्रण से प्राप्त होते हैं। मिश्रातु समांगी ठोस विलयन हो सकते हैं जिनमें एक धातु के परमाणु दूसरी धातु के परमाणुओं में अनियमित रूप से वितरित रहते हैं।

इस प्रकार के मिश्रातुओं की रचनाएँ उन परमाणुओं द्वारा होती हैं जिनकी धात्विक त्रिज्याओं में 15% का अन्तर हो। एक मिश्रातु मिश धातु (misch metal) है जो एक लैन्थेनाइड धातु (~95%), आयरन (~5%) तथा लेशमात्र S, C, Ca एवं Al से बनी होती है। मिश धातु की अत्यधिक मात्रा मैग्नीशियम आधारित मिश्रातु में प्रयुक्त होती है जो बन्दूक की गोली, कवच या खोल तथा हल्के फ्लिण्ट के उत्पादन के लिए उपयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 8.28
आन्तरिक संक्रमण तत्व क्या हैं? बताइए कि निम्नलिखित में कौन-से परमाणु क्रमांक आन्तरिक संक्रमण तत्वों के हैं:
29, 59, 74, 95, 102, 104
उत्तर:
ऐसे तत्व जिनमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन -उपकोश में प्रवेश करता है f – ब्लॉक तत्व या आन्तरिक संक्रमण तत्व कहलाते हैं। ये दो श्रेणियाँ हैं – लैन्थेनाइड (58 – 71) तथा ऐक्टिनाइड (90 – 103) होते हैं। अत: परमाणु क्रमांक 59, 95 तथा 102 वाले तत्व आन्तरिक संक्रमण तत्व हैं।

प्रश्न 8.29
ऐक्टिनाइड तत्वों का रसायन उतना नियमित नहीं है जितना कि लैन्थेनाइड तत्वों का रसायन। इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इस कथन का आधार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
सभी ऐक्टिनाइड रेडियोऐक्टिव हैं। यद्यपि प्राकृतिक रूप से उपस्थित तत्व तथा श्रेणी के पूर्व सदस्यों के अर्द्ध-आयुकाल अधिक हैं, परन्तु मानवनिर्मित तत्वों की अर्द्ध-आयु कई दिनों से लेकर 3 मिनट [लॉरेन्शियम (Z = 103) के लिए] तक है। यह उच्च रेडियोऐक्टिवता इनके अध्ययन में कठिनाई उत्पन्न करती है।

इसके अतिरिक्त ऐक्टिनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ विस्तृत परास में होती हैं जिसके कारण इनका रसायन नियमित नहीं होता है। ऐक्टिनाइड सामान्यतया +3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं। श्रेणी के प्रारम्भिक अर्द्ध-भाग वाले तत्व सामान्यतया उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरणार्थ: उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था Th में +4 है, Pa, U तथा Np में क्रमश: +5, +6 तथा +7 तक पहुँच जाती है, परन्तु बाद के तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ घटती हैं। प्रारम्भ तथा बाद वाले ऐक्टिनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं के वितरण में इतनी अधिक अनियमितता तथा विभिनन्नता पाई जाती है कि ऑक्सीकरण अवस्थाओं के सन्दर्भ में इन तत्वों के रसायन की समीक्षा करना सन्तोषजनक नहीं है।

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प्रश्न 8.30
ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्व कौन-सा है? इस तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्व की सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्थाओं पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्व लॉरेन्शियम (Z = 103) है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित है:
Lr (Z = 103) = [Rn]86 5f14 6d1 7s2
Lr की सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।

प्रश्न 8.31
हुण्ड-नियम के आधार पर Ce3+ आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को व्युत्पन्न कीजिए तथा ‘प्रचक्रण मात्र’ सूत्र के आधार पर इसके चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
गणना:
58 Ce = [Xe]54 4f1 5d1 6s2
∴ Ce3+ = [Xe]54 4f1
∴ Ce3+ का चुम्बकीय आघूर्ण (µ)
= \(\sqrt{n(n+2)}\)
= \(\sqrt{1(1+2)}\) (∵n = 1)
= \(\sqrt{3}\) = 1.73 B.M

प्रश्न 8.32
लैन्थेनाइड श्रेणी के उन सभी तत्वों का उल्लेख कीजिए जो +4 तथा जो +2 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाते हैं। इस प्रकार के व्यवहार तथा उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
लैन्थेनाइड श्रेणी के +4 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाने वाले तत्व 58Ce, 59Pr. 60Nd, 65Tb, 66Dy हैं। लैन्थेनाइड श्रेणी के +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाने वाले तत्व 60Nd, 62Sm, 63Eu, 69Tm, 70 Yb हैं। +2 ऑक्सीकरण अवस्था तब प्रदर्शित की जाती है, जबकि लैन्थेनाइडों का विन्यास 5d0 6s2 होता है जिसमें 2 इलेक्ट्रॉन सरलतापूर्वक निकल सकें। +4 ऑक्सीकरण अवस्था तब प्रदर्शित की जाती है, जबकि लैन्थेनाइडों का शेष विन्यास 4f0 (जैसे – 4f0, 4f1, 4f2) या 4f7 (जैसे – 4f7 या 458) पर समाप्त हो।

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प्रश्न 8.33
निम्नलिखित के सन्दर्भ में ऐक्टिनाइड श्रेणी के तत्वों तथा लैन्थेनाइड श्रेणी के तत्वों के रसायन की तुलना कीजिए –

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
  2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
  3. रासायनिक अभिक्रियाशीलता।

उत्तर:
अभ्यास प्रश्न संख्या 20 का उत्तर देखिए।

प्रश्न 8.34
61, 91, 101 तथा 109 परमाणु क्रमांक वाले तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 11

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प्रश्न 8.35
प्रथम श्रेणी के संक्रमण तत्वों के अभिलक्षणों की द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के वर्गों के तत्वों से क्षैतिज वर्गों में तुलना कीजिए। निम्नलिखित बिन्दुओं पर विशेष महत्व दीजिए:

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
  2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
  3. आयनन एन्थैल्पी
  4. परमाण्वीय आकार।

उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]86 5f1-14 6d0-1 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।

2. ऑक्सीकरण अवस्था:
लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+ 2, +3, +4) प्रदर्शित करते हैं जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। ऐक्टिनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं; क्योंकि 5f, 6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।

3. आयनन एन्थैल्पी (Ionization Enthalpy):
प्रत्येक श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर प्रथम आयनन एन्थैल्पी सामान्यतया धीरे-धीरे बढ़ती है, यद्यपि प्रत्येक श्रेणी में कुछ अपवाद भी प्रेक्षित होते हैं। समान क्षैतिज वर्ग में 3d श्रेणी के तत्वों की तुलना में 4d श्रेणी के कुछ तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी उच्च तथा कुछ तत्वों की कम होती है, यद्यपि 5d श्रेणी की प्रथम आयनन एन्थैल्पी 3d तथा 4d श्रेणियों की तुलना में उच्च होती है। इसका कारण 5d श्रेणी में 4f इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकर का दुर्बल परिरक्षण प्रभाव है।

4. परमाण्वीय एवं आयनिक आकार:
लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड दोनों +3 ऑक्सीकरण अवस्था में अपने परमाणुओं अथवा आयनों के आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं। लैन्थेनाइडों में यह कमी लैन्थेनाइड आकुंचन कहलाती है, जबकि ऐक्टिनाइडों में यह ऐक्टिनाइड आकुंचन प्रभाव के कारण आकुंचन उत्तरोत्तर बढ़ता है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 8.36
निम्नलिखित आयनों में प्रत्येक के लिए 3d इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए:
Ti2+, V2+, Cr3+, Mn2+, Fe2+, Fe3+, CO2+, Ni2+, Cu2+ आप इन जलयोजित आयनों (अष्टफलकीय) में पाँच 3d कक्षकों को किस प्रकार अधिगृहीत करेंगे? दर्शाइए।
उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 12

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प्रश्न 8.37
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व भारी संक्रमण तत्वों के अनेक गुणों से भिन्नता प्रदर्शित करते हैं। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व भारी संक्रमण तत्वों के गुणों से भिन्नता निम्न प्रकार दर्शाते हैं –

  1. भारी संक्रमण तत्वों (4d तथा 5d श्रेणियाँ) की परमाणु त्रिज्याएँ प्रथम संक्रमण श्रेणी (3d) के सम्बन्धित तत्वों से अधिक होती हैं, यद्यपि 4d तथा 5d श्रेणियों की परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान होती हैं।
  2. 5d श्रेणी की आयनन एन्थैल्पियाँ 3d तथा 4d श्रेणियों के सम्बन्धित तत्वों से उच्च होती है।
  3. 4d तथा 5d श्रेणियों की कणन एन्थैल्पियाँ प्रथम श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों से उच्च होती हैं।
  4. भारी संक्रमण तत्वों के गलनांक तथा क्वथनांक प्रथम संक्रमण श्रेणी की तुलना में अधिक होते हैं क्योंकि इनमें प्रबल अन्तराधात्विक बन्धों की उपस्थिति है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 8.38
निम्नलिखित संकुल स्पीशीज़ के चुम्बकीय आघूर्णों के मान से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे?
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 13
उत्तर:
चुम्बकीय आघूर्ण (µ) = \(\sqrt{n(n + 2)}\) B.M.
जहाँ n = अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
n = 1 के लिए = µ = \(\sqrt{1(1+2)}\) = \(\sqrt{3}\) = 1.73 B.M.
n = 2 के लिए = µ = \(\sqrt{2(2+2)}\) = \(\sqrt{8}\) = 2.83 B.M.
n = 3 के लिए = µ = \(\sqrt{3(3+2)}\) = \(\sqrt{15)}\) = 3.87 B.M.
n = 4 के लिए µ = \(\sqrt{4(4+2)}\) = \(\sqrt{24}\) = 4.9 B.M.
n = 5 के लिए µ = (\(\sqrt{5(5+2)}\)) = \(\sqrt{35)}\) = 5.92 B.M.

K4Mn(CN)6:
यहाँ की Mn की ऑक्सीकरण +2 है। अत: Mn, M2+ अवस्था में है।
µ = 2.2 B.M.से यह पता चलता कि इसमें एक युगलित इलेक्ट्रॉन है, अतः जब CN लिगेण्ड Mn2+ से जुड़ता है। तो 3d – कक्षकों के इलेक्ट्रॉन युगलित होकर उपलब्ध 6 रिक्त कक्षक बनाते हैं जिसमें d2sp3 संकरण प्रयुक्त होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 14
अतः यह अल्प प्रचक्रण संकुल है जिसमें एक अयुगलित इलेक्ट्रॉन है।

[Fe(H2O)6]2+:
यहाँ Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है जिस का रूप Fe2+ है।
5.3 B.M. यह दर्शाता है कि संकुल में चार अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं। इससे तात्पर्य है कि Fe2+ आयन में इलेक्ट्रॉन युगलित नहीं होते हैं जब छ: H2O अणु इससे जुड़ते हैं। अत: H2O एक दुर्बल लिगेण्ड है। इन छ: H2O अणुओं द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉनों को समायोजित करने के लिए संकुल sp3d2 संकरण वाला होगा।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 15

K2[MnCl4]:
यहाँ Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है जिस का रूप Mn2+ है। 5.9 B.M. से यह दर्शाता है कि इसमें 5 अयुगलित इलेक्ट्रॉन हैं। अत: यह संकरण sp3 है और संकुल चतुष्फकीय प्रकृति का है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 8 d एवं f-ब्लॉक के तत्त्व img 16

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व

Bihar Board Class 12 Chemistry p-ब्लॉक के तत्त्व Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1
P, As, Sb तथा Bi ट्राइहैलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सह-संयोजी क्यों होते हैं?
उत्तर:
चूँकि पेन्टाहैलाइडों में केन्द्रीय परमाणु +5 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है, जबकि ट्राइहैलाइडों में यह +3 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है; अत: ट्राइहैलाइडों से पेन्टहैलाइड अधिक सहसंयोजी होते हैं।

प्रश्न 7.2
वर्ग 15 के तत्त्वों के हाइड्राइडों में BiHg सबसे प्रबल अपचायक क्यों है?
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्त्वों के हाइड्राइडों में BiH3 के प्रबल अपचायक है क्योंकि इस वर्ग के हाइड्राइडों में BiH3 सबसे कम स्थायी होता है।

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प्रश्न 7.3
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील क्यों है?
उत्तर:
चूँकि प्रबल pπ – pπ अतिव्यापन के फलस्वरूप बनता है, अत: N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील है।

प्रश्न 7.4
अमोनिया की लब्धि को बढ़ाने के लिए आवश्यक स्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इसकी लब्धि बढ़ाने के लिए, ला-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार, आवश्यक स्थितियाँ निम्न प्रकार हैं –

  1. तापमान = 700 K,
  2. 200 × 105 Pa (लगभग 200 वायुमण्डलीय उच्च दाब)
  3. K2O तथा Al2O3 मिश्रित आयरन ऑक्साइड उत्प्रेरक हैं।

प्रश्न 7.5
Cu2+ विलयन के साथ अमोनिया कैसे क्रिया करती है?
उत्तर:
Cu2+ आयन अमोनिया से क्रिया करके गहरे नीले रंग का संकुचन बनाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 1

प्रश्न 7.6
N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता क्या है?
उत्तर:
N2O5 में, प्रत्येक नाइट्रोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के चार सहभाजित युग्म हैं जैसा कि निम्न चित्र में दर्शाया गया हैं:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 2
अत: N2O5 में N की संयोजकता 4 है।

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प्रश्न 7.7
PH3 से PH+4 का आबन्ध कोण अधिक है। क्यों?
उत्तर:
PH3 से आबन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म तथा P – H बन्ध युग्म के बीच प्रतिकर्षण बल के कारण H – P – H कोण कम हो जाता है जबकि PH+4 में आबन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म H+ के साथ बन्ध बनाने में भाग लेता है। इस के कारण चारों P – H बन्ध तुल्य हो जाते हैं। चूँकि PH+4 अणुओं में sp3 संकरित हैं, अतः इसकी आकृति चतुष्फलकीय होती है तथा H – P – H कोण 1099.5° होता है, अत: PH3 से PH+4 का आबन्ध कोण अधिक होता है।

प्रश्न 7.8
क्या होता है जब श्वेत फॉस्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करते हैं?
उत्तर:
श्वेत फॉस्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर फॉस्फीन बनती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 3

प्रश्न 7.9
क्या होता है जब PCl5 को गर्म करते हैं?
उत्तर:
गर्म करने पर यह ऊर्ध्वपातित होता है परन्तु अधिक गर्म करने पर वियोजित हो फॉस्फोरस ट्राइ क्लोराइड तथा क्लोरीन बनाते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 4

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प्रश्न 7.10
PCl5 की भारी पानी में जल अपघटन अभिक्रिया का संतुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
फॉस्फोरस ऑक्सी-क्लोराइड तथा ड्यूटेरियम क्लोराइड बनते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 5

प्रश्न 7.11
H3PO4 की क्षारकता क्या है?
उत्तर:
चूंकि H3PO4 अणु में तीन -OH समूह उपस्थित होते हैं, अत: इसकी क्षारकता 3 है।

प्रश्न 7.12
क्या होता है जब H3PO4 को गर्म करते हैं।
उत्तर:
H3PO4 के गर्म करने पर असमानुपातित होकर फॉस्फोरिक अम्ल तथा फॉस्फीन बनते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 6

प्रश्न 7.13
सल्फर के महत्त्वपूर्ण स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त अवस्था में सल्फर निम्नलिखित में मिलती हैं –

1. सल्फाइड, जैसे:
जिंक ब्लैंड (ZnS), गैलेना (PbS), कॉपर पाइराइटीज (CuFeS2)

2. सल्फेट, जैसे:
जिप्सम (CaSO4.2H2O), बेराइटस (BaSO4) तथा एप्सम लवण (MgSO4.7H2O)

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प्रश्न 7.14
वर्ग 16 तत्त्वों के हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व का क्रम लिखिए।
उत्तर:
चूँकि तत्त्वों के आकार वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं, अत: E – H बन्ध वियोजन ऊर्जा घटती है और यह बन्ध सरलता से टूट जाते हैं। अतः वर्ग 16 तत्त्वों के हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। अतः हाइड्राइडों के तापीय स्थायित्व का क्रम निम्न प्रकार है –
H2O > H2S > H2Se > H2 Te > H2Po

प्रश्न 7.15
H2O द्रव तथा H2S गैस है क्यों?
उत्तर:
H2O अणुओं के मध्य अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध होने के कारण उन का संगुणन हो जाता है, अत: H2O द्रव है जबकि H2S के अणुओं के मध्य अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध नहीं बनता। अतः इनका संगुणन नहीं होता और H2S गैस है।

प्रश्न 7.16
निम्न में से कौन-सा तत्त्व ऑक्सीजन के साथ सीधा अभिक्रिया नहीं करता?
Zn, Ti, Pt, Fe
उत्तर:
चूँकि प्लेटिनम एक उत्कृष्ट धातु है; अत: यह ऑक्सीजन से सीधे से संयोग नहीं करती है। दूसरी ओर, Zn, Ti तथा Fe सक्रिय धातुएँ हैं अतः ये ऑक्सीजन से सीधे संयोग करके अपने-अपने ऑक्साइड बनाती हैं।

प्रश्न 7.17
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए।

  1. C2H4 + O2
  2. 4Al + 3O2

उत्तर:
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 7

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प्रश्न 7.18
O3 एक प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्यों क्रिया करती है?
उत्तर:
चूँकि O3 नवजात ऑक्सीजन देता है, अतः यह प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्रिया करती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 8

प्रश्न 7.19
O3 का मात्रात्मक आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर:
जब ओजोन पोटैशियम आयोडाइड के आधिक्य से जिसे बोरेट बफर (pH 9.2) के साथ बफरीकृत करने पर अभिक्रिया करती है तो आयोडीन उत्पन्न होती है। इसे सोडियम थायोसल्फेट के मानक विलयन के साथ अनुमापित करते हैं। इस प्रकार O3 का मात्रात्मक आकलन किया जाता है।

प्रश्न 7.20
तब क्या होता है जब सल्फर डाइआक्साइड को Fe(III) लवण के जलीय विलयन में प्रवाहित करते हैं?
उत्तर:
चूँकि SO2 अपचायक की भाँति कार्य करती है, अतः यह आयन (III) लवण को आयरन (II) में अपचयित कर देती है।
2Fe3 + SO2 + 2H2O → 2Fe2+ + SO42- + 4H+

प्रश्न 7.21
S – O आबन्धों की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए जो SO2 अणु बनाते हैं। क्या SO2 अणु के ये दोनों S – O आबन्ध समतुल्य हैं?
उत्तर:
चूँकि SO2 में बनने वाली S – O आबन्ध सहसंयोजक हैं; अतः अनुनादी संरचनाओं के कारण ये दोनों समान रूप से प्रबल हैं।

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प्रश्न 7.22
SO2 की उपस्थिति का पता कैसे लगाया जाता है?
उत्तर:
SO2 की उपस्थिति निम्न दो परीक्षणों से की जाती
1. यह गुलाबी-बैंगनी रंग के अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट (VII) विलयन को MnO4 के Mn2+ आयन में अपचयन के कारण रंगहीन कर देती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 9

2. यह अम्लीय K2Cr2O7 को \(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) के Cr3+ आयनों में अपचयन से हरा कर देती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 10

प्रश्न 7.23
उन तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें H2SO4 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर:

  1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में
  2. पेट्रोलियम के शोधन में।
  3. अपमार्जक उद्योग में।

प्रश्न 7.24
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को लिखिए।
उत्तर:
H2SO4 के उत्पादन में SO2 का O2 के साथ उत्पादन V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त होती है।
2SO2 (g) + O2 (g) ⇄ 2SO3 (g); ∆fH = -19.6 kJ mol-1 यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्पक्रमणीय है। अग्रगामी अभिक्रिया में आयतन में कमी आती है। अतः ताप तथा उच्च दाब मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। परन्तु ताप अत्यधिक कम नहीं होना चाहिए अन्यथा अभिक्रिया की दर कम हो जाएगी।

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प्रश्न 7.25
जल में H2SO4 के लिए \(K_{a_{2}}<<K_{a_{1}}\) क्यों है?
उत्तर:
H2SO4 एक द्विक्षारकीय अम्ल है, यह दो पदों में आयनित होता है, इसलिए इसके दो वियोजन स्थिरांक होते हैं।

  1. H2SO4 (aq) + H2O → H3O+ (aq) + HSO4 (aq); Ka1 >10
  2. HSO4 (aq) + H2O (l) → H3O+ (aq) + SO42- (aq); Ka2 = 1.2 × 10-2

Ka1 (>10) के अधिक मान से तात्पर्य यह है कि H2SO4 H3O+ तथा HSO4 में अधिक वियोजित होता है। मुख्यत: H3O+ और HSO4 में प्रथम आयनन के कारण H2SO4 जल में प्रबल अम्ल है। HSO4 का H3O+ तथा SO42- आयनन नगण्य है; अत: Ka2 << Ka1

प्रश्न 7.26
आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी जैसे प्राचलों को महत्त्व देते हुए F2 तथा Cl2 की आक्सीकारक क्षमता की तुलना कीजिए।
उत्तर:
आक्सीकारक क्षमता F2 से Cl2 तक घटती है। जलयी विलयन में हैलोजनों की आक्सीकारक क्षमता वर्ग में नीचे की ओर घटती है (F से Cl तक)। फ्लु ओरीन का इलेक्ट्रोड विभव (+ 2.87 V) क्लोरीन = 1.36 V) की तुलना में उच्च होता है, इसलिए F2 क्लोरीन की तुलना में प्रबल आक्सीकारक है। अब इलेक्ट्रोड विभव निम्नलिखित प्राचलों पर निर्भर करता है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 11
फ्लु ओरीन 158.8 kJ mol-1 -333 kJ mol-1 515 kJmol-1
क्लोरीन 242.6 kJ mol-1 – 349 kJ mol-1 381 kJmol-1
अतः F2 प्रबल ऑक्सीकारक है।

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प्रश्न 7.27
दो उदाहरणों द्वारा फ्लु ओरीन के असामान्य व्यवहार को दर्शाइए।
उत्तर:
फ्लु ओरीन का असामान्य व्यवहार:
लघु आकार, उच्च विद्युत ऋणात्मकता, निम्न F – F आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी तथा इसके संयोजी कोश में d – कक्षकों की अनुपलब्धता के कारण होता है।
उदाहरण:

  1. यह एक ऑक्सीअम्ल बनती है जबकि दूसरे हैलोजेन कई में ऑक्सो-अम्लों का निर्माण करते हैं।
  2. हाइड्रोजन फ्लुओराइड प्रबल हाइड्रोजन बन्धों के कारण द्रव होता है जबकि अन्य हाइड्रोजन हैलाइड गैसीय होते हैं।

प्रश्न 7.28
समुद्र कुछ हैलोजनों का मुख्य स्रोत है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
समुद्री जल में मैग्नीशियम, कैल्शियम, सोडियम तथा पोटैशियम के क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड होते हैं। जिनमें सोडियम क्लोराइड (द्रव्यमान अनुसार 2.5%) हैं। समुद्री निक्षेपों में सोडियम क्लोराइड तथा कार्नेलाइट KCI.MgCl2.6H2O प्रमुख हैं। कुछ समुद्री जीवों के तन्त्र में आयोडीन होती है। कुछ समुद्री पादपों में 0.5% आयोडीन तथा चिली साल्टपीटर 0.2% सोडियम आयोडेट होता है।

प्रश्न 7.29
Cl2 की विरंजक क्रिया का कारण बताइए।
उत्तर:
Cl2 की विरंजक क्रिया आक्सीकरण के कारण होती है। नमी या जलीय विलयन की उपस्थिति Cl2 नवजात आक्सीजन देती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 12
यह नवजात आक्सीजन नमी की उपस्थिति में वनस्पतियों अथवा कार्बनिक यौगिक का विरंजन करती है। Cl2 की विरंजन क्रिया स्थाई होती है।

प्रश्न 7.30
उन दो विषैली गैसों के नाम बताइए जो क्लोरीन गैस से बनाई जाती है।
उत्तर:
फॉस्जीन (COCl2) तथा मस्टर्ड गैस (ClCH2SCH2CH2Cl)।

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प्रश्न 7.31
I2 से ICI अधिक क्रियाशील क्यों हैं?
उत्तर:
चूँकि I – I आबन्ध से I – Cl आबन्ध दुर्बल होता है। ICl सरलता से टूटकर हैलोजेन परमाणु बनाता है जो तीव्रता से अभिक्रिया करते हैं। अतः I से ICl अधिक क्रियाशील होता है।

प्रश्न 7.32
हीलियम को गोताखोरी के उपकरणों में उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
आधुनिक गोताखोरी के उपकरणों में हीलियम आक्सीजन के तनुकारी के रूप में प्रयुक्त होता है, क्योंकि रक्त में इसकी विलेयता बहुत कम है।

प्रश्न 7.33
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिए:
XeF6 + H2O → XeO2F2 + HF
उत्तर:
XeF6 + 2H2O → XeO2F2 + 4HF

प्रश्न 7.34
रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन क्यों था?
उत्तर:
चूँकि रेडॉन अत्यन्त कम अर्द्धआयु वाला रेडियोएक्टिव तत्त्व है; अत: रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन था।

Bihar Board Class 12 Chemistry p-ब्लॉक के तत्त्व Additional Important Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1
वर्ग 15 के तत्त्वों के सामान्य गुणधर्मों की उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था, परमाण्विक आकार, आयनन एन्थैल्पी तथा विद्युत – ऋणात्मकता के सन्दर्भ में विवचेना कीजिए।
उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-इन तत्त्वों के संयोजी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2, np3 होता है। इनमें s – कक्षक पूर्णतया भरे हुए तथा p – कक्षक अर्द्धपूरित होते हैं, जो इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को अधिक स्थायी बनाते हैं।

2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ-इन तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ -3, +3 तथा +5 हैं। तत्वों द्वारा -3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार तथा धात्विक गुण बढ़ने के कारण घटती है। वस्तुतः अन्तिम तत्व बिस्मथ कठिनता से -3 ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक बनाता है।

ऑक्सीकरण अवस्था +5 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। इस अवस्था में केवल Bi(V) का यौगिक BiF5 ज्ञात है। ऑक्सीकरण अवस्था +5 तथा ऑक्सीकरण अवस्था +3 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर क्रमशः घटता तथा बढ़ता है (अक्रिय युग्म प्रभाव)। नाइट्रोजन ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +1, +2 +4 प्रदर्शित करता है, जबकि यह ऑक्सीजन के साथ अभिकृत होता है। फॉस्फोरस कुछ ऑक्सोअम्लों में +1 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है।

3. परमाणु आकार-समूह में नीचे जाने पर सहसंयोजी तथा आयनिक त्रिज्याएँ बढ़ती हैं। N से P तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में पर्याप्त वृद्धि होती है, जबकि As से Bi तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में सूक्ष्म वृद्धि प्रेक्षित होती है। यह भारी सदस्यों में पूर्णतया भरे हुए d तथा f – कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है।

4. आयनन एन्थैल्पी-वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी में परमाणु आकार में क्रमिक वृद्धि के कारण कमी आती है। इस प्रकार अधिक स्थायी अर्द्धपूरित p – कक्षक के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा छोटे आकार के कारण वर्ग 15 के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग 14 के तत्वों से सम्बन्धित आवों में अधिक होते हैं। आयनन एन्थैल्पी का उत्तरोत्तर बढ़ता क्रम निम्नवत् है:
iH1 < ∆iH2 < ∆iH3

5. विद्युतऋणात्मकता-किसी समूह में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के साथ विद्युतऋणात्मकता सामान्यतः घटती है। यद्यपि भारी तत्वों में इस प्रकार का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।

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प्रश्न 7.2
नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न क्यों है?
उत्तर:
नाइट्रोजन अणु द्विपरमाणुक होता है, जिसमें नाइट्रोजन परमाणु त्रिबन्ध द्वारा (N = N) जुड़े रहते हैं। इनकी बन्ध वियोजन ऊर्जा अत्यधिक (941.4 kJ mol-1) होती है। अत: नाइट्रोजन तात्विक अवस्था में अक्रिय अथवा अक्रियाशील होता है। दूसरी ओर श्वेत अथवा पीला फॉस्फोरस चतुःपरमाण्विक अणु (P4) के रूप में पाया जाता है। चूंकि N = N त्रिबन्ध (941.4 kJ mol-1) से एकल P – P बन्ध (213 kJ mol-1) अत्यधिक दुर्बल होता है, इसलिए फॉस्फोरस नाइट्रोजन से बहुत अधिक क्रियाशील होता है।

प्रश्न 7.3
वर्ग 15 के तत्वों की रासायनिक क्रियाशीलता की प्रवृत्ति की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
(i) हाइड्राइड (Hydrides):
वर्ग 15 के सभी तत्व MH3 तथा M2H4 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं।
(M = N, P, As, Sb, Bi)।

(क) क्षारीय गुण:
हाइड्राइडों के क्षारीय गुण उनके आकार बढ़ने अर्थात् इलेक्ट्रॉन घनत्व घटने के साथ घटते हैं। इनकी क्षारीय सामर्थ्य के घटने का क्रम निम्नवत् है।
NH3 > PH3 > ASH3 > SbH3 > BiH3

(ख) ऊष्मीय स्थायित्व:
हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व NH3 से BiH3 तक घटता है; क्योंकि परमाणु आकार बढ़ता है जिससे बन्ध लम्बाई (MH) बढ़ती है।

(ग) अपचायक गुण:
हाइड्राइडों का अपचायक प्रवृत्ति NH3 से BiH3 तक बढ़ती है। अत: NH3 सबसे कमजोर अपचायक है जब BiH3 सबसे प्रबल अपचायक है।

(घ) क्वथनांक:
वर्ग में नीचे जाने पर हाइड्राइडों के क्वथनांक बढ़ते हैं। NH3 का क्वथनांक हाइड्रोजन आबन्ध के कारण PH3 से अधिक होता है। क्वथनांक PH3 से आगे जाने पर बढ़ते हैं; क्योंकि आण्क्कि द्रव्यमान बढ़ने के कारण वाण्डर-वाल्स बलों में वृद्धि होती है।

(ii) हैलोजन के प्रति क्रियाशीलता:
ये तत्व ट्राइहैलाइड तथा पेंटा हैलाइड बनाते हैं।

(क) ट्राइहैलाइड:
ये सभी प्रकार के हैलोजेनों से सीधे संयोग करके MX3 प्रकार के ट्राइहैलाइड बनाते हैं। NHr3 तथा NI3 को छोड़कर सभी ट्राइहैलाइड स्थायी तथा पिरैमिडी संरचना के होते हैं। BiF3 के अतिरिक्त सभी ट्राइहैलाइड सहसंयोजी प्रकृति के होते हैं। ट्राइहैलाइडों की सहसंयोजी प्रकृति तत्व के आकार के बढ़ने पर घटती है।
NI3 > PF3 > AsF3 > SbF3 > BiF3
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 13

(ख) फॉस्फोरस के ऑक्साइड:
फॉस्फोरस के दो महत्त्वपूर्ण ऑक्साइड P4O10 (P3O3 का द्विलक) तथा (P4O10 (P2O5 का द्विलक) हैं।

(ग) अन्य तत्वों के ऑक्साइड:
अन्य तत्वों के ऑक्साइड AS4O6, AS2O5, Sb4O6, Sb2O5, Bi2O3 तथा Bi2O5 हैं।
N, P तथा As के ट्राइऑक्साइड अम्लीय होते हैं। Sb का ऑक्साइड उभयधर्मी होता है, जबकि Bi का ऑक्साइड क्षारीय होता है। सभी पेन्टाऑक्साइड अम्लीय होते हैं।

(iv) ऑक्सी – अम्ल (Oxy-acids):
Br को छोड़कर अन्य सभी तत्व ऑक्सी-अम्ल (जैसे – HNO3, H3PO4, H3ASO4 तथा S3SbO4) का निर्माण करते हैं। ऑक्सी-अम्लों की सामर्थ्य तथा स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है।
HNO3 > H3PO4 > H3ASO4 > H3SbO4

(ख) पेन्टा हैलाइड:
P, As तथा Sb सूत्र MX5 के पेन्टाहैलाइड बनाते हैं। नाइट्रोजन के संयोजकता कोश में d कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण यह पेंटा हैलाइड नहीं बनता है। पेंटा हैलाइड ट्राइहैलाइडों की अपेक्षा अधिक सहसंयोजी होते हैं। Bi अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण पेंटा हैलाइड नहीं बनाता है। पेंटा हैलाइडों में sps – संकरण होता है और इन की संरचना त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी होती है।

(iii) ऑक्साइड:
ये ऑक्सीजन से संयुक्त होकर विभिन्न प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं।

(क) नाइट्रोजन के ऑक्साइड:
नाइट्रोजन विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के अनेक ऑक्साइड बनाती है। इन का संक्षिप्त वर्णन निम्न तालिका में दिया गया है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 7.4
NH3 हाइड्रोजन बन्ध बनाती है परन्तु PH3 नहीं बनाती क्यों?
उत्तर:
चूँकि नाइट्रोजन की विद्युतऋणात्मकता (3.0) हाइड्रोजन (2.1) से अधिक होती है तथा NH ध्रुवीय होता है। अत: NH3 में अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्ध होते हैं। चूँकि P तथा दोनों की विद्युतऋणात्मकता 2.1 होती है तथा P – H बन्ध ध्रुवीय नहीं होता; अत: PH3 में हाइड्रोजन बन्ध नहीं होता है।

प्रश्न 7.5
प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं? सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर:
प्रयोगशाला में डाइनाइट्रोजन बनाने के लिए अमोनियम क्लोराइड के जलीय विलयन की सोडियम नाइट्राइट के साथ अभिक्रिया कराई जाती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 14

प्रश्न 7.6
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है?
उत्तर:
अमोनिया को औद्योगिक उत्पादन हैबर प्रक्रम द्वारा किया जाता है।
N2 (g) + 3H2 (g) = 2NH3 (g) ∆fHΘ = -46.1 kJ mol-1
शुष्क नाइट्रोजन 1 : 3 से लेकर उच्च दाब (200 से 300 वायुमण्डल) तथा ताप (723 K2O से 773 K) पर K2O, Al2O3 मिश्रित आयरन ऑक्साइड उत्प्रेरक पर प्रवाहित करने पर NH3 प्राप्त होती है।

प्रश्न 7.7
उदाहरण देकर समझाइए कि कॉपर धातु HNO3 के साथ अभिक्रिया करके किस प्रकार भिन्न उत्पाद दे सकती है?
उत्तर:
1. तनु HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 15

2. सान्द्र HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड बनाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 16

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 7.8
NO2 तथा N2O5 की अनुनादी संरचनाओं को लिखिए।
उत्तर:
1. NO2 की अनुनादी संरचनाएँ –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 17
X = नाइट्रोजन का अप्रयुक्त इलेक्ट्रान

2. N2O5 की अनुनादी संरचनाएँ –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 18

प्रश्न 7.9
HNH कोण का मान, HPH, HASH तथा HSbH कोणों की अपेक्षा अधिक क्यों हैं?
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्त्वों के सभी हाइड्राइडों में, केन्द्रीय परमाणु sp3 – संकरित होता है। चार sp3 संकरित कक्षकों में से तीन कक्षक तीन E – Hσ बन्ध बनाते हैं, जबकि चौथे कक्षक में इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म होता है।

चूँकि बन्ध युग्म-बन्ध युग्म प्रतिकर्षण से एकाकी युग्म-बन्ध युग्म प्रतिकर्षण अधिक होते हैं, इसलिए NH3 में, बन्ध कोण 109°28 से घटकर 107.8° रह जाता है। N से P तक, P से As तक तथा As से Sb तक जाने पर केन्द्रीय विद्युत-ऋणात्मकता घटती है। इससे बन्ध युग्मों के इलेक्ट्रॉन परस्पर तथा केन्द्रीय परमाणु से दूर हो जाते हैं। फलतः समीपवर्ती बन्ध युग्मों के मध्य प्रतिकर्षण बल घटता जाता है जिससे बन्ध कोण NH3 से SbH3 तक घटते जाते हैं। अतः HNH बन्ध कोण सबसे अधिक होता है।

प्रश्न 7.10.
R3P = 0 पाया जाता है जबकि R3N = 0 नहीं क्यों (R = ऐल्किल समूह)?
उत्तर:
नाइट्रोजन के बाह्य कोश में d – कक्षक नहीं होता है जिससे dπ – pπ बन्ध नहीं बन सकता है। और R3N = O नहीं बन पाता है। दूसरी ओर फास्फोरस के बाह्य कोश में d – कक्षों की उपस्थिति के कारण pπ – dπ बन्ध बनाता है। अतः फास्फोरस R3P = O यौगिक बनाता है।

प्रश्न 7.11
समझाइए कि क्यों NH3 क्षारकीय है जबकि BiH3 केवल दुर्बल क्षारक है?
उत्तर:
चूँकि नाइट्रोजन का परमाणु आकार सबसे छोटा होता है, इसलिए N – परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व Bi – परमाणु से बहुत अधिक होता है। फलस्वरूप NH3 में N की अपने इलेक्ट्रॉन-युग्म को दान देने की प्रवृत्ति BiH3 में Bi की तुलना में उच्च होती है। अत: NH3 क्षारकीय है जबकि BiH3 केवल दुर्बल क्षारक है।

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प्रश्न 7.12
नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है तथा फॉस्फोरस P4 के रूप में। क्यों?
उत्तर:
नाइट्रोजन का लघु आकार तथा उच्च विद्युत-ऋणात्मकता होती है और pπ – pπ बहुत बन्ध बनाता है। अतः यह द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है जिसमें दो N – परमाणुओं के मध्य त्रिबन्ध होता है। फॉस्फोरस का विशाल आकार तथा अल्प विद्युत-ऋणात्मकता होती है जिससे यह pπ – pπ बहुल बन्ध नहीं बनाता है। किन्तु p – p एकल बन्ध बनाता है। अतः यह चतुष्फलकीय P4 अणु के रूप में पाया जाता है।

प्रश्न 7.13
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।
उत्तर:
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताएँ निम्नलिखित हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 19

प्रश्न 7.14
फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन श्रृंखलन गुणों को कम प्रदर्शित करती है, क्यों?
उत्तर:
शृंखलन का गुण तत्व की बन्ध प्रबलता पर निर्भर करता है। चूँकि N – N बन्ध की प्रबलता (159 kJ mol-1), P – P बन्ध की प्रबलता (212 kJ mol-1) से कम होती है, इसलिए नाइट्रोजन फॉस्फोरस की तुलना में कम शृंखलन गुणों को दर्शाती है।

प्रश्न 7.15
H3PO3 की असमानुपातन अभिक्रिया दीजिए।
उत्तर:
H3PO4 को गर्म करने पर यह असमानुपातित होकर PH3, H3PO4 देता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 20

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प्रश्न 7.16
क्या PCl5 ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों कार्य कर सकता है? तर्क दीजिए।
उत्तर:
चूँकि फॉस्फोरस के संयोजी कोश में पाँच इलेक्ट्रॉन होते हैं; इसलिए यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को इलेक्ट्रॉन दान करके +5 से अधिक नहीं कर सकता है अतः PCl5 अपचायक का कार्य नहीं कर सकता। यद्यपि यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को +5 से +3 तक या इससे कम मान तक घटा सकता है इसलिए PCl5 ऑक्सीकारक का कार्य कर सकता है जिसमें आ० सं० घटती है। उदाहरण के लिए –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 21
चूँकि अभिक्रियाओं में, P की ऑक्सीकरण संख्या +5 से +3 तक घटती है तथा Ag की ऑक्सीकरण संख्या 0 से +1 तक बढ़ती है तथा Sn की 0 से +4 तक बढ़ती है। इसलिए PCl5 ऑक्सीकारक की भाँति भी कार्य कर सकता है।

प्रश्न 7.17
O, S, Se, Te तथा PO को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ऑक्सीकरण अथवा तथा हाइड्राइड निर्माण के सन्दर्भ में आवर्त सारणी के एक ही वर्ग में रखने का तर्क दीजिए।
उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
इन सभी तत्त्वों के बाहरी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं जिनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np4 होता है।
8O = [He] 2s2 2p4
16S = [Ne] 3s2 3p4
34 Se = [Ar] 3d10 4s2 4p4
52Te = [Kr] 4d105d10 6s2 6p4
84Po =[Xe] 4f14 5d10 6s2 6p4

2. आक्सीकरण अवस्था:
इन्हें समीपवर्ती अक्रिय गैस विन्यास प्राप्त करने के लिए अर्थात् द्विऋणात्मक आयन बनाने के लिए दो अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए इन तत्वों की न्यूनतम आक्सीकरण अवस्था -2 होनी चाहिए। आक्सीजन विशिष्ट रूप से तथा सल्फर कुछ मात्रा में विद्युतऋणात्मक होने के कारण -2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।

इस वर्ग के अन्य तत्व, O तथा S से अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण ऋणात्मक आक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करते हैं। चूँकि इन तत्वों के संयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए ये तत्व अधिकतम +6 आक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित कर सकते हैं।

इन तत्वों द्वारा प्रदर्शित अन्य धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +2 तथा +4 हैं। यद्यपि ऑक्सीजन d – कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण +4 तथा +6 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित नहीं करता; अतः न्यूनतम तथा अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इन तत्वों की समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायोचित है।

3. हाइड्राइडों का निर्माण:
सभी तत्व अपने संयोजी इलेक्ट्रॉनों में दो इलेक्ट्रॉनों की हाइड्रोजन के 1s – कक्षक के साथ सहभागिता करके अपने-अपने अष्टक पूर्ण कर लेते हैं तथा सामान्य सूत्र EH2 के हाइड्राइड बनाते हैं; जैसे – H2O, H2S, H2Se, H2Te तथा H2Po, अतः इन तत्वों को समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायसंगत है।

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प्रश्न 7.18
क्यों डाइऑक्सीजन एक गैस है, जबकि सल्फर एक ठोस है?
उत्तर:
ऑक्सीजन pπ – pπ बहुल बन्ध बनाता है। छोटे आकार तथा उच्च विद्युतऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन द्विपरमाणुक अणु (O2) के रूप में पाया जाता है। ये अणु परस्पर दुर्बल वाण्डरवाल्स आकर्षण बलों द्वारा जुड़े रहते हैं जो कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा सरलता से हट जाते हैं। अतः O2 कमरे के ताप पर एक गैस होती है।

सल्फर अपने विशाल आकार तथा कम विद्युत ऋणात्मकता के कारण pπ – pπ बहुल बन्ध नहीं बनाता है। अपितु यह S – S एकल बन्ध बनाते हैं। पुन: O – O एकल बन्धों से अधिक प्रबल S – S बन्धों के कारण सल्फर में श्रृंखलन का गुण ऑक्सीजन से अधिक होता है।

अतः सल्फर श्रृंखलन की उच्च प्रवृत्ति तथा pπ – pπ बहुल बन्ध बनाने की अल्प प्रवृत्ति के कारण अष्टपरमाणुक अणु (S8) बनाता है, जिसकी संकुचित वलय संरचना (puckered ring structure) होती है। विशाल आकार के कारण S अणुओं को परस्पर बाँधे रखने वाले आकर्षण बल पर्याप्त प्रबल होते हैं जिन्हें कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा नहीं हटाया जा सकता है। अतः सल्फर कमरे के ताप पर एक ठोस होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 22

प्रश्न 7.19
यदि O → O तथा O → O2- के इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी मान पता हो, जो क्रमशः 141 तथा 702 kJ mol-1 हैं तो आप कैसे स्पष्ट कर सकते हैं कि O2- स्पीशीज वाले आक्साइड अधिक बनते हैं न कि O वाले?
उत्तर:
हम आक्सीजन की किसी द्विसंयोजी धातु के साथ अभिक्रिया पर विचार करते हैं। MO तथा M2O के निर्माण में निम्नलिखित पद सम्मिलित होते हैं –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 23
यद्यपि ∆iH1 की तुलना में ∆iH2 बहुत अधिक होती है तथा ∆eg H1 से ∆eg H2 अत्यन्त उच्च होती है, फिर भी उच्च आवेश के कारण M2O (s) की चालक ऊर्जा MO (s) से अधिक होती है। अत: ऊष्मीय रूप से MO का निर्माण M2O से अधिक अनुकूल होता है। इस कारण आक्सीजन O2+ स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनाता है न कि O वाले।

प्रश्न 7.20
कौन-से ऐरोसॉल्स ओजोन को कम करते हैं?
उत्तर:
ऐरोसॉल्स; जैसे- क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (CFCs) अर्थात् फ्रीआन Cl मुक्त मूलकों की आपूर्ति से ओजोन परत को अवक्षयित कर देते हैं। ये मुक्त मूलक O3 को O2 में परिवर्तित कर देते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 24

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प्रश्न 7.21
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 के उत्पादन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संस्पर्श द्वारा H2SO4 का उत्पादन (Production of H2SO4 by Contact Process):
सल्फ्यूरिक अम्ल का उत्पादन संस्पर्श प्रक्रम द्वारा तीन चरणों में सम्पन्न होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 25
चित्र – सल्फयूरिक अम्ल के उत्पादन का प्रवाह चित्र

  • सल्फर तथा सल्फाइड अयस्कों को वायु में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड का उत्पादन करना।
  • उत्प्रेरक (V2O5) की उपस्थिति में ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कराकर SO2 का SO3 में परिवर्तन करना।
  • SO3 को सल्फ्यूरिक अम्ल में अवशोषित करके ओलियम (H2S2O7) प्राप्त करना।

सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन का प्रवाह चित्र, चित्र में दिया गया है। प्राप्त सल्फरडाइऑक्साइड को धूल के कणों एवं आर्सेनिक यौगिकों जैसी अन्य अशुद्धियों से मुक्त कर शुद्ध कर लिया जाता हैं।

सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में आक्सीजन द्वारा SO2 गैस का V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरकी आक्सीकरण मूल पद है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 26

यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है एवं अग्र अभिक्रिया में आयतन में कमी आती है। अत: कम ताप और उच्च दाब उच्च लब्धि (yield) के लिए उपयुक्त स्थितियाँ हैं, परन्तु तापक्रम बहुत कम नहीं होना चाहिए अन्यथा अभिक्रिया की गति धीमी हो जाएगी। सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में प्रयुक्त संयन्त्र का संचालन 2 bar दाब तथा 720 K ताप पर किया जाता है।

उत्प्रेरकी परिवर्तक से प्राप्त SO3 गैस, सान्द्र सल्फूरिक अम्ल में अवशोषित होकर ओलियम (H2S2O7) देती है। जल द्वारा ओलियम का तनुकरण करके वांछित सान्द्रता वाला सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त कर लिया जाता है। प्रक्रम के सतत संचालन तथा लागत में भी कमी लाने के लिए उद्योग में उपर्युक्त दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ सम्पन्न की जाती हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 27
सम्पर्क विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल की शुद्धता सामान्यतः 96.98% होती है।

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प्रश्न 7.22
SO2 किस प्रकार से एक वायु प्रदूषक है?
उत्तरः
सल्फर डाइआक्साइड का प्रमुख प्रभाव श्वास-तन्त्र पर पड़ता है। इससे जलन उत्पन्न होती है तथा वायु-मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। प्राय: 5 ppm So, स्तर पर हमें जलन अनुभव होने लगती है। SO2 के कारण अत्यन्त विषम परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जबकि इसे धुएँ के साथ श्वसित कर लिया आता है।

SO2 पौधों के लिए भी हानिकारक है। SO2 गैस के अल्प स्तर (0.03 ppm) में रहने पर भी पत्तियों के ऊतक नष्ट हो जाते हैं तथा पत्तियों के किनारों को क्षति पहुँचाती है। SO2 के कारण अम्ल वर्षा होती है जो पौधों के साथ-साथ नदियों, तालाबों में रहने वाले जलचरों तथा इमारतों के लिए भी हानिकारक सिद्ध होती है।

प्रश्न 7.23
हैलोजन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं?
उत्तर:
चूँकि हैलोजनों में, अल्प बन्ध वियोजन एन्थैल्पी, उच्च विद्युतऋणात्मकता तथा अधिक ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी होती है जिससे इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अपचयित होने की प्रबल प्रवृत्ति होती है।
X + e → X
अत: हैलोजेन प्रबल ऑक्सीकरण कर्मक होते हैं।

प्रश्न 7.24
स्पष्ट कीजिए कि फ्लु ओरीन केवल एक ही ऑक्सोअम्ल, HOF क्यों बनाता है।
उत्तर:
उच्च विद्युत ऋणात्मक तथा छोटे आकार के कारण F2 एक हीऑक्सो अम्ल HOF बनाती है जो फ्लूओरिक अम्ल या हाइपो फ्लूओरस अम्ल कहलाता है।

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प्रश्न 7.25
व्याख्या कीजिए कि क्यों लगभग एक समान विद्युतऋणात्मकता होने के पश्चात् भी नाइट्रोजन हाइड्रोजन आबन्ध निर्मित करता है, जबकि क्लोरीन नहीं।
उत्तर:
चूँकि O तथा Cl की विद्युतऋणात्मकता समान है तथा इनके परमाणु आकार में बहुत अधिक अन्तर है। अतः ऑक्सीजन के प्रति इकाई आयतन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व क्लोरीन परमाणु की तुलना में अधिक होता है। इसलिए ऑक्सीजन हाइड्रोजन आबन्ध निर्मित करता है जबकि क्लोरीन नहीं।

प्रश्न 7.26
ClO2 के दो उपयोग लिखिए।
उत्तर:

  1. ClO2 का अत्यधिक मात्रा का प्रयोग वुडपल्प तथा सेलुलोस के विरंजन और पीने के जल के शोधन में किया जाता है।
  2. यह एक उत्कृष्ट विरंजक है। चूँकि विरंजक चूर्ण क्लोरीन से 30 गुना शक्तिशाली होता है। अत: इसे उत्कृष्ट विरंजक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

प्रश्न 7.27
हैलोजेन रंगीन क्यों होते हैं?
उत्तर:
सभी हैलोजेन रंगीन होते हैं। इसका कारण यह है कि दृश्य क्षेत्र में विकिरणों का अवशोषण होता है जिससे इनके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं। हैलोजेनों का रंग वास्तव में इस उत्सर्जित प्रकाश का रंग होता है। उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा परमाणु आकार के अनुसार F से I तक लगातार घटती है, अत: उत्सर्जित प्रकाश की ऊर्जा F से I तक बढ़ती है।

हैलोजेन का रंग F2 से I2 तक गहरा होता जाता है। उदाहरणार्थ – F2 बैंगनी प्रकाश अवशोषित करके हल्का पीला दिखाई देता है जबकि आयोडीन पीला तथा हरा प्रकाश अवशोषित करके गहरा बैंगनी रंग का प्रतीत होता है। इसी प्रकार हम Cl2 के हरे-पीले तथा ब्रोमीन के नारंगी-लाल रंग की व्याख्या कर सकते हैं।

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प्रश्न 7.28
जल के साथ F2 तथा Cl2 की अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
F2 जल से अभिक्रिया O2 या O3 में ऑक्सीकृत कर देती है।
2F2 (g) + 2H2O → 4H+ (aq) + 4F (aq) + O2 (g)
3F2 (g) + 3H2O (l) → 6H+ (aq) + 6F (aq) + O3 (g)
Cl2 जल से अभिक्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा हाइपोक्लोरस अम्ल बनाती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 28

प्रश्न 7.29
आप HCl से Cl2 तथा Cl2 से HCI को कैसे प्राप्त करेंगे? केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
HCl से Cl2 के अनेक ऑक्सीकारकों; जैसे –
MnO2, KMnO4, तथा K2Cr2O7 द्वारा प्राप्त किया जा सकता हैं।
Cl2 से HCl को अपचयन द्वारा सूर्य के मन्द प्रकाश में H2 की अभिक्रिया से प्राप्त करते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 29

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प्रश्न 7.30
एन-बार्टलेट Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए कैसे प्रेरित हुए?
उत्तर:
एन बार्टलेट ने प्रेक्षित किया कि PtF6 की अभिक्रिया O2 से होने पर एक आयनिक ठोस, \(\mathrm{O}_{2}^{+} \mathrm{PtF}_{6}^{-}\) प्राप्त होता है।
O2 (g) + PtF(g) → \(\mathrm{O}_{2}^{+} \mathrm{PtF}_{6}^{-}\)
चूँकि Xe की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (1170 kJ mol-1) O2 अणुओं की प्रथम आयन एन्थैल्पी (1175 kJ mol-1) के समान है, इसलिए Xe को जब PtF6 के बीच Xe में ऑक्सीकृत करना चाहिए। इससे वे Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए प्रेरित हुए। Xe तथा PtF6 के बीच एक तीव्र अभिक्रिया हुई तथा सूत्र Xe+Pt6 का एक लाल ठोस पदार्थ प्राप्त हुआ।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 30

प्रश्न 7.31
निम्न यौगिकों में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्या हैं?

  1. H2PO3
  2. PCl3
  3. Ca3P2
  4. Na2PO4
  5. POF3

गणना:
माना निम्नलिखित में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्था x है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 31

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प्रश्न 7.32
निम्नलिखित के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।

  1. जब NaCl को MnO2 की उपस्थिति में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
  2. जब क्लोरीन गैस को NaI के जलीय विलयन में से प्रवाहित किया जाता है।

उत्तर:
1. Cl2 मुक्त होती है।
4NaCl + MnO2 + 4H2SO4 → MnCl2 + 4NaHSO4 + Cl2 ↑ + 2H2O

2. Cl2,NaI को I2 में ऑक्सीकृत कर देती है।
Cl2 (g) + 2Nal(aq) → 2NaCl(aq) + I2 (s)

प्रश्न 7.33
जीनॉन फ्लु ओराइड, XeF2, XeF4 तथा XeF6 कैसे बनाए जाते हैं?
उत्तर:
जीनॉन फ्लुओराइडों को Xe तथा F2 के मध्य विभिन्न परिस्थितियों में सीधे अभिक्रिया करके XeF2, XeF4 तथा XeF6 बनाती हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 32

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प्रश्न 7.34
किस उदासीन अणु के साथ ClO समइलेक्ट्रॉनी है? क्या यह गुण लुइस क्षारक है?
उत्तर:
ClO में 26 इलेक्ट्रॉन है। 26 इलेक्ट्रॉनों वाला उदासीन अणु OF2 है। अत: ClO OF2 के साथ समइलेक्ट्रॉनी

विकल्पत:
ClO में O को F से प्रतिस्थापित करने पर, परिणामी उदासीन अणु CIF है। चूंकि CIF फ्लुओरीन से पुनः संयोग करके CIF बना सकता है इसलिए CIF एक लुइस क्षारक है।

प्रश्न 7.35
निम्नलिखित प्रत्येक समुच्चय को सामने लिखे गुणों के अनुसार सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. F2, Cl2, Br2, I2 आबन्ध वियोजन एन्थैलपी बढ़ते क्रम में।
  2. HF, HCl, HBr, HI अम्ल सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।
  3. NH3, PH3, AsH3, SbH3, BiH3 सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।

उत्तर:
1. हैलोजन अणुओं में बन्ध लम्बाई बढ़ने से बन्ध वियोजन ऐन्थैल्पी के मान घटते हैं। इसका कारण यह है चूँकि F परमाणु अत्यधिक छोटा होता है तथा प्रत्येक F परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के तीन एकाकी युग्म F2 अणु में F परमाणुओं को बाँधे रखने वाले आबन्ध युग्मों को प्रतिकर्षित करते हैं। अत: आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम इस प्रकार होता है –
I2 < F2 < Br2 < Cl2

2. चूँकि गैसीय अवस्था में हाइड्रोजन हैलाइड्स सहसंयोजी हो जाते हैं तथा प्रकृति के होते हैं तथा जलीय विलयन में आयनिक प्रकृति का क्रम निम्न है-अम्लों की भाँति कार्य करते हैं। अतः इन की अम्लीय सामर्थ्य HF < HQ < HB < HI

3. केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म उपस्थित होने के कारण ये लूइस क्षारों की भाँति कार्य करते हैं। अतः इनकी क्षारक सामर्थ्य का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार से है –
BiH3 < SbH3 < AsH3 < PH3 < NH3

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प्रश्न 7.36
निम्नलिखित में से कौन-सा एक अस्तित्व में नहीं है?

  1. XeOF4
  2. NeF2
  3. XeF2
  4. XeF6

उत्तर:
चूँकि Ne की प्रथम द्वितीय आयतन एन्थैल्पियों का योग Xe की तुलना में अधिक है। अत: F2 Xe को Xe2+ में ऑक्सीकृत कर सकता है और Ne को Ne2+ में ऑक्सीकृत नहीं कर सकती। अत: NeF2 का अस्तित्व नहीं है जबकि (XeOF4) का अस्तित्व है।

प्रश्न 7.37
उस उत्कृष्ट गैस स्पीशीज का सूत्र देकर संरचना की व्याख्या कीजिए जो कि इनके साथ समसंरचनीय है –

    1. ICI4
    2. IBr2
    3. BrO3

उत्तर:
1. ICI में 36 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः 36 इलेक्ट्रॉनों वाली उत्कृष्ट गैस XeF4 है।

XeF4 की संरचना:
इसमें दो 5d – कक्षक, एक 5s कक्षक तथा हीन 5p कक्षकों के संयोजन में छ: sp3 d2 संकर कक्षक बनाता है।

इस प्रकार 6sp3d2 संकरित कक्षकों में 12 इलेक्ट्रॉन चार सहसंयोजक आबन्धों तथा दो असहभाजित युग्मों के रूप में वितरित रहते हैं। इसमें चारों फ्लुओरीन परमाणु एक ही तल में होते हैं। तथा इससे वर्ग समतली अण्ड प्राप्त हाता है जिसमें दो अन आबन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 33

2. IBr2 में 22 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। 22 इलेक्ट्रॉनों वाली उत्कृष्ट गैस स्पीशीज XeF2 होगी।

XeF2 की संरचना:
इसमें एक 5d – कक्षक, एक 5s – कक्षक तथा तीन 5p – कक्षकों के साथ संकरित होकर पाँच sp3d संकरित कक्षक देता है।

पाँच sp3d संकरित कक्षकों में दस इलेक्ट्रॉन, दो साधारण सहसंयोजक आबन्ध तथा तीन असहभाजित युग्म देते हैं। यदि दोनों F परमाणु अधिकतम सम्भव दूरी पर हों तो हमें एक समद्विबाहु त्रिभुज के बिन्दुओं पर तीन अनआबन्धित इलेक्ट्रॉन-युग्मों का रेखीय अणु प्राप्त होता है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 34

3. BrO3 में 26 संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। 26 इलेक्ट्रॉनों वाली उत्कृष्ट गैस स्पीशीज XeO3 होगी।

XeO3 की संरचना:
इसमें Xe sp3 संकरण अवस्था में होता है जिसमें चार sp3 संकर कक्षक हैं। इनमें एक कक्षक में इलेक्ट्रॉन O युग्म हैं जो इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म प्रदर्शित करते हैं और शेष तीन संकर कक्षक ऑक्सीजन परमाणुओं के साथ तीन σ बनाते हैं। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के तीन d – कक्षक तीन ऑक्सीजन परमाणुओं के साथ तीन π – बन्ध बनाते हैं। XeO3 अण्ड की ज्यामिति त्रिकोणीय पिरैमिड होती है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्त्व img 35

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प्रश्न 7.38
उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनातमक रूप से बड़े क्यों होते हैं?
उत्तर:
उत्कृष्ट गैसों की परमाण्विक त्रिज्या अपने सम्बन्धित आवों में सर्वाधिक होती है। इस कारण उत्कृष्ट गैसों की केवल वाण्डरवाल्स त्रिज्या होती है (क्योंकि ये अणु नहीं बनाती है), जबकि अन्यों में सहसंयोजक त्रिज्याएँ होती हैं। वाण्डरवाल्स त्रिज्या सहसंयोजक त्रिज्या से अधिक होती है; अतः उत्कृष्ट गैसों परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े होते हैं।

प्रश्न 7.39
निऑन तथा ऑर्गन गैसों के उपयोग लिखिए।
उत्तरः
निऑन के उपयोग (Uses of Neon):

  1. निऑन का उपयोग विसर्जन ट्यूब तथा प्रदीप्त बल्बों में विज्ञापन प्रदर्शन हेतु किया जाता है।
  2. निऑन बल्बों का उपयोग वनस्पति उद्यान तथा ग्रीनहाउस में किया जाता है।

ऑर्गन के उपयोग (Uses of Argon):

  1. ऑर्गन का उपयोग उच्चताप धातु कर्मीय प्रक्रमों में अक्रिय वातावरण उत्पन्न करने के लिए किया जाता है (धातुओं तथा उपधातुओं के आर्क वेल्डिंग में)।
  2. इसका उपयोग विद्युत-बल्ब को भरने के लिए किया जाता है।
  3. प्रयोगशाला में इसका उपयोग वायु सुग्राही पदार्थों के प्रबन्धन में भी किया जाता है।

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम

Bihar Board Class 12 Chemistry Solutions Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 12 Chemistry तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम Text Book Questions and Answers

पाठ्यनिहित प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.1
पाठ्यपुस्तक की सारणी 6.1 में दर्शाए गए अयस्कों में से कौन-से चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सान्द्रित किए जा सकते हैं?
उत्तर:
यदि अयस्क या गैंग (दोनों में से एक) चुम्बकीय हो उन्हें चुम्बकीय प्रथक्करण विधि द्वारा किया जा सकता है। सारणी में दर्शाए गये अयस्क जैसे-हेमेटाइट (Fe2O3), मेग्नेटाइट (Fe3O4) सिडेराइट (FeCO3) तथा आयरन पाइराइट (FeS2) को चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सान्द्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 6.2
ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
ऐलुमिनियम के मुख्य अयस्क बाक्साइट में मुख्यत: SiO2, आयरन ऑक्साइड आदि की अशुद्धियाँ होती हैं जिन्हें ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन द्वारा हटाया जा सकता है तथा शुद्ध ऐलुमिना भी प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.3
अभिक्रिया Cr2O3 + 2Al → Al2O3 + 2Cr (∆G° = – 421 kJ) के गिब्ज ऊर्जा मान से लगता है कि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार सम्भव है, पर यह कक्ष ताप पर सम्पन्न क्यों नहीं होती?
उत्तर:
चूँकि संक्रियण ऊर्जा की निश्चित मात्रा ऊष्मा गतिकीय अभिक्रियाओं के लिए आवश्यक होती है, अतः दी गई अभिक्रिया को सम्पन्न करने के लिए अतिरिक्त ऊष्मा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.4
क्या यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम, Al2O3 को अपचित कर सकता है और Al, Mgo को? वे परिस्थितियाँ कौन-सी है?
उत्तर:
अध्यापक की सहायता से करें।

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.1
कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा किया जाता है, परन्तु जिंक का नहीं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जिंक का मानक इलेक्ट्रोड विभव (EΘ) [Zn2+ | Zn = – 0.76 V] कॉपर व EΘ | Cu2+ | Cu = + 0.34] से कम होता है। दूसरी ओर जिंक Cu2+ आयनों के विलयन से Cu को विस्थापित कर सकता है।
Zn (s) + Cu2+ (aq) → Zn2+ (aq) + Cu (s)
इसीलिए Zn2+ आयनों के विलयन से जिंक विस्थापित करने के लिए हमें इससे अधिक क्रियाशील धातु की आवश्यकता होगी अर्थात्
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 1
परन्तु ये सभी धातुएँ जल से क्रिया करके अपने सम्बन्धित आयन बनाती हैं तथा H2 गैस मुक्त करती है। इसलिए Al, Mg आदि को Zn2+ आयनों के विलयन से जिंक विस्थापित करने में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। अतः कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा किया जा सकता है, परन्तु जिंक का नहीं।

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प्रश्न 6.2
फेन प्लवन विधि में अवनमक की क्या भूमिका है?
उत्तर:
फेन प्लावन विधि में, अवनमक की भूमिका दो सल्फाइड अयस्कों को पृथक् करना होता है। उदाहरणार्थ: एक अयस्क में से जिंक सल्फाइड (ZnS) तथा लेड सल्फाइड को पृथक करने के लिए सोडियम साइनाइड (NaCN) प्रयुक्त किया जाता है। इस चयन से ZnS को फेन में आने से रोकता है परन्तु Pbs को फेन में आने देता है। अत: ZnS अयस्क से पृथक किया जा सकता है।

प्रश्न 6.3
अपचयन द्वारा आक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कर्षण अधिक कठिन क्यों है?
उत्तर:
Cu2S के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा (∆fGΘ); CS2 तथा H2S की मानक मुक्त ऊर्जा की तुलना में अधिक होती है। इसलिए कार्बन तथा हाइड्रोजन Cu2S को Cu में अपचयित नहीं कर सकते हैं।
Cu2S + H2 → 2Cu ↓+ H2S ↑
2Cu2S + C → 4Cu ↓+ CS2
दूसरी ओर Cu2O का ∆fGΘ CO2 की तुलना में अत्यन्त कम होता है, इसलिए कार्बन सरलता से Cu2O को Cu में अपचयित कर सकता है।
Cu2O(s) + C(s) → 2Cu(s) + CO(g)
इसी कारण अपचयन द्वारा ऑक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कर्षण अधिक कठिन है।

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प्रश्न 6.4
व्याख्या कीजिए –

  1. मण्डल परिष्करण
  2. स्तम्भ वर्णलेखिकी।

उत्तर:
1. मण्डल परिष्करण (Zone Refining):
यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है (चित्र)।

इसकी सहायता अशुद्ध धातु को गर्म किया जाता है। तापक जैसे ही आगे की ओर बढ़ता है, गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ संलग्न गलित मण्डल में चली जाती हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 2
चित्र – मण्डल परिष्करण प्रक्रम

इस क्रिया को कई बार दोहराया जाता है तथा तापक को एक ही दिशा में बार-बार चलाते हैं। अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं। इसे काटकर अलग कर लिया जाता है। यह विधि मुख्य रूप से अतिउच्च शुद्धता वाले अर्धचालकों तथा अन्य अतिशुद्ध धातुओं; जैसे-जर्मेनियम, सिलिकॉन, बोरॉन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।

2. स्तम्भ वर्णलेखिकी (Column Chromatography):
यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अधिशोषक पर मिश्रण के विभिन्न घटकों का अधिशोषण अलग-अलग होता है। मिश्रण को द्रव या गैसीय माध्यम में रखा जाता है जो कि अधिशोषक में से गुजरता है। स्तम्भ में विभिन्न घटक भिन्न-भिन्न स्तरों पर अधिशोषित हो जाते हैं। बाद में अधिशोषित घटक उपर्युक्त विलायकों (निक्षालक) द्वारा निक्षालित कर लिए जाते हैं। गतिशील माध्यम की भौतिक

अवस्था, अधिशोषक पदार्थ की प्रकृति एवं गतिशील माध्यम के गमन के प्रक्रम पर भी निर्भर होने के कारण इसे ‘स्तम्भ वर्णलेखिकी’ नाम दिया जाता है। इस प्रकार की एक विधि में कांच की नली में Al2O3 का एक स्तम्भ बनाया जाता है तथा गतिशील माध्यम जिसमें अवयवों का विलयन उपस्थित होता है, द्रव प्रावस्था में होता है।

यह स्तम्भ-वर्णलेखिकी का एक उदाहरण है। यह सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले शुद्धिकरण और शुद्ध किए जाने वाले तत्व तथा अशुद्धियों के रासायनिक गुणों में अधिक भिन्नता न होने की स्थिति में, शुद्धिकरण के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है। स्तम्भ वर्णलेखिकी में प्रयुक्त प्रक्रम में चित्र में दर्शाया गया है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 3
चित्र-स्तम्भ वर्णलेखिकी

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प्रश्न 6.5
673 K ताप पर C तथा CO में से कौन-सा अच्छा अपचायक है?
उत्तर:
जब कार्बन डाइआक्सीजन से अभिक्रिया करता है, तब दो अभिक्रियाँ सम्भव होती हैं –
C(s) + O2 (g) → CO2 (g)
2C(s) + O2 (g) → 2CO (g) प्रथम अभिक्रिया में उत्पन्न CO2 का आयतन, प्रयुक्त O2 के आयतन के बराबर होता है, इसलिए ∆S अत्यन्त कम होता है तथा ∆G ताप के साथ परिवर्तित नहीं होता है। अतः ∆G तथा T के मध्य ग्राफ लगभग क्षैतिज होता है। द्वितीय अभिक्रिया प्रयुक्त O2 के प्रत्येक एक आयतन के लिए CO के दो आयतन उत्पन्न करती है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 4
चित्र-कार्बन के लिए एर्लिंघम आरेख

अतः ∆S धनात्मक होता है तथा ∆G ताप बढ़ाने पर ऋणात्मक रूप से बढ़ता है। परिणामस्वरूप एलिंघम आरेख पर इसकी रेखा का ढाल नीचे की ओर होता है। अभिक्रियाओं C → CO2 तथा C → CO के लिए दोनों रेखाएँ 983 K पर एक-दूसरे को काटती हैं।

इस ताप से नीचे CO2 का निर्माण करने वाली अभिक्रिया ऊष्मीय रूप से अधिक सम्भव होगी, परन्तु 673 K से अधिक ताप पर CO का निर्माण होगा। दूसरे शब्दों में 673 K से नीचे ताप पर C तथा CO दोनों अपचायक की भाँति कार्य करते हैं ‘क्योंकि CO का CO2 में आक्सीकरण C → CO2 की अपेक्षा सरलता से हो सकता है, इसलिए 673 K से ताप पर CO कार्बन की अपेक्षा अधिक प्रभावी अपचायक होता है।

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प्रश्न 6.6
कॉपर के विद्युत-अपघट्न शोधन में ऐनोड पंक में उपस्थित सामान्य तत्वों के नाम दीजिए। वे वहाँ कैसे उपस्थित होते हैं?
उत्तर:
कॉपर के विद्युत अपघट्न शोधन में ऐनोड पंक में उपस्थित सामान्य तत्व ऐन्टीमनी, सेलेनियम, सिल्वर, गोल्ड आदि (CuSO4 + H2SO4) हैं। ये तत्व, कम क्रियाशील होते हैं जिससे ये विलयन द्वारा प्रभावित नहीं होते और ऐनोड पर ऐनोड पंक के रूप में विद्यमान रहते हैं।

प्रश्न 6.7
आयरन (लोहे) के निष्कर्षण के दौरान वात्या भट्टी के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली अभिक्रियाओं को लिखिए।
उत्तर:
वात्या भट्टी मे विभिन्न ताप-परासों में आयरन ऑक्साइड का अपचयन होता है। वात्या भट्टी में होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –
500 – 800K पर (वात्या भट्टी में निम्न ताप परिसर में)
3Fe2O3 + CO → 2Fe3O4 + CO2
Fe3O4 + 4CO → 3Fe ↓+ 4CO2
Fe2O3 + CO → 2FeO + CO2
900 – 1500K पर (वात्या भट्टी में उच्च ताप-परिसर में)
C + CO2 → 2CO ↑
FeO + CO → Fe ↓+ CO2
चूना पत्थर (लाइमस्टोन) भी CaO में अपघटित हो जाता है जो अयस्क की सिलिकेट अशुद्धि को धातुमल के रूप में हटा देता है। धातुमल स्लैग गलित अवस्था में हो जाता है तथा आयरन से पृथक्कृत हो जाता है।

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प्रश्न 6.8
जिंक ब्लेण्ड से जिंक के निष्कर्षण में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं को लिखिए।
उत्तर:
जिंक ब्लेण्ड से जिंक के निष्कर्षण में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

1. सान्द्रण (Concentration):
अयस्क का सान्द्रण फेन प्लावन प्रक्रम द्वारा किया जाता है।

2. भर्जन (Roasting):
सान्द्रित अयस्क को लगभग 1200K ताप पर वायु की अधिकता में भर्जन किया जाता है जिससे जिंक ऑक्साइड प्राप्त होता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 5

3. अपचयन (Reduction):
प्राप्त जिंक ऑक्साइड को चूर्णित कोक के साथ मिलाकर एक फायर क्ले रिटॉर्ट में 1673K तक गर्म करने पर जिंक धातु में अपचयित हो जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 6

4. विद्यत-अपघटनी शोधन (Electrolytic refining):
अशुद्ध जिंक ऐनोड तथा कैथोड शुद्ध जिंक कैथोड लेते हैं। इसमें विद्युत-अपघट्य तनु H2SO4 से अम्लीकृत ZnSO4 विलयन लेकर विद्युत धारा प्रवाहित करने पर शुद्ध Zn कैथोड पर प्राप्त हो जाता है।

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प्रश्न 6.9
कॉपर के धातुकर्म में सिलिका की भूमिका बताइए।
उत्तर:
भर्जन के दौरान, कॉपर पाइराइट FeO तथा Cu2O के मिश्रण में परिवर्तित हो जाते हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 7
2FeS + 3O2 → 2FeO + 2SO2
FeO तथा कॉपर, कॉपर मेट के रूप में प्राप्त होता है इसमें Cu2S तथा Fes होते हैं। FeO, SiO2 से संयोग करके फेरस सिलिकेट (FeSiO3) धातुमल बनाता है जो गलित अवस्था में मैट पर तैरता है।

प्रश्न 6.10
‘वर्णलेखिकी’ पद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वर्णलेखिकी (Chromatography) को मूल रूप में ग्रीक शब्द Chroma अर्थात् रंग या वर्ण तथा graphy अर्थात् लेखन है। किसी मिश्रण के कुछ या सभी अवयवों को भिन्न प्रावस्थाओं में पृथक करने के प्रक्रम को वर्णलेखिकी कहते हैं। यह विधि किसी मिश्रण के अवयवों के दो प्रावस्थाओं के मध्य वर्णात्मक वितरण पर आधारित है। इस में एक अवस्था स्थिर अवस्था ठोस या द्रव होती है और दूसरी प्रावस्था गतिमान प्रावस्था द्रव या गैस होती है।

प्रश्न 6.11
वर्णलेखिकी में स्थिर प्रावस्था के चयन में क्या मापदण्ड अपनाए जाते हैं?
उत्तर:
स्थिर प्रावस्था का चयन के लिए अशुद्धियाँ स्थिर प्रावस्था में शुद्ध होने वाले तत्व से अधिक विलेय हो। जब स्तम्भ का निष्कर्षण किया जाता है, तब अशुद्धियाँ स्थिर प्रावस्था द्वारा रुक जाती है तथा शुद्ध घटक को सरलतापूर्वक हटा देते हैं।

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प्रश्न 6.12
निकिल-शोधन की विधि समझाइए।
उत्तर:
निकिल शोधन की मॉन्ड प्रक्रम:
इस प्रक्रम में निकिल को कार्बन मोनोक्साइड के प्रवाह में गरम करने से वाष्पसील निकिल टेट्राकार्बोनिल संकुल बन जाता है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 8
इस कार्बोनिल को और अधिक ताप पर गरम करते हैं, जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु दे देता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 9

प्रश्न 6.13
सिलिकायुक्त बॉक्साइट अयस्क में से सिलिका को ऐलुमिना से कैसे अलग करते हैं? यदि कोई समीकरण हो तो दीजिए।
उत्तर:
सिलिकायुक्त बॉक्साइट अयस्क को NaOH के सान्द्रविलयन के साथ 473 – 523K ताप पर तथा 35-36 bar दाब पर गर्म करते हैं। इससे, ऐलुमिना, सोडियम ऐलुमिनेट के रूप में तथा सिलिका, सोडियम सिलिकेट के रूप में घुल जाती है तथा अशुद्धियाँ अवशेष के रूप में रह जाती हैं।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 10

सोडियम सिलिकेट परिणामी विलयन को छानकर अविलेय अशुद्धियों (यदि कोई हो) को हटा दिया जाता है तथा इसे CO2 गैस प्रवाहित करके उदासीन कर दिया जाता है। इस अवस्था पर विलयन को ताजा बने हुए जलयोजित Al2O3 के नमूने से बीजरोपित किया जाता है, जो अवक्षेपण को प्रेरित करता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 11

सोडियम सिलिकेट विलयन में शेष रह जाता है तथा जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर तथा गर्म करके पुनः शुद्ध Al2O3 प्राप्त कर लिया जाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 12

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प्रश्न 6.14
उदाहरण देते हुए भर्जन एवं निस्तापन में अन्तर बताइए।
उत्तर:
निस्तापन (Calcination):
इस क्रिया में सांद्रित अयस्क को इतना गर्म करते हैं कि वह पिघले नहीं। इस क्रिया में अयस्क से गैसीय पदार्थ अथवा वाष्पशील पदार्थ अलग हो जाते हैं। गैस निकलने से अयस्क सरन्ध्र हो जाते हैं।
कार्बोनेट अयस्क अपघटित हो आक्साइड में बदल जाते हैं तथा CO2 निकल जाती है।
CaCO3 + CaO + CO2
ZnCO3 → ZnO + CO2

भर्जन (Roasting):
इस क्रिया में अयस्क को वायु की उपस्थिति में उसके गलनांक से नीचे गर्म किया जाता है। भर्जन क्रिया के द्वारा अयस्क आंशिक या पूर्ण रूप से आक्सीकृत हो जाता है। यहाँ S, As आदि अशुद्धियाँ ऑक्साइड के रूप में निकल जाती हैं तथा अयस्क ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं। जैसे-जिंक ब्लैड (ZnS) के भर्जन पर ZnO प्राप्त होता है।
2ZnS + 3O2 → 2ZnO + 2SO2

भर्जन एवं निस्तापन में अन्तर (Difference between Roasting and Calcination):
निस्तापन तथा भर्जन लगभग समान क्रियाएँ होती हैं। भर्जन में अयस्क को अकेले अथवा किसी अन्य पदार्थ के साथ गर्म करते हैं, जबकि निस्तापन अयस्क को अकेले ही गर्म करते हैं। भर्जन में As, Sb, S आदि की अशुद्धियाँ आक्साइड बनकर बाहर निकल जाती हैं, जबकि निस्तापन में H2O तथा CO2 आदि बाहर निकल जाते हैं।

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प्रश्न 6.15
ढलवाँ लोहा कच्चे लोहे से किस प्रकार भिन्न होता है?
उत्तर:
वात्या भट्टी से प्राप्त लोहे में लगभग 4% कार्बन तथा अन्य अशुद्धियाँ; जैसे – S, P, Si, Mn सूक्ष्म मात्रा में उपस्थित रहती है। यह कच्चे लोहे (pig iron) के नाम से जाना जाता है तथा विभिन्न आकृतियों में ढाला जा सकता है। ढलवाँ लोहा (cast iron) कच्चे लोहे से भिन्न होता है तथा इसे कच्चे लोहे को, रद्दी लोहे एवं कोक के साथ गर्म हवा के झोंकों द्वारा पिघलाकर बनाया जाता है। इसमें थोड़ा कम कार्बन (लगभग 3%) होता है तथा यह अति कठोर और भंगुर होता है।

प्रश्न 6.16
अयस्कों तथा खनिजों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खनिज (minerals):
प्रकृति में पाए जाने वाले धातु के विभिन्न खनिज कहलाते हैं, जैसे – एक सॉल्ट (NaCl)

अयस्क (Ores):
वे खनिज जिसे शद्ध धातु का निष्कर्षण अधिक मात्रा में कम व्यय पर सुविधा से किया जा सकता है, अयस्क कहलाते हैं। जैसे – बॉक्साइट (Al2O3.2H2O) एल्युमीनियम का अयस्क है। अतः सभी अयस्क खनिज होते हैं, परन्तु सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं।

प्रश्न 6.17
कॉपर मैट को सिलिका की परत चढ़े हुए परिवर्तकों में क्यों रखा जाता है?
उत्तर:
कॉपर मैट में Cu2S तथा FeS से जब कॉपर मैट को सिलिका की परत चढ़े हुए परिवर्तक में लेकर इसमें गर्म वायु का तेज झोंका प्रवाहित करते हैं तब मैट में उपस्थित FeS फेरिक ऑक्साइड ऑक्सीकृत हो जाता है और सिलिका से क्रिया कर FeSiO2 धातुमल बनाता है।
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 13
जब धातुमल (FeSiO3) को अलग कर लिया जाता है तो Cu2S ऑक्सीकृत होकर Cu2O बनाता है जो Cu2S के संयोग से कॉपर धातु देता है।
2Cu2S + 3O2 → 2Cu2O + 2SO2
2Cu2O + Cu2S → 6Cu + SO2
अतः कॉपर के निष्कर्षण में सिलिका की भूमिका धातुमल को हटाने की होती है।

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प्रश्न 6.18
ऐलुमिनियम के धातुकर्म में क्रायोलाइट की क्या भूमिका है?
उत्तर:
यह ऐलुमिना के गलनांक को कम करता है और उसकी विद्युत चालकता को बढ़ाता है।

प्रश्न 6.19
निम्न कोटि के कॉपर अयस्कों के लिए निक्षालन क्रिया को कैसे किया जाता है?
उत्तर:
निम्न कोटि के कॉपर अयस्कों से कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातु कर्म द्वारा करते हैं। इसे अम्ल या जीवाणु के उपयोग से निक्षालित करते हैं तथा Cu2+ आयन युक्त विलयन H2 से क्रिया करते हैं।
Cu2+ (aq) + H2 (g) → Cu(s) + 2H+ (aq)

प्रश्न 6.20
CO के उपयोग करते हुए अपचयन द्वारा जिंक ऑक्साइड से जिंक का निष्कर्षण क्यों नहीं किया जाता?
उत्तर:
चूंकि CO से CO2 के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा (∆fGΘ), Zn से Zn0 के निर्माण की मानक ऊर्जा अधिक होने के कारण Zno को Zn में अपचयित करने के लिए CO का उपयोग नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.21
Cr2O3 के विरचन के लिए ∆fGΘ का मान – 540 kJ mol-1 है तथा Al2O3 के लिए – 827 kJ mol-1 है। क्या Cr2O3 का अपचयन Al से सम्भव है?
गणना:
इस प्रक्रम में अभिक्रियाओं के दो समीकरण है –
BIhar Board Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम img 14
समीकरण (1) को (2) में से घटाने पर,
\(\frac{4}{3}\) cr(s) – \(\frac{4}{3}\) Al(s) → \(\frac{2}{3}\) Cr2O3 (s) – \(\frac{2}{3}\) Al2O3(s);
\(\frac{4}{3}\) Al (s) + \(\frac{2}{3}\) Cr2O3 (s) → \(\frac{2}{3}\) Al2O3 (s) + \(\frac{4}{3}\) Cr (s); ∆fGΘ = -287 kJ mol-1
∵ संयुक्त रेडॉक्स अभिक्रिया का ∆fGΘ ऋणात्मक है।
∴ Cr2O3 का अपचयन Al से सम्भव है।

प्रश्न 6.22
C व CO में से Zno के लिए कौन-सा अपचायक अच्छा है?
उत्तर:
जिंक ऑक्साइड का अपचयन कोक द्वारा किया जाता है। इसमें कॉपर की स्थिति की अपेक्षा ताप अधिक रखा जाता है। तापन के लिए ऑक्साइड की कोक तथा मृदा के साथ छोटी-छोटी ईटें बनाई जाती हैं।
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धातु को आसवित कर तथा तीव्र शीतलन द्वारा एकत्र कर लेते हैं। C से CO के निर्माण की मुक्त ऊर्जा (∆fGΘ) 1120K से अधिक ताप पर कम हो जाती है, जबकि O से CO2 के निर्माण की मुक्त ऊर्जा, Zn0 के AG° की तुलना में, 1323 K से अधिक ताप पर कम हो 1120 K से अधिक ताप पर C से CO के बनने में मुक्त ऊर्जा कम हो जाती है।

जबकि 1323 K से अधिक ताप पर C से CO2 के बनने में मुक्त ऊर्जा, ZnO की मुक्त ऊर्जा की तुलना में कम हो जाती है। चूंकि CO से CO2 की मुक्त ऊर्जा ZnO से अधिक होती है, अत: C, ZnO का Zn में अपचयन कर सकता है जबकि CO नहीं। अत: c व CO में से ZnO के लिए अच्छा अपचायक C है, जबकि CO नहीं।

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प्रश्न 6.23
किसी विशेष स्थिति में अपचायक का चयन ऊष्मागतिकी कारकों पर आधारित है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? अपने मत के समर्थन में दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी निश्चित धात्विक ऑक्साइड का धात्विक अवस्था में अपचयन करने के लिए उचित अपचायक का चयन करने में ऊष्मागतिकी कारक सहायता करता है। इसे निम्नवत् समझा जा सकता है –

ऐलिंघम आरेख से यह स्पष्ट होता है कि वे धातुएँ, जिनके लिए उनके ऑक्साइडों के निर्माण की मानक ऊर्जा अधिक ऋणात्मक होती है, उन धातु ऑक्साइडों को अपचयित कर सकती है जिनके लिए उनके सम्बन्धित ऑक्साइडों के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा कम ऋणात्मक होती है। दूसरे शब्दों में कोई धातु किसी धातु के ऑक्साइड को केवल तब अपचयित कर सकती है, जबकि यह एलिंघम आरेख में इस धातु से नीचे स्थित हो।

चूँकि संयुक्त रेडॉक्स अभिक्रिया का मानक मुक्त ऊर्जा परिवर्तन ऋणात्मक होगा (जोकि दोनों धातु आक्साइडों के ∆fGΘ में अन्तर के तुल्य होता है।); अत: Al तथा Zn दोनों FeO को Fe में अपचयित कर सकते हैं, परन्तु Fe, Al2O3, को Al में तथा ZnO को Zn में अपचयित नहीं कर सकता। इसी प्रकार C, ZNO को Zn में अपचयित कर सकता है, परन्तु CO को नहीं।

प्रश्न 6.24
उस विधि का नाम लिखिए जिसमें क्लोरीन सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। क्या होगा यदि NaCl के जलीय विलयन का विद्युत अपघटन किया जाए?
उत्तर:
सोडियम धातु डॉउन प्रक्रम द्वारा प्राप्त की जा सकती है। इस प्रक्रम में NaCl तथा CaCl2 के संगलित मिश्रण का 873K पर विद्युत अपघटन किया जाता है। जिससे सोडियम कैथोड पर निरावेशित होती है तथा Cl2 ऐनोड पर सहउत्पाद के रूपं में होती है।
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यदि NaCl के जलीय विलयन का विद्युत अपघटन किया जाता है तो कैथोड पर H2 मुक्त होती है तथा Cl2 ऐनोड पर प्राप्त होती है। चूँकि Na+/ Na रेडॉक्स युग्म का E°(= – 2.17 V) जल के E° (= – 0.83 V) की अपेक्षा कम होता है तथा अत: जल Na+ आयनों की अपेक्षा H2 में अपचयित हो जाता है।
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प्रश्न 6.25
ऐलुमिनियम के विद्युत-धातुकर्म में ग्रेफाइट छड़ की क्या भूमिका है?
उत्तर:
इस धातु में Al2O3 में Na3AlF6 या CaF2 मिलाया जाता है जिससे मिश्रण का कम हो जाता है और इसमें चालकता आ जाती है। विद्युत-अपघटन में ग्रेफाइट के रूप में विद्युत अपघटन तथा स्टील कैथोड के रूप में प्रयुक्त होते हैं। विद्युत-अपघट्य में Al कैथोड पर और CO तथा CO2 ऐनोड पर बनती है।

कथोड:
Al3+ (गलित) → Al(l)

ऐनोड:
C(s) + O2-(गलित) → CO(g) + 2e
C(s) + 2O2- (गलित) → CO2(g) + 4e
ग्रेफाइट के स्थान पर किसी अन्य धातु लेने पर मुक्त ऑक्सीजन न केवल इलेक्ट्रोड की धातु को ऑक्सीकृत करेगी बल्कि कैथोड पर मुक्त Al की कुछ मात्रा को Al2O3 में परिवर्तित कर देगी। अत: Al के निष्कर्षण में ग्रेफाइट की भूमि का ऐनोड पर 0, को संरक्षित करके मुक्त होने वाले Al की कुछ मात्रा को पुन: Al2O3 में परिवर्तन न करने में रोकना होती है।

प्रश्न 6.26
निम्नलिखित विधियों द्वारा धातुओं के शोधन के सिद्धान्तों की रूपरेखा दीजिए:

  1. मण्डल परिष्करण
  2. विद्युतअपघट्न परिष्करण
  3. वाष्य प्रावस्था परिष्करण

उत्तर:
1. मण्डल परिष्करण:

मण्डल परिष्करण (Zone Refining):
यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है (चित्र)।

इसकी सहायता अशुद्ध धातु को गर्म किया जाता है। तापक जैसे ही आगे की ओर बढ़ता है, गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ संलग्न गलित मण्डल में चली जाती हैं।
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चित्र – मण्डल परिष्करण प्रक्रम

इस क्रिया को कई बार दोहराया जाता है तथा तापक को एक ही दिशा में बार-बार चलाते हैं। अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं। इसे काटकर अलग कर लिया जाता है। यह विधि मुख्य रूप से अतिउच्च शुद्धता वाले अर्धचालकों तथा अन्य अतिशुद्ध धातुओं; जैसे-जर्मेनियम, सिलिकॉन, बोरॉन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।

2. विधुतअपघटन परिष्करण:
इस विधि में अशुद्ध धातु की ऐनोड बनाते हैं। उसी धातु की शुद्ध धातु-पट्टी को कैथोड के रूप में प्रयुक्त करते हैं। इन्हें एक उपयुक्त विद्युतअपघटनी विश्लेषित्र में रखते हैं जिसमें उसी धातु का लवण घुला रहता है। अधिक क्षारकीय धातु विलयन में रहती है तथा कम क्षारकीय धातुएँ ऐनोड पंक (anode mud) में चली जाती हैं। इस प्रक्रम की व्याख्या, विद्युत विभव की धारण, अधिविभव तथा गिब्ज के द्वारा (उपयोग) भी की जा सकती है। ये अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

ऐनोड: Mn → Mn+ + ne
कैथोड: Cu2+ + 2e → Cu
फफोलेदार कॉपर से अशुद्धियाँ ऐनोड पंक के रूप में जमा होती हैं, जिसमें एण्टिमनी सेलीनियम टेल्यूरियम, चाँदी, सोना तथा प्लैटिनम मुख्य होती हैं। इन तत्वों की पुनः प्राप्ति से शोधन की लागत की क्षतिपूर्ति हो सकती है। जिंक का शोधन भी इसी प्रकार से किया जा सकता है।

3. वाष्प प्रावस्था परिष्करण-इस विधि में, धातु को वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित किया जाता है तथा दूसरे स्थल पर एकत्र कर लेते हैं। इसके बाद इसे विघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रक्रिया की दो आवश्यकताएँ होती हैं –

(क) उपलब्ध अभिकर्मक के साथ धातु वाष्पशील यौगिक बनाती हो तथा
(ख) वाष्पशील पदार्थ आसानी से विघटित हो सकता हो, जिससे धातु आसानी से पुनः प्राप्त की जा सके।

उदाहरणार्थ:
जर्कोनियम या टाइटेनियम शोधन के लिए वॉन-आरकैल विधि – यह Zr तथा Ti जैसी कुछ धातुओं से अशुद्धियों की तरह उपस्थित सम्पूर्ण ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन को हटाने में बहुत उपयोगी है। परिष्कृत धातु को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गर्म करते हैं। धातु आयोडाइड अधिक सहसंयोजी होने के कारण वाष्पीकृत हो जाता है।
Zr + 2I2 → ZrI4

धातु आयोडाइड को विद्युत धारा द्वारा 1800K ताप पर गर्म किए गए टंगस्टन तन्तु पर विघटित किया जाता है। इस प्रकार से शुद्ध धातु तन्तु पर जमा हो जाती है।
ZrI4 → Zr + 2I2

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प्रश्न 6.27
उन परिस्थितियों का अनुमान लगाइए जिनमें Al, MgO को अपचयित कर सकता है।
उत्तर:
इसके लिए रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
\(\frac{4}{3}\) Al + O2 → \(\frac{2}{3}\) Al2O3; ∆fGΘ Al, Al2O3 ……………….. (1)
2 Mg + O2 → 2MgO; ∆fGΘ Mg, MgO ………………. (2)
एलिंघम आरेख द्वारा स्पष्टीकरण:
कुछ ऑक्साइडों के विरचन में T तथा ∆GΘ के एलिंघम आरेख निम्न प्रकार से हैं –