Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

Bihar Board Class 11 Economics आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
दंड-आरेख –
उत्तर:
एक विमीय आरेख है।

प्रश्न 2.
आयत चित्र के माध्यम से प्रस्तुत किए गए आँकड़ों द्वारा हम आलेखी रूप में निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं –
उत्तर:
मध्यिका

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प्रश्न 3.
तोरणों के द्वारा आलेखी रूप में निम्न की स्थिति जानी जा सकती है –
उत्तर:
माध्यिका

प्रश्न 4.
अंकगणितीय रेखाचित्र के द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों से निम्न को समझने में मदद मिलती है
उत्तर:
दीर्घकालिक प्रवृत्ति

प्रश्न 5.
दंड-आरेख के दंडों की चौड़ाई का एक समान होना जरूरी नहीं है।
उत्तर:
सही

प्रश्न 6.
आयत चित्र में आयतों की चौड़ाई अवश्य एक समान होनी चाहिए।
उत्तर:
गलत

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प्रश्न 7.
आयत चित्र की रचना केवल आँकड़ों के सतत वर्गीकरण के लिए की जा सकती है।
उत्तर:
सही

प्रश्न 8.
आयत चित्र एवं स्तंभ आरेख आँकड़ों को प्रस्तुत करने के लिए एक जैसी: विधियाँ है।
उत्तर:
सही

प्रश्न 9.
आयत चित्र की मदद से बारंबारता वितरण के बहुलक को आलेखी रूप में राज्य जा सकता है।
उत्तर:
सही

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प्रश्न 10.
तोरणों में बारम्बारता वितरण की माध्यिका को नहीं जाना जा सकता है।
उत्तर:
गलत

प्रश्न 11.
निम्नलिखित को प्रस्तुत करने के लिए किस प्रकार का आरेख प्रभावी होता है?
(क) वर्ष विशेष की मासिक वर्षा
(ख) धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन
(ग) एक कारखाने में लागत घटक
उत्तर:
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प्रश्न 12.
मान लीजिए आप भारत में शहरी गैर-कामगारों की संख्या में वृद्धि तथा भारत में शहरीकरण के निम्न स्तर पर बल देना चाहते हैं, जैसा कि उदाहरण 4.2 में दिखाया गया है, तो आप उसका सारणीयन कैसे करेंगे? उत्तर:
भारत में शहरी गैर-कामगारों की संख्या –
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प्रश्न 13.
यदि किसी बारम्बारता सारणी में समान वर्ग अन्तरालों की तुलना में वर्ग अंतराल असमान हों, तो आयत चित्र बनाने की प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न होगी?
उत्तर:
आवृत्ति तालिका में वर्गान्तर समान भी हो सकते हैं और असमान भी। दोनों प्रकार के वर्गान्तर से आयत चित्र बनाने के विधि कुछ भिन्न है। जब सभी वर्गान्तर समान हैं तो सभी आयतों की चौड़ाई समान रहती है, परंतु आयतों की ऊँचाई वर्गों की आवृत्तियों पर निर्भर करती है। जितनी आवृत्तियाँ अधिक होंगी आयतों की ऊँचाई भी उतनी ही अधिक होगी। इसके अतिरिक्त वर्गान्तर समान होने पर आवृत्तियों में कोई फेरबदल नहीं हो जाती, आवृत्तियों को मौलिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इसके विपरीत जब वर्गान्तर समान नहीं होते तो वर्गान्तरों की ऊँचाई करने के लिए आवृत्तियों का संशोधन किया जाता है। मान लो न्यूनतम वर्गान्तर 10 है और वर्ग 20-40 का वर्गान्तर 20 है जो न्यूनतम वर्गान्तर का दोगुना है। अतः वर्ग की संशोधित आवृत्ति 20 के स्थान पर 10 (20 ÷ 2) होगी। मान लो 40-70 वर्गान्तर की आवृत्तियाँ 15 हैं। यह वर्गान्तर न्यूनतम वर्गान्तर का तीन गुना है। अतः इसकी संशोधित आवृत्ति 5(15 ÷ 2) होगी।

प्रश्न 14.
भारतीय चीनी उद्योग संघ ने बताया कि दिसम्बर 2001 से पहले 15 दिन चीनी का उत्पादन लगभग 3,87,000 टन था जबकि पिछले वर्ष 2000 में उन्हीं 15 दिनों का उत्पादन 3,78,000 टन था।
दिसम्बर 2001 के पहले 15 दिनों में आन्तरिक उपभोग के लिये 2,83,000 टन चीनी खरीदी गई और निर्यात के लिए 41,000 टन जबकि पिछले वर्ष इन्हीं दिनों में 1,54,000 टन चीनी आन्तरिक उपभोग के लिए ली गई थी।

  1. आँकड़ों को तालिका में प्रस्तुत करें।
  2. यदि अपने इन आँकड़ों को आरेख में प्रदर्शित करना है तो आप किस प्रकार का आरेख प्रयोग करेंगे और क्यों?
  3. इन आँकड़ों को आरेख में प्रकट करें।

उत्तर:
1. भारत में चीनी उत्पादन (Production of Sugar in India):
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2. यदि हमें इनको आँकड़ों में प्रदर्शित करना है तो बहु दंड आरेख में प्रदर्शित करेंगे, क्योंकि यह आरेख दो या दो से अधिक तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए सबसे अधिक उपयोगी है।
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प्रश्न 15.
निम्नलिखित तालिका अनुमानित क्षेत्रीय वास्तविक वृद्धि दरों को प्रतिशत में प्रदर्शित करती है। इन आँकड़ों को बहु समय श्रृंखला ग्राफ में प्रदर्शित करें।
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उपर्युक्त आंकड़ों को बहु काल-श्रेणी आरेख द्वारा प्रस्तुत करें।
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Bihar Board Class 11 Economics आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सारणीयन के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  1. आँकड़ों को क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना।
  2. आँकड़ों का सरलीकरण करना।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण तथा सारणीयन में कोई एक अंतर बताएँ।
उत्तर:
वर्गीकरण सांख्यिकी विश्लेषण की एक विधि है जब कि सारणीयन समंकों को प्रस्तुत करने की एक विधि है।

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प्रश्न 3.
सारणी के कोई पाँच प्रमुख अंग लिखें।
उत्तर:

  1. सारणीयन संख्या
  2. शीर्षक
  3. शीर्ष टिप्पणी
  4. उप-शीर्षक व पक्तिशीर्षक
  5. सारणी का मुख्य भाग
  6. सारणी का मुख्य भाग

प्रश्न 4.
यदि सारणी में एक निश्चित संख्या को महत्त्व दिया जाना है तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
विशेष महत्त्व वाले समंकों को मोटे अंकों में लिखा जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
सरल सारणी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सरल सारणी वह सारणी है जो सांख्यिकीय आंकड़ों की किसी एक विशेषता अथवा गुण को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 6.
जटिल सारणी किसे कहते हैं?
उत्तर:
जटिल सारणी उस सारणी को कहते हैं जो कि एक से अधिक विशेषताओं को दर्शाती है।

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प्रश्न 7.
स्तंभों के शीर्षक को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
स्तंभों के शीर्षक को उप-शीर्षक कहते हैं।

प्रश्न 8.
आरेखीय प्रदर्शन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आरेखीय प्रदर्शन वह विधि है जिसके द्वारा आंकड़ों को आरेखों (दंड आरेख, आयत चित्र, वृत्तीय आरेख) द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 9.
आरेखों की कोई दो सीमाएं लिखो।
उत्तर:

  1. आरेख अनुमानों पर आधारित होते हैं
  2. ये विस्तृत जानकारी नहीं देते।

प्रश्न 10.
आरेखों के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  1. गोखों द्वारा आंकड़ों की प्रस्तुति मिनची होती है।
  2. इनका व्यापक प्रयोग होता है।

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प्रश्न 11.
सरल दंड आरेख पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
सरल दंड आरेखों में मूल्यों को दंडों की ऊंचाई द्वारा दिखाया जाता है। दण्डों की पीटाई तथा उनके बीच की दूरी एक समान रखी जाती है। ये आरेख जनसंख्या, उत्पादन तथा भौगोलिक आँकड़ों को प्रदर्शित करने में उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 12.
सूचना के स्रोत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूचना के स्रोत से अभिप्राय उस स्रोत से है जिससे आँकड़े लिए गए हैं।

प्रश्न 13.
बहुभुजी सारणी किसे कहते हैं?
उत्तर:
दो गुणों से अधिक विशेषताओं के आधार पर निर्मित की गई सारणी को बहुभुजी सारणी कहते हैं।

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प्रश्न 14.
एक अच्छी सांख्यिकीय सारणी की कोई तीन विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. यह सरल तथा संक्षिप्त होनी चाहिए
  2. स्पष्ट तथा देखने में आकर्षक होनी चाहिए
  3. विश्वसनीय होनी चाहिए।

प्रश्न 15.
सारणीयन में प्रयोग किया जाने वाला वर्गीकरण कितने प्रकार का होता हैं?
उत्तर:
चार प्रकार का –

  1. परिमाणात्मक
  2. गुणात्मक
  3. समय संबंधी तथा
  4. स्थान संबंधी।

प्रश्न 16.
परिमाणात्मक या मात्रात्मक वर्गीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
परिमाणात्मक वर्गीरण उस वर्गीकरण को कहते हैं, जिसमें वर्गीकरण का आधार ‘परिमाणात्मक विशेषताएं हैं। दूसरे शब्दों में इन विशेषताओं को मात्रा में मापा जा सकता है। उदाहरण के लिए आयु, ऊँचाई, उत्पादन, आय आदि मात्रात्मक विशेषताएं हैं।

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प्रश्न 17.
सारणी का मुख्य भाग कौन-सा है?
उत्तर:
सारणी का मुख्य भाग कलेवर (Body) है।

प्रश्न 18.
आँकड़ों को दर्शाने के लिए. मुख्य आरेख निम्नलिखित हैं –
उत्तर:

  1. ज्यामितीय आरेख (Geometric diagram)। जैसे-दंडभुज।
  2. आवृत्ति आरेख (Frequency diagram)।
  3. गणितीय रेखा आरेख (Arithmatic Line graph)।

प्रश्न 19.
सांख्यिकीय सारणी क्या है?
उत्तर:
सांख्यिकीय सारणी एक संयंत्र है जिसमें आँकड़ों को पंक्तियों और स्तम्भों में . व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।

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प्रश्न 20.
सारणीयन किसे कहते हैं?
उत्तर:
सांख्यिकीय आंकड़ों को सारणी के रूप में अर्थात् पंक्तियों तथा स्तंभों के रूप में प्रकट करने को सारणीयंन कहते हैं।

प्रश्न 21.
आयत चित्र का अर्थ बताएँ।
उत्तर:
यह वह चित्र है जो अखंडित श्रृंखलाओं से जुड़ी हुई आयातों (adjacent rectangles) द्वारा प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 22.
यदि सभी वर्ग अंतराल (Class Intervals) समान हैं तो आयत चित्र की चौड़ाई समान होगी या असमान?
उत्तर:
समान होगी।

प्रश्न 23.
आवृत्ति बहुभुज कैसे बनाया जाता है?
उत्तर:
आवृत्ति बहुभुज को आयत चित्र के सिरे के मध्य बिन्दुओं को जोड़कर बनाया जाता है।

प्रश्न 24.
श्रम पर खर्च कुल खर्चे का 30% है। इसकी कोण की डिग्री बताएँ।
उत्तर:
कोण की डिग्री = 30 × 3.6 = 108°

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प्रश्न 25.
102 मजदूरों में मुख्य मजदूर 31 हैं। मुख्य मजदूरों की कोण की डिग्री बताएँ।
उत्तर:
कोण की डिग्री = \(\frac{31}{102}\) × 360 = 1090

प्रश्न 26.
दो तोरण (Ogive) से कम और ‘से अधिक’ एक दूसरे को M बिन्दु पर काटते हैं। माध्यिका (Meidan) निकालने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
माध्यिका निकालने के लिए M बिन्दु से आधार रेखा पर लंब डालना चाहिए। आधार बिन्दु आधार रेखा को जिस बिन्दु पर काटेगा, वह बिन्दु माध्यिका प्रदर्शित करेगा।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित को प्रस्तुत करने के लिए किस प्रकार का आरेख अधिक प्रभावशली है?

  1. वर्ष विशेष की मासिक वर्षा।
  2. धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन।
  3. एक कारखाने में लागत-घटक।

उत्तर:

  1. काल श्रेणी आरेख।
  2. सरल दण्ड आरेख तथा
  3. वृत्त आरेख।

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प्रश्न 28.
जब वर्गान्तर असमान हैं तो आयत चित्र की ऊँचाई कैसे निर्धारित की जाती है?
उत्तर:
सबसे कम वर्गान्तर से वर्गान्तर जितना अधिक होगा, आयत की ऊँचाई के लिए उस वर्गान्तर की आवृत्ति उसी अनुपात से कम कर दी जाती है। मान लो एक वर्गान्तर न्यूनतम वर्गान्तर का दोगुना है तो ऐसी अवस्था में उसके आयत की ऊँचाई कर दी जाएगी। अर्थात् उसकी आवृत्तियाँ 6 हैं तो वह 3(6 ÷ 2) होंगी।

प्रश्न 29.
संचयी आवृत्ति के कितने रूप हो सकते हैं?
उत्तर:
संचयी आवृत्ति के दो रूप हो सकते हैं –
से कम’ तथा ‘से अधिक’। ‘से कम’ ओजाइन नीचे से ऊपर दाईं ओर उठती है और ‘से अधिक’ ओजाइब ऊपर से नीचे की ओर दाईं ओर ढालू होती है।

प्रश्न 30.
आयत चित्र बनाने के लिए समावेशी पर आधारित श्रृंखला को अपवर्ती वर्ग पर आधारित श्रृंखला में क्यों परिवर्तित करते हैं?
उत्तर:
समावेशी वर्ग पर आधारित शृंखला में अंतर होता है और आवृत्ति चित्र बनाने के लिये निरंतरता चाहिए। अतः निरन्तरता प्राप्त करने के लिए हम समावेशी वर्ग पर आधारित श्रृंखला को अपवर्जी वर्ग पर आधारित श्रृंखला में परिवर्तित करते हैं।

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प्रश्न 31.
ओजाइब का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:
ओजाइब का दूसरा नाम संचयी आवृत्ति वक्र या तोरण है।

प्रश्न 32.
दोनों ओजाइब की विशेष विशेषता क्या है?
उत्तर”
दोनों ओजाइब जिस बिन्दु पर एक दूसरे को काटते हैं उस बिन्दु से हमें माध्यिका प्राप्त होती है।

प्रश्न 33.
सरल दंड आरेख द्वारा कितने चरों को प्रदर्शित किया जा सकता है?
उत्तर:
सरल दंड आरेख द्वारा केवल एक ही चर को प्रदर्शित किया जा सकता है।

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प्रश्न 34.
किस प्रकार के दंड आरेख का हमें प्रयोग करना होगा, यदि हमें विभिन्न वर्षों के एक से अधिक चरों के मूल को प्रदर्शित करना हो तो?
उत्तर:
बहुदंड आरेख को।

प्रश्न 35.
हमें एक देश के आयात तथा निर्यात के मूल्यों को दंड आरेख द्वारा प्रदर्शित करना है। इसके लिये हम किस प्रकार के दंड आरेख का प्रयोग करेंगे?
उत्तर:
बहुदंड आरेख का।

प्रश्न 36.
एक उदाहरण दीजिए जहाँ सरल दंड आरेख का प्रयोग किया जा सकता है।
उत्तर:
जब विभिन्न जनगणना वर्षों में एक ही राज्य की जनसंख्या प्रदर्शित करनी हो।

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प्रश्न 37.
सरल दंड आरेख तथा बहुदंड आरेख में एक अंतर बताएँ।
उत्तर:
सरल दंड आरेख में एक ही चर के मूल्यों को विभिन्न वर्षों में व्यक्त किया जाता है। जबकि बहु दंड आरेख में एक से अधिक चर के मूल्यों को प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 38.
समय कालिक श्रृंखला किसे कहते हैं?
उत्तर:
समय कालिक श्रृंखला वह श्रृंखला है जहाँ किसी चर का मूल्य समयानुसार दिया हो, जैसे-विभिन्न वर्षों के कृषि उत्पादन के आँकड़े।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आंकड़ों के आरेखीय प्रस्तुतीकरण के लाभ लिखें।
उत्तर:
आँकड़ों के आरेखीय प्रस्तुतीकरण के लाभ (Avantages of diagrammatic presentation of data)

  1. आरेख आँकड़ों को प्रस्तुत करने का एक प्रभावशाली साधन हैं, क्योंकि आरेख रोचक तथा आकर्षक होते हैं।
  2. आरेख आँकड़ों को सरल तथा बोधगम्य बनाते हैं।
  3. ये समंकों के तुलनात्मक अध्ययन में सहायक होते हैं।
  4. इनका प्रयोग उत्पादन, व्यापार, वाणिज्य, परिवहन आदि के क्षेत्र में बहुत उपयोगी है।

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प्रश्न 2.
दंड आरेख की विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
विशेषताएँ (Features) –

  1. दंड आरेख एकपक्षीय (One Dimensional) होते हैं।
  2. दंड क्षैतिज (Horizontal) तथा शीर्ष (Vertical) दोनों रूप में हो सकते हैं।
  3. दंड आरेखों को आकर्षक बनाने के लिए सभी दंडों में रंग भर दिया जाता है।
  4. दंड आरेख कई प्रकार के होते हैं-जैसे सरल दंड आरेख, बहु दंड आरेख, घटक दंड आरेख, प्रतिशत घटक दंड आरेख आदि।

प्रश्न 3.
परिमाणात्मक वर्गीकरण का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 7

प्रश्न 4.
गुणात्मक वर्गीकरण का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 8

प्रश्न 5.
समयानुसार या कालिक वर्गीकरण का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
1995-2000 में एक चाय की दुकान की वार्षिक बिक्री –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 9

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प्रश्न 6.
वृत्त आरेख बनाने की विधि लिखें।
उत्तर:
वृत्त आरेख बनाने की विधि (Method of constructing a piediagram) –

  1. प्रत्येक दिए गए मूल्य को कुल मूल्य के प्रतिशत रूप में परिवर्तित किया जाता है। यदि मूल्य पहले से ही प्रतिशत में दिया गया है तो यह चरण छोड़ दिया जाता है।
  2. प्रतिशत मूल्य को.3.6 से गुणा करके उस मूल्य का कोण ज्ञात किया जाता है।
  3. पेंसिल और परकार की सहायता से एक उचित वृत्त बनाया जाता है।
  4. वृत्त में प्रत्येक मद का कोण बनाया जाता है।
  5. वृत्त आरेख के प्रत्येक खंड में अलग-अलग रंग भरे जाते हैं।
  6. वृक्त आरेख के प्रत्येक खंड में अलग-अलग रंग भरा जाता है।

प्रश्न 7.
तिशत घटक दंड आरेख तथा घटक दंड आरेख में अंतर बताएँ।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 10

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प्रश्न 8.
प्रतिशत घटक दंड आरेख बनाने की विधि में निहित चरण लिखें।
उत्तर:
प्रतिशत घटक दंड आरेख बनाने की विधि में निम्नलिखित चरण होते हैं –

  1. इन्हें बनाने के लिए पहले सभी समय (वर्षों आदि) से सम्बन्धित जोड़ को 100 मान लिया जाता है।
  2. दूसरे, सभी विभागों को प्रतिशत रूप में बदल दिया जाता है।
  3. चौथे, अलग-अलग समय (वर्षों) के अलग-अलग दंड बनाए जाते हैं, जिनकी ऊँचाई समान अथवा 100 होती है। फिर बाद में संचयी प्रतिशत के बराबर विभिन्न विभागों को काट दिया जाता है और उनमें अलग-अलग रंग भर दिया जाता है।

प्रश्न 9.
वृत्त आरेख बनाने की विधि लिखें।
उत्तर:
वृत्त आरेख की विधि के चरण इस प्रकार हैं –

  1. प्रत्येक दिए गए मूल्य को कुल मूल्य के प्रतिशत में परिवर्तित किया जाता है। यदि मूल्य पहले से ही प्रतिशत में हो तब यह चरण छोड़ दिया जाता है।
  2. प्रतिशत मूल्य को 3.6 से गुण करके उस मूल्य का कोण ज्ञात किया जाता है।
  3. पेंसिल और परकार की सहायता से एक उचित वृत्त का निर्माण किया जाता है।
  4. वृत्त में प्रत्येक मद का कोण बनाया जाता है।
  5. वृत्त आरेख. के प्रत्येक खंड में अलग-अलग रंग भरे जाते हैं।

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प्रश्न 10.
सामान्य प्रयोग में लाए जाने वाले आरेखों के विभिन्न रूप लिखें।
उत्तर:
सामान्य प्रयोग में लाए जानेवाले आरेखों के विभिन्न रूप निम्नलिखित हैं –
1. ज्यामितीय आरेख (Geometric diagrams):

  • दंड आरेख
  • बहुदंड आरेख
  • वृत्तीय आरेख

2. आवृत्ति आरेख (Frequency diagrams):

  • आयत चित्र
  • आवृत्ति बहुभुज
  • आवृत्ति वक्र तथा
  • तोरण

3. गणितीय समय ग्राफ (Arithmetic Time Graph):
काल श्रेणी आरेख।

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प्रश्न 11.
सामान्य उद्देश्य सारणी तथा विशेष उद्देश्य सारणी में अंतर बताएँ।
उत्तर:
सामान्य उद्देश्य सारणी का कोई महत्त्व नहीं होता। ये सामान्यतः प्रकाशित प्रतिवेदनों (Report) के पीछे दी जाती है। विभिन्न व्यक्ति इसका प्रयोग अपने ढंग से करते हैं। इसके विपरीत विशेष उद्देश्य सारणी किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाई गई होती है। यह प्रायः संक्षिप्त होती है।

प्रश्न 12.
स्थानिक वर्गीकरण का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 11

प्रश्न 13.
घटक दण्ड आरेख का प्रयोग कब किया जाता है? इस आरेख को बनाने की विधि लिखें।
उत्तर:
जब तथ्यों के जोड़ और उसके विभिन्न विभागों (जैसे-कॉलेज के विद्यार्थियों और उसके विभिन्न घटकों की संख्या जैसे लड़के तथा लड़कियों आदि) का प्रदर्शन करना हो तो घटक दण्ड आरेख का प्रयोग किया जाता है।

बनाने की विधि (Method of preparing):
पहले समय अथवा स्थान के आधार पर, तथ्यों के जोड़ के आधार दंड बनाए जाते हैं। बाद में प्रत्येक खंड के विभिन्न भागों में अलग-अलग रंग भरा जाता है परंतु एक वस्तु से संबंधित सभी दंडों के भागों में एक ही रंग भरा जाता है।

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित आवृत्ति वितरण से हम एक आयत चित्र बनाना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए हम वर्गान्तर में क्या परिवर्तन करेंगे?
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 13

प्रश्न 15.
सांख्यिकी में जनसंख्या (समग्र) का क्या अभिप्राय है? एकल, द्वि तथा बहु जनसंख्या समझाएँ।
उत्तर:
सांख्यिकी में जनसंख्या (समग्र) से अभिप्राय अनुसंधान क्षेत्र की सभी इकाइयों से होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी पाठशाला में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के मानसिक स्तर का अध्ययन करना चाहते हैं तो पाठशाला के सभी विद्यार्थी सांख्यिकी की दृष्टि से ‘जनसंख्या’ कहलाते हैं। जनसंख्या को समग्र भी कहते हैं। रोसन्दर (Rosander) के अनुसार, “समग्र विचाराधीन विषय इकाइयों का योग होता है।”

एकल समग्र से अभिप्राय है समग्र से सम्बन्धित केवल एक चर। जैसे जनसंख्या केवल आय। द्वि-समग्र से अभिप्राय है समग्र से सम्बन्धित दो चर। उदाहरण के लिए एक कक्षा के सभी छात्रों की ऊँचाई तथा वजन। बहु जनसंख्या से अभिप्राय समग्र के विषय से सम्बन्धित बहुत सारी जानकारी के आँकड़े। उदाहरण के लिए सभी परिवारों के उपभोग की सभी मदों का व्यय।

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प्रश्न 16.
अविछिन्न तथा खंडित (विछिन्न) चरों में अंतर बताएँ। उदाहरण देकर समझाइएँ।
उत्तर:
अविछिन्न तथा विछिन्न चरों में अंतर (Difference between Continuous Series):
एक चर को विभिन्न चर उस समय कहा जाता है जब वह विस्तार में कोई भी मूल्य ले सकता है। उसका मूल्य 1, 2, 3 भी हो सकता है और = \(\frac{1}{2}\), \(\frac{1}{3}\), \(\frac{3}{4}\), \(\frac{7}{8}\) अथवा \(\sqrt{2}\) या 1 414 …..। उदाहरण के लिए वस्तुओं की कीमतों, व्यक्तियों की ऊंचाई व भार तथा उनकी आय को अविछिन्न चर कहा जा सकता है तो इसे विछिन्न चर कहेंगे जैसे पूर्ण संख्या (whole number) को विछिन्न चर कहते हैं। जैसे-एक श्रेणी में विद्यार्थियों की संख्या आदि।

प्रश्न 17.
एक आदर्श वर्गीकरण के आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एक आदर्श वर्गीकरण के आवश्यक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. वर्गीकरण निरंतर का आकार उचित होना चाहिए।
  2. वर्गीकरण सरल होना चाहिए।
  3. उसमें निरन्तरता का गुण होना चाहिए।
  4. वह शुद्ध होना चाहिए।
  5. वह उद्देश्य के अनुकूल होना चाहिए।
  6. वह लोचदार होना चाहिए।
  7. उसमें व्यापकता का गुण होना। चाहिए।
  8. उसमें सजातीयता का गुण होना चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित आँकड़ों का आयत आरेख बनाएँ तथा बहुलक ज्ञात करें।
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उत्तर:
आँकड़ों का आवृत्ति आरेख बनाने से पहले हम संशोधित वर्ग बनाएँगे।
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प्रश्न 2.
नीचे दी गई आवृत्ति वितरण के आधार पर ‘से कम’ संचयी आवृत्ति वक्र बनाएँ।
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उत्तर:
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प्रश्न 3.
नीचे दी गई आवृत्ति वितरण के आधार पेर ‘से अधिक’ संचयी आवृत्ति वक्र बनाएँ।
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उत्तर:
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प्रश्न 4.
नीचे दी गई सूचना के आधार पर आरेखीय विधि द्वारा माध्यिका का निर्धारण करें। (Calculate median graphically with the help of following date)
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उत्तर:
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित सूचना को एक वृत्त आरेख में दिखाएँ –
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उत्तर:
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Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 6.
एक सारणी के मख्य भागों का वर्णन करें।
उत्तर:
एक सारणी के मुख्य भाग (Main parts ofa Table):
एक सांख्यिकी सारणी के मुख्य भाग इस प्रकार हैं –
1. सारणी की संख्या (Table Number):
सारणी को सबसे पहले एक संख्या (सारणी संख्या) अर्थात 1, 2, 3 …. आदि की जानी चाहिए। एक अध्ययन में तालिकाएं जिस क्रम में बनाई जाती हैं उसी के अनुसार उनकी संख्या दी जानी चाहिए। सारणी संख्या से उन्हें ढूँढ़ने में सहायता मिलती है तथा उनका उल्लेख सरलता से किया जा सकता है।

2. शीर्षक (Title):
प्रत्येक सारणी में संख्या के बाद सबसे ऊपर उसका शीर्षक दिया जाना चाहिए। शीर्षक मोटे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए ताकि तुरंत ही ध्यान आकर्षित कर सके। शीर्षक सरल, स्पष्ट और छोटा होना चाहिए। शीर्षक इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उसे पढ़ते ही ज्ञात हो जाए कि –

  • आँकड़े किस समस्या (What) से संबंधित हैं।
  • ऑकड़े किस समय (When) से संबंधित हैं।
  • ऑकड़े किस स्थान (Where) से संबंधित हैं।
  • आँकड़ों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है। एक अच्छा शीर्षक छोटा, परंतु पूर्ण होता है।

3. शीर्ष टिप्पणी (Head Note):
यदि शीर्षक से पूरी सूचना प्रकट नहीं होती तो उसके तुरंत नीचे शीर्ष टिप्पणी (Head Note) दी जाती है। इसमें एक अतिरिक्त सूचना दी जाती है जो शीर्षक में नहीं दी जा सकी। उदाहरण के लिए शीर्षक टिप्पणी में यह बताया जाता है कि आँकड़े किस इकाई में व्यक्त किए गए हैं। उन्हें कोष्ठक (Brackets) में लिखा जाना चाहिए।

4. पंक्ति शीर्षक (Stubs):
सारणी की पंक्तियों (Rows) के शीर्षक को पंक्ति शीर्षक कहा जाता है। इसके द्वारा सरल भाषा में ज्ञात होता है कि पंक्तियों द्वारा क्या दिखाया जा रहा है।

5. उपशीर्षक (Caption):
सारणी के स्तंभों (Columns) के शीर्षक को उपशीर्षक कहा जाता है। इसके शीर्षक से यह ज्ञात होता है कि कॉलम मद की किस विशेषता को बता रहे हैं।

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प्रश्न 7.
अंतर बताएँ।

  1. दंड आरेख तथा (Bar diagram)
  2. आयत चित्र (Histogram)

उत्तर:
दंड आरेख तथा आयत चित्र में अंतर (Difference between bar diagram and histogram):
दंड ओरख वह आरेख है जिसमें आँकड़ों को दंडों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दंडों की ऊँचाई चरों के मूल्यों पर निर्भर करती है जबकि इनकी चौड़ाई केवल आरेख को आकर्षक बनाने के लिए ली जाती है। दंडों के बीच दूरी समान होती है।

ये सामान्यतः व्यक्तिगत मूल्यों, कालश्रेणियों, भौगोलिक श्रेणियों को प्रदर्शित करने में प्रयोग में लाई जाती हैं। इसके विपरीत आयत चित्र आवृत्ति वितरण को प्रस्तुत करता है। इसमें वर्ग अन्तरालों को आवृत्तियों के समीपवर्ती (Adjacent) आयतों में प्रकट किया जाता है। इसमें वर्ग अन्तरालों को X अक्ष पर लेते हैं तथा आवृत्तियों को Y अक्ष पर लेते हैं।
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प्रश्न 8.
आरेखों द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों के प्रदर्शन लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आरेखों के लाभ (Advantages of Diagrams):
यह सर्वविदित है कि जैसे-जैसे समंकों का जमघट अधिक होता जाता है, उन्हें समझने में असुविधा होती है तथा समय लगता है। जनसाधारण अंकों में रुचि नहीं रखते हैं। यदि हम अपनी बातों को अंकों के द्वारा समझने की बजाय किसी अन्य सरल साधन द्वारा समझाने का प्रयत्न करें, जहाँ अंकों का कम-से-कम प्रयोग किया गया हो, तो हमारी बात जनसाधारण के लिए सरल, समझने तथा याद करने के योग्य हो जाती है। आरेखों के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं –

1. सरल (Simple):
आरेखों की सहायता से जटिल आँकड़ों को सरल तथा सुबोध बनाया जा सकता है।

2. समझने में सुगमता (Easy to understand):
आरेखों को समझने के लिए विशेष शिक्षा या ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती।

3. समय व श्रम की बचत (Saving of time and labour):
आरेखों की सहायता से आँकड़ों को समझने में बहुत कम समय लगता है।

4. अधिक समय तक स्मरणीय (Memorable for a long time):
अंकों को कुछ समय बाद भूल जाना स्वाभाविक है, लेकिन आरेखों द्वारा आँकड़ों की एक ऐसी छाप मस्तिष्क पर पड़ जाती है कि आँकड़े बहुत दिनों तक याद रहते हैं।

5. आरेख आकर्षक होते हैं (Diagrams are attractive):
अंकों की अपेक्षा रेखाचित्र अधिक आकर्षक होते हैं। इसलिए मेलों, प्रदर्शनियों आदि में जनता को प्रभावित करने के आरेखों का प्रयोग अधिक उपयोगी होता है।

6. तुलना में सहायक (Easy to comprison):
रेखाचित्रों की सहायता से सांख्यिकी सामग्री में तुलना बहुत सरल हो जाती है। उदाहरणार्थ दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले वर्ष और इस वर्ष के परीक्षा परिणामों की तुलना रेखाचित्रों द्वारा बड़े सुचारु रूप से की जा सकती है।

7. सूचना प्रसार में सहायक (Publicity):
रेखाचित्रों द्वारा सूचना प्रसार आसानी से किया जा सकता है।

8. सृजनात्मक मनोरंजन (Creative entertainment):
रेखाचित्र सूचना प्रदान करने के साथ-साथ मनोरंजन भी करते हैं। अंकों को देखने से जहाँ आँखें तिलमिला जाती हैं, वहाँ आरेखों को देखने से रुचि बढ़ती है और मनोरंजन भी हो जाता है।

9. सार्वभौमिक उपयोगिता (Universal Utility):
विभिन्न लाभों के कारण अनेक क्षेत्रों में सांख्यिकी रेखाचित्रों का बहुत प्रयोग होता है। व्यापार, वाणिज्य तथा विज्ञापन के क्षेत्र में से बहुत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण होते हैं। इस प्रकार रेखाचित्रों की उपयोगिता सार्वभौमिक है। ये सभी क्षेत्रों में नवजीवन प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 9.
सारणीयन के लाभ लिखें।
उत्तर:
सारणीयन के लाभ (Advantages of tabulation):

1. समझने में सरलता (Easy to understand):
सारणी से आंकड़ों को सरलता से समझा जा सकता है, क्योंकि सारणी आंकड़ों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती है।

2. संक्षिप्त (Simple):
सारणी द्वारा अव्यवस्थित आंकड़ें कम-से-कम स्थान में इस प्रकार संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं कि उनसे अधिक-से-अधिक सूचना प्राप्त हो सके।

3. तुलना में सुविधा (Convenient in comparision):
सारणी द्वारा आंकड़ों को विभिन्न वर्गों में प्रस्तुत किया जाता है। अतः उनकी तुलना करना सुविधाजनक हो जाता है।

4. प्रस्तुतीकरण में सहायक (Helpful Presentation):
सारणी की सहायता से ही आँकड़ों को आरेखों तथा रेखा-आरेखों द्वारा आकर्षक ढंग से प्रस्तुत कराना संभव हो जाता है।

5. विश्लेषण में सहायक (Helpful in Analysis):
सारणी द्वारा आँकड़ों के विश्लेषण में सहायता मिलती है। आँकड़ों को सारणी के रूप में व्यवस्थित करके ही माध्य (Mean), उपकिरण (Dispersion) आदि ज्ञात किए जाते हैं।

6. आँकड़ों की मुख्य विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं (Clarifies the Chief Charactetistic of Data):
सारणी द्वारा आकड़ों की मुख्य विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं। आँकड़ों को याद रखना भी सरल हो जाता है।

7. बचत (Economic):
सारणी द्वारा आँकड़ों को कम स्थान में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके फलस्वरूप समय तथा कागज की बचत होती है। आवश्यक आँकड़ों को आसानी से ज्ञान किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण में विवरणात्मक तथा सारणीयन विधियों की तुलना करें।
उत्तर:
आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण कई विधियों से किया जा सकता है। उनमें दो विधियाँ विवरणात्मक विधि तथा सारणीयन विधि है। विवरणात्मक विधि से आँकड़ों का विवरण दिया जाता है जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2002 के अनुसार भारत में 2000-2001 में खाद्यान्नों का उत्पादन 2000 मिलियन टेन था। जिसमें चावल, गेहूँ और अन्य फसलों का उत्पादन क्रमशः 85.5, 69.0 और 45.5 मिलियन टन था। कुल उत्पादन में इनका प्रतिशत योगदान क्रमशः मिलियन टन था। कुल उत्पादन में इनका प्रतिशत योगदान क्रमशः 42.75%, 34.50% और 22.75% था।

सारणीयन विधि में ऊपर दिए आँकड़ों को एक सारणी में प्रस्तुत किया जाता है ताकि आंकड़ों को सरलता से समझे जा सके। ऊपर दिए गए तथ्यों को सारणी में निम्न प्रकार प्रस्तुत कर सकते है –
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प्रश्न 11.
निम्नलिखित को संक्षेप में समझाइए। (Write short notes on)
(अ) विवतर्मुखी वर्ग
(ब) असमान वर्गान्तर
(स) संचयी आवृत्ति वितरण।
उत्तर:
(अ) विवतर्मुखी वर्ग-विवतर्मुखी वर्ग वह है जिसमें या तो निम्नतम वर्ग की निम्न सीमा या उच्चतम वर्ग की ऊपरी सीमा को छोड़ा है। इस प्रकार के वर्गों का प्रयोग बहुत कम होता है, क्योंकि विवतर्मुखी वर्ग का मध्य मूल्य नहीं ज्ञात कर सकते। उदाहरणार्थ – 10 से कम, 10-20, 20-30, 30-40, 40 और अधिक।

(ब) असमान वर्गान्तर-असमान वर्गान्तर से अभिप्राय ऐसी अखंडित श्रृंखला से है जिसमें वर्गों के बीच का अंतर एक समान नहीं होता। हम ऐसे वर्गों की आवृत्ति की तुलना नहीं कर सकते। आवृत्तियों की तुलना करने के लिए हम वर्गान्तरों को समान मानकर आवृत्तियों की पुनर्गणना द्वारा प्रत्येक वर्ग की आवृत्तियाँ ज्ञात करके तुलना करते हैं।

(स) संचयी आवृत्ति वितरण-जब विभिन्न मूल्यों की आवृत्तियों को क्रमशः जोड़कर रखा जाता है तो उसे संचयी आवृत्ति वितरण कहते हैं। स्पष्ट है कि अंतिम वर्ग की संचयी आवृत्ति सब वर्गों की आवृत्तियों का योगफल होता है। संचयी आवृत्ति वितरण को दो रूपों में व्यक्त किया जाता है –

  • से कम (Less than type)
  • से अधिक (More than type)।

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प्रश्न 12.
संचयी आवृत्ति वितरण किसे कहते हैं? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
संचयी आवृत्ति वितरण (Cumulative frequency distribution):
संचयी आवृत्ति वितरण उस आवृत्ति वितरण को कहते हैं, जिसमें आवृत्तियों को सरल विधि से वर्गानुसार अलग-अलग न लिखकर संचयी रूप में लिखा जाता है। इस प्रकार के आवृत्ति वितरण के अन्तर्गत केवल एक सीमा (निचली, ऊपरी) दी जाती है। यदि वर्ग समूह में निचली सीमा के आधार पर संचयी आवृत्ति दी गई है तो ‘से कम’ शब्दों का प्रयोग लिख कर किया जाता है। दोनों पर की गई संचयी आवृत्तियों के उदाहरण नीचे दिए गए हैं।
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संचयी आवृत्ति वितरण का महत्त्व निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जाता है:

  1. संचयी आवृत्ति वितरण की सहायता से हम किसी दिए गए चर से कम या अधिक मूल्य ज्ञात कर सकते हैं।
  2. विभाजन मूल्यों को ज्ञात करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है।
  3. किसी वर्गान्तर विशेष में सम्मिलित मदों की संख्या भी ज्ञात की जा सकती है।

प्रश्न 13.
आयत बहुभुज बनाने के लिए असमान वर्गान्तर पर आवृत्तियों का संशोधन क्यों किया जाता है? आवृत्तियों को संशोधित करने की विधि लिखो।
उत्तर:
बड़े वर्गान्तर को न्यूनतम वर्गान्तर के बराबर लाने के लिए आवृत्तियों में संशोधन किया जाता हैं। मान लो न्यूनतम वर्गान्तर 10 है और उच्च वर्ग (40 – 70) में वर्गान्तर 30 है और उसकी आवृत्ति 15 है। अत: 40 – 70 वर्ग के तीन वर्ग 40 – 50, 50 – 60 तथा 60 – 70 बनते हैं और उनकी आवृत्तियाँ 15 तीन वर्गों में बँट जाती हैं और प्रत्येक वर्ग की आवृत्ति 5(5 + 5 + 5) होती है। आवृत्तियों में संशोधन करने के लिए न्यूनतम वर्गान्तर लेते हैं। कोई वर्गान्तर न्यूनतम वर्गान्तर किया जाता है –
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प्रश्न 14.
निम्नलिखित आँकड़ों को एक आयत चित्र द्वारा प्रस्तुत कीजिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 15.
निम्नलिखित आँकड़ों से एक आयत चित्र बनाइए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 37
उत्तर:
प्रश्न में वर्गान्तर समावेशी विधि (Inclusive method) द्वारा दिए गए हैं। अतः इनमें पहले संशोधन करना आवश्यक होगा ताकि समीपवर्ती आयतें बन जाएँ।
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प्रश्न 16.
भारत सरकार को पिछली तीन वर्षों के दौरान करों से प्राप्त आगम के बारे में निम्न जानकारी उपलब्ध है –
वर्ष 1997 – 98 में सरकार को कर-आगम के रूप में कुल 77,693 करोड़ रुपए की प्राप्ति हुई। इसमें से 11,165 करोड़ रुपए प्रत्यक्ष करों तथा 66,528 करोड़ रुपए परोक्ष करों के रूप में प्राप्त हुए। वर्ष 1998-99 में यह राशि क्रमशः 89,303 करोड़ रुपए, 13,397 करोड़ रुपए तथा 75,906 करोड़ रुपए थी। 1999-2000 में कुल राशि। 1.02,896 करोड़ रुपए तथा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों का योगदान क्रमशः 15,338 करोड़ रुपए तथा 87,558 करोड़ रुपए था।
उत्तर:
भारत सरकार को करों से प्राप्त आगम
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 40

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प्रश्न 17.
भारत में चीनी निर्यात से आय के आँकड़े नीचे दिए गए हैं। इन्हें निरपेक्ष कालिक आरेख में प्रस्तुत कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 41
उत्तर:
X अक्ष पर वर्ष और Y अक्ष पर आय (करोड़ रुपए में) प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक वर्ष के सामने आय के चिह्नों को लगाइए, फिर चिह्नों को छूती हुई रेखा बनाइए। इस आरेख को निरपेक्ष कालिक आरेख कहते हैं, जैसा कि नीचे आरेख में दिखलाया गया है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 42a

प्रश्न 18.
द्विवीय आरेख (Two dimentional) किसे कहते हैं? नीचे दो परिवारों के आय-व्यय सम्बन्धी आँकड़ें दिए गए हैं। उन्हें द्विवीम आरेख द्वारा निरपेक्ष (Absolute) तथा सापेक्ष रूप में दिखाएँ।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 43
उत्तर:
द्वितीय आरेख उस रेखाचित्र को कहते हैं जिसमें लम्बाई के साथ-साथ चौड़ाई को भी दिखाया जाता है। चौड़ाई कुल मूल्यों के अनुपात में होती है। इन्हें निरपेक्ष (Absolute) तथा सापेक्ष (Relative) दो रूपों में दिखाया जा सकता है। निरपेक्ष में दिए गए मूल्यों को आरेख में प्रदर्शित करते हैं जबकि सापेक्ष द्विविम आरेख के मूल्यों को प्रतिशत में बदलकर प्रतिशत खंड़ों में काटकर लिखते हैं।

सापेक्ष द्विविम आरेख (Relative Two Dimensional):
तुलनात्मक अध्ययन के लिए मूल्यों को प्रतिशत में बदल लेते है। इस प्रकार ऊँचाई समान हो जाती है और चौड़ाई कुल व्यय के अनुपात में रखी जाती है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 44
निरपेक्ष द्विविम आरेख (Absolute Two Dimensional):
आय का अनुपात 500:1000 = 1:2
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प्रश्न 19.
भारत में 1951, 1961, 1971, 1981 और 1991 तथा 2001 की जनगणना में कुल जनसंख्या क्रमशः 361, 38, 439, 23, 548, 16, 683.3, 843.9 तथा 1020 मिलियन थी। कुल जनसंख्या में पुरुषों की संख्या क्रमश: 185.68, 226.29, 284.05, 353.9, 441.8 तथा 530 मिलियन थी तथा स्त्रियों की संख्या क्रमशः 175.70, 212.94, 264.11, 329, 4, 402.1 तथा 490 मिलियन थी। इन आँकड़ों को उपयुक्त सारणी में प्रस्तुत करें।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या (Population of India) दस लाख में।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 46

प्रश्न 20.
भारत में 2004 – 2005 में खाद्यान्नों का उत्पादन 172.25 मिलियन टन था, जिसमें चावल, गेहूँ और अन्य फसलों का उत्पादन क्रमश: 70, 76, 53.99 और 45.0 मिलियन टन था। कुल उत्पादन में इनका प्रतिशत योगदान क्रमशः 42, 0, 32.0 तथा 26.0 था। दी गई सूचना को एक उपयुक्त सारणी में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
2004 – 2005 में खाद्यान्नों का उत्पादन
(Production of Food-grain during 2004 – 2005):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 47

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प्रश्न 21.
निम्नलिखित विवरण को एक तालिका में प्रदर्शित करें भारत की जनगणना 2001 के अनुसार भारत की जनसंख्या बढ़कर 102 करोड़ हो गई, जिसमें 49 करोड़ महिलाएँ हैं और 53 करोड़ पुरुष हैं। 74 करोड़ लोग ग्रामीण भारत में रहते हैं और केवल 28 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं। सम्पूर्ण भारत में 62 करोड़ लोग काम करने वाले व्यक्ति नहीं हैं और 47 करोड़ लोग काम करने वाले हैं। शहरी जनसंख्या में 19 करोड़ काम करने वाले कर्मचारी नहीं हैं और 9 करोड़ काम करने वाले कर्मचारी हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 74 करोड़ लोगों में 31 करोड़ काम पर लगे हुए हैं। इस सूचना को एक तालिका द्वारा दिखाएँ।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 4 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण part - 2 img 48

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समंकों को खानों एवं पंक्तियों में व्यवस्थित करने को कहते हैं –
(a) वर्गीकरण
(b) सारणीयन
(c) चित्रमय प्रदर्शन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) सारणीयन

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प्रश्न 2.
एक अच्छी सारणी की विशेषता है –
(a) सुन्दर
(b) स्वर्य परिचायक
(c) संक्षिप्त
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
निम्न में कौन अधिक प्रभावशाली होती/होता है –
(a) सारणी
(b) त्रिमय प्रदर्शन
(c) वर्गीकरण
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) त्रिमय प्रदर्शन

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प्रश्न 4.
दो या अधिक चरों के मूल्यों को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है –
(a) दण्ड चित्र
(b) बहुगुणी दण्ड चित्र
(c) अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बहुगुणी दण्ड चित्र

प्रश्न 5.
चित्रमय प्रदर्शन की उपयोगिता है –
(a) सार्वभौमिक
(b) राष्ट्रीय
(c) स्थानीय
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सार्वभौमिक

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प्रश्न 6.
सारणी स्रोत लिखा जाता है –
(a) कलेवर में
(b) सारणी के ऊपर
(c) सारणी के नीचे
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) सारणी के नीचे

प्रश्न 7.
सारणी शीर्षक को प्रायः लिखा जाता है –
(a) कलेवर में
(b) सारणी के ऊपर
(c) सारणी के नीचे
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) सारणी के ऊपर

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प्रश्न 8.
चित्रमय प्रदर्शन का सबसे सरल रूप है –
(a) सरल दण्ड चित्र
(b) वृत्त चित्र
(c) चित्र व लेख
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सरल दण्ड चित्र

प्रश्न 9.
कालिक चित्र में आँकड़ों को दर्शाया जाता है –
(a) यथातथ्य रूप में
(b) प्रतिशत में
(c) अनुपात में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) प्रतिशत में

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प्रश्न 10.
आवृत्ति वितरण आयत चित्र बनाए जाते हैं –
(a) व्यक्तिगत श्रृंखला में
(b) अखण्डित श्रृंखला में
(c) खण्डित श्रृंखला में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) अखण्डित श्रृंखला में

प्रश्न 11.
आवृत्ति आयत चित्र में आवृत्तियों का दर्शाया जाता है –
(a) x – अक्ष पर
(b) y – अक्ष पर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) y – अक्ष पर

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प्रश्न 12.
आवृत्ति आयत चित्र में वर्गान्तराल दर्शाए जाते हैं –
(a) x – अक्ष पर
(b) y – अक्ष पर
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) y – अक्ष पर

प्रश्न 13.
आवृत्ति आयत चित्र बनाते समय ध्यान रखा जाता है –
(a) उपयुक्त शीर्षक
(b) पैमाना
(c) कृत्रिम आधार रेखा
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 14.
आवृत्ति आयत चित्र बनाते समय x – अक्ष पर दर्शाते हैं –
(a) वर्ग अंतराल
(b) आवृत्ति
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) वर्ग अंतराल

प्रश्न 15.
आवृत्ति वक्र के अंदर क्षेत्र समानुपाती है –
(a) आवृत्तियों के
(b) वर्ग अंतरालों के
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) आवृत्तियों के

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प्रश्न 16.
काल श्रेणी आरेख के x-अक्ष पर दर्शाया जाता है –
(a) चर मूल्य
(b) समय
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समय

प्रश्न 17.
समावेशी श्रृंखला से आयत चित्र बनाने के लिए इस श्रृंखला को दिलाते हैं –
(a) अपवर्जी श्रृंखला में
(b) खंडित श्रृंखला में
(c) व्यक्तिगत श्रृंखला में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) अपवर्जी श्रृंखला में

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प्रश्न 18.
‘से अधिक’ आवृत्ति वक्र का ढाल होता है –
(a) धनात्मक
(b) ऋणात्मक
(c) x – अक्ष के समांतर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) ऋणात्मक

प्रश्न 19.
‘से कम’ आवृत्ति वक्र का ढाल होता है –
(a) धनात्मक
(b) ऋणात्मक
(c) x – अक्ष के समांतर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) धनात्मक

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

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कबीर के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को बौराया क्यों कहा है?
उत्तर-
कबीर ने संसार को ‘बौराया हुआ’ इसलिए कहा है क्योंकि संसार के लोग सच सहन नहीं कर पाते और न उसपर विश्वास करते हैं। उन्हें झूठ पर विश्वास हो जाता है। कबीर संसार के लोगों को ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य बातें बताता है, ये सब बातें परम्परागत ढंग से भिन्न है, अत: लोगों को अच्छी नहीं लगती। इसलिए कबीर ने ऐसा कहा है कि यह संसार बौरा गया है, अर्थात पागल-सा हो गया है।

प्रश्न 2.
“साँच कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना” कबीर ने यहाँ किस सच और झूठ की बात कही है?
उत्तर-
कबीर ने बाह्याडंबरों से दूर रहकर स्वयं को पहचानने की सलाह दी है। आत्मा का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। कबीर संसार के लोगों को ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य बातें बताता है, ये सब परंपरागत ढंग से भिन्न है, अत: लोगों को यह पसंद नहीं है। संसार के लोग सच को सहन न करके झूठ पर विश्वास करते हैं। इस प्रकार कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के बाह्यडंबरों पर तीखा कटाक्ष किया है।

प्रश्न 3.
कबीर के अनुसार कैसे गुरु-शिष्य अन्तकाल में पछताते हैं? ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-
कबीर के अनुसार इस संसार में दो तरह के गुरु और शिष्य मिलते हैं। एक कोटि है सदगुरु और सद् शिष्य की जिन्हें तत्त्व ज्ञान होता है, जो विवेकी होते हैं, जिन्हें जीव-ब्रह्म के सम्बन्ध का ज्ञान होता है, ऐसे सदगुरु और शिष्यों में सद् आचार भरते हैं। इनका अन्तर-बाह्य एक समान होता है। ये अहंकार शून्य होते हैं। गुरु-शिष्य की दूसरी कोटि है असद गुरु-और असद शिष्य की। इस सम्बन्ध में कबीर ने एक साखी में कहा है-

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

जाके गुरु अंधरा, चेला खरा निरंध,
अंधा-अधे ठेलिय, दोनों कूप पड़प।

असद् अविवेकी बनावटी गुरु सद्ग्रन्थों का केवल उच्चारण करते हैं, वाचन करते-कराते हैं, ग्रन्थों में विहित, निहित तथ्यों को अपने आचरण में उतारते और उतरवाते नहीं हैं। अपरिपक्व ज्ञान और उससे उत्पन्न अभिमान को अपनी आजीविका बना लेते हैं। समय रहते ये चेत नहीं पाते और अन्त में जब आत्मोद्धार के लिए समय नहीं बच पाता, तब ये बेचैन हो जाते हैं। किन्तु अब इनके पास पछतावे के अलावा कुछ बचता ही नहीं है।

प्रश्न 4.
“हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना
आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मर्म न काहू जाना।
इन पंक्तियों का भावार्थ लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ अपने समय के और अपनी तरह के अनूठे समाज-सुधारक चिंतक कबीर रचित पद से उद्धृत है। इन पंक्तियों में परम सत्ता के एक रूप का कथन हुआ है। यही मर्म है, यही अन्तिम सत्य है कि परम ब्रह्म, अल्लाह, गॉड सभी एक ही हैं। किन्तु अज्ञानतावश अलग-अलग धर्म सम्प्रदायों में बता मानव समाज अपने-अपने भगवान से प्यार करता है, दूसरे के भगवान को हेय समझता है। अपने भगवान के लिए अन्ध-भक्ति दर्शाता है। उनकी यह कट्टरता, बद्धमूलता, इतनी प्यारी होती है कि जरा-जरा सी बात पर धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं।

दो सम्प्रदायों के बीच का सौहार्द्र वैमनस्य में बदल जाता है। हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं और लड़कर कट मर जाते हैं। यदि उन्हें परम तत्त्व का, परम सत्य का, मूल-मर्म का ज्ञान होता तो पूरब-पश्चिम, मंदिर-मस्जिद, पूजा-रोजा, राम-रहीम में भेद नहीं करते। एक-दूसरे के लिए प्राणोत्सर्ग करते न कि एक-दूसरे के खून के प्यासे होते।

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प्रश्न 5.
‘बहुत दिनन के बिछुरै माधौ, मन नहिं बांधै धीर’ यहाँ माधौ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर-
कबीर निर्गुण-भक्ति के अनन्य उपासक थे। उन्होंने परमात्मा को कण-कण में देखा है, ज्योति रूप में स्वीकारा है तथा उसकी व्याप्ति चराचर संसार में दिखाई है। इसी व्याप्ति को अद्वैत सत्ता में देखते हुए उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति दी है। कबीर ने ईश्वर को “माधौ” कहकर पुकारा है।

प्रश्न 6.
कबीर ने शरीर में प्राण रहते ही मिलने की बात क्यों कही है?
उत्तर-
प्रेम में यों तो सम्पूर्ण शरीर मन, प्राण सभी सहभागी होते हैं किन्तु आँखों की भूमिका अधिक होती है। विरह की दशा में आँखें लगातार प्रेमास्पद की राह देखती रहती हैं। विरही प्रेमी की आंकुलता-व्याकुलता का अतृप्ति का ज्ञापन आँखों से ही होता है फिर इसका क्या भरोसा कि मृत्यु के बाद यही शरीर पुनः प्राप्त हो। प्रेम यदि इसी जन्म और मनुष्य योनि में हुआ है, विरह की ज्वाला में यदि यही शरीर, मन, प्राण दग्ध हो रहे हैं तो फिर प्रेम को सार्थक्य भी तभी प्राप्त होगा जब शरीर में प्राण रहते इसी जन्म में प्रभु से मिलन हो जाए। विरह मिलन में बदल जाए। यही कारण है कि कबीर ने शरीर में प्राण रहते ही मिलते ही बात कही है।

प्रश्न 7.
कबीर ईश्वर की मिलने के लिए बहुत आतुर हैं। क्यों?
उत्तर-
हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग भक्तिकाल के निर्गुण भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि कबीरदास ने ‘काचै भांडै नीर’ स्वयं को तथा ‘धीरज’ अर्थात् धैर्य की प्रतिमूर्ति ईश्वर को कहा है। अपनी व्याकुलता तथा प्रियतम से मिलकर एकाकार होने की उनकी उत्कंट लालसा उन्हें आतुर बना देती है। तादात्म्य की उस दशा में कवि अपने जीवन को कच्ची मिट्टी का घड़ा में भरा पानी माना है। यह शरीर नश्वर है। मृत्यु शाश्वत सत्य है कवि इन लौकिक दुखों (जीवन-मृत्यु) से छुटकारा पाकर ईश्वर की असीम सत्ता में विलीन होना चाहता है। अतः कबीर की ईश्वर से मिलने की आतुरता अतीव तीव्र हो गई है।

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प्रश्न 8.
दूसरे पद के आधार पर कबीर की भक्ति-भावना का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-
हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित कबीर रचित द्वितीय पद कबीर की भक्ति भावना का प्रक्षेपक है। वस्तुत: कबीर की भक्ति- भावना को एक विशिष्ट नाम दिया है-“रहस्यवाद”। यह रहस्यवाद साहित्य की एक स्पष्ट भाव धारा है, जिसका किसी रहस्य से कोई लेना-देना नहीं है। आत्मा-परमात्मा को प्रणय-व्यापार, मिलन-विरह आदि रहस्यवाद का उपजीव्य है।

इस रहस्यवाद में कवि स्वयं को स्त्री या पुरुष मानकर ईश्वर, आराध्य या परम ब्रह्म के साथ अपने विभिन्न क्रिया व्यापारों, क्षणों और उपलब्धियों का अत्यंत प्रांजल, भाव प्रवण वर्णन करती है।

सूफी संत की जहाँ आत्मा पुरुष और परमात्मा को नारी रूप में चित्रित करते हैं, वहाँ कबीर आदि संत कवियों ने स्वयं को नारी, प्रिया, प्रेयसी आदि के रूप में प्रस्तुत करते हुए परमब्रह्म, ईश्वर, . साईं, सद्गुरु, कर्त्तार आदि के साथ अपने रभस प्रसंग का स्नेहिल, क्षणों का निष्कलुष और प्रांजल वर्णन किया है।

कबीर की भक्ति भाव रहस्यवाद, प्रगल्भ इन्द्रिक बिम्बों प्रतीकों से पूर्ण है किन्तु शृंगारिक रचनाओं की तरह कामोद्दीपक नहीं है, जुगुप्सक नहीं है। “मेरी चुनरी में लग गये दाग” लिखकर भी कबीर का रहस्यवाद पुरइन के पत्र पर पानी की बून्द की तरह निर्लिप्त है, शीलगुण सम्पन्न है।

प्रश्न 9.
बलिया का प्रयोग सम्बोधन में हुआ है। इसका अर्थ क्या है?
उत्तर-
कबीर रचित पद में बलिया सम्बोधन शब्द आया है जिसका कोशगत अर्थ ‘बलवान’ है। किन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि कबीर भाषा के डिक्टेटर हैं। “बाल्हा” शब्द ‘बलिया’ का विकृत रूप है जिसका प्रयोग कबीर ने एक अन्य पद में किया है बाल्हा आओ हमारे गेह रे। कबीर के मत से बलिया का अर्थ सर्वशक्ति सम्पन्न परमपुरुष, भर्तार और पति ही है।

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प्रश्न 10.
प्रथम पद में कबीर ने बाह्याचार के किन रूपों का जिक्र किया है? उन्हें अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
परम्परा-भंजक; रूढ़ि-भंजक, समाज-सुधारक कबीर रचित प्रथम पद में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदायों में व्याप्त आडम्बर पूर्ण बाह्याचारों का उल्लेख हुआ है।

तथाकथित नेमी द्वारा (नियमों का कठोरता से अनुपालन करने वाले) प्रात:काल प्रत्येक ऋतु और अवस्था में स्नान करना, पाहन (पत्थर) की पूजा करना, आसन मारकर बैठना और समाधि लगाना पितरों (पितृ) की पूजा, तीर्थाटन करना, विशेष प्रकार की टोपी, पगड़ी को धारण करना, तरह-तरह के पदार्थों की माला (तुलसी, चन्दन, रुद्राक्ष और पत्थरों की मालाएँ) माथे पर विभिन्न रंगों और रूपों में, गले में कानों के आस-पास बाहुओं पर तिलक-छापा लगाना ये सभी बाह्याडम्बर है। इनका विरोध मुखर स्वर में कबीर ने किया है।

प्रश्न 11.
कबीर धर्म उपासना के आडंबर का विरोध करते हुए किसके ध्यान पर जोर देते हैं?
उत्तर-
संत कबीर ने हिन्दू और मुसलमानों के ढोंग-आडंबरों पर करारी चोट की है। उन्होंने धर्म के बाहरी विधि विधानों, कर्मकांडों-जप, माला, मूर्तिपूजा, रोजा, नमाज आदि का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि हिन्दू और मुसलमान आत्म-तत्त्व और ईश्वर के वास्तविक रहस्य से अपरिचित हैं, क्योंकि मानवता के विरुद्ध धार्मिक कट्टर और आडम्बरपूर्ण कोई भी व्यक्ति अथवा : .. धर्म ईश्वर की परमसत्ता का अनुभव नहीं कर सकता।

कबीर ने स्वयं (आत्मा) को पहचानने पर बल देते हुए कहा है कि यही ईश्वर का स्वरूप है। आत्मा का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

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प्रश्न 12.
आपस में लड़ते-मरते हिन्दू और तर्क को किस मर्म पर ध्यान देने की सलाह कवि देता है?
उत्तर-
मुगल बादशाह बाबर के जमाने से हिन्दू-मुसलमान अपने पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण लड़ते-मरते चले आ रहे हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द्र की जगह साम्प्रदायिकता का जहर पूरे समाज में घुला हुआ है। दोनों ही सम्प्रदायों का तथाकथित पढ़ा-लिखा और अनपढ़ तबका ‘ईश्वर’ की सत्ता, अवस्थिति की वस्तु स्थिति से अनवगत है। मूल चेतना, मर्म का ज्ञान किसी को नहीं है।

वेद-पुराण, कुरान, हदीश लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों पर ईश्वर के स्वरूप, उसके प्रभाव और सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान होने की बात कही गयी है। जीव और ब्रह्म में द्वैत नहीं अद्वैत का सम्बन्ध है यह भी कथित है। किन्तु द्विधा और द्वैत भाव की प्रबलता के कारण हम हिन्दू-मुसलमान लड़ते आ रहे हैं। कबीर ने स्पष्ट कहा “एकै चाम एकै मल मूदा-काको कहिए ब्राह्मण शूद्रा।”

हमें इस मर्म पर ध्यान देना है कि हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। हमारी उत्पत्ति समान रूप से हुई है। पालन समान हवा, पानी, अन्नादि से होता है और मृत्यु की प्रक्रिया भी परम सत्ता द्वारा नियत और नियंत्रित है। परोपकार करके हम ईश्वर के सन्निकट होते हैं। पाप करके बाह्योपचार के पचड़े में पड़कर हम ईश्वर से दूर होकर अपना इहलोक के साथ परलोक भी कष्टमय कर लेते हैं। सदाचरण निष्काम सेवा ही ईश्वरोपासना का मूल मर्म है। मानवता की निष्काम सेवा से बढ़कर इस अनित्य संसार में कुछ भी नहीं है।

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प्रश्न 13.
“सहजै सहज समाना” में सहज शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है। इस प्रयोग की सार्थकता स्पष्ट करें।
उत्तर-
मध्यकालीन भारत में भक्ति की क्रांतिकारी भाव धारा को जन-जन तक पहुँचाने वाले भक्त कबीर ने ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को ‘सहजै सहज समाना’ शब्द का दो बार प्रयोग किया है। प्रस्तुत शब्द में कबीर द्वारा बाह्याडंबरों की अपेक्षा स्वयं (आत्मा) को पहचानने की बात कही गई है। अपने शब्दों में कबीर ने ये बाह्याडंबर बताए हैं-पत्थर पूजा, कुरान पढ़ाना, शिष्य बनाना, तीर्थ-व्रत, टोपी-माला पहनना, छापा-तिल, लगाना, पीर औलिया की बातें मानना आदि।

कबीर कहते हैं ईश्वर का निवास न तो मंदिर में है, न मस्जिद में, न किसी क्रिया-कर्म में है और न योग-साधना में। उन्होंने कहा है कि बाह्याडंबरों से दूर रहकर स्वयं (आत्मा) को पहचानना चाहिए। यही ईश्वर है। आत्म-तत्व के ज्ञानी व्यक्ति ईश्वर को सहज से भी सहज रूप में प्राप्त कर सकता है। कबीर का तात्पर्य है कि ईश्वर हर साँस में समाया हुआ है। उन्हें पल भर की तालाश में ही पाया जा सकता है।

प्रश्न 14.
कबीर ने भर्म किसे कहा है?
उत्तर-
कबीर के अनुसार अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्य अज्ञानता के अंधकार में डूब जाते हैं। इनके गुरु भी अज्ञानी होते हैं; वे घर-घर जाकर मंत्र देते फिरते हैं। मिथ्याभिमान के परिणामस्वरूप लोग विषय-वासनाओं की आग से झुलस रहे हैं। कवि का कहना है कि धार्मिक आडम्बरों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ईश्वर की परम सत्ता से अपरिचित हैं। इनमें कोई भी प्रभु के प्रेम का सच्चा दीवाना नहीं है।

कबीर ने इन बाह्याडम्बरों के ‘भर्म’ को भुलाकर स्वयं (आत्मा) को पहचानने की सलाह देते हुए कहा है कि आत्मा का ज्ञान की सच्चा ज्ञान है। ईश्वर हर साँस में समाया हुआ है अर्थात् सच्ची अनुभूति और आत्म-साक्षात्कार के बल पर ईश्वर को पल भर की तलाश में ही पाया जा सकता है।

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कबीर के पद भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का रूप लिखें
आतम, परवान, तीरथ, पियारा, सिख्य, असनान, डिंभ, पाथर, मंतर, नर्म, अहनिस, तुमकूँ।
उत्तर-

  • आतम-आत्मा
  • परवान-पत्थर
  • तीरथ-तीर्थ
  • पियारा-प्यारा
  • सिख्य-शिष्य
  • असनान-स्नान
  • डिभ-दंभ
  • पाथर-पत्थर
  • मंतर-मंत्र
  • मर्म-भ्रम
  • अहनिश-अहर्निश
  • तुमकूँ-तुमको

प्रश्न 2.
दोनों पदों में जो विदेशज शब्द आये हैं उनकी सूची बनाएँ एवं उनका अर्थ लिखें।
उत्तर-
कबीर रचित पद द्वय में निम्नलिखित विदेशज (विदेशी) शब्द आये हैं, जिनका अर्थ अग्रोद्धत है

पीर-धर्मगुरु; औलिया-संत; कितेब-किताब, पुस्तक; कुरान-इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रंथ; मुरीद-शिष्य, चेला, अनुयायी; तदबीर-उपाय, उद्योग, कर्मवीरता; खवरि-सूचना, ज्ञान; तुर्क-इस्लाम धर्म के अनुयायी, तुर्की देश के निवासी; रहिमाना-रहमान-रहम दया करने वाला अल्ला।

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प्रश्न 3.
पठित पदों से उन शब्दों को चुनें निम्नलिखित शब्दों के लिए आये हैं
उत्तर-
आँख-नैन; पागल-वौराना (बौराया); धार्मिक-धरमी; बर्तन-भांडे, वियोग-विरह, आग-अगिनि, रात-निस।

प्रश्न 4.
नीचे प्रथम पद से एक पंक्ति दी जा रही है, आप अपनी कल्पना से तुक मिलते हुए अन्य पंक्तियाँ जोड़ें- “साँच कहो तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।”
उत्तर-
साँच कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना,
मर्म समझ कर चेत ले जल्दी घूटे आना-जाना,
जीवन क्या इतना भर ही है रोना हँसना खाना,
हिय को साफ तू कर ले पहले, बसे वहीं रहिमान।
छोड़ सके तो गर्व छोड़ दे राम बड़ा सुलिताना,
भाया मोह की नगरी से जाने कब पड़ जाय जाना”
चेत चेत से मूरख प्राणी पाछे क्या पछि ताना।

प्रश्न 5.
कबीर की भाषा को पंचमेल भाषा कहा गया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें वाणी का डिक्टेटर कहा है। कबीर की भाषा पर अपने शिक्षक से चर्चा करें अथवा कबीर की भाषा-शैली पर एक सार्थक टिप्पणी दें।
उत्तर-
“लिखा-लिखि की है नहीं देखा देखी बात’ “की उद्घोषणा करने वाले भाषा के डिक्टेटर और वाणी के नटराज कबीर की भाषा-शैली कबीर की ही प्रतिमूर्ति है। कबीर बहु-श्रुत और परिव्राजक संत कवि थे। हिमालय से हिन्द महासागर और गुजरात से मेघालय तक फैले उनके अनुयायियों द्वारा किये गये कबीर की रचनाओं के संग्रह में प्रक्षिप्त क्षेत्रियता का निदर्शन इस बात का सबल प्रमाण है कि कबीर “जैसा देश वैसी वाणी, शैली’ के प्रयोक्ता थे।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट कहा है “मेरी बोली पूरबी” लेकिन भोजपुरी राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, ब्रजभाषा आदिनेक तत्कालीन प्रचलित बोलियों और भाषाओं के शब्द ही नहीं नवागत इस्लाम की भाषा अरबी, उर्दू, फारसी के शब्दों की शैलियों का उपयोग किया है। रहस्यवादी संध्याभाषा उलटबाँसी, योग की पारिभाषिक शब्दावली के साथ ही सरल वोधगम्य शब्दों के कुशल प्रयोक्ता हैं।

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“जल में रहत कुमुदनी चन्दा बसै आकास, जो जाहि को भावता सो ताहि के पास” कहने वाले कबीर “आँषि डिया झाँई पड्या जीभड्या छाल्या पाड्या” भी कहते हैं। ये आँखियाँ अलसानि पिया हो सेज चलो “कहने वाले कबीर” कुत्ते को ले गयी बिलाई ठाढ़ा सिंह चरावै गाई”। भी कहते हैं। कबीर के सामने भाषा सचमुच निरीह हो जाती है।

प्रश्न 6.
प्रथम पद में अनुप्रास अलंकार के पाँच उदाहरण चुनें।
उत्तर-
नेमि देखा धरमी देखा-पंक्त में ‘मि’ वर्ण और देखा शब्द की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। जै पखानहि पूजै में प वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार पीर पढ़े कितेब कुराना में क्रमशः प और क वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। उनमें उहै में उ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। पीतर पाथर पूजन में प वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार उपस्थित है।

प्रश्न 7.
दूसरे पद में ‘विरह अगिनि’ में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार के चार अन्य उदाहरण दें।
उत्तर-
रूपक अलंकार के चार अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं ताराघाट, रघुवर-बाल-पतंग, चन्द्रमुखी, चन्द्रबदनी, मृगलोचनी।

प्रश्न 8.
कारक रूप स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
झठे-झूठ को-द्वितीय तत्पुरुष, पखानहि-पत्थर को द्वितीया तत्पुरुष; सब्दहि-शब्द को-द्वितीय-तत्पुरुष, खबरि-सूचना ही में-सम्प्रदान तत्पुरुष; कारनि-कारण से-अपादान, तत्पुरुष, भांडै-भांड में-अधिकरण तत्पुरुष।

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प्रश्न 9.
पाठ्य-पुस्तक में संकलित कबीर रचित पद “संतौ देखो जग बौराना’ का भावार्थ लिखें।
उत्तर-
प्रथम पद का भावार्थ देखें। प्रश्न 10. पाठ्य-पुस्तक में संकलित कबीर रचित द्वितीय पद का भावार्थ प्रस्तुत करें। उत्तर-द्वितीय पद का भावार्थ देखें।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

कबीर के पद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर की विरह-भावना पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
कबीर परमात्मा से प्रेम करने वाले भक्त हैं। उनकी प्रीति पति-पत्नी भाव की है। परमात्मा रूपी पति से मिलन नहीं होने के कारण वे विरहिणी स्त्री की भाँति विरहाकुल रहते हैं। ये प्रियतम के दर्शन हेतु दिन-रात आतुर रहते हैं। उनके नेत्र उन्हें देखने के लिए सदैव आकुल रहते हैं। वे विरह की आग में सदैव जलते रहते हैं। एक वाक्य में उनकी दशा यही है कि “तलफै बिनु बालम मोर जिया। दिन नहिं चैन, रात नहिं, निंदिया तरप तरप कर भोर किया।”

कबीर के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर विरह की दशा में क्या अनुभव करते हैं?
उत्तर-
कबीर को विरह की अग्नि जलाती है, आतुरता और उद्वेग पैदा करती है तथा मन धैर्य से रहित हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कबीर परमात्मा से क्या चाहते हैं?
उत्तर-
कबीर परमात्मा का दर्शन चाहते हैं, विरह-दशा की समाप्ति और मिलन का सुख चाहते हैं।

प्रश्न 3.
कबीर के अनुसार हिन्दू-मुस्लिम किस मुद्दे पर लड़ते हैं? उत्तर-हिन्दू-मुसलमान नाम की भिन्नता और उपासना की भिन्नता को लेकर लड़ते हैं। प्रश्न 4. कबीर की दृष्टि में नकली उपासक क्या करते हैं?
उत्तर-
नकली उपासक नियम-धरम का विधिवत पालन करते हैं, माला-टोपी धारण करते हैं, आसन लगाकर उपासना करते हैं, पीपल-पत्थर पूजते हैं, तीर्थव्रत करते हैं तथा भजन-कीर्तन गाते हैं।

प्रश्न 5.
कबीर की दृष्टि में नकली गुरु लोग क्या करते हैं?
उत्तर-
नकली गुरु लोग किताबों में पढ़ें मन्त्र देकर लोगों को शिष्य बनाते हैं और ठगते हैं।

इन्हें अपने ज्ञान, महिमा तथा गुरुत्व का अभिमान रहता है लेकिन वास्तव में ये आत्मज्ञान से रहित मूर्ख, ठग और अभिमानी होते हैं।

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प्रश्न 6.
कबीर के अनुसार ईश्वर-प्राप्ति का असली मार्ग क्या है?
उत्तर-
ईश्वर-प्राप्ति का असली मार्ग है आत्मज्ञान अर्थात् अपने को पहचानता और अपनी सत्ता को ईश्वर से अभिन्न मानना तथा ईश्वर से सच्चा प्रेम करना।

प्रश्न 7.
कबीरदास ने प्रथम पद में किसकी व्यर्थता सिद्ध की है?
उत्तर-
कबीरदास ने अपने प्रथम पद में पत्थर पूजा, तीर्थाटन और छाप तिलक को व्यर्थ बताया है।

प्रश्न 8.
कबीर ने दूसरे पद में बलिध का प्रयोग किसके लिए किया है?
उत्तर-
कबीरदास ने अपने दूसरे पद में बलिध का प्रयोग परमात्मा और सर्वशक्तिमान के लिए किया है।

प्रश्न 9.
कबीर के दृष्टिकोण में सारणी या सबद गाने वाले को किसकी खबर नहीं है?
उत्तर-
कबीरदास ने दृष्टिकोण में सारणी या सबद गाने वाले को स्वयं अपनी खबर नहीं है।

कबीर के पद वस्तनिष्ठ प्रश्नोत्तर

सही उत्तर सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

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प्रश्न 1.
कबीरदास किस काल के कवि हैं?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) वीरगाथा काल
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 2.
कबीर किसके उपासक थे?
(क) निर्गुण ब्रह्म के
(ख) सगुण ब्रह्म के
(ग) निराकार ब्रह्म के
(घ) साकार ब्रह्म के
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
कबीर ने इस संसार को क्या कहा है?
(क) बौराया हुआ
(ख) साश्वत
(ग) क्षणभंगुर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 4.
लोग किस पर विश्वास करते हैं?
(क) सत्य पर
(ख) झूठ पर
(ग) बाह्याडम्बर पर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
कबीर ने मर्म किसे कहा है?
(क) घाव को
(ख) वेदना को
(ग) रहस्य को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
कबीर ने ‘साखी’, संबंद और……………की रचना की।
उत्तर-
रमैनी

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प्रश्न 2.
कबीर, कागद की लेखी’ की जगह………..को तरजीह देते थे।
उत्तर-
आँखन-देखी

प्रश्न 3.
साँच कहाँ तो मारन धावै,………….जग पतियाना।
उत्तर-
झूठे

प्रश्न 4.
साखी सब्दहि गावत भूले…………खबरि, नहि जाना।
उत्तर-
आतम।

कबीर के पद कवि परिचय – (1399-1518)

कबीर का जन्मकाल भी निश्चित प्रमाण के अभाव में विवादास्पद रहा है। फिर भी, बहुत से विद्वानों द्वारा सन् 1399 ई० को उनका जन्म और सन् 1518 ई० को उनका शरीर त्याग मा लिया गया है। इस तरह कुल एक सौ बीस वर्षों की लम्बी आयु तक जीवित रहने का सौभाग्य संत कवि कबीर को मिला था। जीवन रूपी लम्बी चादर को इन्होंने इतने लम्बे काल तक ओढा, जीया और अंत में गर्व के साथ कहा भी कि “सो चादर सुन नर मुनि ओढ़ी-ओढ़ी के मैली कीन्हीं चदरिया।

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दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धरि दीनि चदरिया।” हिन्दी साहित्य के स्वर्णयुग भक्तिकाल के पहले भक्त कवि कबीरदास थे। भक्ति को जन-जन तक काव्य रूप में पहुँचा कर उससे सामाजिक चेतना को जोड़ने का काम भक्तिकालीन भक्त कवियों ने किया। ऐसा भक्त कवियों में पहला ही नहीं सबसे महत्वपूर्ण नाम भी कबीर का ही माना जाता है।

कहा जाता है कि एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्म लेने के बाद लोक-लाज के भय से माता द्वारा परित्यक्त नवजात शिशु कबीर बनारस के लहरतारा तालाब के किनारे नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पति द्वारा पाये और पुत्रवत पाले गये।

कबीर रामानन्दाचार्य के ही शिष्य माने जाते हैं पर गुरु मंत्र के रूप में प्राप्त राम नाम को उन्होंने सर्वथा निर्गुण रूप में स्वीकार और अंगीकार किया। अनजाने सिद्ध और नाथ-साहित्य से भी गहरे तक प्रभावित रहे। विशेष पंथ या मठ-मंदिर के आजन्म विरोधी रहे। कहा जाता है कि उनको कमाल नामक पुत्र और कमाली नामक एक पुत्री भी थी।

सिकंदर लोदी जैसे कट्टर मुसलमान शासक के काल में भी ऐसी धर्म निरपेक्ष ही नहीं कट्टरता-विरोधी उक्तियाँ कबीर से ही संभव थीं। शायद उसके अत्याचार का वे शिकार हुए भी थे। मृत्युकाल में उन्होंने मगहर की यात्रा की थी।

कबीर के पद कविता का भावार्थ

प्रथम पद महान् निर्गुण संत, परम्परा, भंजक, एकेश्वरवादी चिंतक कवि, कबीर संतों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे संतो ! देखो यह संसार बौरा गया है, पागल हो गया है। इसकी विवेक . बुद्धि नष्ट हो गयी है। जब भी मैं इन सांसारिक जीवों को सत्य के बारे में बताना चाहता हूँ।

ये मुझे उल्टा-सीधा कहते हैं, मुझे मारने दौड़ते हैं और जो कुछ इनके इर्द-गिर्द माया प्रपंच है उसे ये सत्य मान बैठे हैं।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

मुझे ऐसे अनेक नियम-धर्म के कठोर पालक दिखे जो हर मौसम में शरीर को कष्ट देकर स्नान करते हैं, आत्म ज्ञान से शून्य होकर पत्थर के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। अनेक पीर (धर्म गुरु) और औलिया (संत) मिले जो कुरान जैसे ग्रंथ की गलत तथ्यहीन व्याख्या अपने शिष्यों को समझा कर उनको भटका चुके हैं। उन्हें अपने पीर औलिया होने का घमंड हो गया है।

पितृ (मरे हुए पूर्वज) की सेवा पत्थरों की मूर्ति पूजा और तीर्थटन करने वाले धार्मिक अहंकारी हो चले हैं। स्वयं को संत, महात्मा धार्मिक दर्शन के लिए टोपी, माला, तिलक-छाप धारण किये हुए हैं और अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल चुके हैं। सचमुच के महान् वीतरागी संतों द्वारा रचित साखी सबद आदि गाते घुमते चलते हैं। इस संसार के प्राणी अपने को हिन्दू-मुस्लिम में बाँट चुके हैं।

एक को राम प्यारा है तो दूसरे को रहमान प्यारे हैं। छोटी-छोटी बातों पर ये एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो लड़-मर पड़ते हैं? लेकिन अभिमान अहंकार के वशीभूत हो ये घर-घर बाह्याचरण का आडम्बर युक्त पूजा, कर्मकाण्ड का मंत्र देते चलते हैं। मुझे तो लगता है कि ये तथाकथित गुरु अपने शिष्यों सहित माया के सागर में डूब चुके हैं। अन्त में इन्हें पछताना ही पड़ेगा।

ये हिन्दू-मुसलमान, पीर औलिया सभी ईश्वर-धर्म के मूल तत्त्व और मर्म को भूल चुके हैं। कई बार इनकी मैंने समझाकर कहा कि ईश्वर को कर्मकाण्ड बाह्यचार से नहीं बल्कि सहज जीवन-यापन की पद्धति से ही प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि परमब्रह्म ईश्वर अल्ला अत्यंत सहज और सरल हैं।

प्रस्तुत पद में कबीर ने अपने समय के साम्प्रदायिक तनावग्रस्त माहौल का भी वर्णन किया है। पद में अनायास रूप से अनुप्रास, वीप्सा. आदि अलंकार आये हैं। पद शांत रस का अनूठा उदाहरण है।

द्वितीय पद साधना के क्षेत्र के सहज सिद्ध हठयोगी, भावना के क्षेत्र में आकर कितना कोमल प्राण, भावुक, भाव विह्वल, विदग्ध हृदय हो सकता है, यह विरोधाभास कबीर में उपलब्ध हो सकता है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

चिर विरहिणी कबीर आत्मा विरह विदग्ध अवस्था की चरम स्थिति में चीत्कार करती हुई कहती है कि हे बलिया (बाल्हा) प्रियतम तुझे कब देवूगी तेरा प्रेम मेरे भीतर इस तरह से व्याप्त हो गया है कि दिन-रात तुम्हारे दर्शन की आतूरता आकुलता बनी रहती है। मेरी आँखें केवल तुमको देखना चाहती हैं, ये लगातार खुली रहती हैं कि तुम्हारे दीदार से वंचित न हो जाएँ।

हे मेरे भर्तार (स्वामी) तुम भी इतना सोच विचार लो कि तुम्हारे बिना शरीर में जो विरहाग्नि उत्पन्न हुई है वह शरीर को कैसे जलाती होगी। मेरी गुहार सुनो, बहरा मत बन जाओ मैं जानती हूँ कि तुम धीरता की प्रतिमूर्ति हो, शाश्वत हो लेकिन मेरी शरीर कच्चा कुम्भ है और उसने प्राण रूपी नीर है। घड़ा कभी भी फूट सकता है, मृत्यु कभी भी हो सकती है। तुमसे बिछड़े हुए भी बहुत दिन हो गये, अब मन को किसी भी प्रकार से धीरता प्राप्त नहीं हो पाती।

जब तक यह शरीर है, मेरे दु:ख का नाश करने वाले तुम एक बार मुझे अपना “दरस-परस” करा दो। मैं अतृप्ति को साथ लिये मरना नहीं चाहती। तुमसे मैंने प्रेम किया है, विरह भी भोंग रही हूँ किन्तु यदि हमारा मिलन नहीं हुआ, प्रेम का सुखान्त नहीं हुआ तो यह तुम्हारे जैसे सर्वशक्तिमान आर्तिनाशक के विरुद्ध के विरुद्ध बात होगी।

प्रस्तुत पद में कबीर ने भारतीय रहस्यवाद का सुन्दर वर्णन किया है। जहाँ जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध प्रेमी और प्रेमास्पद के रूप में चित्रित है।

रूपक और अनुप्रास अलंकार के उदाहरण यत्र-तत्र उपलब्ध है। सम्पूर्ण पद में शांत रस का पूर्ण परिपाक हुआ है।

कबीर के पद कठिन शब्दों का अर्थ

पतियाना-विश्वास करना। धावै-दौड़ना। व्यापै-अनुभव। रती-तनिक (रत्ती, रती)। नेमी-नियम का पालन करने वाला। बधीर-बहरा, जो कम सुने या न सुने। आतम-आत्मा। अगिनी-अग्नि। पखानहि-पत्थर को। दादि-विनती, स्तुति। पीर-धर्म गुरु। गुसांई-गोस्वामी, मालिक। औलिया-सन्त। जिन-मत, नहीं (निषेध सूचक)। कितेब-किताब, पुस्तक। भांडै-बर्तन। मुरीद-शिष्य, चेला, अनुयायी। छता-अक्षत, रहते हुए। तदवीर-उपाय। आरतिवंत-दुःखी। डिंभ-दंभ। रहिमाना-दयालु। पीतर-पीतल, पितर, पुरखा। महिमा-महत्त्व। मूए-मरे। बलिया-प्रियतम। अहनिस-दिन-रात।

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कबीर के पद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. संतो देखत जग बौराना…………नमें कछु नहिं ज्ञाना।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी ने धार्मिक क्षेत्र में उलटी रीति और संसार के लोगों के बावलेपन का उल्लेख किया है। वे संतों अर्थात् सज्जन तथा ज्ञान-सम्पन्न लोगों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि संतो! देखो, यह संसार बावला या पागल हो गया है? इसने उल्टी राह पकड़ ली है। जो सच्ची बात कहता है उसे लोग मारने दौड़ते हैं। इसके विपरीत जो लोग गलत और झूठी बातें बताते हैं उन पर वे विश्वास करते हैं। मैंने धार्मिक नियमों और विधि-विधानों का पालन करने वाले अनेक लोगों को देखा है। वे प्रातः उठकर स्नान करते हैं, तथा मंदिरों में जाकर पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं। मगर उनके पास तनिक भी ज्ञान नहीं है। वे अपनी आत्मा को नहीं जानते हैं और उसकी आवाज को मारते हैं, अर्थात् अनसुनी करते हैं, अर्थात् अनसुनी करते हैं, सारांशतः कबीर कहना चाहते हैं कि ऐसे लोग केवल बाहरी धर्म-कर्म और नियम-आचार जानते हैं जबकि अन्त: ज्ञान से पूर्णतः शून्य हैं।

2. बहुतक देखा पीर औलिया…………..उनमें उहै जो ज्ञाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी ने अपने पद की प्रस्तुत पंक्तियों में मुसलमानों के तथाकथित पीर और औलिया के आचरणों का परिहास किया है। वे कहते हैं कि मैंने अनेक पीर-औलिये को देखा है जो नित्य कुरान पढ़ते रहते हैं। उनके पास न तो सही ज्ञान होता है और न कोई सिद्धि होती है फिर भी वे लोगों को अपना मुरीद यानी अनुगामी या शिष्य बनाते और उन्हें उनकी समस्याओं के निदान के उपाय बताते चलते हैं। यही उनके ज्ञान की सीमा है। निष्कर्षतः कबीर कहना चाहते हैं कि ये पीर-औलिया स्वतः अयोग्य होते हैं लेकिन दूसरों को ज्ञान सिखाते फिरते हैं। इस तरह ये लोग ठगी करते हैं।

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3. आसन मारि डिंभ धरि…………….आतम खबरि न जाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी का स्पष्ट मत है कि जिस तरह मुसलमानों के पीर औलिया ठग हैं उसी तरह हिन्दुओं के पंडित ज्ञान-शूल। वे कहते हैं कि ये नकली साधक मन में बहुत अभिमान रखते हैं और कहते हैं कि मैं ज्ञानी हूँ लेकिन होते हैं ज्ञान-शूल। ये पीपल पूजा के रूप में वृक्ष पूजते हैं, मूर्ति पूजा के रूप में पत्थर पूजते हैं। तीर्थ कर आते हैं तो गर्व से भरकर अपनी वास्तविकता भूल जाते हैं। ये अपनी अलग पहचान बताने के लिए माला, टोपी, तिलक, पहचान चिह्न आदि धारण करते हैं और कीर्तन-भजन के रूप में साखी, पद आदि गाते-गाते भावावेश में बेसुध हो जाते हैं। इन आडम्बरों से लोग इन्हें महाज्ञानी और भक्त समझते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इन्हें अपनी आत्मा की कोई खबर नहीं होती है। कबीर के अनुसार वस्तुतः ये ज्ञानशून्य और ढोंगी महात्मा हैं।

4. हिन्दु कहै मोहि राम पियारा………….मरम न काहू जाना।
व्याख्या-
कबीर कहते हैं कि हिन्दू कहते हैं कि हमें राम प्यारा है। मुसलमान कहते हैं कि हमें रहमान प्यारा है। दोनों इन दोनों को अलग-अलग अपना ईश्वर मानते हैं और आपस में लड़ते तथा मार काट करते हैं। मगर, कबीर के अनुसार दोनों गलत हैं। राम और रहमान दोनों एक सत्ता के दो नाम हैं। इस तात्त्विक एकता को भूलकर नाम-भेद के कारण दोनों को भिन्न मानकर आपस में लड़ना मूर्खता है। अत: दोनों ही मूर्ख हैं जो राम-रहीम की एकता से अनभिज्ञ हैं।

5. घर घर मंत्र देत…………….सहजै सहज समाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी इन पंक्तियों में कहते हैं कि कुछ लोग गुरु बन जाते हैं मगर मूलतः वे अज्ञानी होते हैं। गुरु बनकर वे अपने को महिमावान समझने लगते हैं। महिमा के इस अभिमान से युक्त होकर वे घर-घर घूम-घूम कर लोगों को गुरुमंत्र देकर शिष्य बनाते चलते हैं। कबीर के मतानुसार ऐसे सारे शिष्य गुरु बूड़ जाते हैं; अर्थात् पतन को प्राप्त करते हैं और अन्त समय में पछताते हैं। इसलिए कबीर संतों को सम्बोधित करने के बहाने लोगों को समझाते हैं कि ये सभी लोग भ्रमित हैं, गलत रास्ते अपनाये हुए हैं।

मैंने कितनी बार लोगों को कहा है कि आत्मज्ञान ही सही ज्ञान है लेकिन ये लोग नहीं मानते हैं। ये अपने आप में समाये हुए हैं, अर्थात् स्वयं को सही तथा दूसरों को गलत माननेवाले मूर्ख हैं। यदि आप ही आप समाज का अर्थ यह करें कि कबीर ने लोगों को कहा कि अपने आप में प्रवेश करना ही सही ज्ञान है। तब यहाँ ‘आपहि आप समान’ का अर्थ होगा-‘आत्मज्ञान प्राप्त करना’ जो कबीर का प्रतिपाद्य है।

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6. हो बलिया कब देखेंगी…………..न मानें हारि।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी ने ईश्वर के दर्शन पाने की अकुलाहट भरी इच्छा व्यक्त की है। वे कहते हैं कि प्रभु मैं तुम्हें कब देखूगा? अर्थात् तुम्हें देखने की मेरी इच्छा कब पूरी होगी, तुम कब दर्शन दोगे? मैं दिन-रात तुम्हारे दर्शन के लिए आतुर रहता हूँ। यह इच्छा मुझे इस तरह व्याप्त किये हुई है कि एक पल के लिए भी इस इच्छा से मुक्त नहीं हो पाता हूँ।

मेरे नेत्र तुम्हें चाहते हैं और दिन-रात प्रतीक्षा में ताकते रहते हैं। नेत्रों की चाह इतनी प्रबल है कि ये न थकते हैं और न हार मानते हैं। अर्थात् ये नेत्र जिद्दी हैं और तुम्हारे दर्शन किये बिना हार मानकर बैठने वाले नहीं हैं। अभिप्राय यह कि जब ये नेत्र इतने जिद्दी हैं, और मन दिन-रात आतुर होते हैं तो तुम द्रवित होकर दर्शन दो और इनकी जिद पूरी कर दो।

7. “बिरह अगिनि तन……………..जिन करहू बधीर।”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी अपनी दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे स्वामी ! तुम्हारे वियोग की अग्नि में यह शरीर जल रहा है, तुम्हें पाने की लालसा आग की तरह मुझे दग्ध कर रही है। ऐसा मानकर तुम विचार कर लो कि मैं दर्शन पाने का पात्र हूँ या उपेक्षा का?

कबीरदास जी अपनी विरह-दशा को बतला कर चुप नहीं रह जाते हैं? वे एक वादी अर्थात् फरियादी करने वाले व्यक्ति के रूप में अपना वाद या पक्ष या पीड़ा निवेदित करते हैं और प्रार्थना. करते हैं कि तुम मेरी पुकार सुनो, बहरे की तरह अनसुनी मत करो। पंक्तियों की कथन-भगिमा की गहराई में जाने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि कबीर याचक की तरह दयनीय मुद्रा में विरह-निवेदन नहीं कर रहे हैं। उनके स्वर में विश्वास का बल है और प्रेम की वह शक्ति है जो प्रेमी पर अधिकार-बोध व्यक्त करती है।

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8. तुम्हे धीरज मैं आतुर…………….आरतिवंत कबीर।
व्याख्या-
अपने आध्यात्मिक विरह-सम्बन्धी पद की प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर अपनी तुलना आतुरता और ईश्वर की तुलना धैर्य से करते हुए कहते हैं कि हे स्वामी ! तुम धैर्य हो और मैं आतुर। मेरी स्थिति कच्चे घड़े की तरह है। कच्चे घड़े में रखा जल शीघ्र घड़े को गला कर बाहर निकलने लगता है। उसी तरह मेरे भीतर का धैर्य शीघ्र समाप्त हो रहा है अर्थात् मेरा मन अधीर हो रहा है। आप से बहुत दिनों से बिछुड़ चुका हूँ।

मन अधीर हो रहा है तथा शरीर क्षीण हो रहा है। अपने भक्त कबीर पर कृपाकर अपने दर्शन दीजिए। आपके दर्शन से ही मेरा जीवन सफल हो सकता है। कबीरदास का मन ईश्वर से मिलने के लिए व्याकुल है। उनकी अन्तरात्मा ईश्वर के लिए आतुर है। वास्तव में, ईश्वर के दर्शन से ही कबीर का जीवन सफल हो सकता है।

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Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 9 Voice of the Unwanted Girl

Bihar Board Class 11th English Book Solutions Poetry Poem 9 Voice of the Unwanted Girl Text Book Questions and Answers.

Rainbow English Book Class 11 Solutions Poem 9 Voice of the Unwanted Girl

Bihar Board Class 11 English Voice of the Unwanted Girl Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions :

Question 1.
How many brothers or sisters do you have ? Does the girl child in your family receive same kind of love and attention as the boy in the family ? If not, why ? Is it proper ?
Answer:
We are three brothers and one sister. We all receive same kind of love and attention equally. There is no descrimination between a boy and a girl in my family. We all enjoy the same right in the family.

Question 2.
You might have heard several cases of female foeticide ? Who, in your opinion, is responsible for this ?
Answer:
Our society is responsible for this. In our society girl is considered a burden. The parents have to fight much for the marriage of the girl. Even after her being educated nobody is ready to marry her without dowry.

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B. 1.1. Write ‘T’ for true and ’F’ for false statements :

(a) Mother was taken to the autopsy room by force.
(b) The doctor was solely responsible for the heinous crime.
(c) The female foeticide took place in Bombay.
(d) Everybody loved the speaker.
(e) Mother loved Pomegranate very much.
Answer:
(a) False
(b) False
(c) True
(d) False
(e) False.

B. 1. 2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Who is ‘I’ in the opening line ?
Answer:
The unwanted girl is T in the opening line.

Question 2.
Who does the speaker address to ?
Answer:
The speaker addressed to her mother.

Question 3.
What did the mother do to the speaker ?
Answer:
The mother had the speaker killed before she was born.

Question 4.
What happened to the speaker ?
Answer:
The speaker was cut like a sliced Pomegranate in the autopsy room.

Question 5.
What did the doctor tell the mother ? How did it affect her ?
Answer:
The doctor told the mother that the foetus was a girl. Then the mother was sad because it would be her second daughter.

Question 6.
How did the mother dress up when she knew about her second girl child ?
Answer:
The mother put on her grass-green sari, and put parijatak blossoms in her hair.

Question 7.
Do you find any evidence in the poem that shows the mother’s lack of concern for her girl child ?
Answer:
The mother had the child sent away. She would not even touch it or ask about it. This shows her lack of concern for the girl child.

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B. 2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Who does ‘everyone’ refer to in line 28 ? Why did everyone smile ?
Answer:
Everyone in line 28 refers to the mother, father, friends and doctors. They smiled because they had successfully got rid of the unwanted girl child.

Question 2.
How does the ‘unwanted girl’ question her mother’s conscience ?
Answer:
The unwanted girl questions her mother’s conscience. She tells her mother that she acted in an unmotherly fashion. She has acted against the will of God.

Question 3.
What does the killed infant smell of ?
Answer:
The killed child smells of formaldehyde.

Question 4.
How many times has the verb ‘look’ been repeated in the poem ? What effect does it have on you ?
Answer:
The verb look has been repeated ten times in the poem.

It makes me feel that the killed girl child is deeply disturbed. She pricks her mother’s conscience. She tells her what a heinous crime the mother has committed.

Question 5.
What does ‘God’s will’ mean in line 44 ?
Answer:
In line 44, God’s will means what God ordained. The unwanted girl child wants to say that the mother had acted against what God had wanted. God wanted the girl to grow up in a natural way.

Question 6.
What does the speaker wish in the last two lines ?
Answer:
In the last two lines the unwanted child wishes that her mother should have shown her concern for her. She should have shown her motherly love. At least should have desired to see how the girl child looked.

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C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
Who, in your opinion, is responsible for the killing of the unborn female child — mother, doctor, society or all of them ?
Answer:
In my opinion all of them are responsible for killing the unborn girl child. The traditional society looked upon women as inferior, useless and no better than slaves. Women had no rights, and parents had to give a lot of dowry at the time of a girl’s marriage. Girls were never given any education. They were ill-nourished. If a girl was born, it was no matter of rejoicing. If a girl died, there was nothing to grieve about. People wanted sons to perpetuate their family name. Many people deliberately killed a girl child just after her birth.

Even today there are orthodox people who consider a daughter a curse. They look upon the second daughter as a misfortune. It is not only men’s attitude. Women themselves subscribe to this view. That’s why, mothers are part of the crime of getting the girl child killed.

In modern times, science has made it possible to determine the sex of the unborn child. So the doctors have made it a business. They determine the sex, and if is a girl, they help in abortion. In this way all of them are responsible in getting the female child destroyed. The government has made a law that determination of the sex of an unborn child is illegal and punishable.

Question 2.
How will you react if you find that female foeticide is being committed before you ? Would you try to stop it or remain indifferent to it ?
Answer:
I hope that I will try to do my best to stop it. I would inform the police about it if I failed to convince the people concerned.

Question 3.
Describe the scene of autopsy room with all minute details. Have you ever been to an autopsy room ?
Answer:
It was a very sad day in my life when for the first time I had to be present in the autopsy room during the postmortem on one of my friend’s dead body. The autopsy room looks similar to an operating room. An atmosphere of dignity and respect for the deceased is maintained at all time. The room has a good lighting arrangement. It is fitted with fly-proof net to avoid flies.There is provision for both hot and cold water taps. Water resistant coating materials are used on the walls so as to wash them with water easily. Postmortem table is preferably made up of marble or stainless steel. There is a refrigerator in the postmortem room to store tissue sample. The room has adequate number of exhaust fans.

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Question 4.
Attempt a critical estimate of the poem.
Answer:
The speaker, in the poem is an unborn girl child. Apparently it is impossible. How can a child who is killed before she is bom speak ?

The poet uses the unborn child as a mouthpiece to articulate the crime of mothers and humanity against the innocent unborn girl children. She does not accuse her father, society and the doctors, though they are equal partners in the crime. If only they had done the killing, it wouldn’t have been so bitter. But the child did not expect a mother to treat her own child with such callousness as to not even think of her.

The child describes how she was sliced like a Pomegranate in the autopsy room and the mother did not even think of looking at it.

Then the child pricks her mother’s conscience. She says she has nipped a bud before it could bloom. She killed a butterfly that could flit; she murdered a sweet girl whom someone would have loved and admired. These images are beautiful, and sharpen the acuteness of the crime and the loss.

The second part of the poem uses a rhetoric device to make the mother answerable as if she was being tried in a court of law. There is no rhyme scheme in the poem. The sentences are short, like slaps of whiplashes.

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C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs.

Question a.
How far is it proper to say “Blessed with a son and cursed with a daughter” ?
Answer:
It is not proper at all. In old days, sons stayed with their parents and were supposed to support them in the old age, whereas daughters were married, and left their parents to serve their husband’s family. Now even sons leave their old parents and go to far off places for better employment. Girls too help their parents because they are educated and have independent income.

Question b.
True progress can hardly be achieved without abolishing gender bias in the society.
Answer:
Men and women are equal partners. They both can contribute to the building up of society. Gandhiji realised this. He called upon women to come forward and join the national movement. Women proved that they could endure hardships and make every possible sacrifice for a national cause. India’s independence could not have been possible without women’s contribution. Indeed, it is wrong to have a bias against women.

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C. 3. Composition :

Write a paragraph in about 100 words on the following:

Question a.
Female foeticide.
Answer:
It is a matter of shame that some people are still so orthodox and ignorant that they consider the birth of a girl child a curse. During the last twenty years, there have been so many female foeticides that ratio between male and female drastically changed. Even in the national capital, the ratio is 820 girls against 1000 boys. Just imagine what will happen to society where there are no women. It will be the dooms day. So we must protect girls, look upon them as essential as boys, and empower them to be more useful to society.

Question b.
A visit to an autopsy room.
Answer:
It was a very sad day in my life when for the first time I had to be present in the autopsy room during the postmortem on one of my friend’s dead body. The autopsy room looks similar to an operating room. An atmosphere of dignity and respect for the deceased is maintained at all time. The room has a good lighting arrangement. It is fitted with fly-proof net to avoid flies.There is provision for both hot and cold water taps. Water resistant coating materials are used on the walls so as to wash them with water easily. Postmortem table is preferably made up of marble or stainless steel. There is a refrigerator in the postmortem room to store tissue sample. The room has adequate number of exhaust fans.

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D. 1. Dictionary Use:

Ex. 1. Correct the spelling of the following words:
Answer:
insection — injection
trafic — traffic
cluched — clutched
blosoms — blossoms
glisened — glistened
formaldehide — formaldehyde.

D. 2. Word-meaning :

Find from the poem words the meanings of which have been given in Column A’. The last part of each word is given in Column ’B’:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Poem 9 Voice of the Unwanted Girl 1
Answer:
1. (e)
2. (f)
3. (d)
4. (c)
5. (h)
6. (g)
7. (b)
8. (a)

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D. 3. Vocabulary Test :

Ex. 1. Add a prefix to each of the following words and use the new words in sentences of your own:
told, heard, wanted, touch, turn, speakable.
Answer:
Told — untold – This is an untold story.
heard — unheard – Their protests went unheard.
wanted — unwanted – It is very sad when children feel unwanted.
touch — retouch – Retouch means to make small changes to a picture or photograph so that it looks better.
turn — return – Will you return today ?
speakable — unspeakable – The abusive language used by him is unspeakable.

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D. 4. Registers :

Ex. 1. Find out the words from the poem which are used in medical field:
Answer:
doctor, injection, autopsy, cut, formaldehyde.

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 7 राष्ट्रवाद

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 7 राष्ट्रवाद Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 7 राष्ट्रवाद

Bihar Board Class 11 Political Science राष्ट्रवाद Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक सम्बद्धताओं से अलग है?
उत्तर:
मानव एक सामाजिक प्राणी है। ऐसा प्रकृति के कारण है। व्यक्ति अपना जीवन समूह में व्यतीत करता है। उसका ऐसा पहला समूह परिवार था, जब उसने अपना जीवन व्यतीत किया। परिवार से वह विभिन्न संघों और समाज के सम्पर्क में आया। संघ के पश्चात् राज्य और बाद में देश बना। राज्य सर्वाधिक अनुशासित और संगठित संस्था है। राज्य संगठित एवं अनुशासित है, क्योंकि इसके पास प्रभुसत्ता होती है, अर्थात् नागरिकों एवं विषयों के ऊपर राज्य एक उच्च शक्ति है। इन सभी समूहों में राष्ट्र का सामूहिक संगठन का आधार अन्य की तुलना में भिन्न होता है।

परिवार का आधार रक्त सम्बन्ध होता है। समाज का आधार लोगों का एक दूसरे पर आश्रित होना है और संघ का आधार निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करना है। ये सभी सामाजिक समूह लोगों के समूह हैं। राष्ट्र के संगठन का आधार राष्ट्रीयता होती है, जो समान जाति, समान इतिहास, समान संस्कृति, समान नैतिकता, समान विश्वास और समान भूगोल के लोगों का समूह होता है। राष्ट्रीयता देशभक्ति की भावना को जागृत करती है। विभिन्न तत्वों के समान राष्ट्रीयता के कारण उनके भावी स्वप्न भी समान होते हैं। इस प्रकार राष्ट्र अन्य सामाजिक समूहों से भिन्न होता है।

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प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह: विचार राष्ट्र-राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर:
आत्म-निर्णय का सिद्धान्त समाज की लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को प्रथम विश्व युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने प्रस्तुत किया था। आत्म-निर्णय के सिद्धान्त का तात्पर्य है कि प्रत्येक सामाजिक और सांस्कृतिक समूह या समान संस्कृति और भूगोल के लोगों.की पसन्द के कानून को चुनने का अधिकार होना चाहिए।

इसका यह भी मतलब है एक सामाजिक समूह को नियन्त्रण करने वाले कानून को सामाजिक समूहों के सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषा सम्बन्धी क्षेत्रीय और भौगोलिक आकांक्षाओं को प्रकट करना चाहिए, जिसके लिए कानून बनाया जाता है। अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने आपको नियन्त्रित रखते हैं और अपने भावी विकास का निर्धारण करते हैं। इस प्रकार के आवश्यकताओं के निर्माण में राष्ट्र एक स्पष्ट राजनीतिक पहचान के रूप में अपने स्तर के अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के द्वारा अपनी पहचान और स्वीकृति चाहते हैं।

इस प्रकार की अधिकांश माँगें. लोगों द्वारा हुई हैं, जो एक विशिष्ट स्थान पर लम्बे समय से एक साथ रहते हैं और जिन्होंने समान पहचान का दृष्टिकोण विकसित किया है। इस अधिकार ने एक ओर लोगों के आत्मविश्वास को राज्य के कार्यों में बढ़ाया है और उनके विकास को सुनिश्चित किया था। परन्तु इसी समय इस अधिकार ने राज्य व्यवस्था के लिए चुनौतियों को पेश की है और उससे अलगाव की प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं। इस प्रकार इस अधिकार ने जन-विरोधी स्थिति को उत्पन्न किया है। विशेष रूप से एकीकरण की स्थिति में मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

संयुक्त सोवियत रूस का पतन 15 राष्ट्र राज्यों में आत्म निर्णय के अधिकार की स्वीकृति के कारण हुआ। चूँकि अधिकांश समाज बहुदलीय और विरोधी हैं। प्रत्येक राज्य अल्प राष्ट्रीयता की समस्या का समाना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए इस सन्दर्भ में श्रीलंका का नाम लिया जा सकता है, जहाँ एल.टी.टी.ई. अलग राज्य की माँग कर रहा है। इसी प्रकार भारत में भी आतंकवादी गुटों की यही माँग है। यह राष्ट्र राज्य के रूप में जम्मू कश्मीर की है। इसका समाधान राष्ट्रीय हितों और स्थानीय, क्षेत्रीय और सामाजिक हितों के बीच समझौता और समर्थन है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 7 राष्ट्रवाद

प्रश्न 3.
हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीयता व्यक्ति की वहं भावना है, जो राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय महत्त्व, राष्ट्रीय सम्मान और त्याग की भावना से सम्बद्ध है। राष्ट्रीय भावना से एक व्यक्ति अपने निजी, क्षेत्रीय, भाविक और अन्य हित के कार्य राष्ट्र के लिए और उसके सम्मान में करता है। राष्ट्रवाद समान राष्ट्रीयता के लोगों में उत्पन्न किया जाता है अर्थात् यह समान संस्कृति, जाति, इतिहास, रहन-सहन और भूगोल के लोगों का समूह है। यह एक व्यक्ति के राष्ट्र के प्रति महत्त्व की जागरुकता का परिणाम है। वह राष्ट्रीय इतिहास और गौरव के प्रति भी चैतन्य रहता है। आज राष्ट्रवाद देशभक्ति से जुड़ा हुआ है अर्थात् इससे देश के लिए त्याग और प्रेम की भावना उत्पन्न होती है।

राष्ट्रवाद एक संवेगात्मक और मनोवैज्ञानिक अवधारणा है, जो भूमि, झंडा और गाने को गौरवान्वित अवधारणा है, राष्ट्रभूमि को ‘माँ’ के रूप में जाना जाता है अर्थात् यह मातृभूमि है और यह माना जाता है कि माँ द्वारा प्रदत्त यहाँ सब कुछ है। इस प्रकार मातृभूमि ही देश है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनसे पता चलता है कि एक राष्ट्र और उनके लोग औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी ताकतों के शोषण से किस प्रकार मुक्त हुए।

19 वीं और 20 वीं शताब्दी में अनेक एशियाई और अफ्रीकी देश राष्ट्रवाद के फलस्वरूप ही आजाद हुए। सकारात्मक दृष्टिकोण से राष्ट्रवाद एक धर्म है। परन्तु जब यह चरमोत्कर्ष पर होता है, तो यह मानवता के लिए हानिकारक होता है। इसका चरमोत्कर्ष और नकारात्मक रूप को अति राष्ट्रवाद (challanism) कहा जाता है। अनेक दर्शन हैं, जिनका विकास चरमोत्कर्ष राष्ट्रवाद के आधार पर हुआ है। जर्मनी में नाजीवादी और इटली में फांसीवादी दर्शन का जन्म हुआ, जिनसे निम्नता और सर्वोच्चता की भावना का जन्म हुआ। फलस्वरूप कटुता, आतंकवाद और युद्धों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

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प्रश्न 4.
वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए सांझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीयता की भावना के विकास में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं –
1. समान विश्वास:
राष्ट्रवाद की भावना उस समय उत्पन्न होती है, जब लोगों में एक होकर रहने की भावना हो और वे एकसाथ तभी रह सकते हैं, जब उनमें आपस में विश्वास हो। जब टीम में सामूहिकता की भावना होती है, तब उनके उद्देश्य और आकांक्षाएँ समान होती हैं।

2. समान इतिहास:
जब लोगों के सुख-दुःख, विजय-पराजय, लाभ-हानि, युद्ध-शान्ति, अहिंसा-हिंसा का इतिहास समान होता है, तब एकता की भावना का विकास होता है, जो राष्ट्रवाद के लिए आवश्यक है। जब लोग अपने स्वयं का इतिहास का निर्माण करते हैं, तो उनमें राष्ट्रवादी भावना बढ़ने लगती है।

वे ऐतिहासिक साक्ष्यों का प्रयोग राष्ट्रीयता के भावना को बढ़ाने के लिए करते हैं। भारत का एक सभ्यता के रूप में लम्बा और गौरवपूर्ण इतिहास है, जो भारत का देश के रूप में आधार है और भारत में राष्ट्रीयता को बढ़ाने का साधन है। पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत एक खोज’ (Discovery of India) में भारतीय सभ्यता का गौरवपूर्ण इतिहास प्रस्तुत किया है।

3. समान भू-भाग:
समान भू-भाग एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है, जो राष्ट्रवाद को बढ़ावा देता है। भू-भाग किसी देश की भूमि का हिस्सा होता है, जो संवेगी और आध्यात्मिक होता है, जो लोगों को एक साथ जोड़े रखता है और उनमें राष्ट्रीय भावना और राष्ट्रवाद का विकास करता है।

4. समान भावी आकांक्षाएँ:
समान भावी आकांक्षाएँ लोगों में एकता स्थापित करती हैं और राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न करती हैं। भविष्य के समान स्वप्न और सामूहिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाएँ भविष्य में लोगों को एक रखती हैं। समान भावी आकांक्षाएँ देश के कार्य और राष्ट्रवाद के कार्य में सहयोग करती हैं। ये नागरिक के गुणों में वृद्धि करती हैं और इच्छा शक्ति को मजबूत करती हैं। उदाहरण के लिए पी.एल.ओ.।

5. समान संस्कृति:
राष्ट्रवाद लाने और बढ़ाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक समान संस्कृति है। समान संस्कृति में समान परम्पराओं, त्योहारों, इतिहास, भूगोल, भाषा आदि शामिल हैं, जो सामान्य हितों और उद्देश्यों को बढ़ावा देती हैं, जिससे राष्ट्रीयता की भावना का विकास होता है।

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प्रश्न 5.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर:
लोकतन्त्र एक सरकारी व्यवस्था है, जो समानता, बहुलवाद, उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। राष्ट्रवाद निश्चित रूप से एक सकारात्मक भावना है। परन्तु जब राष्ट्रवाद पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, तो यह नकारात्मक हो जाता है, तब यह समाज के लिए खतरनाक और हानिकारक हो जाता है।

चरमोत्कर्ष राष्ट्रवाद अनैच्छिक है, क्योंकि चरमोत्कर्ष राष्ट्रवादी व्यक्ति दूसरे लोगों के धर्म क्षेत्र, संस्कृति, भाषा आदि को हानि पहुँचाता है और इससे असहिष्णुता की भावना बढ़ती है। पराकाष्ठा की देशभक्ति एक नकारात्मक भावना है और किसी भी समाज के लिए अनैच्छिक और हानिकारक है। इससे दूसरे क्षेत्र, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के लोगों में असहिष्णुता की भावना बढ़ती है। इसलिए ऐसे राष्ट्रवाद जो चरमोत्कर्ष पर और जो नकारात्मक हो, रोकने का उपाय होना चाहिए। निम्नलिखित मुख्य कारक हैं, जो अति राष्ट्रवाद को सीमित करते हैं –

1. लोकतन्त्रता:
लोकतन्त्र, समानता, न्याय, सहनशीलता और मानव मूल्यों पर आधारित होता है, जो किसी भी प्रकार के उग्रवाद पर रोक लगाता है। प्रजातन्त्र में उग्रवाद का कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार लोकतन्त्र एक बड़ा कारक है, जो राष्ट्रवाद को सीमित करता है।

2. धर्मनिरपेक्षता:
धर्म निरपेक्षता एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है, जो अनैच्छिक राष्ट्रवाद पर रोक लगाता है। धर्म निरपेक्षता विभिन्न धर्म, विश्वास और संस्कृति के लोगों को शान्ति का पाठ सिखाता है। यह सह-अस्तित्व पर भी जोर देता है।

3. बहुलवाद:
बहुलवाद वह विचारधारा है, जो विरोधी समाज को जोड़ता है। यह इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह राष्ट्रवाद को सीमित करता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीयवाद:
यह विचारधारा भी अति राष्ट्रवाद को रोकता है।

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प्रश्न 6.
आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
प्रशासकीय व विकास की दृष्टि का होना आवश्यक है। इसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय हों, जिसमें सभी अल्पसंख्यक अपने आपको सुरक्षित व गौरवान्वित महसूस करें। एक राष्ट्र की सीमाएँ प्रशासन व विकास की दृष्टि से तय होनी चाहिए। राष्ट्रवाद को मानवता पर हावी नहीं होने देना चाहिए। समूहों की पहचान देने में काफी सतर्कता बरती जाती है। लेकिन इन समूहों को राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने से पहले यह देख लें कि वे समूह असहिष्णु तो नहीं हैं।

वे अमानवीय नहीं हैं और वे समूह दूसरे समूहों के साथ सहयोग करते हैं। एक राष्ट्र का अपना एक अतीत होता है, जो भविष्य को समेटे होता है। एक राष्ट्र की पहचान उसके भौगोलिक क्षेत्र, राजनीतिक आदर्श, राजनीतिक पहचान से जुड़ी हुई है। समूहों से अलग राष्ट्र अपना शासन अपने आप करने और भविष्य को तय करने का अधिकार चाहता है। लेकिन राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार ऐसे राज्यों के निर्माण की ओर ले जा सकता है, जो आर्थिक व राजनीतिक क्षमता में काफी छोटे हों और इससे उनकी समस्याएँ और बढ़ सकती हैं। इस प्रकार से हमें सहिष्णुता और विभिन्न रूपों के साथ सहानुभूति होनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Political Science राष्ट्रवाद Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता के दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। (Explain the two elements of nationality)
उत्तर:
राष्ट्रीयता के दो महत्त्वपूर्ण तत्त्व निम्नलिखित हैं –

1. भौगोलिक एकता:
प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति जुड़ा रहता है, जहाँ वह जन्म लेता है। जिस भूखण्ड पर अन्य व्यक्तियों के साथ-साथ वह रहता है उसको अपनी मातृभूमि से लगाव हो जाता है। इजरायल बनने से पूर्व यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे हुए थे किन्तु उनके मन में इजराइल के प्रति लगाव था।

2. प्रजातीय शुद्धता:
एक ही प्रजाति के लोग एक राष्ट्रीयता को उत्पन्न करते हैं। परन्तु आजकल प्रवास एवं अन्तर्जातीय विवाह के कारण विशुद्ध प्रजाति का मिलना आसान नहीं है।

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प्रश्न 2.
आर्थिक पारस्परिक निर्भरता से क्या अभिप्राय है? (What do you mean by economic inter-dependent?)
उत्तर:
आर्थिक क्षेत्र में आज राष्ट्र-राज्यों की पारस्परिक निर्भरता बढ़ रही है। अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती हुई पारस्परिक निर्भरता ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के सम्मुख गम्भीर चुनौतियाँ पैदा की हैं। विश्व के अधिक भागों में बढ़ती गरीबी, अप्रयुक्त मानव संसाधन, पर्यावरण के खतरों के प्रति बढ़ती जागरुकता तथा मानव जाति के अस्तित्व की समस्या जैसे मामले इसमें प्रमुख हैं। आज विश्व आर्थिक रूप में एकजुट हो गया है। सुदृढ़ भूमण्डलीय मंच स्थापित करने का अब समय आ गया है।

प्रश्न 3.
भारत के आर्थिक एकीकरण ने किस प्रकार राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित किया? (How did the economic integration influenced the nationalism)
उत्तर:
आर्थिक एकीकरण के कारण गाँवों का एकान्त जीवन समाप्त हो गया तथा ग्रामीण लोग शहरों में आने लगे। शहरों में कच्चा माल आने लगा। गाँव के शिल्पकार तथा अन्य लोर मजदूरी एवं रोजगार की तलाश में शहरों में आने लगे। शहरों की राष्ट्रीय चेतना गाँवों में पहुंचने लगी। इससे राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित के बारे में बताइए कि क्या वे राज्य हैं? यदि हाँ तो कैसे और नहीं तो कैसे? (Are the following state? Why?)
(क) भारत
(ख) संयुक्त राष्ट्र
(ग) बिहार
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर:
(क) हाँ, भारत एक राज्य है, क्योंकि यह सम्प्रभु है।
(ख) नहीं, संयुक्त राष्ट्र एक राज्य नहीं है, क्योंकि यह तो सम्प्रभु राज्यों का संघ है।
(ग) बिहार भी राज्य नहीं है। यह भारतीय संघ की एक इकाई है।
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका राज्य है, क्योंकि यह सम्प्रभु है।

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प्रश्न 5.
राज्य के कोई दो तत्त्व लिखिए। (Describe any two elements of a State) अथवा, राज्य के चार आवश्यक तत्त्व कौन से हैं? (What are the 4 elements of a state?)
उत्तर:
राज्य के निम्नलिखित तत्त्व होते हैं –

  1. जनसंख्या
  2. निश्चित प्रदेश
  3. सरकार
  4. सम्प्रभुता

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प्रश्न 6.
राज्य और समाज के अन्तर के किन्हीं दो बिन्दुओं को बताइए। (Give two points of the difference between state and society)
उत्तर:
राज्य और समाज के बीच अन्तर –

  1. राज्य व्यक्ति के केवल बाह्य आचरण को नियन्त्रित करता है। परन्तु समाज व्यक्ति के सभी प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों को नियन्त्रित करता है।
  2. राज्य एक अनिवार्य संगठन है, जबकि समाज ऐच्छिक है। राज्य की सदस्यता अनिवार्य है। व्यक्ति किसी न किसी राज्य का सदस्य जीवनपर्यन्त रहता है। परन्तु समाज का सदस्य बनना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है।

प्रश्न 7.
राष्ट्र राज्य का अर्थ बताइए। (Give the meaning of the nation-state)
उत्तर:
राष्ट्र राज्य एक ऐसा राज्य होता है, जो राष्ट्रीयता से बना है। जब व्यक्ति सामान्य धर्म सामान्य भाषा अथवा सामान्य विरासत में बँधा होता है, तो वह एक राष्ट्र होता है। यदि वे एक स्वतन्त्र राज्य का स्वरूप धारण कर लेते हैं, तो वे एक राष्ट्र-राज्य का निर्माण करते हैं। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जारी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आए।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्र-राज्य से क्या अभिप्राय है? इनके विकास में सहायक तत्त्वों का विवेचन कीजिए। (What do you mean by Nation-State? Discuss the helping elements of its development)
उत्तर:
राष्ट्र-राज्य:
राष्ट्र का स्वरूप शताब्दियों तक विकसित हुआ। राष्ट्र-राज्यों ने क्षेत्र राज्यों का स्थान ले लिया है। राष्ट्र-राज्य आपस में संघर्ष तथा सहयोग के द्वारा बँधे रहते हैं। राष्ट्र-राज्य प्रणाली राजनीतिक जीवन का एक ऐसा नमूना है, जिसमें जनता अलग-अलग सम्प्रभु राज्यों के रूप में संगठित होती है। राष्ट्र-राज्य का क्षेत्र उसमें निवास करने वाली जनसंख्या का है, किसी अन्य का नहीं। उस राज्य को राष्ट्र-राज्य नहीं कहा जा सकता, जो किसी अन्य राज्य की परिसीमा का उल्लंघन करके राष्ट्र-राज्य बनने का प्रयत्न करे।

राष्ट्र राज्य का विकास-आधुनिक राष्ट्र:
राज्य जिन्होंने इंग्लैण्ड, फ्रांस व अमरीका आदि में हुई औद्योगिक क्रान्तियों की विजय के पश्चात् सामंतशाही का स्थान लिया, नए पूँजीवादी वर्ग के राजनैतिक संगठन हैं। बीसवीं शताब्दी में एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जारी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों के परिणामस्वरूप राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आए।

राष्ट्र-राज्य प्रणाली को प्रोत्साहित करने वाले सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व इस प्रकार हैं –

  1. रोमन साम्राज्य व पवित्र रोमन साम्राज्य का विखण्डन तथा सामंतवाद का अन्त।
  2. भूक्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता व कानून पर आधारित राष्ट्र-राज्यों का उदय।
  3. मेकियावेली, वोदां, ग्रोशियश, हाब्स, अल्यूशियस तथा अन्य विचारकों का सैद्धान्तिक व बौद्धिक योगदान।

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प्रश्न 2.
ऐसे किन्हीं पाँच कारकों की व्याख्या कीजिए, जिन्होंने भारत में राष्ट्रवाद को विदेशी आधिपत्य के विरुद्ध चुनौती के रूप में प्रोत्साहित किया? (Explain any five factors which influenced the challenges against foreign rule)
उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले पाँच कारक –
1. विदेशी प्रभुत्व के परिणाम:
भारत में राष्ट्रवाद के उदय में सर्वप्रथम विदेशी पभुत्व ने योगदान दिया। स्वयं ब्रिटिश शासन की परिस्थितयों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना विकसित करने में सहायता दी।

2. देश का प्रशासकीय और आर्थिक एकीकरण:
19 वीं और 20 वीं शताब्दी में भारत का एकीकरण हो चुका था और वह एक राष्ट्र के रूप में उभर चुका था। इसलिए भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावनाओं का विकास आसानी से हुआ।

3. पश्चिमी विचार और शिक्षा:
उन्नीसवीं सदी में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा और विचारधाराओं के प्रसाद के फलस्वरूप बड़ी संख्या में भारतीयों ने एक आधुनिक बुद्धिसंगत, धर्मनिरपेक्ष, जनतान्त्रिक तथा राष्ट्रवादी राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाया।

4. प्रेस तथा साहित्य की भूमिका:
वह प्रमुख साधन प्रेस था, जिसके द्वारा राष्ट्रवादी भारतीयों ने देश-भक्ती की भावनाओं का, आधुनिक, आर्थिक-सामाजिक, राजनीतिक विचारों का प्रचार किया तथा एक अखिल भारतीय चेतना जगाई।

5. सामाजिक व धार्मिक सुधार आन्दोलन:
19 वीं शताब्दी में भारत में सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध जो अनेक सुधार आन्दोलन चलाये थे, उन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने में बड़ा योगदान दिया। इन आन्दोलनों ने लोगों को विदेशी शासन के कुप्रभावों और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण से भी अवगत कराया।

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प्रश्न 3.
राज्य तथा संघ में कोई तीन अन्तर बताइए। (Explain any three points of difference between state and association)
उत्तर:
संघ वह संगठन होता है, जिसका निर्माण मनुष्यों के द्वारा किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। राज्य और संघ में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

1. सदस्यता का भेद (Membership):
राज्य की सदस्यता प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य होती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का सदस्य होता है किन्तु संघ की सदस्यता ऐच्छिक होती है। एक व्यक्ति एक समय में केवल एक ही राज्य का सदस्य हो सकता है। परन्तु वह एक समय पर अनेक संघों का सदस्य हो सकता है।

2. प्रदेश का भेद (Territory):
राज्य प्रादेशिक रूप में संगठित संघ होता है और इसका. क्षेत्र पूर्णतया निश्चित होता है। परन्तु संघ का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं होता। रेड-क्रास सोसायटी एक ऐसा संघ है, जिसका क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय है। दूसरी ओर अत्यन्त सीमित क्षेत्र वाले छोटे-छोटे संघ भी होते हैं।

3. अवधि का भेद (Tenure):
राज्य एक स्थायी संघ होता है। परन्तु संघ अधिकांशतः अल्पकालीन होते हैं।

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प्रश्न 4.
राज्य और समाज में अन्तर समझाइए। (Explain the difference between state and society)
उत्तर:

  1. राज्य समाज का एक भाग है। समाज व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों का जाल होता है, जबकि राज्य व्यक्तियों का एक राजनीतिक संगठन है।
  2. समाज व्यक्ति के सभी प्रकार के सामाजिक आचरण को नियन्त्रित करता है। परन्तु राज्य व्यक्ति के केवल बाहरी सम्बन्धों को ही नियन्त्रित करता है।
  3. राज्य एक अनिवार्य संगठन है, जबकि समाज ऐच्छिक है।
  4. राज्य एक प्रादेशिक संगठन है, जबकि समाज किसी प्रकार की भौगोलिक सीमाओं में बँधा हुआ नहीं होता। वह स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय हो सकता है।
  5. राज्य एक कृत्रिम संगठन है। परन्तु समाज की प्रकृति स्वाभाविक होती है।
  6. राज्य के निर्धारित विधान होते हैं, जिन्हें कानून कहा जाता है। कानून के उल्लंघन पर राज्य दण्ड देता है। समाज के अपने कायदे कानून होते हैं, जिनके उल्लंघन पर सामाजिक निर्वासन का प्रावधान होता है। इसका अर्थ है कि तब व्यक्ति को समाज से बाहर कर दिया जाता है।

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प्रश्न 5.
राष्ट्रवाद के प्रमुख तत्त्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिए। (Write short note on the main elements of Nationalism)
उत्तर:
राष्ट्रवाद के तीन मुख्य तत्त्व हैं –

  1. सम्प्रभुता
  2. क्षेत्रीय अखण्डता
  3. राज्यों की वैधानिक समानता

1. सम्प्रभुता (Sovereignty):
सम्प्रभुता का अर्थ है कि आधुनिक राष्ट्र राज्य पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं। सम्प्रभु राज्य ही परस्पर दूसरे राज्यों के साथ सन्धि बनाने का अधिकार रखते हैं। सम्प्रभुता विहीन राजनीतिक इकाई को इस प्रकार संधि करने का अधिकार नहीं होता। वे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का सदस्य भी नहीं बन सकते।

2. क्षेत्रीय अखण्डता (Territorial Integrity):
सम्प्रभु राज्यों को अपने भू-क्षेत्र के अन्तर्गत सर्वोच्च असीमित सत्ता प्राप्त होती है। इस पर कोई बाहरी नियन्त्रण नहीं होता। सम्प्रभुता विहीन राजनैतिक इकाई का अन्य राज्यों में कोई स्थान नहीं है। राष्ट्र-राज्य प्रणाली की यह विशेषता प्रथम विशेषता का तार्किक परिणाम है। राज्यों की सीमाओं की रक्षा हर दशा में होनी ही चाहिए।

3. राज्यों की वैधानिक समानता (Legal Equality):
सभी राष्ट्र-राज्य अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी के समान सदस्य हैं चाहे उनके आकार, जनसंख्या, आर्थिक संसाधन, दैनिक क्षमता आदि कितने भी असमान हों। यहाँ यह बात स्मरणीय है कि सभी स्वतन्त्र राज्यों की समानता का यह सिद्धान्त लगभग उसी समय अपनाया गया जब राष्ट्र-गान अस्तित्व में आया। 18 वीं शताब्दी के अनेक लेखकों ने भी राज्यों के समानता के सिद्धान्त का समर्थन किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राज्य तथा समाज में क्या अन्तर है? दोनों किन बिन्दुओं पर परस्पर निर्भर करते हैं?
उत्तर:
राज्य और समाज के विषय में कभी-कभी कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं और दोनों को एक समझने लगते हैं। वास्तव में दोनों में अन्तर है। अरस्तु ने राज्य तथा समाज के बीच भेद किया था, किन्तु एक तानाशाह के लिए दोनों में से कोई भेद नहीं होता। भौगोलिक दृष्टि में दोनों (राज्य तथा समाज) प्रायः एक ही भू-भाग में स्थित होते हैं, किन्तु दोनों की उत्पत्ति, उद्देश्यों और कार्य प्रणाली में अन्तर होता है। राज्य समाज में निम्नलिखित अन्तर होता है –

1. उत्पत्ति का भेद (Origin):
व्यक्तियों के बीच पाये जाने वाले सम्बन्धों को सामूहिक रूप से समाज कहा जाता है। ये सम्बन्ध संगठित अथवा असंगठित होते हैं। परन्तु राज्य का निर्माण राजनीतिक रूप से संगठित सम्बन्धों के आधार पर ही होता है। समाज राज्य से प्राचीन है। राज्य का अस्तित्व एक समाज में ही सम्भव है।

2. प्रदेश का अन्तर (Territory):
समाज के लिए निश्चित प्रदेश आवश्यक नहीं होता। परन्तु राज्य के लिए आवश्यक है। इसके बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु समाज के लिए निश्चित क्षेत्र या प्रदेश होना आवश्यक नहीं है। यह स्थानीय भी हो सकता है और अन्तर्राष्ट्रीय भी।

3. लक्ष्य का भेद (Aims):
लक्ष्य की दृष्टि से समाज व्यापक लक्ष्यों वाला तथा राज्य अपेक्षाकृत संकुचित लक्ष्यों वाला संगठन है। राज्य का अस्तित्व एक महान किन्तु एक ही लक्ष्य के लिए संगठित है। समाज का अस्तित्व अनेक लक्ष्यों के लिए है, जिसमें कुछ महान तथा कुछ साधारण होते हैं।

4. सम्प्रभुता का भेद (Sovereignty):
राज्य एक प्रभुत्व सम्पन्न संस्था है, जबकि समाज केवल नैतिक बल के आधार पर ही अपने आदेशों का पालन करा सकता है।

5. कार्यक्षेत्र का भेद (Scope):
कार्य क्षेत्र की दृष्टि से भी राज्य समाज की तुलना में बहुत सीमित है। सामाजिक जीवन के अनेक ऐसे पहलू हैं, जिनका न तो राज्य से कोई सम्बन्ध है और न ही जिनमें राज्य सफलतापूर्वक हस्तक्षेप कर सकता है। राज्य व्यक्तियों के केवल बाहरी कार्यों से ही सम्बन्ध रखता है और मानव जीवन के सहयोग, सहानुभूति, सेवा और प्रेम जैसे गुणों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता किन्तु समाज मानव जीवन के प्रत्येक पहलू (आन्तरिक एवं बाहरी सभी प्रकार) से सम्बन्ध रखता है।

राज्य और समाज की परस्पर निर्भरता (Inter dependence of State and Society):
राज्य और समाज में उपरोक्त भेद होते हुए भी परस्पर आन्तरिक आत्मनिर्भता होती है। सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर ही राज्य द्वारा कानूनों का निर्माण किया जाता है। सामाजिक एवं राजकीय नियमों के आधार पर ही सामाजिक आचरण को नियमित रखना सम्भव होता है। समाज और राज्य एक दूसरे पर निर्भर है। बार्कर का कहना है कि यदि ऐसा न होता तो राज्य की स्थापना ही नहीं हो सकती थी।

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प्रश्न 2.
राष्ट्र की परिभाषा दीजिए। इसके मुख्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए। (Define Nation What are its main elements)
उत्तर:
राष्ट्र (Nation) शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘नेट्स’ (Natus) शब्द से हुई जिसका अर्थ होता है ‘पैदा हुआ’। इसका तात्पर्य यह है कि राष्ट्र उन व्यक्तियों से बना है, जो किसी एक विशेष प्रजाति में पैदा हुए लोगों से बना है। परन्तु आज के युग में प्रजातियों के प्रवासीकरण तथा अन्तर्जातीय विवाहों के कारण कोई विशुद्ध प्रजाति नहीं बची है। रामजे मूर के अनुसार, “राष्ट्र व्यक्ति के शरीर की भाँति होता है, जिसमें हर अंग सौहार्द्रपूर्ण, ढंग से एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं तथा शरीर को मजबूत बनाते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले व्यक्ति भी यदि आपसी सौहार्द्र तथा सहभागिता का त्याग कर दें, तो राष्ट्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।”

राष्ट्र का निर्माण राज्य और राष्ट्रीयता से होता है। बर्गेस के अनुसार, “राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बंधी हुई वह जनता है, जो किसी अखण्ड भौतिक प्रदेश पर निवास करती हो।” जातीय एकता से उनका अभिप्राय ऐसी आबादी से है, जिसकी एक सामान्य भाषा और साहित्य, सामान्य परम्परा और इतिहास, सामान्य रीति-रिवाज तथा उचित और अनुचित की सामान्य चेतना हो। वास्तव में राष्ट्र ऐसे लोगों का समूह है, जो घनिष्ठता, अभिन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगठित है और एक मातृभूमि से सम्बन्धित है। हेज (Hayes) ने कहा है, “राष्ट्रीयता राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता को प्राप्त करके राष्ट्र बन जाती है।”

राष्ट्र के मुख्य तत्त्व:

1. प्रजातीय शुद्धता (Racial Purity):
प्रजातीय शुद्धता का अर्थ है कि एक ही समुदाय के सदस्यों की शुद्धता हो। आजकल प्रवास एवं अन्तर्जातीय विवाहों के कारण कहीं भी प्रजातीय शुद्धता प्राप्त करना आसान नहीं है।

2. भाषा समुदाय (Linguistic Association):
सामान्यतः किसी भी राष्ट्र के नागरिकों की एक आम भाषा होती है, क्योंकि इसी के माध्यम से वे अपने विचार तथा संस्कृति का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं।

3. भौगोलिक संलग्नता (Geographical Attachment):
प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभूमि से जुड़ा रहता है। इजराइल बनने से पूर्व यहूदी पूरी दुनिया में बिखरे हुए थे, किन्तु उनके मन में इजराइल के प्रति ही लगाव था।

4. धार्मिक समुदाय (Religious Association):
पहले राष्ट्र के निर्माण में धार्मिक भावनाओं की मुख्य भूमिका हुआ करती थी। उदाहरण के लिए प्रोटेस्टेंट का विरोध करने पर ब्रिटेन तथा स्पेन के बीच युद्ध छिड़ गया था। परन्तु आजकल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रों के निर्माण का बोलबाला है अर्थात् एक ही राष्ट्र में कई-कई धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। वे एक सशक्त राष्ट्रीयता से बंधे रहते हैं। भारत में धर्मों के विषय में विविधता में एकता पायी जाती है।

5. सामान्य राजनीतिक आकांक्षाएँ (Political Ambitious):
सामान्य राजनीतिक आकांक्षाएँ भी इसका एक तत्त्व माना जाता है। 1971 ई. के पेरिस शान्ति सम्मेलन में इसी आधार पर Self Determination के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया।

6. आर्थिक हितों की समरूपता (Economic Interest):
राष्ट्र निर्माण में अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है आर्थिक हितों की समरूपता। मिल के अनुसार, “किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी राजनीतिक पूर्वापरता, अपना राष्ट्रीय इतिहास तथा किसी प्राचीन ऐतिहासिक घटना पर एक सामूहिक प्रतिक्रिया तथा इससे जुड़ी स्मृतियों के आधार पर निर्मित होती है।”

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प्रश्न 3.
तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रवाद का उदय किस प्रकार हुआ? (How did the Nationalism rise in third world countries?)
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी में एशिया व अफ्रीका में साम्राज्यवाद के पतन के बाद भारत, चीन, बर्मा, मिस्र, नाइजीरिया, घाना, फिजी, वियतनाम, इण्डोनेशिया, लीबिया,, सीरिया तथा अन्य राज्य अस्तित्व में आए। कई मामलों में इन राज्यों की रचना राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के परिणामस्वरूप हुई। इन राष्ट्रों को सम्पूर्ण प्रभूता लम्बे संघर्षों के बाद स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद मिली।

साम्राज्वादी देशों ने इन राज्यों का खूब शोषण कर अपने को अमीर बना लिया। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध व बीसवीं शताब्दी के दौरान इन उपनिवेशों में शिक्षित शहरी वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ तथा ये स्वतंत्र हुए और राष्ट्रीय सम्प्रभु राज्यों के रूप में उभरे। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् संसार के मानचित्र में अनेक नए राज्य दिखाई पड़े। वर्तमान में इन नवस्वतन्त्र राज्यों को तीसरी दुनिया के देशों के रूप में जाना जाता है क्योंकि ये अमरीकी अथवा सोवियत गुट में से किसी में शामिल नहीं हुए। उन्होनें स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण किया। इन देशों को अविकसित अथवा विकासशील देश कहा जाता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(Write short note on)
(क) राष्ट्र
(ख) राज्य
(ग) संघ
(घ) सरकार

  1. Nations
  2. State
  3. Association
  4. Government

उत्तर:
(क) राष्ट्र (Nation):
राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता जिनको अंग्रेजीी में Nation तथा Nationality कहते हैं लैटिन भाषा के एक ही सामान्य शब्द ‘नेट्स’ (Natus) से निकले हैं, जिसका अर्थ ‘जन्म’ अथवा ‘जाति’ है। गार्नर के अनुसार, “राष्ट्रीयता का विकास सजातीय सामाजिक समुदाय के लोगों के सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक रूप से आपसी विचारों के आदान-प्रदान हेतु संगठित होने के कारण हुआ है।”

रामजे मूर (Ramsey Muir) के अनुसार, “राष्ट्र व्यक्ति के शरीर की भाँति होता है, जिसमें हर अंग सौहार्द्रपूर्ण ढंग से एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं तथा शरीर को मजबूत बनाते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले व्यक्ति भी यदि आपसी सौहार्द तथा सहभागिता का त्याग कर दें, तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।” बर्गेस के अनुसार, “राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बंधी हुई वह जनता है, जो किसी अखण्ड भौतिक प्रदेश पर निवास करती हो।” जिमन ने लिखा है, “राष्ट्र ऐसे लोगों का समूह है, जो घनिष्ठता, अभिन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगठित है और एक मातृभूमि से सम्बन्धित है।”

(ख) राज्य (State):
डॉ. गार्नर के अनुसार, “राज्य एक थोड़े या अधिक संख्या वाले संगठन का नाम है, जो कि स्थायी रूप से पृथ्वी के निश्चित भाग में रहता हो। वह बाहरी नियन्त्रण से सम्पूर्ण स्वतन्त्र या लगभग स्वतन्त्र हो और उसकी एक संगठित सरकार हो, जिसकी आज्ञा का पालन अधिकतर जनता स्वभाव से करती हो।”

गिलक्राइस्ट ने लिखा है, “राज्य उसे कहते हैं, जहाँ कुछ लोग एक निश्चित प्रदेश में एक सरकार के अधीन संगठित होते हैं। यह सरकार आन्तरिक मामलों में अपनी जनता की प्रभुसत्ता को प्रकट करती है और बाहरी मामलों में अन्य सरकारों से स्वतन्त्र होती है।” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही रहना चाहता है। एक निश्चित सीमा में बिना किसी नियन्त्रण के गठित सरकार के अधीन संगठित लोगों के समुदाय को राज्य कहा जाता है।

(ग) संघ (Association):
मेकाइवर के अनुसार संघ व्यक्तियों या सदस्यों के ऐसे समूह को कहा जाता है, जो एक सामान्य लक्ष्य के लिए संगठित है। एक प्रकार के विशेष उद्देश्य रखने वाले व्यक्ति एक दूसरे के समीप आते हैं और समूह बनाकर अर्थात् संगठित होकर इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि राज्य भी मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गठित एक संगठन होता है। परन्तु राज्य में चार तत्त्व होते हैं-जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और सम्प्रभुता जबकि संघ को निश्चित भू-भाग की आवश्यकता नहीं होती। इसकी सदस्यता ऐच्छिक होती है। राज्य की तरह संघ सम्प्रभु नहीं होते।

(घ) सरकार (Government):
बहुत से लोग राज्य तथा सरकार को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। लुई चौदहवाँ (फ्रांस का सम्राट) कहा करता था, “मैं ही राज्य हूँ।” परन्तु सरकार तो राजा का एक तत्त्व है। सरकार सार्वजनिक नीतियों को निर्धारित करने वाली तथा सार्वजनिक हितों को लागू करने वाली एक एजेन्सी अथवा तन्त्र है। सरकार वास्तव में राज्य सत्ता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। राज्य में सरकारें बदलती रहती है। परन्तु राज्य स्थायी तौर पर बना रहता है। सरकार के तीन अंग होते हैं –

  1. कार्यपालिका
  2. विधायिका
  3. न्यायपालिका

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प्रश्न 5.
राज्य किसे कहते हैं? राज्य के प्रमुख तत्त्वों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (What is state Explain the main elements of a state)
उत्तर:
एक निश्चित सीमा में बिना किसी बाहरी नियन्त्रण के गठित सरकार के अधीन संगठित लोगों के समुदाय को राज्य कहा जाता है। मानव स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। लास्की ने कहा है कि राज्य एक भूमिगत समाज है, जो शासक और शासितों में बँटा रहता है।

अरस्तू ने कहा था कि राज्य का जन्म जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ है और आज भी आदर्श जीवन की प्राप्ति के लिए इसका अस्तित्व बना हुआ है। गार्नर के अनुसार, “राज्य बहुसंख्यक व्यक्तियों का ऐसा समुदाय है, जो किसी प्रदेश के निश्चित भाग में स्थायी रूप से रहता हो, बाहरी शक्ति के नियन्त्रण से पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से ही स्वतन्त्र हो और जिसमें ऐसी सरकार विद्यमान हो, जिसके आदेश का पालन नागरिकों के विशाल समुदाय द्वारा स्वभावतः किया जाता है।” राज्य के तत्त्व-राज्य के निम्नलिखित चार अनिवार्य तत्व होते हैं –

1. जनसंख्या (Population):
राज्य को बनाने के लिए जनसंख्या आवश्यक है। हम किसी निर्जन प्रदेश को राज्य नहीं कह सकते। किसी राज्य की जनसंख्या कितनी हो यह नहीं कहा जा सकता है। प्लूटो ने राज्य की जनसंख्या 5000 तथा रूसो ने 10,000 निश्चित की थी। परन्तु आजकल विशाल राज्य है, जिनकी जनसंख्या करोड़ों में है। भारत और चीन की जनसंख्या एक अरब से भी अधिक है। अरस्तु का यह कथन था कि राज्य की जनसंख्या इतनी हो, जिससे कि वह आत्मनिर्भर रह सके। आज भारत की अनेक समस्याओं का कारण उसकी अधिक जनसंख्या है।

2. भू-भाग (Territory):
प्रत्येक राज्य का अपना एक निश्चित भू-भाग होता है। इस निश्चित भू-भाग से प्रेम करने के कारण देशभक्ति का उदय होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय अनेक वीरों ने अपनी मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है। निश्चित भू-भाग राज्य के लिए इस कारण अनिवार्य है कि राज्य की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए दूसरे राज्यों द्वारा किए जाने वाले हस्तक्षेपों को रोका जा सके। निश्चित भू-भाग के अन्तर्गत भूमि, जल तथा वायु तीनों ही क्षेत्र आते हैं। राज्य का अधिकार अपने भू-क्षेत्र, समुद्री क्षेत्र तथा आकाश आदि सभी पर होता है। राज्य का भू-भाग रूस के समान विशाल तथा सेन्ट मरीना जितना छोटा भी हो सकता है।

3. सरकार (Government):
राज्य का एक प्रमुख तत्त्व सरकार भी है। जनता जब तक समुचित ढंग से संगठित नहीं होती, तो राज्य नहीं बन सकता। सरकार एक निर्धारित भू-भाग में रहने वाले लोगों के सामूहिक उद्देश्यों की तरफ भी ध्यान देती है। सरकारें नीति निर्धारण और उनको क्रियान्वित करने का कार्य करती है। सरकार की अनुपस्थिति में गृह युद्ध होने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सरकार के विभिन्न रूप होते हैं। लोकतन्त्र, कुलीन तन्त्र तथा अधिनायक तन्त्र की सरकारें हो सकती है। इसके आलावा संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक सरकारें हो सकती हैं।

4. सम्प्रभुता (Sovereignty):
सम्प्रभुता भी राज्य का एक अनिवार्य तथा महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। किसी निश्चित भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या को एक सरकार के अधीन नियन्त्रित हो जाने मात्र से ही उसे राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता, क्योंकि इसके लिए सम्प्रभुता का होना भी आवश्यक है। सम्प्रभुता दो प्रकार की होती है –

  • एक आन्तरिक सम्प्रभुता और
  • बाह्य सम्प्रभुता।

आन्तरिक सम्प्रभुता का अर्थ है राज्य का अपनी सीमा के भीतर एकाधिकार। इसमें किसी दूसरे राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता। उसकी इस स्वतन्त्रता में किसी बाहरी सत्ता का हस्तक्षेप नहीं होता। 1947 ई. से पूर्व भारत में अन्य सभी तत्त्व मौजूद थे, किन्तु उसे राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं था, क्योंकि तब तक भारत सम्प्रभुता सम्पन्न नहीं था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उग्र राष्ट्रवाद किसका समर्थन करता है?
(क) सैनिकवाद
(ख) विश्वशान्ति
(ग) अहिंसा
(घ) आतंकवाद
उत्तर:
(ग) अहिंसा

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प्रश्न 2.
अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त अधिकार –
(क) भारत में निवास करने वाले सभी व्यक्तियों में उपलब्ध है।
(ख) भारत में नागरिकों को ही उपलब्ध है।
(ग) विदेशियों को भी उपलब्ध है।
(घ) इनमें से किसी को भी उपलब्ध नहीं है।
उत्तर:
(ख) भारत में नागरिकों को ही उपलब्ध है।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

Bihar Board Class 11 Political Science राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
राजनीतिक सिद्धांत के बारे में नीचे लिखे कौन-से कथन सही हैं और कौन-से गलत?
(क) राजनीतिक सिद्धांत उन विचारों पर चर्चा करता है जिनके आधार पर राजनीतिक संस्थाएं बनती हैं।
(ख) राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न धर्मों के अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या करता है।
(ग) यह समानता और स्वतंत्रता जैसी अवधारणाओं के अर्थ की व्याख्या करता है।
(घ) यह राजनीतिक दलों के प्रदर्शन की भविष्यवाणी करता है।
उत्तर:
(अ) सत्य
(ब) असत्य
(स) सत्य
(द) असत्य

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प्रश्न 2.
‘राजनीति उन सबसे बढ़कर है, जो राजनेता करते हैं।’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
राजनीति में मानव स्वभाव की गहरी पैठ है। व्यक्ति मौलिक रूप से एक स्वार्थी जीव है जो हमेशा प्रतियोगिता में या छिपे रूप में होता है। राजनीति दूसरों के व्यवहार के प्रबंधन की कला है जो उस पर लादा जाता है या निर्देशित किया जाता है। राजनीति प्रभाव की एक कला है और यह अधिकृत स्थिति प्राप्त करने की विधि है। यह निश्चित रूप से राजनीतिज्ञ के उस कार्य से सम्बन्धित नहीं है जो वह करता है या वह विभिन्न कार्यों में निर्णय लेता है।

वस्तुतः राजनीति उससे कहीं अधिक है। राजनीति किसी भी समाज का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग है। राजनीति सरकार के अच्छे मार्गों का एक प्रयास है। महात्मा गाँधी ने एक बार अवलोकन किया कि राजनीति हमें सर्प की कुण्डली के समान ढंकता, है और बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं देता परंतु यह एक संघर्ष है। राजनीति का प्रयोग समूह, समाज और राजनीतिक संगठन के कुछ रूपों में सामूहिक निर्णय निर्माण के लिए होता है। राजनीतिक बातचीत में सामूहिक निर्णय पर इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीति एक विस्तृत संकल्पना है जिसका क्षेत्र विस्तृत है।

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प्रश्न 3.
लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए नागरिकों का जागरूक होना जरूरी है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
लोकतंत्र को लोगों की सरकार कहा जाता है। यह कहा जाता है कि सरकार की लोकतंत्रीय प्रणाली में वास्तविक शक्ति जनता के पास होती है। यह एक अत्यधिक उत्तरदायी और उत्तरदायित्व पूर्ण सरकार होती है। यह विभिन्न मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर बातचीत और वाद-विवाद पर आधारित होती है। लोकतंत्र का उद्देश्य जनता हेतु महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे-समानता, न्याय, स्वतंत्रता इत्यादि को प्राप्त करना होता है। लोकतंत्र में लोगों का महत्व दिया जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य भाईचारा भी स्थापित करना होता है।

लोकतंत्र की सफलता के लिए कुछ पूर्व आवश्यकताएँ जरूरी हैं जिनमें सतर्क नागरिक होना अति आवश्यक है। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति और कर्तव्यों के प्रति चैतन्य नहीं हैं। यदि वे यह नहीं जानता है कि सरकार क्या करने जा रही है और सरकार की नीति क्या है? यदि वे प्रशासन और विधान पर प्रतिरोध या रुकावट नहीं डालते, वे घमंडी हो जाएंगे और अपनी स्थिति और अधिकारों का दुरुपयोग करेंगे। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित होंगे और प्रजातंत्र के सम्मान में भी गिरावट आयगी।

इसीलिए लोगों को विभिन्न स्तरों पर जातीय वाद-विवाद और भाषण के आधार पर स्वस्थ जनमत बनाना चाहिए। इसके लिए लोगों में निम्नलिखित गुण होना चाहिए –

  1. उनमें उच्च स्तर की साक्षरता होनी चाहिए।
  2. लोगों में आर्थिक और सामाजिक समानता होनी चाहिए।
  3. लोगों में पर्याप्त रोजगार होना चाहिए।
  4. लोगों को जाति, भाषा और धर्म के ऊपर उठना चाहिए जिससे लोगों में भाई-चारे का दृष्टिकोण विकसित हो। यदि समाज में योग्यता का अभाव होगा तो प्रजातंत्र केवल एक भीड़ के रूप में होगा और सरकार पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं कायम हो पायगा।
  5. चैतन्य नागरिक का तात्पर्य उत्तरदायी और जागरूक नागरिक से है जो सरकार के कार्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग ले सकता है।

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प्रश्न 4.
राजनीतिक सिद्धांत का अध्ययन हमारे लिए किन रूपों में उपयोगी है? ऐसे चार तरीकों की पहचान करें जिनमें राजनीतिक सिद्धांत हमारे लिए उपयोगी हों।
उत्तर:
प्रत्येक विषय का अपना सिद्धांत होता है। वस्तुतः कोई विषय भी विषय सिद्धांतों के बगैर हो ही नहीं सकता। जब एक परिकल्पना तथ्यों से समर्थित होती है, तो यह सिद्धांत बन जाता है। सिद्धांत एक सामान्यीकरण है जो सम्पूर्ण स्थिति की व्याख्या करता है। यह एक तथ्यात्मक कथन है। यदि विज्ञान (शारीरिक विज्ञान) है या सामाजिक विज्ञान, सभी विषयों के सिद्धांत होते हैं। हमने डार्विन सिद्धांत, न्यूटन नियम और आर्किमिडीज के सिद्धांत के विषय में सुना है। ये सभी सिद्धांत नये नियमों, सिद्धांतों और कानूनों के प्रेरणा-स्रोत हैं।

उसी प्रकार सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, नागरिक प्रशासन आदि के सभी शाखाओं में सिद्धांतों की उपयोग की बात है उसे निम्नलिखित उपयोगी बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. राजनीतिक सिद्धांत समाज को राजनीतिक दिशा प्रदान करता है।
  2. राजनीतिक सिद्धांत सामान्यीकरण, साधन और अवधारणा प्रदान करता है जो समाज में प्रभावी प्रवृत्तियों को समझने में सहायता करता है।
  3. राजनीतिक सिद्धांत आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा का कार्य करता है।
  4. राजनीतिक सिद्धांत समाज को बदलता है।
  5. राजनीतिक सिद्धांत समाज को गतिशील और आंदोलनकारी बनाता है।
  6. ये सिद्धांत समाज में सुधार लाते हैं।
  7. राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विचार और संस्थाओं के मौलिक ज्ञान को प्राप्त करने में सहायता करते हैं जो समाज को एक विशेष आकार देते हैं जिसमें हम रहते हैं।
  8. राजनीतिक सिद्धांत समाज को निरंतर बनाये रखते हैं।

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प्रश्न 5.
क्या एक अच्छा या प्रभावपूर्ण तर्क औरों को आपकी बात सुनने के लिए बाध्य कर सकता है?
उत्तर:
सिद्धांत तथ्यों और हेतुवाद (Rationalism) को बताता है। सिद्धांत तार्किक वाद-विवाद और भाषण पर आधारित होता है। सिद्धांत व्यक्ति के उचित सामर्थ्य और मानव व्यवहार में निहित होता है। यह बहुत हद तक सही है कि अतार्किक कथन दूसरों के लिए अनुसरण योग्य नहीं होते। यह केवल तार्किक और विवेकी तर्क ही हैं जो दूसरों के लिए अनुसरण योग्य होते हैं। राजनीतिक सिद्धांत उन प्रश्नों का परीक्षण करता है जो समाज से सम्बन्धित और व्यवस्थित होते हैं।

ये विचार मूल्यों के विषय में होते हैं जो राजनैतिक जीवन और मूल्यों को वैसे और महत्व और सम्बन्धित संकल्पना की व्याख्या करते हैं। ऊँचे स्तर पर यह उन वर्तमान संस्थाओं को देखता है जो पर्याप्त है और वे किस प्रकार अस्तित्व में हैं। वह नीति कार्यान्वयन को भी देखता है ताकि वे लोकतांत्रिक और सही रूप में परिवर्तित हो। राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों और राजनीतिक घटनाओं का मूल्यांकन करने में विवेकयुक्त विचार करने में पशिक्षित करता है।

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प्रश्न 6.
क्या राजनीतिक सिद्धांत पढ़ना, गणित पढ़ने के समान है? अपने उत्तर के पक्ष में कारण दीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांतों का अध्ययन निश्चित रूप से केवल कुछ पहलुओं में गणित अध्ययन के समान है। यह पूर्ण रूप से समान नहीं है। राजनीतिक सिद्धांत एक तथ्यात्मक कथन है जो कुछ तथ्यों पर आधारित होते हैं। उनमें सूत्रीय औचित्य होता है। तथ्य अंकों के समान गणितीय नहीं होते। राजनीतिक सिद्धांत परिकल्पना करता है। यह एक तार्किक और विवेकी है। यह गुण समस्याओं और गणितीय समीकरणों में दिखाई देता है। हम कह सकते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत गुणात्मक तथ्यों के गणित के निकट है और मात्रात्मक की अपेक्षा विवेकयुक्त है। विधि की दृष्टि से भी राजनीतिक सिद्धांत और गणित में निकटता दिखाई देती है।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (What is the meaning of the term Politics)
उत्तर:
प्राचीन काल में राज्य के क्रियात्मक रूप के लिए ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। अरस्तू के ग्रन्थ का नाम भी ‘राजनीति’ (Politics) था। पालिटिक्स शब्द की उत्पति यूनानी शब्द के पोलिस (Polis) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ नगर-राज्य (City-State) होता है। राजनीति के अन्तर्गत राज्य सरकार, अन्य राजनीतिक संगठनों और उनकी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

आधुनिक विद्वान-जेलिनिक, होल्जन बर्क, सिजविक, ट्रीटरके आदि भी राजनीति के अन्तर्गत राज्य और सरकार से सम्बद्ध बातों का अध्ययन मानते हैं। फ्रेडरिक पोलक इसे सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक राजनीति में बाँटते हैं। सैद्धान्तिक राजनीति राज्य, सरकार तथा विधान से सम्बन्धित मूल सिद्धांत तथा व्यावहारिक राजनीति राज्य के कार्य, कानून का स्वरूप, व्यक्ति तथा राज्य के सम्बन्धों आदि का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 2.
राजनीतिक सिद्धांत का आशय स्पष्ट कीजिए। (Clarify the meanings of Political theory)
उत्तर:
कुछ विद्वानों ने ‘राजनीतिशास्त्र’ अथवा ‘राजनीतिक दर्शन’ के लिये राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग किया किन्तु आशीर्वाद जैसे विद्वानों ने दोनों की विषय वस्तु को एक नहीं माना है। आशीर्वाद के विचार में ‘राजनीतिक सिद्धांत’ शब्द का प्रयोग ‘राजनीतिक दर्शन’ की अपेक्षा अधिक उचित है। ‘राजनीतिक दर्शन’ अनिश्चितता, अस्पष्टता तथा काल्पनिक पक्ष का द्योतक है, जबकि राजनीतिक सिद्धांत शब्द अधिक स्पष्ट, अधिक निश्चित और अधिक नियोजित है।

किन्तु वर्तमान काल में राज्य-विषयक ज्ञान के लिये राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग उचित और तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि, “राजनीतिक सिद्धांत’ सरकार और शासन कला से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। ‘राजनीतिक सिद्धांत’ का सम्बन्ध राज्य के मौलिक सिद्धांतों तथा उसके भूत और वर्तमान तक सीमित है। इसका राज्य के भावी स्वरूप तथा कार्यक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है। इस सम्बन्ध में तथ्य प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को अनेक विद्वानों ने निम्न तथ्यों के आधार पर एक विज्ञान माना है –

  1. प्रयोगात्मक विधि द्वारा राजनीतिशास्त्र का अध्ययन सम्भव है।
  2. विज्ञान की तरह राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी की जा सकती है।
  3. राज्य रूपी प्रयोगशाला में राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत परीक्षण एवं पर्यवेक्षण कर एक निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है।
  4. राजनीति विज्ञान में भी कार्य कारण-प्रभाव सम्बन्ध देखा जा सकता है।

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प्रश्न 4.
राजनीति विज्ञान एक विज्ञान नहीं है। तर्क दीजिए। (Political Science is not a science. Give reason)
उत्तर:
निम्न तथ्यों के आधार पर राजनीति विज्ञान को विज्ञान नहीं माना जाता है।

  1. इसमें वैज्ञानिक विधियों का अभाव है।
  2. कार्य-कारण सम्बन्ध का अभाव है।
  3. इसके अन्तर्गत सही भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है।
  4. इसमें शुद्ध एवं शाश्वत निष्कर्ष का अभाव है।
  5. इसमें सार्वभौम रूप से मान्य नियमों का अभाव है।
  6. प्रयोगशालाओं का अभाव।
  7. राजनीति विज्ञान का आधार अनिश्चित तथा विचारों में एकता का अभाव है।
  8. इसमें अचूक माप का अभाव है।
  9. इसमें वस्तुपरक अध्ययन की कमी है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान किसे कहते हैं? (What is Political Science?) अथवा, राजनीति विज्ञान से आप क्या समझते हैं? (What do you know about Political Science?)
उत्तर:
विश्व के बहुत से. दार्शनिकों ने राजनीति विज्ञान को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। प्रो. गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का अध्ययन राज्य के साथ आरम्भ होता है और राज्य के साथ समाप्त होता है।” प्रो. सीले के अनुसार, “जिस तरह अर्थशास्त्र धन का, जीव-शास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का तथा रेखागणित स्थान और दूरी का अध्ययन करता है, उसी प्रकार राजनीति विज्ञान ‘शासन’ के बारे में छानबीन करता है।”

प्रो. गेटेल के अनुसार, “जिन विषयों में राजनीति विज्ञान की सर्वाधिक दिलचस्पी है वे हैं-राज्य, सरकार और कानून।” इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान, राज्य, सरकार, व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन है। इसमें राज्य के भूत, वर्तमान और भविष्य के हर पहलू का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 6.
राजनीति विज्ञान ‘पोलिस’ शब्द से किस प्रकार सम्बन्धित है? (How is Political Science related with the word ‘Polis’?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को अंग्रेजी भाषा में Political Science कहा जाता है। अरस्तू ने इसे Politics का नाम दिया है। पोलिटिक्स (Politics) शब्द यूनानी भाषा के ‘पोलिस’ (Polis) से बना है जिसका अर्थ है ‘नगर राज्य’ (City State)। प्राचीन काल में छोटे-छोटे नगर राज्य हुआ करते थे परंतु अब विशाल राज्यों का युग है। अत: राजनीति विज्ञान वह विषय है जो राज्यों के बारे में अध्ययन करता है।

प्रश्न 7.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व बताइए। (Write two significance of study of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व निम्नलिखित हैं –

  1. राजनीति विज्ञान देश के नागरिकों को उनके अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान कराता है।
  2. राजनीति विज्ञान का अध्ययन लोकतंत्र की सफलता के लिए भी. आवश्यक माना जाता है। नागरिकों को राजनीति विज्ञान से राजनीतिक शिक्षा मिलती है। नागरिकों को यह पता चलता है कि इन्हें अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कैसे करना चाहिए तथा उनके प्रतिनिधि कैसे होने चाहिए।

प्रश्न 8.
राजनीति विज्ञान में मुख्यतः किन बातों का अध्ययन किया जाता है? (What is the main subject matter of Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान में मुख्यतः जिन बातों का अध्ययन किया जाता है उनमें से अधिकांश निम्नलिखित हैं –

  1. राज्य का अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन।
  2. सरकार और उसके विभिन्न रूपों का अध्ययन।
  3. मानव के राजनीतिक आचरण का अध्ययन।
  4. विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन।

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प्रश्न 9.
राजनीति विज्ञान को सर्वव्यापी विज्ञान किसने तथा क्यों कहा? (Why has called Political Science. “A Master Science” and why?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को कुछ विद्वान विज्ञान मानते हैं और कुछ अन्य विद्वान इस विषय को कला मानते हैं। अरस्तु यूनान का एक बड़ा दार्शनिक था। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान न केवल विज्ञान है बल्कि यह अन्य विज्ञानों से ऊपर भी है। अरस्तू के विचार में इसे इसलिए सर्वव्यापी विज्ञान (Master Science) कहना आवश्यक है क्योंकि यह मानव की सभी क्रियाओं और पहलुओं का अध्ययन करता है। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान के क्षेत्रों में केवल राजनीतिक संस्थाएँ ही नहीं आतीं बल्कि सामाजिक संस्थाएं भी आती हैं।

प्रश्न 10.
राजनीति क्या है? (What is Politics?)
उत्तर:
राजनीति (Politics) शब्द यूनानी भाषा के शब्द (Polis) से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य (City State) है। प्राचीन काल में नगर राज्य हुआ करते थे। अतः राजनीति का अर्थ राज्य संबंधी समस्याओं से ही माना जाता था, परंतु आधुनिक धारणा यह है कि राजनीति एक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक दल, दबाव, गुट, राजनीतिक संस्कृति, जनमत, मतदान आचरण सभी आ जाते हैं। कुछ आधुनिक लेखकों ने राजनीतिक को ‘शक्ति के लिए सघर्ष’ कहा है। कुछ अन्य लेखक राजनीति को मूल्यों के अधिकारिक आबंटन से संबंधित करते हैं।

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प्रश्न 11.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के क्या लाभ हैं? (What are the advantage of studying Political science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के प्रमुख लाभ –

  1. राजनीति विज्ञान के अध्ययन से हमें राज्य और सरकार के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।
  2. नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान होता है।
  3. विभिन्न समुदायों के संगठनं कार्य तथा उद्देश्यों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. लोकतंत्र की सफलता विज्ञान के अध्ययन पर निर्भर है।
  5. राजनीतिक चेतना जागृत होती है।
  6. मानव के दृष्टिकोण को उदार बनाता है।
  7. जन कल्याण सम्बन्धी नीति बनाने में सहायक होता है।
  8. व्यक्ति में नैतिक गुणों का विकास करता है। उसे एक आदर्श नागरिक बनाता है।

प्रश्न 12.
राजनीति और राजनीति विज्ञान में क्या अंतर है? (What is the distinction between Politics and Political Science?)
उत्तर:
राजनीति और राजनीति विज्ञान में अंतर (Distinction between Politics and Political Science):
प्राचीन काल में राजनीति शास्त्र को राजनीति ही कहा जाता था। अरस्तू ने अपनी पुस्तक का नाम ‘Politics’ ही रखा था, परंतु आजकल इन दोनों में भेद किया जाता है। ‘Politics’ (राजनीति) शब्द ग्रीक भाषा के Polis से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे नगर राज्य थे, परंतु अब बड़े-बड़े राज्य बन गए हैं। आजकल राजनीति शब्द का अर्थ उन राजनीतिक समस्याओं से लगाया जाता है जो कि किसी ग्राम, नगर, प्रान्त, देश अथवा विश्व की समस्याएँ हैं।

राजनीति दो प्रकार की होती हैं-सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक। राजनीतिक विज्ञान, राजनीति से प्राचीन है। राजनीति विज्ञान का उद्देश्य आदर्श राज्य, आदर्श नागरिक तथा आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है जबकि राजनीति का उद्देश्य किसी भी प्रकार सत्ता प्राप्त करने से है। राजनीति का अर्थ ही सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष है जबकि राजनीति शास्त्र सहयोग, सौहार्द्र, सहिष्णुता, प्रेम तथा त्याग की भावना सिखाता है। राजनीति विज्ञान निश्चित आदर्शों पर आधारित है जबकि राजनीति स्वार्थ व अवसरवादिता पर आधारित है।

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प्रश्न 13.
“राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है।” व्याख्या कीजिए। (“Politics is the struggle for power.” Explain)
उत्तर:
कई आधुनिक लेखकों ने राजनीति को ‘शक्ति के लिए संघर्ष’ के रूप में देखा है। वेल और केपलेन (Lasswel and Kaplan) के शब्दों में, “राजनीतिक विज्ञान शक्ति को सँवारने और उसका मिल-बाँटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” राबर्ट डैल (Robert Dahl) का कहना है “राजनीति में शक्ति और प्रभाव का अध्ययन शामिल है।” (Politics involves power and influence) लोग दूसरों पर शासन करना चाहते हैं। ये सत्ता के भूखे होते हैं और शक्ति के लिए संघर्ष करते हैं। राजनीतिक दलों, दबाव गुटों और अन्य संगठित समुदायों के बीच सत्ता या सुविधाओं के लिए संघर्ष चलता रहता है। अत: यह ठीक ही कहा गया है कि राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है।

प्रश्न 14.
राजनीति विज्ञान की इतिहास को क्या देन है? (What is the contribution of Political Science to History?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान की इतिहास को देन (Contribution of Political Science to History):

  1. राजनीति विज्ञान इतिहास को सरस बनाता है।
  2. राजनीति विज्ञान इतिहास को नयी दिशा प्रदान करता है, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न होती तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता।
  3. राजनीतिक विचारधाराएँ ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती है। रूसो और मांटेस्क्यू के विचारों ने फ्रांस को जन्म दिया।
  4. “राजनीति विज्ञान ही वह शास्त्र है जो स्वर्ण कणों के रूप में इतिहास रूपी नदी की रेत में संगृहीत किया जाता है।”

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प्रश्न 15.
राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को क्या देन है? (What is the contribution of Political Science to Economics?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Economics):
राजनीति विज्ञान का उद्देश्य नागरिकों को उन्नति व विकास द्वारा जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना है। राजनीतिक विचारधाराओं का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। “जैसे प्रजातंत्र की विचारधारा आर्थिक न्याय पर बल देती है। राजनीतिक संगठनों का भी देश की अर्थशास्त्र पर प्रभाव पड़ता है। यदि सत्ता दल में एकता और अनुशासन है तो वहाँ की आर्थिक नीतियाँ उचित और स्थायी होंगी। सरकारी नीतियाँ, आयात-निर्यात, बैंक नीति, विनिमय दर, सीमा शुल्क आदि नीतियों का भी अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 16.
“राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक हैं।” स्पष्ट करो। (“Political Science and History are matually contributory and complementary.” Explain)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और इतिहास का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। दोनों को एक दूसरे से अलग करना बहुत कठिन है। सीले का कथन है कि, “राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास का कोई फल नहीं; इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान का कोई मूल्य नहीं।” राजनीति विज्ञान इतिहास पर निर्भर है। सभी राजनीति संस्थाएँ विकास का परिणाम होती हैं।

उन्हें समझने के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। इतिहास राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला है। ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर वर्तमान राजनीतिक जीवन में सुधार करने हेतु भविष्य के लिए मार्ग निश्चित किया जा सकता है। दूसरी ओर राजनीति विज्ञान भी इतिहास को अध्ययन सामग्री प्रदान करता है। ऐतिहासिक घटनाएँ राजनीतिक विचारधाराओं का परिणाम होती हैं। निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक हैं।

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प्रश्न 17.
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति के किन्हीं दो विषयों का नाम बताओ। (Mention the name of any two subjects of Political Science according to Modern Approach)
उत्तर:
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के मुख्य विषय निम्नलिखित हैं –

  1. सत्ता तथा शक्ति का अध्ययन
  2. मूल्यों की सत्तावादी व्यवस्था का अध्ययन

प्रश्न 18.
परम्परागत दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन के कोई दो विषय बताओ। ( Mention any two subject of Political Science according to traditional view)
उत्तर:
परम्परागत दृष्टिकोण के अध्ययन के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन में निम्नलिखित विषयों को मुख्यरूप से शामिल किया जाता है:

  1. राजनीति शास्त्र का अध्ययन (Study of Political Science) है। इसमें राज्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है।
  2. सरकार का अध्ययन (Study of Government): राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत सरकार का अध्ययन किया जाता है। सरकार राज्य का आवश्यक अंग है। सरकार का संगठन सरकार के अंग तथा विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियों का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 19.
राजनीति की परिभाषा दीजिए। (Define politics)
उत्तर:
सामान्य राजनीति से आशय ‘निर्णय लेने की प्रक्रिया’ है। यह प्रक्रिया सार्वभौमिक है। जीन ब्लान्डल के अनुसार “राजनीति एक सार्वभौमिक क्रिया है।” हरबर्ट जे. स्पेंसर के अनुसार “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान करता है।”

प्रश्न 20.
घरेलू मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप को उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। (Clarify with example the political interference in internal affairs)
उत्तर:
राजनीति का घरेलू मामलों में हस्तक्षेप 10वीं सदी के उत्तरार्द्ध में प्रारंभ हुआ। महिलाओं का शोषण रोकने के लिए भारत में भी अन्य देशों के समान घरेलू हिंसारोधक अधिनियम बनाकर उन्हें घरेलू हिंसा से निदान के क्षेत्र में पहल हुई।

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प्रश्न 21.
क्या राजनीतिक विवादों को तर्कों द्वारा सुलझाया जा सकता है? (Does the solution of Political conflicts is settled by arguments?)
उत्तर:
राजनीतिक तर्कों का एकमात्र उद्देश्य अपनी बात को मनवाना होता है और इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए मनुष्य अनेक तरीकों को अपना सकता है, जैसे-विज्ञापन अथवा प्रचार-प्रसार द्वारा। इराक पर आक्रमण के अपने तर्क को सही ठहराने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने विज्ञापन तथा प्रचार, दोनों तरीकों का सहारा लिया था।

ऐसे समय राजनीतिक विवाद उन तक ही सीमित रह जाते हैं जिनका प्रदर्शन अच्छे तरीके से किया जाता है चाहे वह तर्क गलत ही क्यों न हों। प्रचार के माध्यमों से राजनीतिक उद्देश्यों को जनता के सामने तोड़-मरोड़ कर तथ्यों के द्वारा रखा जाता है और अपने मनमाने निष्कर्षों को लोगों के ऊपर थोप दिया जाता है। यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विचारक यह म ते हैं कि राजनीतिक विवादों को तर्कों के माध्यम से ठीक ढंग से नहीं सुलझाया जा सकता है।

प्रश्न 22.
सिद्धांत किसे कहते हैं? (What is theroy?)
उत्तर:
सिद्धांत अंग्रेजी शब्द (Theory) का हिन्दी रूपांतर है और Theory यूनानी शब्द ‘थ्योरिया’ (Thoria), थ्योरमा’ (Theorema) थ्योराइन’ (Theorein) नामक शब्द से लिया गया है। इसका अर्थ है “भावात्मक सोच-विचार” (Sentimental Thinking)। एक ऐसी मानसिक दृष्टि जो कि एक वस्तु के अस्तित्व और उसके कारणों को प्रकट करती है। ओनोल्ड बेश्ट के अनुसार सिद्धांत के अन्तर्गत “किसी भी विषय के संबंध में एक लेखक की पूरी की पूरी सोच या समझ शामिल रहती है। इसमें तथ्यों का वर्णन विश्लेषण व व्याख्या सहित उसका इतिहास के प्रति दृष्टिकोण, उसकी मान्यताएँ और वे लक्ष्य शामिल हैं जिनके लिए किसी भी सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है। पॉपर के अनुसार: “सिद्धांत मानसिक आँखों में रेखांकित, अनुभाविक व्यवस्था का विकल्प है।”

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प्रश्न 23.
राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषा दीजिए। (Give the difinition of political theory)
उत्तर:
जार्ज कैटलिन के अनुसार, राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक दर्शन तथा राजनीति विज्ञान दोनों सम्मिलित हैं। डेविड हैल्ड के अनुसार “राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन से संबंधित अवधारणाओं और व्यापक अनुमानों का एक ऐसा ताना-बाना है जिसमें शासन, राज्य और समाज की प्रकृति व लक्ष्यों और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं का विवरण शामिल है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें। (Explain relations between Political Science and Economics)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और तर्कशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन समय से ही इन दोनों शास्त्रों को एक ही शास्त्र के दो अंगों के रूप में माना जाता रहा है। राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के घनिष्ठ संबंधों के बारे में विभिन्न विद्वानों के विचार निम्नलिखित हैं –
प्रो. गार्नर के अनुसार, “वर्तमान काल में राजनीति के ज्वलन्त प्रश्न मूल रूप में अर्थशास्त्र के भी प्रश्न हैं। वास्तव में प्रशासन के सम्पूर्ण सैद्धान्तिक पक्ष का स्वरूप अधिकांशतः आर्थिक है। मार्क्स ने तो यहाँ तक कहा है कि, “किसी युग के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के स्वरूप का निश्चिय आर्थिक परिस्थितियाँ ही करती है।” बिस्मार्क का कथन था कि, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं वरन् व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।”

राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Economics):
राजनैतिक विचारधाराओं का आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संगठन का भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो उस देश के लोगों की आर्थिक दशा अच्छी होगी। अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science) अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान कहते हैं। अर्थशास्त्र में धन के उत्पादन, विनिमय, वितरण तथा उपभोग में लगे व्यक्ति के सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह मानव आवश्यकताओं और उनकी संतुष्टि का विज्ञान है। जब तक व्यक्ति की आर्थिक दशा अच्छी नहीं होगी, वह अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। अतः अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में गहरा सम्बन्ध है।

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प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र क्या है? (What is the scope of Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का क्षेत्र (Scope of Political Science):
राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। राजनीति विज्ञान में मुख्यतः निम्नलिखित तथ्यों का अध्ययन होता है:

1. राज्य का अध्ययन (Study of State):
राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य के भूत वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।” गिलक्राइस्ट ने भी कहा है; “राज्य क्या है, क्या रहा है और क्या होना चाहिए का अध्ययन राजनीति विज्ञान का विषय है।”

2. सरकार का अध्ययन (Study of Govemment):
सरकार राज्य का एक अनिवार्य तत्व है। सरकार के विभिन्न रूप सरकार के अंग तथा सरकार का संगठन आदि का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में किया जाता है।

3. मानव व्यवहार का अध्ययन (Study of Human Behaviour):
राज्य का व्यक्ति के साथ अटूट संबंध है। व्यक्ति और राज्य का क्या सम्बन्ध है? व्यक्ति को कौन-कौन से अधिकार मिलने चाहिए और कौन-कौन से कर्त्तव्य करने चाहिए? व्यक्ति का राजनैतिक आचरण। क्या है ? इन सब बातों का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में किया जाता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन (Study of International relations):
राजनीति विज्ञान में अन्तर्राष्ट्रीय कानून, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि का भी अध्ययन किया जाता है। उपरोक्त के अतिरिक्त राजनीति विज्ञान शक्ति का भी अध्ययन है। इसमें नीति निर्माण प्रक्रिया भी अध्ययन की जाती है। इसमें शास्त्र संबंधी कार्य, मतदान, राजनैतिक दल एवं आम राजनीतिक संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान के परम्परागत तथा आधुनिक अर्थ बताएँ। (Give traditional and modern meaning of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अंग्रेजी पर्याय (Political Science) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है, जिसका अर्थ है (City State) अर्थात् नगर राज्य। प्राचीन काल में यूनान में छोटे-छोटे नगर राज्य होते थे। आज के युग में छोटे-छोटे नगर राज्यों का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। राज्य के इस विकसित और विस्तृत रूप से संबंधित विषय को राजनीति विज्ञान कहा जाने लगा। राजनीतिक विज्ञान की परिभाषाएँ विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत की गई हैं –

1. राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन है –
ब्लंटशली के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान वह विज्ञान है, जिसका संबंध राज्य से है और जो यह समझने का प्रयत्न करता है कि राज्य के आधारभूत तत्व क्या हैं, उसका आवश्यक स्वरूप क्या है, उसकी किन विविध रूपों में अभिव्यक्ति होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ?” प्रसिद्ध विद्वान डॉ. गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान विषय के अध्ययन का आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।”

2. राजनीति विज्ञान ‘राज्य और सरकार’ दोनों का अध्ययन है:
पॉल जैनट के अनुसार, “राजनीति विज्ञान समाज का वह अंग है जिसमें राज्य के आधार और सरकार के सिद्धांतों पर विचार किया जाता है।” डिमॉक (Dimock) के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का संबंध राज्य तथा उसके साधक सरकार से है।”

3. मानवीय तत्त्व-राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अंग है, जिसके अंतर्गत मानवीय जीवन के राजनीतिक पक्ष और जीवन के पक्ष से संबंधित राज्य, सरकार तथा अन्य संबंधित संगठनों का अध्ययन किया जाता है।

राजनीति विज्ञान की परिभाषा-आधुनिक दृष्टिकोण (Definition of Political Science A moderm approach):
परम्परागत रूप से राजनीति विज्ञान को व्यक्तियों के राजनीतिक क्रिया-कलापों तक ही सीमित समझा जाता था और जिसमें राज्य सरकार और अन्य राजनीतिक संस्थाओं को ही महत्वपूर्ण समझा जाता था। परंतु आधुनिक दृष्टिकोण अधिक व्यापक और यथार्थवादी हैं। इसमें अन्तः अनुशासनात्मक दृष्टिकोण (Inter-disciplinary approach) अपनाया गया है। इसमें राज्य को ही नहीं वरन् समाज को भी सम्मिलित किया गया है। आधुनिक लेखकों के द्वारा राजनीति विज्ञान को शक्ति, प्रभाव, सत्ता, नियंत्रण, निर्णय और मूल्यों का अध्ययन बताया गया है।

डेविट इस्टन के अनुसार, “राजनीति विज्ञान मूल्यों का सत्तात्मक आबंटन है।” (Political Science deals with the authoriative allocation of values) केटलिन ने राजनीति विज्ञान को शक्ति का विज्ञान (Science of Power) कहा है। पिनॉक और स्मिथ के अनुसार, “राजनीति विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनात्मक ढाँचों से संबंधित होता है जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना, सदस्यों के सामूहिक कर्मों का सम्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक अन्तर्भावी (Inclusive) और अंतिम माना जाता है।” इस प्रकार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार को उसके समस्त सामाजिक जीवन के संदर्भ में ही ठीक प्रकार से समझने की कोशिश करता है।

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प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखो (Write short notes on:)
(क) शक्ति की अवधारणा (Concept of Power)
(ख) सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य (Social Science Perspective)
उत्तर:
(क) शक्ति की अवधारणा (Concept of Power):
शक्ति एक ऐसी अवधारणा है जो राज्य के लिए आवश्यक है। राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिये नागरिकों द्वारा कानूनों का पालन किए जाने की अपेक्षा रखी जाती है परंतु जो व्यक्ति ऐसा नहीं करते उन्हें शक्ति द्वारा बाध्य किया जाता है कि कानूनों का पालन करें।

(ख) सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य (Social Science Perspective):
इतिहास अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजनीति विज्ञान आदि अनेक विषय मानव सम्बन्धों का वर्णन करते हैं तथा वे परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। अतः विषयी दृष्टिकोण में ही मानव समस्याओं को उचित रूप से समझा जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों में इस प्रकार के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मानव समाज में पायी जाने वाली गरीबी की समस्या की कई दिशाएँ होती हैं। आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक और यहाँ तक की राजनीतिक सभी दृष्टिकोणों से समस्या का अध्ययन किया जा सकता है और तभी उसका निराकरण संभव है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या कीजिए। (Explain the scope of Political Science)
उत्तर:
प्रत्येक विषय का अपना क्षेत्र होता है जिसकी व्यापकता उस शासन की विषय वस्तु पर निर्भर करती है। गार्नर ने राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया है:

  1. राज्य की प्रकृति तथा उत्पत्ति का अनुसंधान।
  2. राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप, उनके इतिहास तथा विभिन्न रूपों की गवेषणा।
  3. इन दोनों आधार पर राजनीतिक विकास के नियोजन का यथासम्भव आकलन।

राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या करते हुए गेटल (Gettell) ने कहा है “राजनीति विज्ञान को राज्य का विज्ञान कहा जाता है। यह संगठित राजनीतिक इकाइयों के रूप में मानवजाति का अध्ययन करता है। राज्य के जन्म की ऐतिहासिक व्याख्या भी इसके अन्तर्गत की जाती है। यह राज्य के विकास की व्याख्या भी करता है और वर्तमान समय के विशिष्ट शासन वाले राज्यों के विषय में भी चर्चा करता है।

“राजनीति विज्ञान एक सीमा तक राज्य के आदर्श स्वरूप तथा उसके सर्वोच्च लक्ष्य और शासन के उचित प्रकारों का भी अध्ययन करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिकरण UNESCO के संयोजन में हुए सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राजनीति के सिद्धांत, राजनीतिक संस्थाएं, राजनीतिक दल, दबाव समूह एवं लोकमत, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध आदि विषय सम्मिलित समझा जाना चाहिए।

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प्रश्न 6.
राजनीतिशास्त्र का कला के रूप में विवेचना कीजिए। (Explain the Political Science as an Art)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान न केवल विज्ञान है, अपितु इसे कला भी कहा जा सकता है। यह कला की समस्त विशेषताओं को अपने में समाहित करता है और किसी भी सिद्धांत या सूत्र को व्यवहार में क्रियान्वित करने का प्रयास करता है। अब प्रश्न यह है कि कला क्या है? कला वह विद्या है जो किसी भी कार्य को अच्छी तरह करना सिखाती है और व्यावहारिक जीवन में विभिन्न सिद्धांतों का प्रयोग बताकर जीवन का आदर्श प्रस्तुत करती है अर्थात् कला मानव जीवन का सर्वांगीण चित्र तथा किसी ज्ञान का व्यावहारिक पहलू है। इस दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान भी एक कला है।

प्रोफेसर गैटल के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र की कला का उद्देश्य मनुष्य के क्रिया-कलापों से संबंधित उन सिद्धांतों तथा नियमों का निर्धारण करना है जिन पर चलना राजनीतिक संस्थाओं के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है।” बकल (Buckle) राजनीति विज्ञान को कलाओं में पिछड़ी हुई कला मानते हुए यह स्वीकार करते हैं कि राजनीति विज्ञान एक कला है, “राजनीति विज्ञान से अधिक कला है। इसका राज्य के व्यावहारिक पक्ष से ज्यादा सम्बन्ध है।”

प्रश्न 7.
राजनीति विज्ञान, विज्ञान और कला दोनों है, स्पष्ट कीजिए। (The Political Science is both the Science and Arts Discuss)
उत्तर:
यह एक सामान्य अभिमत है कि कोई भी अध्ययन या तो विज्ञान की श्रेणी में आता है या कला की, लेकिन वस्तुतः ऐसा सोचना त्रुटिपूर्ण है। विलियम एस. लिंगर के अनुसार “विज्ञान और कला का परस्पर विरोधी आवश्यक नहीं है। कला विज्ञान पर आधारित हो सकती है।” राजनीतिशास्त्र के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह विज्ञान और कला दोनों है।

विज्ञान और कला दोनों ही रूपों में यह हमारे लिये उपयोगी है। गार्नर के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करता है, भ्रममूलक राजनीति दर्शन के सिद्धांत का खण्डन करता है तथा विवेकपूर्ण राजनीतिक क्रियाकलाप के आधार के रूप में सुदृढ़ सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।” (It renders practical service by deducting sound principles as a basis for wise political action and by exposing the teaching of false political philosophy)

इस प्रकार राजनीतिशास्त्र एक विज्ञान भी है और एक उच्चस्तरीय कला भी। जब हम राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित विवेचन करते हैं तथा कुछ सामान्य व सार्वभौम निष्कर्षों की खोज करते हैं तो यह एक विज्ञान है लेकिन जब हम इन सिद्धांतों व व्यवहार के मध्य भिन्नता व सापेक्षता पाते हैं तो राजनीति विज्ञान कला के निकट होती है। सिद्धांतों व व्यवहार का यह अंतर कुशलता व कल्पना (कला) के विकास का अवसर प्रदान करता है।

वर्तमान समय में चुनाव एवं राज्यों के पारस्परिक जीवन में बहुत अधिक अंतर आ गया है और ऐसी परिस्थितियों में राजनीति विज्ञान का कला रूप ही विश्वशान्ति एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को प्रोत्साहन देकर विश्व को विनाश के गर्त से बचा सकता है। इसलिए, यह स्पष्ट विस्तार करते हुए उसे कला, दर्शन और विज्ञान तीनों मानता है। लासवेल ने भी राजनीति विज्ञान को कला, विज्ञान और दर्शन का संगम माना है।

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प्रश्न 8.
राजनीति विज्ञान के अर्थ और कार्यक्षेत्र को स्पष्ट करें। (Clarify the meaning and scope of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का अर्थ “राज्य की नीति” से होता है। राज्य की नीति में यह अत्यन्त आवश्यक तत्त्व होता है कि राज्य की उत्पत्ति की जाए। राज्य की शक्ति का व्यवहार और सैद्धान्तिक स्वरूप का संचालन सम्प्रभुता के हाथों में निहित किया जाए और साथ ही साथ राज्य में राजनीतिक विचारधारा और राज्य में विधि के स्तर पर राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव हो।

राजनीति के अर्थ की उपरोक्त प्रासंगिकता को उजागर करते हुए अरस्तू ने राजनीति के अर्थ और उसके कार्यक्षेत्र को उजागर करते हुए इससे इस महत्वपूर्ण कथन के माध्यम से किया कि “समाज द्वारा सुसंस्कृत मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठतम होता है, परंतु जब वह कानून तथा न्याय के बिना जीवन व्यतीत करता है तो वह निकृष्टतम हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एसा है जो समाज में न रह सकता हो अथवा जिसे समाज की आवश्यकता ही न हो क्योंकि वह अपने आप में पूर्ण है, तो उसे मानव समाज का सदस्य मत समझो, वह जंगली जानवर या देवता ही हो सकता है।”

प्रश्न 9.
राजनीति विज्ञान राज्य का ही अध्ययन है, स्पष्ट करें। (The Political Science is study of the state, Explain)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को राज्य का अध्ययन इसलिए कहा जाता है कि राजनीति का अर्थ ही है “राज्य की नीति”। अगर राजनीति अपने इस महत्वपूर्ण अंग का अवलोकन नहीं, करेगी तो निश्चित है कि राजनीति विज्ञान का अस्तित्व कभी भी सम्भव नहीं हो पायेगा। इसलिये राजनीति विज्ञान में राज्य और राज्य की नीति चाहे वह राजनीतिक विचारधारा के रूप हो या किसी विधि के रूप में हो, इन सबको राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है।

राजनीति की कोई भी विचारधारा चाहे वह लोकतंत्रीय हो और या फिर समाजवादी, साम्यवादी और निरंकुशवादी विचारधारा हो। इन सबको उत्पन्न करने का मूल स्रोत राजनीति है और राजनीति ने निरंकुशवादी विचारधाराओं को राज्य की व्यवस्था चलाने के लिये इसकी उपयोगिता की प्रासंगिकता को स्थापित किया। इस कारण राजनीति विज्ञान का आधार स्तम्भ राज्य है और राज्य से जुड़े होने वाले आवश्यक तत्व जैसे सरकार, विधि, जनता की राज्य के प्रति उसकी राजनीतिक विचारधारा आदि की अवहेलना राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में कोई भी नहीं कर सकता।

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प्रश्न 10.
परम्परागत राजनीति विज्ञान से आप क्या समझते हैं, स्पष्ट कीजिए। (What do youknow about Iraditional Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का परम्परागत दृष्टिकोण राजनीति विज्ञान का जहाँ मूल आधार स्तम्भ है, वहीं राज्य और सरकार की संरचना का मूल आधार स्तम्भ भी है। इसके साथ ही परम्परागत राजनीति ने राज्य और सरकार को संचालित करने के लिये राजनीतिक मूल्यों यानि नैतिक दृष्टिकोण पर ही क्रियान्वित होती है। परम्परागत राजनीति बिना नैतिक मूल्यों के किसी भी राजनीतिक सिद्धांत की संरचना को निर्मित नहीं करती, नैतिक मूल्य राजनीति का मूलभूत आधार स्तम्भ है।

परम्परागत राजनीति का यह दृष्टिकोण था कि बिना नैतिक मूल्यों के राज्य की शक्ति निरंकुश होगी, वहीं राजनीति विचारधारा का मार्ग अस्पष्ट और अमर्यादित होगा। इसलिये परम्परावादी राजनीतिक विचारकों ने नैतिकता से ही राजनीति के आदर्श खोजे तथा नैतिकता से राजनीति को मर्यादित किया। अतः यह आदर्श और मर्यादा का स्वरूप होने से राज्य और सरकार की उपयोगिता स्वयं शासक के लिये भी उपयोगी बनी और जनता के लिये भी उपयोगी बनी।

प्रश्न 11.
राजनीतिक विचारधारा की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए। (Clarify the importance of Political Ideology)
उत्तर:
राजनीतिक विचारधाराओं ने ही संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की राज्य तथा इसके अंग, सरकार और विधि पर राजनीतिक विचारधाराओं का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। जैसे लोकतंत्रीय पद्धति में राज्य के यह दो महत्वपूर्ण तत्व सरकार और विधि कभी भी निरंकुश नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें अपने मूल्यों में प्राकृतिक नियमों को अपनाना पड़ेगा, न्याय की व्यवस्था बनाये रखने के लिये और दूसरा राजनीति जनता के प्रति जवाबदेह हो।

यही लोकतंत्रीय राजनीतिक विचारधारा का मूल स्वरूप रहा है। इसके साथ ही ठीक इसके विपरीत जो राजनीति को बल और शक्ति की निरंकुशता से संचालित करने पर विशेष बल देते हैं और साथ ही साथ यह निरंकुश विचारधारा प्राकृतिक नियमों का अवहेलना अपने विधि निर्माण के सन्दर्भ में व्यापक स्तर पर करती है। इसलिये निरंकुशवादी राज्य व्यवस्था के लिये न्याय की अवधारणा, उसके अस्तित्व के लिये खतरे का मूल आधार बन जाती है।

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प्रश्न 12.
राजनीति विज्ञान में दर्शन की उपयोगिता से आप क्या समझते हैं? (What do you know about the importance of philosophy in political science)
उत्तर:
राजनीतिक दर्शन की मूल जड़ नैतिक नियमों से संबंधित होती है। नैतिक नियमों और उद्देश्यों से ही राजनीति के आदर्शात्मक स्वरूप और सीमा पर सही नियंत्रण स्थापित होता है, तथा राज्य इसी के बल पर निरंकुश नहीं हो सकता है अर्थात् राज्य को यदि निरंकुश नहीं होना है, तो उसे निश्चित रूप से आदर्शवादी सिद्धांतों के अनुरूप ढलना होगा।

इस संदर्भ में चाहे प्राचीन राजनीतिक विचारक हों या फिर आधुनिक राजनीतिक विचारक हों, सबने आदर्शवाद की उपयोगिता को राज्य के सन्दर्भ में उपयोगी इसलिए माना, क्योंकि आदर्शवादी ही निरंकुशता को खत्म करने का एकमात्र मौलिक साधन है। बिना आदर्शवाद के निरंकुशवाद को खत्म नहीं किया जा सकता है। हालांकि राजनीतिक दर्शन की आलोचना इस तथ्य पर की गई कि ऐसा दर्शन काल्पनिक और अव्यावहारिक स्तर पर होता है। इसलिये राजनीति दर्शन को उन्हीं लोगों द्वारा काल्पनिक माना गया जो राजनीति को निरंकुशवादी ज्यादा समझते थे।

प्रश्न 13.
आधुनिक राजनीति विज्ञान और परम्परावादी राजनीति विज्ञान में अंतर में स्पष्ट करें। (Distinguish between Modern Political Science and Traditional Political Science)
उत्तर:
आधुनिक राजनीति विज्ञान के विचारक विज्ञान को केवल राज्य का विषय न मानकर वरन् वह मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार को भी राजनीति विज्ञान का विषय मानते हैं। उन्होंने आधुनिक सहभागिता के रूप में प्रदर्शित करके यह स्पष्ट किया, जैसे लासवेल और केपलन ने अपने कथन के द्वारा यह भाव प्रकट किया कि “राजनीति विज्ञान एक व्यवहारवादी विषय के रूप में शक्ति को संवारने और मिल-बांटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” इसलिये राजनीतिक सहभागिता में जनता की भावना और जनता द्वारा शासन में दिए जाने वाले योगदान का विशेष ध्यान रखा जाने लगा, जिससे कि वे राज्य कानून के प्रति जवाबदेह हो।

परम्परावादी राजनीति विज्ञान के विचारक राज्य और सरकार की संरचना को राजनीति विज्ञान का एक अहम् हिस्सा मानते थे। उनका मत था कि यदि सरकार और राज्य के संदर्भ में उनके निर्माण और क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो निश्चित है कि राज्य व्यवस्था वास्तव में एक अनुशासित व्यवस्था को जन्म दे सकेगी तथा स्थायी रूप से शासन व्यवस्था का संचालन कर सकेगी इसलिये परम्परावादी राजनीति विज्ञान के विचारकों ने राज्य और सरकार के स्थायित्व के लिये ही कई राजनीतिक विचारों का प्रतिवादन किया और इन राजनीतिक विचारों का दार्शनिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक पद्धति से सम्बन्ध था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के महत्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (Briefly describe the importance of studying Political Science)
उत्तर:
आधुनिक युग प्रजातंत्र का युग है और इस युग में राजनीति विज्ञान के अध्ययन का बहुत महत्व है। इस विषय की गणना संसार के महत्वपूर्ण विषयों में की जाती है। इसका कारण यह है कि आधुनिक जीवन राजनीतिक जीवन ही है। मनुष्य का कार्य राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित होता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का नागरिक है और उसका राज्य के साथ अटूट संबंध है। अत: राजनीति शास्त्र के अध्ययन के महत्व का विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है –

1. राज्य तथा सरकार का ज्ञान (Knowledge of State and Government):
राजनीति विज्ञान राज्य का विज्ञान है और इसके द्वारा ही हमें राज्य तथा सरकार के बारे में ज्ञान होता है। राज्य का होना सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है क्योंकि समाज में शान्ति व व्यवस्था राजनीतिक संगठन के बिना स्थापित नहीं की जा सकती। राज्य के सभी काम सरकार द्वारा किए जाते हैं। इस कारण सरकार के बारे में भी जानना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि सरकार का गठन कैसे होता है और किस प्रकार की सरकार अच्छी होती है। इस सब बातों का ज्ञान हुए बिना कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का पूरी तरह विकास नहीं कर सकता। अतः इस विज्ञान के अध्ययन के बहुत लाभ हैं।

2. अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties):
राजनीति विज्ञान व्यक्ति को उनके अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान कराता है। समाज और राज्य दोनों में ही रहते हुए व्यक्ति को कुछ अधिकार मिलते हैं और ये अधिकार व्यक्ति को जीवित रहने तथा अपने जीवन का विकास करने में सहायक होते हैं। अधिकारों के बदले व्यक्ति को कुछ कर्त्तव्यों का पालन भी करना पड़ता है ताकि शान्ति और व्यवस्था बनी रहे और दूसरों को भी अधिकार मिल सके।

3. विविध समुदायों का ज्ञान होता है (It gives knowledge about many kinds of associations):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए उसे कई प्रकार के समुदायों में पारा लेना पटता है, जैसे कि धार्मिक, सामाजिक तथा मनोरंजन संबंधी समुदाय। किस समुदाय का संगठन कैसे होता है, उसके क्या उद्देश्य तथा कार्य हैं? व्यक्ति को उनसे क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? इन सब बातों का ज्ञान हमे राजनीति विज्ञान द्वारा मिलता है।

4. दूसरे देशों की शासन प्रणाली का ज्ञान होता है (Knowledge of the Government system of other countries):
आज कोई भी व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता। देश-विदेश की घटनाओं में प्रत्येक व्यक्ति की दिलचस्पी रहती है और उनका प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक विज्ञान के पता चलता है कि किस-किस देश में कौन-कौन सी शासन प्रणाली प्रचलित है? वहाँ पर किस राजनीतिक विचारधारा को अपनाया गया है और उनके अनुसार ही हमें अपने सम्बन्ध उन देशों से स्थापित करने पड़ते हैं। कहीं राजतंत्र, कहीं लोकतंत्र, कहीं तानाशाही, कहीं संघात्मक सरकार, कहीं अध्यक्षात्मक सरकार और कहीं संसदीय प्रणाली।

5. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक (Essential for the Success of democracy):
आज का युग लोकतंत्र का युग है। इस शासन प्रणाली में सम्पूर्ण शासन प्रणाली नागरिकों के हाथों में होती है। वे अपने प्रतिनिधि चुनते हैं जो कानून बनाते और शासन चलाते हैं। अतः लोकतंत्र उसी देश में सफल हो सकता है, जिस देश के लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिली हो और राजनीतिक शिक्षा के लिए राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है।

6. राजनीतिक चेतना जागृत होती है (Its study awakens the political consciousness):
आज लोकतंत्र का युग है और शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है। राजनीति शास्त्र का अध्ययन व्यक्ति को सरकार के विभिन्न अंगों, उनके संगठन तथा कार्यों से परिचित करा देता है। यदि किसी व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करने का अवसर मिले तो राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सहायता से वह व्यक्ति अपने कार्यों को आसानी से कर सकता है। इस प्रकार से राजनीतिक चेतना का भी विकास होता है और शासन में भी कुशलता आती है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र की प्रकृति व विषय क्षेत्र की समीक्षा कीजिए। (Explain the nature and scope of Political Science)
उत्तर:
राजनीति शास्त्र की प्रकृति (Nature of Political Science) क्या राजनीति शास्त्र विज्ञान है? यह प्रश्न राजनीति विज्ञान में अत्यधिक चर्चित रहता है। कुछ विचारक जो इसे विज्ञान मानते हैं उनमें प्रमुख हॉब्स, माण्टेस्क्यू, ब्राइस, जैविक गार्नर आदि। महान दार्शनिक एवं राजनीति विज्ञान के जनक (Father of Political Science) अरस्तू ने तो इसे सर्वोच्च विज्ञान (Master Science) कहा है। राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग होता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन है। तार्किक विश्लेषण एवं पर्यवेक्षण आधारित है। कार्य और कारण में संबंध है।

विज्ञान के लक्ष्य अर्थात् सत्य की खोज का राजनीति विज्ञान में भी पुट मिलता है। किस प्रकार के राजनैतिक नियम एक आदर्श राज्य के अन्तर्गत नागरिकों का अधिकतम हित कर सकते हैं, उनका प्रयोग राजनीति विज्ञान में होता रहता है। इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी भी की जा सकती है। परंतु दूसरे विचारक इसे विज्ञान नहीं मानते। इसमें मटलेण्ड एवं बकल प्रमुख हैं। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान में न तो कोई प्रयोगशाला है और न ही उसमें प्रयोग किए जा सकते हैं।

व्यक्ति को मेढ़क आदि की तरह स्थिर करके प्रयोग नहीं किए जा सकते। राजनीति विज्ञान में निष्पक्षता का अभाव रहता है। कारण और कार्य में वास्तविकता का सम्बन्ध नहीं हो सकता। भविष्यवाणी सही रूप में नहीं की जा सकती। कुछ विचारक राजनीति विज्ञान को कला भी कहते हैं। कला का अर्थ है कि सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्। कला का अर्थ है किसी कार्य को सफलतापूर्वक किया जाना। इन सभी बातों को राजनीति शास्त्र में पाया जाना उसे कला सिद्ध करता है।

विषय क्षेत्र (Scope of Political Science):
राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य का अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार का भी अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान का मानवीय तत्वों पर विशेष बल दिया जाता है। अत: यह मानव संबंधों का भी अध्ययन है। इसमें नागरिकों के कर्त्तव्य और नागरिकों के अधिकारों का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न प्रकार की राजनीतिक संस्थाओं, अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों, अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, विश्व शांति के उपायों आदि सभी का अध्ययन इसमें सम्मिलित है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के समाज में विभिन्न प्रकार के संबंधों में भी अध्ययन करता है। आधुनिक विचारकों के अनुसार राजनीति विज्ञान शक्ति का अध्ययन है तथा मानव मूल्यों का भी अध्ययन है।

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प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र और इतिहास में संबंध स्थापित कीजिए। (What is the relationship between Political Science and History?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सीले (Seelay) का कथन है, “राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसमें कोई फल नहीं लगता और इतिहास के बिना राजनीति शास्त्र बिना जड़ के वृक्ष के समान है।” (Without History Political Science has no root and without Political Science History has no fruit.”) राज्य ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। इतिहास राजनीति शास्त्र की प्रयोगशाला भी है। अकबर ने राजपूतों के साथ सुलह की नीति अपनाकर अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया जबकि औरंगजेब ने जजिया कर लगाकर सिक्ख, मराठे तथा अन्य हिन्दुओं को अपने विमुख कर लिया।

धीरे-धीरे उसका राज्य खण्डित होता गया। इसी प्रकार राजनीति शास्त्र भी इतिहास को सामग्री प्रदान करता है। यदि इतिहास में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन न किया जाए तो इतिहास नीरस बन जाता है। बहुत सी राजनीतिक घटनाएँ इतिहास को एक नई दिशा में मोड़ देती हैं। यदि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न हुई होती तो भारत का इतिहास आज कुछ और ही होता। जून 1975 में इन्दिरा गाँधी ने आपात स्थिति न लगायी होती हो शायद भारत के राजनीतिक दलों का यह इतिहास न होता जो आज है। इस प्रकार इतिहास राजनीतिक विज्ञान का बहुत ऋणी है।

अंतर-इतिहास और राजनीति विज्ञान में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर है। इतिहास में घटनाओं का यथार्थ वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति विज्ञान में घटनाओं का विश्लेषण करके आदर्श रूप को लाने का प्रयास होता है। आदर्श राज्य भविष्य में कैसा होना चाहिए इस पर राजनीति विज्ञान में विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोनों विषयों के विषय क्षेत्र भी अलग-अलग होते हैं। उनमें उद्देश्य की दृष्टि से भी अंतर होता है।

प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र के साथ संबंध विस्तार से बताइए। (Describe in detail the relationship of Political Science with Economics)
उत्तर:
राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थिक परिस्थितियाँ राजनीतिक दशा पर प्रभाव डालती हैं तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ आर्थिक दशा को प्रभावित करती हैं। राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों मानव कल्याण के लिए प्रयासरत हैं। आर्थिक समस्याओं को राजनीति विज्ञान की सहायता से ही सुलझाया जाता है। राज्य द्वारा निर्धारित नीतियों के आधार पर आर्थिक कार्यक्रम चलाए जाते हैं। हिटलर और मुसोलिनी के नेतृत्व में जर्मनी तथा इटली में जो एक नए प्रकार का शासन (राष्ट्रीय समाजवाद पर आश्रित) स्थापित हुआ था, उसके कारण इन राज्यों का आर्थिक संगठन बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था। समाजवाद के विकास का प्रधान कारण आर्थिक विषमता ही है।

ब्रिटेन और भारत में राजकीय समष्टिवाद के कारण इन देशों के आर्थिक जीवन पर राज्य का नियंत्रण बहुत बढ़ गया है। राज्य के कानून मजदूरी की निम्नतम दर, काम के घंटे व इसी प्रकार की अन्य बातों की व्यवस्था करते हैं। इसी प्रकार चुंगी, आयातकर, निर्यातकर, मूल्य का नियंत्रण, मुद्रा पद्धति आदि द्वारा सरकारें वस्तुओं के आदान-प्रदान व विनियम को नियंत्रित करती हैं। इन विविध प्रकार के राजकीय कानूनों द्वारा आर्थिक जीवन बहुत अशों तक मर्यादित हो जाता है। मानव सभ्यता के विकास में आर्थिक परिस्थितियाँ विशेष महत्व रखती हैं। अनेक विचारक इतिहास की घटनाओं का मूल कारण आर्थिक ही मानते हैं। कार्ल मार्क्स ऐसे ही विचारक थे।

अंतर:
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर भी है जिसका वर्णन निम्न प्रकार है –

1. राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध व्यक्तियों से व अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है (Political Science deals with men and the Economics deals with materials):
राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय समाज में रहने वाले व्यक्ति हैं। राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है परंतु अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है। यह शास्त्र वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और विनियम का अध्ययन करता है जबकि राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध राजनीतिक विचारधाराओं से है। संक्षेप में, अर्थशास्त्र कीमतों (Prices) का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान मूल्यों (Values) का।

2. राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अर्थशास्त्र से विस्तृत है (The Scope of Political Science is wider than Economics):
अर्थशास्त्र मानव की केवल आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है जिसमें कि धन का उत्पादन, वितरण और उपयोग सम्मिलित हैं जबकि राजनीति विज्ञान मानव के राजनीतिक जीवन का अध्ययन करता है। राजनीति विज्ञान में व्यक्ति के राजनीतिक पक्ष के अतिरिक्त उसके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व नैतिक पक्ष का ही अध्ययन किया जाता है। अत: राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अर्थशास्त्र से व्यापक है।

निष्कर्ष (Conclusion):
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आज के युग में ये दोनों विषय एक-दूसरे के पूरक, हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 5.
वैधता से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व भी बताइए। (What do you mean by Legitimacy? What is its importance?)
उत्तर:
राज्य को शक्ति प्रयोग करने का अधिकार है। वह नागरिकों के ऊपर बाध्यकारी शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है ताकि नागरिक राज्य के कानूनों का पालन करते रहें। नागरिकों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सदैव शक्ति का प्रयोग न तो सम्भव है और न ही इसका कोई औचित्य है। अतः राज्य शक्ति का प्रयोग अंतिम विकल्प के आधार पर ही करता है। शक्ति का प्रयोग केवल उन व्यक्तियों के लिये ही किया जाता है जो कानून का पालन नहीं करते।

व्यक्तियों के द्वारा राज्य की आज्ञा का पालन इस विश्वास पर ही किया जाता है कि राज्य व्यक्तियों के हित में शासन करता है। जब संसद में किसी एक दल का बहुमत नहीं होता है और कुछ दल मिलकर एक संगठन बना लेते हैं तो गठबंधन में सम्मिलित दलों का बहुमत हो जाता है और वे ही सरकार भी बनाते हैं परंतु उनमें से कोई भी एक दल बहुमत नहीं रखता। इस प्रकार अल्पमत की सरकारें बनती रहती हैं परंतु इस प्रकार की सरकारों को भी न्यायोचित माना जाता है क्योंकि कुछ निश्चित नियम व विधियों का इसमें प्रयोग होता है। राज्य में इस प्रकार बनी सरकार का भी औचित्य रहता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है –
(क) सुकरात
(ख) प्लेटो
(ग) अरस्तु
(घ) गार्नर
उत्तर:
(ग) अरस्तु

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प्रश्न 2.
“सदा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना प्रजातंत्र का मूल्य है।” यह किसका कथन है?
(क) जॉन स्टुअर्ट मिल
(ख) रूसो
(ग) लास्की
(घ) हीगल
उत्तर:
(ग) लास्की

प्रश्न 3.
किस लैटिन शब्द से Justice अर्थात् ‘न्याय’ शब्द की उत्पत्ति हुई?
(क) जस्टिसिया
(ख) जज
(ग) जस
(घ) ज्यूडिशिया
उत्तर:
(घ) ज्यूडिशिया

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 4.
लोकतंत्र की आधारशिला है:
(क) स्थानीय शासन
(ख) राष्ट्रपति शासन
(ग) बहुदलीय शासन
(घ) मिली-जुली सरकार
उत्तर:
(ग) बहुदलीय शासन

प्रश्न 5.
‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक हैं –
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तू
(ग) सुकरात
(घ) कौटिल्य
उत्तर:
(ख) अरस्तू

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प्रश्न 6.
प्रजातंत्र (Democracy) किस भाषा के शब्द से बना है।
(क) ग्रीक
(ख) लैटिन
(ग) फ्रेंच
(घ) जर्मन
उत्तर:
(क) ग्रीक

प्रश्न 7.
अमेरिका में ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ पर आतंकी हमला कब हुआ था।
(क) 9 सितम्बर, 2001
(ख) 11 सितंबर, 2001
(ग) 6 अगस्त, 2001
(घ) 9 मार्च, 2001
उत्तर:
(ख) 11 सितंबर, 2001

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह

Bihar Board Class 11 Economics आँकड़ों का संग्रह Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के कम-से-कम चार उपर्युक्त बहुविकल्पीय वाक्यों की रचना करें –

  1. जब आप एक नई पोशाक खरीदें तो इनमें से किसे सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं?
  2. आप कम्प्यूटर का इस्तेमाल कितनी बार करते हैं?
  3. निम्नलिखित में से आप किस समाचार-पत्र को नियमित रूप से पढ़ते हैं?
  4. पेट्रोल की कीमत में वृद्धि न्यायोचित है?
  5. आपके परिवार की मासिक आमदनी कितनी है?

उत्तर:

1. जब आप एक नई पोशाक खरीदें तो इनमें से किसे सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं?

  • कीमत
  • कपड़ा
  • डिजाइन
  • फिटिंग

2. आप कम्प्यूटर का इस्तेमाल कितनी बार करते हैं?

  • चार
  • दो
  • तीन
  • एक बार

3. निम्नलिखित में से आप किस समाचार-पत्र को नियमित रूप से पढ़ते हैं?

  • हिन्दुस्तान
  • नवभारत टाइम्स
  • दैनिक जागरण
  • पंजाब केसरी

4. पेट्रोल की कीमत में वृद्धि न्यायोचित है?

  • न्यायोचित है
  • न्यायोचित नहीं है
  • (a) व (b) दोनों विकल्प गलत हैं
  • सभी विकल्प सही हैं

5. आपके परिवार की मासिक आमदनी कितनी है?

  • 2,000 रुपये से 5,000 रुपये तक
  • 5,000 से 10,000 रुपये तक
  • 10,000 रुपये से 15,000 रुपये तक
  • 15,000 रुपये तक

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प्रश्न 2.
पाँच द्विमार्गी प्रश्नों की रचना करें (हाँ/नहीं) के साथ।
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प्रश्न 3.
सही विकल्प को चिह्नित करें –

(क) आँकड़ों के अनेक स्रोत होते हैं (सही/गलत)।
उत्तर:
सही

(ख) आँकड़ा-संग्रह के लिए टेलीफोन सर्वेक्षण सर्वाधिक उपयुक्त विधि है, विशेष रूप से जहाँ पर जनता निरक्षर हो और दूर-दराज के काफी बड़े क्षेत्रों में फैली हो (सही/गलत)।
उत्तर:
सही

(ग) सर्वेक्षक/शोधकर्ता द्वारा संग्रह किए गए आँकड़े द्वितीयक आँकड़े कहलाते हैं (सही/गलत)।
उत्तर:
गलत

(घ) प्रतिदर्श के अयादृच्छिक चयन में पूर्वाग्रह (अभिनति) की संभावना रहती है (सही/गलत)।
उत्तर:
सही

(ङ) अप्रतिचयन त्रुटियों को बड़ा प्रतिदर्श अपनाकर कम किया जा सकता है (सही/गलत)।
उत्तर:
गलत

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रश्नों के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आपको इन प्रश्नों में कोई समस्या दिख रही है? यदि हाँ, तो कैसे?
(क) आप अपने सबसे नजदीक के बाजार से कितनी दूर रहते हैं?
(ख) यदि हमारे कूड़े में प्लास्टिक थैलियों की मात्रा 5 प्रतिशत है तो क्या इन्हें निषेधित किया जाना चाहिए?
(ग) क्या आप पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध नहीं करेंगे?
(घ) क्या आप रासायनिक उर्वरक के उपयोग के पक्ष में हैं?
(ङ) (अ) क्या आप अपने खेतों में उर्वरक इस्तेमाल करते हैं?
(ब) आपके खेत में प्रति हेक्टेयर कितनी उपज होती है?
उत्तर:
(क) मैं अपने सबसे नजदीक के बाजार से 6 किमी. दूर रहता हूँ।

(ख) पर्यावरण के हिसाब से प्लास्टिक थैलियों का प्रयोग हानिकारक है। प्लास्टिक अविघटनीय पदार्थ है, इसलिए यह भू-प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक थैलियाँ नालियों एवं पाइपों में पानी के बहाव को अवरुद्ध करती हैं।

(ग) पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध अवश्य होना चाहिए, क्योंकि इससे आवश्यक वस्तुओं की कीमत भी बढ़ जायेगी।

(घ) फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। उर्वरकों के अधिक प्रयोग से भू एवं जल प्रदूषण होता है।

(ङ)
(अ) हाँ, मैं विवेकपूर्ण तरीके से अपने खेतों में उर्वरकों का प्रयोग करता हूँ।
(ब) 50 क्विंटल प्रति हेक्टेअर।

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प्रश्न 5.
आप बच्चों के बीच शाकाहारी आटा नूडल की लोकप्रियता का अनुसंधान करना चाहते हैं। इस उद्देश्य से सूचना-संग्रह करने के लिए एक उपयुक्त प्रश्नावली बनाएँ।
उत्तर:
प्रश्नावली –

  1. क्या आप शाकाहारी आटा नूडल का इस्तेमाल करते हैं?
  2. क्या आपको इसका स्वाद दूसरों से अच्छा लगता है?
  3. आप एक दिन में कितनी बार इसका प्रयोग करते हैं?
  4. प्रतिदिन इस पर आप कितना खर्च करते हैं?
  5. आप इसे किसलिए पसंद करते हैं?
  6. क्या आपको अपने स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर दिखाई पड़ता है?
  7. क्या आप इसके स्थान पर कुछ और प्रयोग करना चाहेंगे?

प्रश्न 6.
200 फार्म वाले एक गाँव में फसलें उत्पादन के स्वरूप पर एक अध्ययन आयोजित किया गया। इनमें से 50 फार्मों का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें से 50 प्रतिशत पर केवल गेहूँ उगाए जाते हैं। यहाँ पर समष्टि और प्रतिदर्श को पहचान कर बताएँ।
उत्तर:
समष्टि 200 खेत हैं और प्रतिदर्श 50 खेत हैं।

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प्रश्न 7.
प्रतिदर्श, समष्टि तथा चर के दो-दो उदाहरण।
उत्तर:
(क) प्रतिदर्श (Sample):

  • एक विद्यालय में 2,000 विद्यार्थी हैं। इनमें से 100 विद्यार्थियों को सर्वेक्षण के लिए चुना गया है। 100 विद्यार्थी ही प्रतिदर्श हैं।
  • एक गाँव में 30 खेत हैं। उनमें से 3 खेतों को सर्वेक्षण के लिए चुना गया है। 5 खेत प्रतिदर्श के उदाहरण हैं।

(ख) समष्टि (Population):

  • एक पाठशाला में 100 विद्यार्थी पढ़ते हैं। 100 समग्र का उदाहरण है।
  • एक गाँव में 100 परिवार हैं। उसका सर्वेक्षण किया गया। 100 परिवार समग्र हैं।

(ग) चर (Variable):

  • कक्षा XI के विद्यार्थियों की ऊँचाई
  • जुलाई के महीने में दिल्ली में हुई प्रतिदिन वर्षा।

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प्रश्न 8.
इनमें से कौन सी विधि द्वारा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं और क्यों?
(क) गणना (जनगणना)
(ख) प्रतिदर्श
उत्तर:
गणना विधि की तुलना में प्रतिचयन विधि द्वारा आँकड़े एकत्र करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. गणना विधि की तुलना में इस विधि से सर्वेक्षण करने में खर्च बहुत कम होता है।
  2. आँकड़े संकलित करने, सारणीबद्ध करने, गणना एवं विश्लेषण करने में इस विधि में श्रम एवं समय काफी कम लगता है।
  3. गणना सम्बन्धी त्रुटियों की संभावना घट जाती है।
  4. इस विधि में गणनाकारों एवं पर्यवेक्षकों के छोटे समूह को प्रशिक्षित करना पड़ता है। अत: उनको अच्छी तरह प्रशिक्षित किया जा सकता है और विभिन्न स्तरों पर काम करने वालों में अच्छा तालमेल हो सकता है।

प्रश्न 9.
निम्न में से कौन-सी त्रुटियाँ अधिक गंभीर हैं?
(क) प्रतिचयन त्रुटियाँ
(ख) अप्रतिचयन त्रुटियाँ।
उत्तर:
अप्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिचयन त्रुटियों से अधिक गंभीर हैं, क्योंकि प्रतिचयन त्रुटियों के बड़े प्रतिदर्श लेकर कम किया जा सकता है। परंतु अप्रतिचयन त्रुटियों को कम नहीं किया जा सकता। चाहे हम कितना भी बड़ा छोटा प्रतिदर्श क्यों न लें।

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प्रश्न 10.
मान लीजिए आपकी कक्षा में 10 छात्र हैं। इनमें से आपको तीन को चुनना है तो इसमें कितने प्रतिदर्श संभव हैं?
उत्तर:
जनसंख्या का आकार (N) = 10
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प्रश्न 11.
अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 को चुनने के लिए लाटरी विधि का उपयोग कैसे करेंगे? चर्चा करें?
उत्तर:
लाटरी द्वारा 10 में 3 छात्रों का चुनाव करना (Selecting 3 students out of 10 students by lottery):

  1. एक जैसी आकार तथा आकृति वाली 10 पर्चियाँ बनाएँगे।
  2. इन पर्चियों पर छात्रों के नाम लिखेंगे। एक पर्ची पर एक नाम लिखा जाएगा।

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प्रश्न 12.
क्या लाटरी विधि सदैव एक यादृच्छिक प्रतिदर्श देती है? बताएँ।
उत्तर:
लाटरी विधि द्वारा हमेशा यादृच्छिक प्रतिचयन ही प्राप्त होता है। इस विधि में प्रत्येक इकाई को शामिल किया जाता है। अतः प्रत्येक इकाई के चुनाव की समान संभावना रहती है। इस विधि में सभी प्रतिभागियों के पर्चियों पर नाम लिखें जाते हैं और उन पर्चियों को एक डिब्बे में डालकर, अच्छी तरह हिलाकर, किसी निष्पक्ष व्यक्ति से उतनी पर्चियाँ एक-एक करके निकलवायी जाती हैं जितने प्रत्याशियों का चुनाव करना होता है, अथवा लोगों को नम्बर वाले टिकट प्रदान किए जाते हैं। टिकटों को बक्से में डालकर, मशीन में हिलाकर, निश्चित संख्या में टिकट निकालकर चयन किया जाता है।

प्रश्न 13.
यादृच्छिक संख्या सारणी का उपयोग करते हुए, अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 छात्रों के चयन के लिए यादृच्छिक प्रतिदर्श की चयन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
10 विद्यार्थियों को 01, 02, 03, 04, 05, 06, 07, 08, 09, 10 अंक प्रदान करते हैं। इन संख्याओं में से किसी एक संख्या का दैव आधार पर चयन कर लिया जाता है। अगली दो क्रमागत संख्याओं का और चुनाव करके 3 छात्रों का चयन कर लिया जाता है। माना दैव आधार पर चुनाव की गई संख्या 3 है, तो चयनित छात्रों की संख्याएँ होगी 3, 4 व 5।

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प्रश्न 14.
क्या सर्वेक्षणों की अपेक्षा प्रतिदर्श बेहतर परिणाम देते हैं? अपने उत्तर की कारण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
गणना विधि की तुलना में प्रतिचयन विधि द्वारा आँकड़े एकत्र करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. गणना विधि की तुलना में इस विधि से सर्वेक्षण करने में खर्च कम होता है।
  2. आँकड़े संकलित करने, सारणीबद्ध करने, गणना. एवं विश्लेषण करने में इस विधि में श्रम एवं समय काफी कम लगता है।
  3. गणना सम्बन्धी त्रुटियों की संभावना घट जाती है।
  4. इस विधि में गणनाकारों एवं पर्यवेक्षकों के छोटे समूह को प्रशिक्षित करना पड़ता है। अतः उनको अच्छी तरह प्रशिक्षित किया जा सकता है और विभिन्न स्तरों पर काम करने वालों में अच्छी तालमेल हो सकती है।

Bihar Board Class 11 Economics आँकड़ों का संग्रह Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संपूर्ण सर्वेक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संपूर्ण सर्वेक्षण में समष्टि की प्रत्येक इकाई से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं।

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प्रश्न 2.
प्रतिदर्श सर्वेक्षण में संगणना सर्वेक्षण की अपेक्षा कौन-कौन सा गुण पाया जाता है?
उत्तर:
प्रतिदर्श सर्वेक्षण में समय, धन तथा श्रम की बचत होती है।

प्रश्न 3.
क्या लाटरी विधि सदैव एक यादृच्छिक प्रतिदर्श देती है? बताएँ।
उत्तर:
इसमें संदेह नहीं कि लाटरी सबसे अधिक प्रचलित और सरल विधि है और यादृच्छिक प्रतिदर्श का एक रूप है। परंतु लाटरी विधि हमें हमेशा यादृच्छिक प्रतिदर्श नहीं देती, क्योंकि यह विधि संयोग (Chance) पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 4.
सामान्य विकल्प प्रश्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामान्य विकल्प प्रश्न उन प्रश्नों को कहते हैं, जिनके उत्तर ‘प्राय’ हाँ या नहीं सही या गलत के रूप में दिए जा सकते हैं।

प्रश्न 5.
बहु-विकल्प प्रश्नों से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
बहु-विकल्प प्रश्नों से अभिप्राय उन प्रश्नों से है जिनके कई संभव उत्तर हो सकते हैं। ये उत्तर प्रश्नावली में ही छिपे होते हैं।

प्रश्न 6.
आँकड़ों की शुद्धता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आँकड़ों की शुद्धता से अभिप्रायः तथ्य या घटना का यथार्थ वर्णन करने वाले आँकड़ों से है।

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प्रश्न 7.
सांख्यिकी आँकड़ों के पूर्ण शुद्ध न होने के दो कारण बताएँ।
उत्तर:
अनुसंधानकर्ता की अपूर्णता, माप, यंत्रों एवं उपकरणों की अपूर्णता।

प्रश्न 8.
अभिनत त्रुटियों के उत्पन्न होने के दो कारण लिखें।
उत्तर:
सूचनाओं की संकलन विधि का दोषपपूर्ण होना तथा आंकड़ों के व्यवस्थितीकरण का दोषपूर्ण होना।

प्रश्न 9.
आवृत्तियों का विन्यास से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आवृत्तियों के विन्यास से अभिप्राय प्रत्येक वर्ग में आने वाली पदों की गणना करके उसकी आवृत्तियों को लिखना है।

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प्रश्न 10.
प्रवेश-पत्रिका के कोई दो लाभ लिखें?
उत्तर:
प्रवेश पत्रिका से –

  1. किसी भी वर्गांतर में लिखी गई अशुद्धि का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
  2. वर्गांतर का निर्माण पुनः किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
अनुरोध-पत्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अनुरोध-पत्र से अभिप्राय उस पत्र से है जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अपना परिचय और अनुसंधान के उद्देश्य का विवरण सूचक को देता है।

प्रश्न 12.
व्यवस्थित प्रतिचयन विधि क्या है?
उत्तर:
व्यवस्थित प्रतिचयन विधि वह विधि है जिसके अंतर्गत समग्र की सभी इकाइयों को किसी एक आधार (संख्यात्मक, भौगोलिक या अक्षरात्मक द्वारा क्रमबद्ध किया जाता है।

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प्रश्न 13.
प्रतिचयन अतंराल की गणना का सूत्र लिखें।
उत्तर:
प्रतिचयन अंतराल = समष्टि का आकार

प्रश्न 14.
प्राथमिक आँकड़े किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये वे आँकड़े होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्यों के अनुकूल सबसे पहले संकलित करता है या गणकों द्वारा संकलित करवाता है।

प्रश्न 15.
द्वितीयक आँकड़े क्या होते हैं?
उत्तर:
यदि किसी दूसरी संस्था द्वारा प्राथमिक तौर पर प्राप्त आँकड़ों को संगृहीत एवं संशोधित (संवीक्षित एवं सारणीकृत) किया जाता है तो इन आँकड़ों को दूसरी संस्था के लिए द्वितीयक आँकड़े कहते हैं।

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प्रश्न 16.
प्रश्नावली किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रश्नावली प्रश्नों की वह सूची है, जिसकी आवश्यकता जानकारी स्वयं-सूचकों द्वारा प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 17.
द्वितीयक आँकड़े संकलित करते समय कौन सी तीन सावधानियां बरतनी चाहिए?
उत्तर:

  1. विश्वसनीयता
  2. अनुकूलता
  3. पर्याप्तता

प्रश्न 18.
एक प्रश्नावली में प्रश्नों की कितनी संख्या होनी चाहिए?
उत्तर:
एक उचित संख्या जो उत्तरदाइओं को हतोत्साहित नहीं करे।

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प्रश्न 19.
प्रतिदर्श सर्वेक्षण (Sample Survey) क्या है?
उत्तर:
प्रतिदर्श सर्वेक्षण में समष्टि में से कुछ चुनी हुई प्रतिनिधि इकाइयों के विषय में आँकड़े प्राप्त किए जाते हैं।

प्रश्न 20.
प्रतिचयन की प्रचलित विधियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. यादृच्छिक प्रतिचयन
  2. स्तरित प्रतिचयन
  3. बहु-स्तरीय प्रतिचयन
  4. गुच्छा प्रतिचयन

प्रश्न 21.
यादृच्छिक प्रतिचयन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यादृच्छिक प्रतिचयन में समष्टि में से इकाइयाँ इस प्रकार छाँटी जाती हैं, ताकि प्रत्येक इकाई के प्रतिदर्श में सम्मिलित होने की बराबर संभावना हो।

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प्रश्न 22.
समष्टि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अनुसंधान क्षेत्र की संपूर्ण इकाइयों को समष्टि कहते हैं।

प्रश्न 23.
प्रतिदर्श से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रतिदर्श समष्टि की इकाइयों का वह भाग है जो पूर्ण समष्टि के अध्ययन हेतु चुना जाता है।

प्रश्न 24.
प्रतिदर्श सर्वेक्षण किस प्रकार के अनुसंधान के लिए अधिक उपयुक्त है?
उत्तर:

  1. अनुसंधान का क्षेत्र विस्तृत हो
  2. समष्टि अनन्त हो
  3. समष्टि की किसी इकाई को परखने से उसका विनाश हो जाए

प्रश्न 25.
आँकड़ों के संकलन में त्रुटि के प्रमुख स्त्रत कौन-से हैं?
उत्तर:
आँकड़ों के संकलन में त्रुटि के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. माप की त्रुटियाँ
  2. गणितीय त्रुटियाँ
  3. प्रश्नों का गणक या सूचक द्वारा सही समझ न पाना
  4. रिकॉर्ड करने में त्रुटियाँ

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प्रश्न 26.
जनगणना 2001 के प्रकाशन से हमें तालिका के रूप में जो जिलेवार जन्म तथा मृत्युदर के आँकड़े प्राप्त हुए हैं क्या आप उन्हें प्राथमिक आँकड़े कहेंगे या द्वितीयक आँकड़ें?
उत्तर:
द्वितीयक आँकड़े।

प्रश्न 27.
अप्रतिचयन त्रुटियाँ क्यों उत्पन्न होती हैं? एक कारण लिखें?
उत्तर:
सूचकों की लापरवाही या भूल से।

प्रश्न 28.
प्रतिदर्श अभिनीति क्या हैं?
उत्तर:
ये वे त्रुटियाँ जो गणकों के पक्षपाती (पूर्वाग्रहित) व्यवहार के कारण पैदा होती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मापन अशुद्धि तथा दर्ज (लेखन) गलतियाँ क्या हैं?
उत्तर:
मापन अशुद्धियाँ (Measurement Errors):
मापन अशुद्धियों से अभिप्राय उन अशुद्धियों से है जो माप के कारण पैदा होती हैं। ये अशुद्धियाँ मापन यंत्र के दोषपूर्ण होने से उत्पन्न होती है या माप को निकटतम इकाई तक लाने में हो सकती हैं।

लेखन (दर्ज) गलतियाँ (Recording Mistakes):
सूचनाओ को गलत कॉलम में लिखने से अधूरी सूचना दर्ज करने से या गंदा लेख (अस्पष्ट लेख) के कारण उत्पन्न गलतियों को दर्ज गलतियाँ कहते हैं। मान लें गणक 13 के स्थान पर प्रश्नावली में 31 लिख देता है। इस प्रकार की गलती दर्ज गलती कहलाएगी।

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प्रश्न 2.
आँकड़ों के संकलन की प्रत्यक्ष वैयक्तिक अनुसंधान तथा अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान विधियों में तीन अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रत्यक्ष वैयक्तिक अनुसंधान तथा अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान में अंतर।
(Differences Between Direct Personal Investigation and Indirect Oral Investigation)
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प्रश्न 3.
अनुसंधानकर्ता, गणक तथा सूचक को परिभाषित कीजिए?
उत्तर:

  1. अनुसंधानकर्ता (Investigator): अनुसंधानकर्ता उस विशेष व्यक्ति को कहते हैं, जो अनुसंधान कार्यों को अपनाता है।
  2. गणक (Enumerator): गणक उस व्यक्ति विशेष को कहते हैं जो अनुसंधान” को तथ्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है।
  3. सूचक (Respondent): सूचना देने वाले व्यक्ति को सूचक कहते हैं।

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प्रश्न 4.
आँकड़ों के संकलन में संगणना विधि की अपेक्षा प्रतिदर्श (प्रतिचयन) विधि में निम्नलिखित लाभ हैं –
उत्तर:
आँकड़ों के संकलन में संगणना विधि की अपेक्षा प्रतिदर्श (प्रतिचयन) विधि में निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. मितव्ययी (Economical): इस विधि के द्वारा एक बड़े समूह के छोटे से भाग का अध्ययन किया जाता है। अत: समय व धन की बचत होती है।
  2. वैज्ञानिक (Scientific): यह विधि वैज्ञानिक भी है, क्योंकि बड़े समूह में से एक अन्य प्रतिदर्श लेकर परिणामों की शुद्धता की जाँच की जा सकती है।
  3. विश्वसनीय (Reliable): यदि प्रतिदर्श प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा ध्यानपूर्वक लिया गया हो तो प्राप्त निष्कर्ष भी शुद्ध रहते हैं।
  4. सरल (Simple): यह विधि बहुत सरल है और इसे आसानी से समझा जा सकता है।

प्रश्न 5.
यादृच्छिक प्रतिचयन को परिभाषित करें। यह मनमाने निदर्शन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
यादृच्छिक प्रतिचयन (Random Sampling):
यादृच्छिक प्रतिचयन को प्रतिनिधि प्रतिचयन भी कहते हैं। यह प्रतिचयन की वह विधि है, जिसके अंतर्गत समष्टि की प्रत्येक इकाई की प्रतिचयन की तरह किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता। उदाहरण के लिए, यदि हमने 1,200 विद्यार्थियों की संख्या वाले स्कूल में 60 का प्रतिदर्श चुनने हैं तो इस विधि के अनुसार प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिदर्श में चुनने जाने की संभावना समान है। इस प्रकार इकाइयों का चुनाव पक्षपात या व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से प्रभावित नहीं होता। इसमें अनुसंधानकर्ता की अपनी मर्जी नहीं चलती। इस विधि के अंतर्गत लाटरी विधि अथवा होल घुमाकर प्रतिदर्श चुना जाता है।

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प्रश्न 6.
प्राथमिक आँकड़ों को एकत्रित करने की प्रश्नावली विधि समझाइए।
उत्तर:
प्रश्नावली विधि में आँकड़ों का एकत्रीकरण प्रश्नावलियों की सहायता से किया जाता है। अनुसंधान के लिए जिन-जिन बातों के संबंध में आँकड़े एकत्रित करने होते हैं, उनके लिए कुछ प्रश्नों की एक सूची (प्रश्नावली) बना ली जाती है। प्रश्नावली में दिए प्रश्नों के उत्तर के आधार पर संबंधित आँकड़ों का एकत्रीकरण किया जाता है। प्रश्नावली विधि के मुख्य रूप है –

  1. डाक द्वारा प्रश्नावली भेजना-इस विधि में अनुसंधानकर्ता प्रश्नावली को डाक द्वारा सूचना देने वालों के पास भेज देता है। वे उसे भरकर निश्चित तिथि तक लौटा देते हैं।
  2. प्रगणकों द्वारा प्रश्नावली भरना-इस विधि में अनुसंधानकर्ता कुछ प्रणगकों को नियुक्त करता है, जो घर-घर जाकर सूचकों से पूछाताछ करके स्वयं प्रश्नावलियाँ भरते हैं।

प्रश्न 7.
एक अच्छी प्रश्नावली में कौन-कौन से गुणों का होना आवश्यक है?
उत्तर:
एक अच्छी प्रश्नावली में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है –

  1. प्रश्न संक्षिप्त तथा स्पष्ट होने चाहिए।
  2. प्रश्नों की संख्या उचित होनी चाहिए।
  3. प्रश्न सरल तथा समझने में आसान हों।
  4. प्रश्न ऐसे हो जिनका उत्तर हाँ या नहीं में दिया जा सके।
  5. उत्तर एक-दूसरे से मेल खाते हों।
  6. कुछ विशेष प्रकार के प्रश्न, जैसे चरित्र से संबंधित नहीं पूछे जाने चाहिए।
  7. प्रश्नावली का पूर्व परीक्षण एवं संशोधन आवश्यक है।

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प्रश्न 8.
द्वितीयक आँकड़ों (Secondary Data) के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
द्वितीयक आँकड़ों के प्रमुख स्रोत निम्न हैं –

  1. सरकार प्रशासन जैसे: (Statistical Abstract of India (Annual); Reserve bank of India Bulletin, Census of India आदि।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन जैसे: The U.N. Statistical Year Book, Annual Report of I.M.F.आदि।
  3. अर्द्ध-सरकारी प्रकाशन जैसे: नगरपालिकाओं, जिला समितियों, पंचायतों आदि द्वारा प्रकाशित जन्म-मरण स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि।
  4. समितियों व आयागों की रिपोर्ट, जैसे-वित्त आयोग, एकाधिकार कमीशन इत्यादि।
  5. व्यापारिक संस्थाओं व परिषदों के प्रकाशित रिपोर्ट जैसे: Hindustan Lever LTD., General Insurance Co. इत्यादि।
  6. पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री, जैसे: Economic Times (Daily), Business Today (Weekly) आदि।
  7. अनुसंधान संस्थाओं के प्रकाशन।
  8. वेबसाइट (इंटरनेट)।

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प्रश्न 9.
द्वितीयक आँकड़ों के प्रयोग में कौन-कौन सी सावधानियाँ आवश्यक हैं? किन्हीं तीन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. उद्देश्य व क्षेत्र (Purpose & Scope):
सर्वप्रथम यह देख लेना चाहिए कि प्राथमिक रूप से जब प्रस्तुत आँकड़े एकत्रित किए गए थे, जो अनुसंधान के उद्देश्य के क्षेत्र वही थे, जिनके लिए उनका अब द्वितीयक आँकड़ों के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

2. शुद्धता की मात्रा (Degree of Accuracy):
इस बात पर भी विचार करना आवश्यक है कि प्रस्तुत आँकड़ों में शुद्धता का स्तर क्या रखा गया था और उसे प्राप्त करने में कितनी सफलता हुई।

3. font partahaf at great (Ability of Last investigation):
यह भी देखना चाहिए कि द्वितीयक आँकड़े पहले किस अनुसंधानकर्ता द्वारा प्राथमिक रूप से कि विधि द्वारा एकत्र किए गए थे। यदि इन प्रश्नों का उत्तर संतोषजनक प्राप्त होता है तो इन आँकड़ों का प्रयोग किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यक्तिगत साक्षात्कार तथा सूचकों को प्रश्नावली भेजने के क्या गुण तथा दोष हैं?
उत्तर:
व्यक्तिगत साक्षात्कार के गुण (Advantages of Direct Interview):
व्यक्तिगत साक्षात्कार के गुण निम्नलिखित हैं –

  1. सूचना अधिक स्पष्ट होती है।
  2. इस विधि के द्वारा संकलित आँकड़े अधिक शुद्ध तथा विश्वसनीय होते हैं।
  3. सूचना देने वाले को प्रश्न पूछने का उद्देश्य बताकर उसे विश्वास में लिया जा सकता है।
  4. व्यक्तिगत साक्षात्कार लचीला है। अनुसंधानकर्ता अपने प्रश्नों में आवश्यकतानुसार फेर-बदल कर सकता है।
  5. सीमित क्षेत्र में व्यक्तिगत साक्षात्कार बहुत ही उपयोगी है।

दोष (Demerits):
व्यक्तिगत साक्षात्कार के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. इस विधि में व्यक्तिगत पक्षपात की संभावना रहती है।
  2. इस विधि में अधिक समय और धन खर्च होता है।
  3. यह एक जटिल विधि है।
  4. इस विधि में प्रशिक्षित, कुशल और निष्पक्ष अनुसंधानकर्ता की आवश्यकता होती है। यदि अनुसंधानकर्ता कुशल, प्रशिक्षित तथा निष्पक्ष नहीं हैं तो परिणाम भ्रामक हो सकते हैं।

सूचकों को डाक द्वारा प्रश्नावली भेजने के गुण (Advantages of Malting Questionnaries to Respondents):
सूचकों को डाक द्वारा प्रश्नावली भेजने में निम्नलिखित गुण हैं –

  1. यह विधि वहाँ उपयुक्त है जहाँ सूचना एकत्रित करने का क्षेत्र विस्तृत है।
  2. इस विधि के अंतर्गत सूचनाएँ नियमित रूप से प्राप्त होती हैं।
  3. यह मितव्ययी प्रणाली है।
  4. इसमें पक्षपात की संभावना नहीं होती।

दोष-इस प्रणाली के निम्नलिखित दोष हैं –

  1. सूचक उत्तर गलत खानों में भर सकता है।
  2. सूचक को प्रश्न ठीक तरह से समझ न आए और उसे गलतफहमी हो जाए।
  3. उत्तरों की सत्यता का पता लगाना कठिन हो जाता है।
  4. हो सकता है कि प्रश्नावली वापस न आए।

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प्रश्न 2.
प्राथमिक तथा द्वितीयक आँकड़ों में अंतर बताएँ। द्वितीयक आँकड़ों के कम-से-कम तीन स्रोत लिखें।
उत्तर:
प्राथमिक और द्वितीयक आँकड़ों में अंतर –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह part - 2 img 4

आँकड़ों के तीन स्रोत (Three Sources of Secondary Data):

  1. सरकारी प्रकाशन
  2. अंतराष्ट्रीय प्रकाशन
  3. वेबसाइट

प्रश्न 3.
क्षेत्र सर्वे की योजना में कौन-से मुख्य चरण हैं।
उत्तर:
इसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं –

1. प्रश्नावली तैयार करना (Preparation of the Questionnaire):
प्रश्नावली अनुसंधानकर्ता से संबंधित प्रश्नों की एक सूची होती है। इसे अनुसंधान तैयार करता है। प्रायः इसे टाइप करवाया जाता है। या छपवाया जाता है। प्रश्नों के साथ-साथ ही उत्तर देने के लिए खाली स्थान छोड़ दिया जाता है।

इसके साथ एक अनुरोध-पत्र भी भेजा जाता है, जिसमें सूचकों को विश्वास दिलाया जाता है। कि उनके द्वारा भेजी सूचना नितांत गुप्त रखी जाएँगी। डाक व्यय आदि पहले ही चुकाया (प्रीपेड) होता है। प्रश्नावली को लौटाने की तारीख व उसके उद्देश्य साफ-साफ लिख दिए जाने चाहिए।

प्रश्नावलियाँ बनाने की शते-ये शर्ते निम्नलिखित हैं –

  • प्रश्न संख्या सीमित हो।
  • प्रश्न उद्देश्य के अनुकूल हो।
  • प्रश्नों की पुरावृत्ति न हों।
  • प्रश्न एक-दूसरे के पूरक हों।
  • प्रश्नों की भाषा सरल तथा स्पष्ट हो।
  • सूचनाएँ गोपनीय रखी जानी चाहिए।
  • सूचकों को शिष्टाचार के शब्दों से संबोधित किया जाएँ।

2. पूछताछ का तरीका (Mode of Enquiry):
आँकड़ों का संकलन डाक द्वारा हो सकता है या साक्षात्कार (mode of Enquiry Interview) के माध्यम से। पहली विधि काफी प्रमाणित है। इस विधि के अंतर्गत सूचकों को एक प्रश्नावली भेजी जाती है। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे निश्चित तिथि तक प्रश्नावली भरकर भेजें। यह विधि वहाँ अधिक उपर्युक्त है जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र विस्तृत है। इसके अतिरिक्त यह विधि मितव्ययी है और इससे हमें विश्वसनीय आँकड़े प्राप्त होते हैं, परंतु यह विधि शिक्षित वर्ग तक सीमित है। सूचक प्राय: प्रश्नावली भरकर भेजने में रुचि नहीं लेते।

सूचना संकलन करने की दूसरी विधि साक्षात्कार (Interview) है। इस विधि के अंतर्गत गणक अनुसूची (प्रश्नावली) लेकर स्वयं सूचक के पास जाता है। गणक सूचक को पहले सारी बातें समझा देता है और फिर उनसे सूचना एकत्रित करता है। यह विधि उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है जहाँ सूचक अशिक्षित हो। जटिल व कठिन प्रश्नों के उत्तर सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं: परंतु यह विधि बहुत महँगी है। गणक पक्षपाती भी हो सकते है और यदि गुणक कुशल नहीं है तो प्राप्त सूचना गलत भी हो सकती है।

3. गणकों को प्रशिक्षण देना (Training for Enumerators):
गणकों को प्रशिक्षण देना बहुत ही आवश्यक है, ताकि वे प्रश्नों को अच्छी तरह स्वयं समझ सकें और सूचकों को समझ सकें।

4. छोटे पैमाने पर सर्वेक्षण (Pilot Surveys):
यदि अनुसंधान विस्तृत क्षेत्र का करना है तो यह अच्छा होगा कि विस्तृत क्षेत्र का अनुसंधान करने से पूर्व छोटे पैमाने पर सर्वेक्षण कर लिया जाए। ऐसा करने से प्रश्नों की उपयुक्तता के बारे में जाए। ऐसा करने से प्रश्नों की उपयुक्तता के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाएगी और बड़े पैमाने पर होने वाली सर्वेक्षण की लागत का पता चल जाएगा।

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प्रश्न 4.
जनगणना विधि द्वारा क्षेत्र में सर्वेक्षण से आप किस प्रकार की त्रुटियों (विभ्रमों) की आशा करते हैं?
उत्तर:
जनगणना विधि द्वारा क्षेत्र सर्वेक्षण से हम निम्नलिखित प्रकार की त्रुटियों की आशा करते हैं –

1. माप की गलतियाँ या त्रुटियाँ (Errors of measurement):
सर्वेक्षण में माप की गलती हो सकती है। दूसरे शब्दों में जब हम किसी व्यक्ति की आयु या आय के विषय में पूछते हैं तो वह अपनी आयु (विशेषतः अशिक्षित व्यक्ति) अनुमान से बताएँगे और कहेंगे लिख लो 30-35 वर्ष। आय के विषय में बताएँगे कि उनकी मासिक आय 2000-3000 रुपए है। इस प्रकार अनुमानित आयु या माप की गलतियाँ कहलाती हैं।

2. प्रश्नावली के कुछ प्रश्नों का गलत समझना या गलत अर्थ (Misunderstanding and misinterpreting some questions of the questionnaire):
जनगणना विधि में बहुत ही गुणकों की नियुक्ति की जाती है और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है, परंतु सारे गणक एक जैसी कुशलता वाले नहीं होते, और कुछ लापरवाह भी होते हैं। अतः वे प्रश्नावली के कई प्रश्नों को गलत समझते हैं या उनका गलत अर्थ लगाते हैं। ऐसी अवस्था में विभ्रम उत्पन्न हो सकती है। कई बार सूचक को भी प्रश्न ठीक ढंग से समझ नहीं आता है और वह गलत उत्तर देकर जान बचाता है।

3. लेखन त्रुटि (Recording mistakes):
कई बार गणक सूचक की सूचनाओं के लेखन में गलती कर बैठता है। उदाहरण के लिए, वह 31 के स्थान पर 13 लिख सकता है। कई बार लेख इतना गंदा होता है कि वह पढ़ा नहीं जाता और तालिका बनाने वाला लिखित उत्तरों को कंप्यूटर की फाइल में गलत बढ़ा देता है।

4. उत्तर न मिलने से त्रुटि (Errors of non-responses):
ये गलतियाँ या त्रुटियाँ उस समय उत्पन्न होती हैं, जब सूचक प्रश्नावली को भरने से इंकार करता है या गणक के बार-बार उससे मिलने जाने पर भी वह उपलब्ध नहीं होता।

5. गणितीय विभ्रम या त्रुटियाँ (Arithmetic errors):
कई प्रश्नों में थोड़ी-सी गणित या गणितीय गणना की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी अवस्था में गणना करने में गलती हो सकती है। उदाहरण के लिए, प्रश्नावली में एक प्रश्न है, ‘गत माह भोजन पर कुल कितना खर्च हुआ? ऐसी अवस्था में परिवार के मुखिया को गेहूँ, चावल, नमक, चीनी, दूध आदि पर होने वाले खर्चों को जोड़ना पड़ेगा। उससे जोड़ लगाने में गलती हो सकती है। मदों और उनकी कीमतों को याद करने में उसे गलती हो सकती है। ऐसी गलतियों को गणितीय गलतियाँ कहते हैं।

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प्रश्न 5.
प्रतिचयन और अप्रतिचयन त्रुटियों में अंतर बताइए।
उत्तर:
प्रतिचयन और प्रतिचयन में अंतर
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प्रश्न 6.
एक व्यक्ति ने एक प्रश्नावली तैयार करने के लिए निम्न प्रश्न बनाए हैं। ये प्रश्न दोषपूर्ण हैं। उनके स्थान पर अच्छे प्रश्न बनाएँ।

  1. आप एक महीने में पुस्तकों पर कितने रुपए खर्च करते हैं?
  2. आप अच्छा लगने के लिए अपनी आय का कितना प्रतिशत कपड़ों पर खर्च करते हैं?
  3. क्या आप नहीं सोचते कि धूम्रपान निषेध होना चाहिए।
  4. क्या आप कॉलेज के पश्चात् नौकरी करेंगी या गृहिणी बनेंगी?
  5. आपको इस उच्च कोटि की चाय की सुगंध कैसी लगी?

उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह part - 2 img 6

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प्रश्न 7.
एक आदर्श प्रश्नावली में क्या-क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?
उत्तर:
एक आदर्श प्रश्नावली में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए –

  1. सीमितता (Limitations): अच्छी प्रश्नावली वही मानी जाती है जो गागर में सागर भरे अर्थात् प्रश्न केवल विषयानुकूल ही हों।
  2. सरल व स्पष्ट (Simple and clear): प्रश्नावली में प्रश्न सीमित के साथ सरल व स्पष्ट भाषा में हों।
  3. उचित क्रम (Systematic order): प्रश्न आपस में जुड़े होने चाहिए और क्रम से होने चाहिए। ऐसा न हो कि बच्चों की संख्या पूछने के बाद, फिर यह पूछे कि आप शादीशुदा हैं? यह निरर्थक एवं हास्यास्पद प्रश्न होगा।
  4. उचित व सम्मानजनक प्रश्न (Proper and respectable questions): प्रश्न सम्मनजनक होने चाहिए जिससे कि सूचक के स्वाभिमान को ठेस न लगे। यह पूछना कि आप जुआ खेलते हैं, उचित नहीं है।
  5. प्रश्नों के प्रकार (Kinds of questions):
    • (क) वैकल्पिक प्रश्न (Alternative question): ये वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हाँ या ना, गलत या सही दिशा में दिया जा सकता है।
    • (ख) बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple-alternative questions): ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर कई हो सकते हैं, जैसे-आपने स्कूल क्यों खोला है? धन कमाने को, यश कमाने को या गरीब बच्चों की सहायता के लिएं? आदि।
    • (ग) विशिष्ट प्रश्न (Specific question): ऐसे प्रश्न तब करने चाहिए जबकि कोई विशिष्ट जानकारी प्राप्त करनी हो, जैसे-किसी की मासिक आय।
    • (घ) खुले प्रश्न (Open questions): ये ऐसे प्रश्न तब करने चाहिए जबकि सूचक इनका उत्तर मनमर्जी से दे। जैसे-नशाबंदी, दहेज प्रथा पर रोक।
  6. निर्देश (Direction): प्रश्नावली में यह भी ठीक-ठीक लिखा होना चाहिए कि प्रश्नावली को भेजने की अंतिम तारीख क्या है तथा उत्तर कैसे हों।
  7. प्रश्न के नीचे की टिप्पणी (Footnot after the questions): प्रश्नावली में दिए गए प्रश्नों में से किसी प्रश्न का अधिक विश्लेषण चाहिए तो ऐसे प्रश्नों के नीचे टिप्पणी अवश्य लिख देनी चाहिए।
  8. प्रश्नावली की पूर्व जाँच (Pre-checking of questionnaire): प्रश्नावली को सूचकों तक भेजने से पहले पूर्ण रूप से जाँच कर लेनी चाहिए। कोई किसी तरह की कमी न हो।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि हम किसी आर्थिक या सामाजिक समस्या का अध्ययन करना चाहते हैं तो हमें –
(a) रुपयों की आवश्यकता होती है
(b) कुछ चरों से संबंधित आँकड़ों की जरूरत होती है
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) कुछ चरों से संबंधित आँकड़ों की जरूरत होती है

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प्रश्न 2.
क्षेत्र सर्वेक्षण द्वारा संग्रहीत आँकड़े कहलाते हैं –
(a) प्राथमिक आंकड़े
(b) द्वितीयक आँकड़े
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्राथमिक आंकड़े

प्रश्न 3.
प्राथमिक आँकड़े अन्वेशणकर्ता द्वारा
(a) स्वयं एकत्र किए जाते हैं
(b) स्वयं एकत्र नहीं करवाये जाते हैं
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) स्वयं एकत्र किए जाते हैं

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह

प्रश्न 4.
जो आँकड़े अन्वेषणकर्ता द्वारा स्वयं एकत्र एवं संशोधित नहीं किए जाते, कहलाते हैं –
(a) मौलिक आँकड़े
(b) द्वितीयक आँकड़े
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) द्वितीयक आँकड़े

प्रश्न 5.
सभी प्रकाशित आँकड़े कहलाते हैं –
(a) द्वितीयक आँकड़े
(b) प्राथमिक आँकड़े
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) प्राथमिक आँकड़े

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प्रश्न 6.
जो वास्तविक आँकड़े एकत्र करने क्षेत्र में जाता है, उसे कहते हैं –
(a) गणनाकार
(b) पर्यवेक्षक
(c) अन्वेषक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) गणनाकार

प्रश्न 7.
उत्तरदाता प्रश्नावली के प्रश्नों का उत्तर देकर –
(a) वास्तविक आँकड़े प्रदान नहीं करता है
(b) वास्तविक आँकड़े प्रदान करता है
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) वास्तविक आँकड़े प्रदान करता है

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 2 आँकड़ों का संग्रह

प्रश्न 8.
जनगणना विधि में दिए गए क्षेत्र की –
(a) सभी व्यक्तिगत इकाइयाँ शामिल की जाती हैं
(b) विशिष्ट इकाइयाँ शामिल की जाती हैं
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सभी व्यक्तिगत इकाइयाँ शामिल की जाती हैं

प्रश्न 9.
प्रतिदर्शी विधि में दिए गए क्षेत्र की –
(a) सभी व्यक्तिगत इकाइयाँ शामिल की जाती हैं
(b) विशिष्ट इकाइयाँ शामिल की जाती हैं
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) विशिष्ट इकाइयाँ शामिल की जाती हैं

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प्रश्न 10.
क्षेत्रीय कार्य की योजना में आँकड़ों के संग्रह के लिए अपनाई जाती है –
(a) गणना विधि
(b) प्रतिदर्श विधि
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

भारत-दुर्दशा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि सभी भारतीयों को किसलिए आमंत्रित करता है और क्यों?
उत्तर-
राष्ट्र-प्रेम का शंखनाद करने वाले, हिन्दी साहित्य में नवजागरण के अग्रयूत. भातेन्दु हरिश्चन्द्र का परतंत्र भारत की दारुण-दशा से व्यथित है। भारत पौराणिक काल से ही सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र रहा है जहाँ शाक्य, हरिश्चन्द्र, नहुष, येयाति, राम, युधिष्ठिर, वासुदेव और सारी जैसे युग-पुरुष मनीषि पैदा हुए थे, उसी भारत के निवासी अज्ञानता और अन्तर्कलह का शिकार होकर पतन के गर्त में समा गए हैं। भारत की ऐसी दारुण-दशा से कवि का हृदय हाहाकार मचा रहा है। गुलामी की उत्कट वेदना में भारतवासियों पर व्यंग-वाण चलाते हुए कहता है कि आओ सभी साथ मिलकर भारत की दुर्दशा पर रोते हैं।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार भारत कई क्षेत्रों में आगे था पर आज पिछड़ चुका है। पिछड़ने के किन कारणों पर कविता के संकेत किया गया है?
उत्तर-
भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अनुसार भारत जो अनेक क्षेत्रों का अधिपति था, अब पिछलग्गू बन गया है। कवि ने अपनी भाषा और साहित्य के द्वारा पौराणिक भारतीय सभ्यता और संस्कृति का गहरा आत्मबोध कराया है। मूढ़ता, अन्तर्कलह और वैमनस्य, आलस्य और कुमति ने भारतीयों को पतन के गर्त में धकेल दिया है। कवि ने इस दुर्दशा से मुक्ति के लिए समाज में गहरे आत्ममंथन और बदलाव की आधारशिला रखकर पराधीनता के खिालाफ शंखनाद करने की उद्देश्य-चेतना के लिए प्रेरित किया है।

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प्रश्न 3.
अब जहँ देखहु तह दुःखहिं दुःख दिखाई। [Board Model 2009(A)]
हा हा ! भारत-दुर्दशा न देखि जाई॥
-इन पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिन्दी साहित्य के सृजनकर्ता, युग प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से उद्धत है। बहुमुखी प्रतिभा के कालजयी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उत्कृष्ट अंतर्दृष्टि एवं सहज बोध के के द्वारा देश के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाया है।

कवि के अनुसार जगतगुरु भारत, परतंत्रता की बेडियों में जकड़कर मूढता, कहल और अज्ञानता की काली रजनी के गोद में समा गया है। अपनी ऐतिहासिक गरिमा को विस्मृत कर भारतीय, सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों के अंधकूप में डूबकर राष्ट्रीयता और देशोन्नति के आत्मगौरव से विमुख हो गए हैं। भारतीय समाज को चारों आरे से दुर्दिन के काले बादल ने घेर लिया है।

ऐतिहासिक आत्मबोध को आत्मसात नहीं करने के कारण भारतवासी चहुँ ओर से दुःखों के दलदल में फंस गये हैं। भारत की इस अन्तर्व्यथा के लिए जिम्मेवार भारतीयों से इसकी दुर्दशा पर रोने के लिए कवि कहता है।

प्रश्न 4.
भारतीय स्वयं अपनी इस दुर्दशा के कारण हैं। कविता के आधार पर उत्तर दीजिए। [Board Model 2009(A)]
उत्तर-
युगांतकारी व्यक्तित्व लेकर साहित्याकाश में उदित ध्रुवतारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की दुर्दशा के लिए भारतीयों को ही जिम्मेदार माना है। भारतीय अपने ऐतिहासिक यथार्थ को विस्मृत कर अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य के गर्त में समा गए हैं। अपने स्वर्णिम अतीत का आत्मगौरव विस्मृत कर पराधीनता के बेड़ी में जकड़ गए हैं जिसके कारण भारतीय अतीव दारूण-दशा से व्यथित हैं।

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प्रश्न 5.
‘लरि वैदिक जैन डूबाई पुस्तक सारी।
करि कलह बुलाई जवनसैन पुनि भारी॥
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हिन्दी साहित्य के युगप्रवर्तक साहित्यकार भारन्तेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ शीर्षक कविता से उद्धत है। धर्म-सम्प्रदाय-भाषा-जाति की संवाद रहित विविधताओं में डूबा तथा सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों में जकड़ा हुआ अशिक्षित भारतीय समाज ऐतिहासिक आत्मबोध को विस्मृत कर आपसी अन्तर्कलह का शिकार हो गया है।

स्वाधीनता के संकल्पकर्ता कविवर भारतेन्दु ने अपने अन्तर्दृष्टि और सहज बोधात्मक दृष्टि से भारतीयों को आपसी अनर्तद्वन्द्व और अन्तर्कलह को परख लिया है। कवि ने ‘अहिंसा परमों धर्मः की गोद में बैठे जैन धर्मावलम्बियों पर तीखा शब्द-वाण चलाया है। भारतेन्दु ने क्रान्तिकारी शाब्दिक हथौड़े से जैन और वैदिक धर्मावलम्बियों पर तल्ख प्रहार किया है। जैन और वैदिक धर्मावलम्बियों के आपसी अन्तर्कलह ने भारत को पराधीन बनाने के लिए यवनों की सेना को भारत पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त किया। अन्तर्कलह में जकड़ा हुआ अशिक्षित भारतीय समाज भला स्वाधीनता के लिए कैसे संघर्ष कर सकता है। अन्तर्कलह का शिकार भारतीय गुलामी के दंश को झेलने के लिए अभिशप्त है जो इनके दुर्दशा का केन्द्र-बिन्दु है।

प्रश्न 6.
‘सबके ऊपर टिक्कस की आफत’-जो कवि ने क्या कहना चाहा है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्ति राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा, धरती और नभ के धूमकेतू कविवर भारतेन्दु रचित ‘भारत-दुर्दशा’ से उद्धत है। कवि ने गुलाम भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था का अतीव दारुण और व्यथित चित्र अंकित किया है। अंग्रेजी आक्रान्ताओं के शासन में भारत का धन विदेश चला जाता है, यह कवि के लिए असह्य और कष्टकारी है। महँगाई रूपी रोग काल के गाल समान निगलने को तैयार खड़ा है जो गरीब और बेसहारा लोगों पर हथौड़ा-सा प्रहार कर रहा है। गुलामी के दंश से आहत भारतीय दरिद्रता और दैयनीयता के शिकार हैं। ऊपर से उनपर ‘टिक्कस का आफत आर्थिक ‘कर’ का बोझ ने उसके मस्तक को दीनता के भार से दबा दिया है। भारतीय कष्ट और दुखों से दब-से गये हैं।

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प्रश्न 7.
अंग्रेजी शासन सारी सुविधाओं से युक्त है, फिर भी यह कष्टकर है, क्यों?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कालजयी साहित्यकार, आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवचेतना के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य के दुर्लभ पुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से ली गई है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत के दारुण-दशा को अपनी अंतर्दृष्टि एवम् सहज बोध से गहराई तक समझा। भारतीय ऐतिहासिक मूल्यों को आत्मसात कर उन्होंने स्वाधीनता संकल्प के लिए भारतवासियों को यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य चेतना जगाकर नवजीवन के संचार का प्रयास किया है।

कविवर भारतेन्दु अंग्रेजों के दमन और लूट-खसोट की नीति पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजों के राज्य में सुख और साज तो बढ़ गये हैं परन्तु भारत का धन विदेश चला जाता है, यह उनके लिए ही नहीं सारे भारतवासियों को कष्ट प्रदान करने वाला कृत्य है। कवि ने भारतीयों के अतमन में झंझावत पैदा करने के लिए क्रान्तिकारी हथौड़े से काम नहीं लिया उन्होंने मृदु संशोधक, निपुण वैद्य की भाँति रोगी की नाजुक स्थिति की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त कर उसकी रूचि के अनुसार पथ्य की व्यवस्था की, जिसका वर्णन मुर्तिमान प्राणधारा का उच्छल वेग के समान ‘भारत-दुर्दशा’ में वर्णित इन पंक्तियों में परिलक्षित होता है।

प्रश्न 8.
कविता का सरलार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
देखें कविता का सारांश।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित उद्धरणों की सप्रसंग व्याख्या करें
(क) रोबहु सब मिलि के आबहु भारत भाई।
हा हा ! भारत दुर्दशा न देखी जाई।

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(ख) अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन विदेश चलि जात इहै अति खारी॥
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता और हिन्दी साहित्य के नवोत्थान के प्रतीक कवि शिरोमणि हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित बहुचर्चित और सुविख्यात कविता ‘भारत-दुर्दशा से उद्धत है। इस कविता में कवि की राष्ट्रीयता, देशोन्नति व जातीय उत्थान के लिए अन्तर्व्यथा ऐतिहासिक यथार्थ के बिडंबनापूर्ण बोध के भीतर से जन्म लेती दिखाई पड़ती है।

कवि के अनुसार भारतीय अपनी स्वर्णिम अतीत का आत्मगौरव को विस्मृत कर दिया है। अशिक्षा, अज्ञनता, अंधविश्वास, कुरीति, कलह और वैभवनस्य में डूबे भारतीयों पर उन्होनें तीखा व्यंग-वाण चलाया है। उनकी अकर्मण्यता और आलस्य से भारत पतन के गर्त में डूब गया है। भारत की इस दारुण-दशा को देखकर कवि के हृदय में हाहाकार मचा हुआ है। भारत में इस दुर्दशा से आहत कवि सभी भारतीयों को जिम्मेवार मानते हुए एक साथ मिलकर रोने के लिए आमंत्रित करता है। कवि ने भारतीयों को अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता के वैषम्य की एक दशमय अनुभूति जगाने का सार्थक और यर्थाथ प्रयास किया है।

(ख) प्रस्तुत पंक्तियाँ कालजयी साहित्यकार, आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवचेतना के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य रूपी वाटिका के दुर्लभ पुष्प भारतेन्दु हरिशचन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से ली गई है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत के दारुण-दशा को अपनी अंतर्दृष्टि एवम् सहजबोध से गहराई तक समझा। भारतीय ऐतिहासिक मूल्यों को आत्मसात कर उन्होंने स्वाधीनता संकल्प के लिए भारतवासियों को यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य चेतना जगाकर नवजीवन के संचार का प्रयास किया है।

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कविवर भारतेन्दु का हृदय अंग्रेजों के दमन और लूट-खसोट की नीति पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजों के राज्य में सुख और साज तो बढ़ गये हैं परन्तु भारत का धन विदेश चला जाता है, यह उनके लिए नहीं सारे भारतवासियों को कष्ट प्रदान करने वाला कृत्य है। कवि ने भारतीयों के अर्न्तमन में झंझावत पैदा करने के लिए क्रान्तिकारी हथौड़े से काम नहीं लिया बल्कि उन्होंने मृदु संशोधक, निपुण वैद्य कि भाँति रोगी की नाजुक स्थिति की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त कर उसकी रुचि के अनुसार पथ्य की व्यवस्था की जिसका वर्णन मूर्तिमान प्राणधारा का उच्छल वेग के समान ‘भारत-दुर्दशा’ में वर्णित इन पंक्तियों से परिलक्षित होता है।

प्रश्न 10.
स्वाधीनता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में इस कविता की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर-
आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पराधीन भारत के दारुण-दशा को मूर्तिमान करने का एक बानगी है-भारत-दुर्दशा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत का अकल्पनीय दारुण-दशा को गहराई से देखा।

पराधीन भारतवासियों में स्वतंत्रता संकल्प के लिए ‘भारत-दुर्दशा कविता के माध्यम से उनके भीतर जातीय अस्मिता, यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य-चेतना का संचार कर दिया। ‘भारत-दुर्दशा’ की यथार्थता और व्यंगता ने अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य में डूबे भारतीय समाज को गहराई से समझने की अंतर्दृष्टि दी। इस कविता का सजीव और यथार्थ चित्रण ने धर्म-सम्प्रदाय, भाषा-जाति की संवाद रहित विविधताओं में डूबा तथा सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों में जकड़ा हुआ अशिक्षित समाज को ऐतिहासिक आत्मबोध को जगाकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया है।

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अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता के वैषम्य एक दंशमय अनुभूति जागृत करने वाली इस कविता ने भारतीय समाज को आन्दोलित कर स्वतंत्रता को पुण्य-पथ पर निरंतर अग्रसित हाने की प्रेरणा दी है। भारतेन्दु की कविता ‘भारत-दुर्दशा’ में कवि ने भारतीयों के स्वर्णिम ऐतिहासिक अतीत का आत्मगौरव से परिचय कराते हुए लिखा है

“जहँ भए शाक्य हरिचंदरू ययाती।
जहँ राम युधिष्ठर वासुदेव संती।।
जहँ भीम करण अर्जुन की छटा दिखाती।
तहँ रही मूढता कलह अविद्या राती।।

भारतेन्दु ने पराधीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर व्यंग्य-बाण चलाकर भारत के निवासियों में स्वतंत्रता संकल्प का ऐतिहासिक आत्मबोध जागृत कराया। इस कविता के ऐतिहासिक आत्मबोध कटाक्ष-व्यंग्य ताजगी तथा मौलिकता के गुणों ने अपनी सार्थकता का परिचय देते हुए स्वतंत्रता का बिगुल फूंकने के भारतीय समाज को उत्साहित तथा जागृत किया है। सदियों तक पराधीन भारतीय समाज ने स्वतंत्रता-संघर्ष के लिए अपने उत्तरदायित्वहीनता के प्रमाद से मुक्त होकर स्वतंत्रता के लिए जागृत हो गए। स्वतंत्रता संग्रान के लिए प्रेरित करनेवाली इस कविता और इसके युगपुरुष और कालजयी साहित्यकार का यशोगान भारतीय समाज जबतक प्रकृति का अस्तित्व कायम है, गाता रहेगा।

भारत-दुर्दशा भाषा की बात।

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें ईश्वर, रोग, दिन, राज, कलह, अविधा, कुमति, छटा
उत्तर-

  • ईश्वर – भगवान
  • रोग – व्याधि
  • दिन – दिवस
  • दीन – गरीब
  • राज – साम्राज्य
  • कलह – झगड़ा
  • अविद्या – कुविद्या
  • कुमति – दुर्गति
  • छटा – शोभा।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य प्रयोग द्वारा निर्णय करें दुर्दशा, विद्या, दुःख, पुस्तक,धन सुख, बल, मूढ़ता, विद्याफल, महँगी, आलस।
उत्तर-
दुर्दशा (स्त्री.) – तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की है? हमें अच्छी विद्या सीखनी चाहिए।
दुःख (पु.) – तुम्हारी दशा देखकर मुझे दुख होता है।
पुस्तक (स्त्री) – यह मेरी पुस्तक है।
धन (पुं.) – आपका धन परोपकारर्थ ही तो है।
सुख (पुं.) – यहाँ तो सुख-ही-सुख है।
बल ((.) – उसका बल अतुलनीय है।
मूढ़ता (स्त्री.) – मेरी मूढ़ता ही तो है जो तुम पर विश्वास किया।
विद्याफय (पुं.) – विद्याफल मीठा होता है।
महँगी (स्त्री.) – चाँदी महँगी है।
आलस (पु.) – आलस करना बुरा है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखें दुर्दशा, रूप, विद्या, कलह, कुमति, विदेश।
उत्तर-

  • दुर्दशा – सुदशा
  • रूप – कुरूप
  • विद्या – अविद्या
  • कलह – मेल
  • कुमति – सुमति।
  • विदेश – स्वदेश।

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प्रश्न 4.
संज्ञा के विविध भेदों के उदाहरण कविता से चुनें।
उत्तर-
किसी भी वस्तु, स्थान व्यक्ति अथवा भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं-
(क) व्यक्तिवाचक,
(ख) जातिवाचक,
(ग) समूहवाचक,
(घ) द्रव्यवाचक तथा
(ङ) भाववाचक।।

भारत दुर्दशा कविता में आगत संज्ञाएँ और उनकी कोटि निम्नोद्धन हैं-
व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द-भारत, ईश्वर, विधाता, शाक्य, हरिश्चन्द्र, नहुष, ययाति, राम, युधिष्ठिर, वासुदेव, सर्याति, भीम, करन, अर्जुन, वैदिक, जैन, जवनसैन।
जातिवाचक संज्ञा शब्द-भाई सब जेहि, रोग।
समूहवाचक सज्ञा शब्द-सैन, सब, जिन।
द्रव्यवाचक संज्ञा शब्द-धन, टिक्कस।
भाववाचक संज्ञा शब्द-बल, सभ्य, रूप, रंग, रस, विद्याफल, छटा, मूढ़ता, कलह, अविद्या, राती, आफत, सुख, भारी, ख्वारी, महंगी, रोग, दुर्दशा, कुमति, अन्ध, पंगु, बुद्धि।

प्रश्न 5.
इन शब्दों को सन्धि विच्छेद करें युधिष्ठिर, हरिश्चन्द्र, यद्यपि, युगोद्देश्य, प्रोत्साहन।
उत्तर-

  • युधिष्ठिर = युधिः + ठिर
  • हरिश्चन्द्र = हरिः + चन्द्र
  • यद्यपि = यदि + अपि
  • युगोद्देश्य = युग + उद्देश्य
  • प्रोत्साहन = प्र + उत्साहन

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अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

भारत-दुर्दशा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतेन्दु के अनुसार भारत का अतीत कैसा था? स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार हमारा अतीत गौरवशाली था। ईश्वर की कृपा से हम सबसे पहले सभ्यं हुए। सबसे पहले कला-कौशल का विकास किया। सबसे पहले ज्ञान-विज्ञान की गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट अनेक अपलब्धियाँ प्राप्त की। अतीत में हमारे यहाँ रामकृष्ण, हरिश्चन्द्र, बुद्ध, भीम, अर्जुन आदि महान पुरुष पैदा हुए जिनको याद कर हम गौरवान्वित होते हैं।

प्रश्न 2.
भारतेन्दु के अनुसार भारत की वर्तमान स्थिति कैसी है? बतायें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार वर्तमान काल से हमारी स्थिति बहुत बुरी थी। उनके समय देश पराधीन था, अंग्रेजों का शासन था। हमारा समाज अशिक्षित मूर्ख और कलहप्रिय था। आपसी कलह के कारण हमने यवनों को बुलाया था उन्होंने हमें पराजित कर हमें लूटा, हमारे ग्रंथ नष्ट कर दिये और हमे पंगु तथा आलसी बना दिया।

प्रश्न 3.
अंग्रेजी राज के प्रति भारतेन्दु के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
अंग्रेजी राज के विषय में भारतेन्दु का दृष्टिकोण विरोधी है। वे देशभक्त थे। अत: गुलामी के विरोधी थे। वे मानते थे कि अंग्रेजी देश में सुख के जो सामान रेल-तार-डाक आदि ले आये है वे अपने लाभ के लिए यो उसका लाभ हमें भी मिल रहा है। इसके विपरीत वे हमारे देश के श्रम और कच्चे माल का उपयोग कर जो सामान बनाते हैं वह हमी को बेचकर उसके मुनाफे से अपने को सम्पन्न बना रहे हैं। हम निरन्तर गरीब होते जा रहे हैं। ऊपर से वे रोज नये टैक्स लगा रहे हैं। रोज महँगाई बढ़ रही है, अकाल पड़ा है। यदि हम स्वाधीन रहते तो हमारा धन यहीं रहता और हम इस तरह निरन्तर दीन-हीन नहीं होते।

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प्रश्न 4.
भारतेन्द्र के अनुसार भारत दुर्दशा के कारणों को संक्षेप में बतायें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार भारत की दुर्दशा का प्रधान कारण है-गुलामी। यह गुलामी चाहे यवनों की हो या अंग्रेजी की हमारे लिए अहितकारी रही। इन लोगों ने हमें विद्या, बल तथा धन तीनों से वंचित रखा ताकि हम दुर्बल बने रहें।

दूसरा कारण उनकी दृष्टि में स्वयं भारतीय लोगों का आचरण है। उनके आचरण में स्वार्थ तथा कलहप्रियता की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ये आलसी स्वभाव के हैं। थोड़े में संतुष्ट होकर प्रयत्न नहीं करते, अपनी बुरी दशा से विद्रोह नहीं करते तथा बेहतर जीवन के लिए संघर्ष नहीं करते। इन्हीं कारणों से ये बार-बार पदाक्रान्त हुए, पराजित हुए और गुलाम बने।

भारत-दुर्दशा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतेन्दु किस कोटि के कवि हैं?
उत्तर-
भारतन्दु प्राचीन और नवीन की संधि-भूमि पर स्थित देशभक्त कवि हैं।

प्रश्न 2.
अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी का क्या अर्थ है?
उत्तर-
अंग्रेजों के शासन काल में भारत विज्ञान से प्राप्त सुविधाओं का वंचित हुआ।

प्रश्न 3.
विश्व में सबसे पहले सभरता का विकास कहाँ हुआ?
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार विश्व में सबसे पहले सभयता का विकास भारत में हुआ।

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प्रश्न 4.
भारत के समय भारत में किन चीजों के कारण अंधेरा छाया था?
उत्तर-
भारतेन्दु के समय आलस्य, कुमति और कलह का अंधेरा छाया था।

प्रश्न 5.
भारत भाई से भारतेन्दु का तात्पर्य क्या है?
उत्तर-
भारत भाई से तात्पर्य भारत के लोगों से है। भारतेनदु ने उन्हें भाई कहकर संबोधित किया है।

प्रश्न 6.
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता भारतेंदु हरिश्चन्द्र के किस नाटक के अंतर्गत है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता भारतेंदु हरिश्चंद्र के भारत-दुर्दशा नामक नाटक के अन्तर्गत है।

प्रश्न 7.
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता में किस भावना की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता में देश-प्रेम की भावना की अभिव्यक्ति हुयी है।

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प्रश्न 8.
भारत-दुर्दशा नामक कविता में किस बात की व्यंजना हुयी है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा नामक कविता में अतीत गौरव और देश प्रेम की व्यंजना हुयी है।

भारत-दुर्दशा वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल के प्रवर्तक साहित्यकार के रूप में किस माना जाता है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) रामचन्द्र शुक्ल
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
‘भारत दुर्दशा’ साहित्य की किस विधा में है?
(क) एकांकी
(ख) नाटक
(ग) गद्य-काव्य
(घ) पद्य-काव्य
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 3.
हिन्दी भाषा और साहित्य में नवजागरण के अग्रदूत किसे माना जाता है?
(क) प्रेमचन्द्र
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) भारतेन्दु हरिशचन्द्र
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
भारत की धार्मिक मर्यादा को किसने नष्ट किया है?
(क) जैन धर्मावलम्वी ने
(ख) वैदिक धर्मावलम्बी ने
(ग) बौद्ध धर्मावलम्बी ने
(घ) वैदिक एवं जैन धर्मावलम्बियों ने
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
भारतेन्दु हरिशचन्द्र के पद किस भावे जुड़े पद हैं?
(क) राष्ट्रीय भाव
(ख) प्रेम भाव
(ग) करुण भाव
(घ) भक्ति भाव
उत्तर-
(क)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न:
1. हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग के संस्थापक
2. ‘भारत-दुर्दशा’ पाठ के रचयिता ………………. हैं।
3. रोबड सब मिलिकै आवहु ……………… भाई।।
4. सबके ऊपर ………………. की आफत आई।
उत्तर-
1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
3. भारत
4. टिक्कस।

भारत-दुर्दशा कवि परिचय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885)

आधुनिकता नवोत्थान के प्रतीक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 18-19वीं सदी के जगत-सेठों के एक प्रसिद्ध परिवार के वंशज थे। उनके पूर्वज सेठ अमीचन्द का उत्कर्ष भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के समय हुआ था। नवाब सिराजुद्दौला के दरबार में उनका बड़ा मान था। निष्ठावान अमीचन्द के साथ अंग्रेजी ने अत्यन्त नीचतापूर्ण व्यवहार किया था। उन्हीं के प्रपौत्र गोलापचन्द्र, उपनाम गिरिधरदास के ज्येष्ठ पुत्र थे भारतेन्दु। भारतेन्दु का जन्म 1850 में उनके ननिहाल में हुआ था 5 वर्ष की अवस्था में ही माता पार्वती देवी का तथा 10 वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया।

विमाता मोहिनी देवी का उनके प्रति कोई खास स्नेह-भाव नहीं था। फलतः उनके लालन-पालन का भार काली कदमा दाई तथा तिलकधारी नौकर पर रहा। पिता की असामयिक मृत्यु से शिक्षा-दीक्षा की समूचित व्यवस्था नहीं हो पायी। बचपन से ही चपल स्वभाव के भारतेन्दु की बुद्धि कुशाग्र तथा स्मरणशक्ति तीव्र थी। उस जमाने के रइसों में राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिन्द’ का नाम बड़ा ऊँचा था। भारतेन्दु शिक्षा हेतु उन्हीं के पास जाया करते थे। स्वाध्याय के बल पर उन्होंने अनके भाषाएँ सीखीं तथा स्वाभाविक संस्कारवश काव्य-सृजन करने लगे।

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तेरह वर्ष की आयु में ही इनका विवाह हो गया। इनकी जीवन-संगिनी बनी काशी के रईस लाला गुलाब राय की सुपुत्री मन्ना देवी। घर की स्त्रियों के आग्रह पर पन्द्रह वर्ष की अवस्था में उन्हें कुटुम्बसहित जगन्नाथ-यात्रा करनी पड़ी। देशाटन का उन्हें खूब लाभ मिला। वे हर जगह मातृभूमि तथा मातृभाषा एवं राष्ट्र की स्वाधीनता पर भाषण देते। 1884 की उनकी बलिया-यात्रा उनकी अंतिम यात्रा प्रमाणित हुई। उनके जर्जर शरीर ने उनकी तेजस्वी आत्मा को बाँधे रखने में असमर्थता जतायी और मात्र 34 वर्ष 6 माह की अल्पवय में वे 6 जनवरी, 1885 को इस संसार से चल बसे।

किन्तु इस छोटे जीवन-काल में भी उन्होंने हिन्दी, समाज तथा भारत राष्ट्र की जो अविस्मरणीय सेवा की उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय, कम होगी। उनकी संताने थीं-एक पुत्री, दो पुत्र। पुत्र असमय ही चल बसे। पुत्री विद्यापति सुविख्यात विदुषी बनी। धर्मपरायण मन्ना देवी ने 42 वर्षों तक वैधव्य भोगने के बाद 1926 ई. में प्राण विसर्जित किये। वे परम गुणवन्ती थी तथा आजीवन जन-जन की प्रशंसा पाती रही।

निस्देह भारतेन्दु के आविर्भाव के पूर्व हम राष्ट्रीयता को ठीक-ठीक समझने में असमर्थ थे। भारतेन्दु ने राष्ट्रभक्ति का ज्वार उमड़ाकर अंग्रेजों की दमनात्मक नीतियों तथा भारत की दुर्दशा के कारणों का पर्दाफाश किया। वे युगान्तकारी कलाकार थे। परिवर्तन का काल था वह जब भारतेन्दु को ब्रजभाषा की गद्य-क्षमता तथा खड़ी बोली की पद्य-क्षमता पर अविश्वास रहा।

लेकिन उन्होंने अपने समकालीन को एक सूत्र में पिरोकर जिस तरह काव्य-साधना तथा साहित्य-सेवा में लगाया, वह अतुलनीय बन गया। उनकी उपलब्धियाँ तथा ख्याति अद्वितीय रही। काव्य के क्षेत्र में उन्होंने ब्रजभाषा का कंटकहीन पथ अपनाया। उनकी काव्याभिव्यक्ति की शैली कृष्ण-काव्य परंपरा वाली है। ब्रजभाषा के वे अंतिम गीतकार थे। . वस्तुतः भारतेन्दु ने अपनी साहित्यिक रचनाओं द्वारा स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

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भारत-दुर्दशा कविता का सारांश

आधुनिक हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘भारत-दुर्दशा’ शीर्षक कविता के माध्यम से देश के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाया है। अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता तथा वैषम्य की दंशमय गहराई को समझने की अन्तर्दृष्टि दी है।

भारत की दुर्दशा देखकर कवि की आत्मा चीत्कार उठी है। भारत की दुर्दशा से व्यथित कवि भारत के निवासियों को इसकी दुर्दशा पर मिलकर रोने के लिए आमंत्रित करता है।

भारत की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर अपना व्यंग्य-वाण चलाते हुए भारतेन्दु कहते है कि जिस भारत देश को ईश्वर ने सबसे पहले धन और बल देकर सभ्य बनाया। सबसे पहले विद्वता के भूषण से विभूषित कर रूप, रंग और रस के सागर में गोता लगवाया, वही भारत वर्ष अब सभी देशों से पीछे पड़ रहा है। कवि को भारत की दुर्दशा देखकर हृदय में हाहाकार मच रहा है।

भारत में त्याग, और बलिदान के प्रतीक शाक्य, हरिश्चन्द्र, नऊष और ययाति ने जन्म लिया। यहीं राम, युष्ठिर, वासुदेव और सर्याति जैसे सत्यनिष्ठ और धर्मनिष्ठ अवतरित हुए थे। भारत में ‘ ही भीम, करण और अर्जुन जैसे वीर, दानवीर तथा धनुर्धर पैदा हुए परन्त आज उसी भारत के निवासी अशिक्षा, अज्ञानता, कलह और वैमनस्य के जंजीरों में जकड़कर दुख के सागर में डूब चुके हैं। भारत की ऐसी दारूण-दशा के लिए कवि का हृदय आन्दोलित है।

राष्ट्र चिंतन से दूर ‘अहिंसा परमो धर्मः, के आलम्बन के केन्द्र में बैठा जैन धर्मावलम्बियों ने वैदिक धर्म का विरोध कर यवनों (इस्लाम आदि) की सेना की भारत पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त किया। मूढ़ता के कारण आपसी कलह ने बुद्धि, बल, विद्या और धन को नाशकर आलस्य, कुमति और कलह की काली छटा से भारतीय जन-जीवन घिर गया। भारतीय अन्धे, लँगड़े और दीन-हीन होकर जीने के लिए अभिशप्त हो गये हैं, भारत की दुर्दशा अवर्णनीय हो गई है।

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अंग्रेजो के राज्य अर्थात पराधीन भारत में वैभव और सुख बढ़ गये हैं परन्तु भारतीय धन विदेश चला जाता है। यह स्थिति अतीव कष्टकारी है। उसपर महँगाई सुरसा की भाँति मुँह फैलाये जा रही है। दिनों-दिन दुखों की तीव्रता बढ़ रही है और ऊपर से ‘कर’ का बोझ तो ‘कोढ़ में खाज’ सा कष्टकारक है। भारत की ऐसी दुर्दशा कवि के लिए असह्य हो गया। उसके हृदय में हाहाकार मचा हुआ है।

भारत-दुर्दशा कठिन शब्दों का अर्थ

आवहु-आओ। मीनो-सिक्त, भीगा हुआ। लखाई-दिखाई। मूढ़ता-मूर्खता। अविद्या-अज्ञान। राती-अंधकार। जवनसैन-यवनों की सेवा। पुनि-फिर। नासी-नष्ट। विखलाई-बिलखना, विलाप करना। ख्यारी-कष्टकारी। टिक्कस-टैक्स, कर। पंगु-लंगड़ा। आफत-आपदा, विपदा।

भारत-दुर्दशा काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. रोबहु सब ……………………. भारत दुर्दशां न देखी जाई।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ भारतेन्दु रचित ‘भारत-दुर्दशा’ कविता से ली गयी हैं। यहाँ भारतेन्दु ने देश की दुर्दशा का कारुणिक चित्रण करते हुए लोगों के मन में सुप्त देश-प्रेम को जागने का प्रयास किया है। कवि कहता है कि हे भारत के भाइयों ! आओ, सब मिलकर रोओ ! अब अपने प्यारे देश की दुर्दशा नहीं देखी जाती।

इस देश को ईश्वर ने दुनिया के सभी देशों से पहले बलवान-धनवान बनाया और सबसे पहले सभ्यता का वरदान दिया। यही देश सबसे पहले रूप-रस-रंग में भींगा अर्थात् कला-सम्पन्न विधाओं को प्राप्त कर अपने को ज्ञान-सम्पन्न बनाया लेकिन दुख है कि वही देश आज इतना पिछड़ गया कि पिछलग्गू बनकर भी चलने लायक नहीं है।

सब मिलाकर भारतेन्दु, प्रस्तुत पंक्तियों में कहना चाहते है कि जो देश सभ्यता, कला-कौशल तथा वैभव में अग्रणी और सम्पन्न रहा वही आज गुलामी के कारण पिछड़कर दीन-हीन बन गया है। आज इसकी दुर्दशा नहीं देखी जाती। देखते ही मन पीड़ा और ग्लानि से भर जाता है।

2. जहँ राम युधिष्ठिर ……………. भारत-दुर्दशा न देखी जाई।।
व्याख्या-
‘भारत दुर्दशा’ कविता से ली गयी प्रस्तुत पंक्तियों में भारतेन्दु देश के लोगों को गौरवशाली अतीत की याद दिलाकर प्रेरणा भरना चाहते हैं। वे कहते है कि इस इस देश में राम, युधिष्ठिर, वासुदेवं कृष्ण, सर्याति, शाक्य, बुद्ध, दानी हरिश्चन्द्र, नहुष तथा ययाति जैसे प्रसिद्ध सम्राट हुए। यहाँ, भीम, कर्ण, अर्जुन जैसे पराक्रमी योद्ध हुए। इन लोगों के कारण देश में सुशासन, सुख और वैभव का प्रकाश फैला रहा। उसी देश में (पराधीनता के कारण) आज सर्वत्र दुःख ही दुःख छाया है। . उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से भारतेन्दु यह बताना चाहते है कि अतीत में हम सुख और समृद्धि के शिखर पर विराजमान थे, जबकि आज हम दुःख और पतन के गर्त में गिरकर निस्तेज हो गये है। इस पतन का कारण गुलामी ही समझना चाहिए।

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3. लरि बैदिक जैन डुबाई ……………. भारत दुर्दशा न देखी जाई।
व्याख्या-
भारत दुर्दशा की इन पंक्तियों में भारतेन्दु जी ने यह बनाना चाहा है कि प्राचीन काल में भारत के लोगों ने धर्म के नाम पर लड़ाई की और द्वेषवश विदेशियों को आमंत्रण देकर बुलाया उसी के परिणामस्वरूप हम अन्ततः गुलाम हा गये।

कवि का मत है कि वैदिक मत को माननेवालों और जैनमत को मानने वालों ने आपस में लड़कर सारे ग्रंथों को नष्ट किया। फिर आपसी कलह के कारण यवनों की सेना को बुला लिया। उन यवनों ने इस देश को सब तरह से तहस नहस कर दिया। मारकाट और ग्रंथों को जलाने के कारण सारी विद्या नष्ट हो गयी तथा धन लूट लिया। इस तरह आपसी कलह के कारण यवनों द्वारा पदाक्रान्त होने से बुद्धि, विद्या, धन, बल आदि सब नष्ट हो गये। आज उसी का कुपरिणाम हम आलस्य, कुमति और कलह के अंधेरे के रूप में पा रहे हैं। कवि इस दशा से विचलित होकर कहता है-हा ! हा ! भारत दुर्दशा, न देखी जाई।”

4. अंगरेजराज सुख साज ………………. दुर्दशा न देखी जाई।
व्याख्या-
भारत दुर्दशा की प्रस्तुत पंक्तियों में भारतेन्दु जी ने अंग्रेजी राज की प्रशसा करने वालों को मुँहतोड़ उत्तर दिया है। उनके समय में देश गुलाम था और अनेक लोग गोजी पढ़-लिखकर तथा अंग्रेजियत को अपनाकर अपने देश को हेय दृष्टि से देख रहे थे। भय अथवा गुलाम स्वभाव अथवा “निज से द्रोह अपर से नाता” की मनोवृत्ति के कारण लोग अंग्रेजों के खुशामदी हो गये थे। अंग्रेजों ने देश का शासन की पकड़ मजबूत रखने और अपने तथा शासन-व्यापार की सुविधा के लिए रेल, डाक आदि की व्यवस्था की।

दोयम दरजे के नागरिक के रूप में इन सुविधाओं का लाभ भारतीयों को ही मिल रहा था। अत: वे अंगेजी राज के प्रशंसक थे। भारतेन्दु सच्चाई उजागर करते हुए कहते है कि यह सच है कि अंग्रेजी राज में सुख-सामानों में भारी वृद्धि हुई है। लेकिन इससे क्या, अंग्रेज हमारा शोषण कर धन एकत्र करते हैं और अपने घर इंगलैंड भेज देते हैं। इस तरह वे मुनाफा से अपना घर भर रहे हैं और हम शोषित हैं। ऊपर से महँगाई रोज बढ़ रही है। नित नए टैक्स लगाये जा रहे हैं जिसके फलस्वरूप हमारा दुख दिन-प्रतिदिन दूना होता जा रहा है। अतः यह शासन के नाम पर हमारा शोषण कर रहा है और हमारी स्थिति खराब होती जा रही है।

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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

Bihar Board Class 11 Geography भूगोल एक विषय के रूप में Text Book Questions and Answers

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल शब्द का प्रयोग किया?
(क) हेरोडोटस
(ख) गैलिलियो
(ग) इरेटास्थिनीज
(घ) अरस्तू
उत्तर:
(ग) इरेटास्थिनीज

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?
(क) बंदरगाह
(ख) मैदान
(ग) सड़क
(घ) जल उद्यान
उत्तर:
(ग) सड़क

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?
(क) क्यों
(ख) क्या
(ग) कहाँ
(घ) कब
उत्तर:
(क) क्यों

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प्रश्न 4.
अनलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?
(क) समाजशास्त्र
(ख) मानवशास्त्र
(ग) इतिहास
(घ) भूगोल
उत्तर:
(ग) इतिहास

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?
(क) इरेटॉस्थनीज
(ख) इम्बोल्ट
(ग) स्ट्रेबो
(घ) टॉलेमी
उत्तर:
(ख) इम्बोल्ट

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर:
हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि भूगोल एवं सांस्कृतिक लक्षणों के मष्य संवों को समझने का संकेत निहित होता है।

प्रश्न 2.
आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?
उत्तर:
पृथ्वी का आकार भू-आम (Geoid) है, क्योंकि पूनों पर यह चपटी है। इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

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प्रश्न 3.
क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधा रोषा क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?
उत्तर:
जी हाँ, हम अपने विद्यालय में वन महोत्सव का आयोजन करते है। हम इतने पौधा रोपण इसलिए करते हैं कि वृक्ष पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते है। प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते है। स्थलाकृतियाँ, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं. जिसे पारास्थितिक तंत्र कहते हैं।वध रस पारिस्थतिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण घटक हैं। जैसे वृक्ष वाष्पोत्सर्वन की प्रक्रिया द्वारा विशाल माश में जल मुक्त करते है. इससे वर्षा वाले बादल बनते हैं। वर्षा के ऊपर ही पूरा जैवमण्डल निर्भर करता है। नक्ष उपजाऊ भूमि के अपरदन को रोकने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

प्रश्न 4.
आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?
उत्तर:
हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। जीवन को आश्रय देने वाला पृथ्वी का यह घेरा हाँ जायमण्डल. स्थलमण्डल तथा जलमहल एक-दूसरे से मिलकर जीवन संभव बनाते हैं उसे जीवमण्डल कहते हैं। सजीय, जीयमण्डल के जैविक और अजैविक घटकों के बीच का सामजस्य जीवमण्डल को गतिशील और स्थिर बनाता है। जैव घटक की पोषण पद्धति के आधार पर, इसे उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में वर्गीकृत किया गया है. उनकी भोजन बनाने की तथा उपभोग संबंधित परस्परिक क्रियायें जीवमण्डल का एक अन्य मनोरंजक लक्षण है।

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प्रश्न 5.
आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान था, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?
उत्तर:
हमारे निवास स्थान से विद्यालय जाने में हमें पैदल एक घण्टा लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सडक के उस पार होता तो गरे । पाटा 30 मिनट लगता। यदि मैं साइकिल दाग विद्यालय आऊं तो मई 20 मिनट लगते हैं। यदि मैं बस द्वारा विद्यालय जाता हूँ तो 15 मिनट लगते हैं। यदि बम विभिन्न स्थानों पर समकर जाने की बजाय सीधे जाय तो में विद्यालय 7 मिनट में पहुँच जाता हूँ। एक स्थान में दूसरे स्थान तक हम बिना रुकं गए तो हम कम समय में पहुँचते हैं। यदि हम तेज गति वाहन का प्रयोग करें तो कम से कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तब्धयों में मिलता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पार एवं पक्षी जिसे आप देशो* भिन-भिन होते है। ये सभी भिन तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिनता का अध्ययन है?
उत्तर:
भूगोल अध्ययन का एक आंतरिक्षण (Interdisciplinary) विषय है। प्रत्येक विषय का अध्यायन कुछ उपागमों के अनुसार किया जाता है। इस दृष्टि से भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम है –

  1. विषय-वस्तुगत क्रमबद्ध, एवं
  2. प्रादेशिक।

विषय – वस्तुगत उपागम में एक तथ्य को पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। तत्पश्चात क्षेत्रीय स्वरूप के वर्गीकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। पहले विद्वान भौतिक भूगोल पर बल देते थे। लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया गया कि मानव धपतल का समाकलित भाग है, वह प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। विषय-वस्तगत या क्रमबद्ध उपागम के आधार र भूगोल को विभिन शाखाओं में बाँय है-भौतिक भूगोल भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान, जल-विज्ञान तथा मृदा धगेल के विषय में जानकारी देता है।

मानव भगोलके अंतर्गत समाज जया इसकी स्थानिक/प्रादेशिक गत्यात्मकता (Dynamism) एवं समाज के वोगदान से निर्मित सांस्कृतिक तत्वों का अध्यपन आता है। जीव-भगोल के अंतर्गत वनस्पति पारितिक विज्ञान, पर्यावरण का अध्ययन अवा है। प्रादेशिक उपागम के अंतर्गत प्रादेशिक या क्षेत्रीय जानकारियों का अध्यक्त किया जाता है। उपडत ती के आधार पर हम कह सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक वा क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन कराता है।

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प्रश्न 2.
आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।
उत्तर:
भूगल एक संश्लेषणात्मक (Synthesis) विषय है जो क्षेत्रीय संश्लेषण का प्रयास करता है तथा इतिहास कालिक संश्लेषण का प्रवास करता है। इसके उपगम की प्रकृति समवात्मक (Holistic) होती है। भूगोलका एक सरलेषणात्मक विषय के रूप में अनेक प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों से अंतरापृष्ठ (Interface) संबंध है। दर्शन किसी विषय को जड़ प्रदान कर उसके क्रमशः विकास की प्रक्रिया में स्पष्ट ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करता है। सामाजिक जिन के सभी विषय यथा समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान, नागरिक भूगोल, अर्थशास्त्र जनकिकी, सामाजिक वाचता का अध्ययन करते हैं।

भूगोल की सभी शाखायें-सामाजिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल (नागरिक शास्त्र), आर्षिक भूगोल, जनसंख्या भूगोत, अधिवास भूगोल आदि विषयों से पनिष्ठता से बड़े हैं क्योंकि इनमें से प्रत्येक में स्थानिक (Spatial) विशेषतायें मिलती हैं। राजनीतिक शास्त्र का मूल उद्देश्य राज्यक्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता का विश्लेषण है, जबकि राजनीतिक भूगोल एक क्षेत्रीय इकाई के रूप में राज्य तब इसको जनसंख्या के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करता है।

अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था की मूल विशेषताओं जैसे उत्पादन, वितरण, बिनिमय एवं उपभोग का विवेचन करता है। इसी प्रकार जनसंख्या विधान भूगोल जनकिकी से निकरण से जुदा हुआ है। उपर्युक्त विवेचन से सष्ट है कि भूगोल इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में गहरा संबंध है।

(घ) परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
वन को एक संसाधन के रूप में एनिए, एवं
(i) भारत के मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के वनों के वितरण को दर्शाइए।
(ii) देश के लिए बनों के आर्थिक महाच’ के विषय पर एक लेख लिखिए।
(iii) भारत में वन संरक्षण का ऐतिहासिक विवरण राजाधान एवं उत्तरांचल में “चिपको आंदोलन’ पर प्रकाश डालते ए प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
(i) (a) पर्वतीय वन
(b) उष्ण कटिबन्धीय शुष्क-महरित एवं भई-सपाहरित वन
(c) उष्ण करिबंधीय पवादीय बन
(d) शुल्क पर्णपाती वन
(e) मॅग्रोव वन

(ii) वनों का भी हमारे जीवित रहने के लिए उतना ही महत्व है, जितना जल का। हमारे देशका लगभग 22.5 प्रतिशत स्थाल भाग वन के रूप में है। वन से हमें लकडी, इंधन, चाय, खाद्य पदार्थ, फल, औषधियाँ, रेशो भावि प्राण होते है। छोटे-छोटे जीवाणुओं से लेकर शेर, चीता आदि वनों में आवास करते हैं. जीव सम्पदा।सभी वन और सौर ऊर्जा को ग्रहण करते हैं, ऑक्सीजन, वातावरण में छोड़ते हैं, उत्पादित पदार्थो को उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं वर्षा करवाते हैं तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में
वन प्रदूषण कम करते हैं। वे वातावरण में उपस्थित कर्मों को अवशोषित करते हैं, तब मार्बन डाइऑभमाह का अवशोषण करते हैं। वर्षों से प्रदेश की सुन्दरता बढ़ती है। हमारी पला,
साहित्य तथा संगीत भीमा विशेष महत्व सिटिक प्रवेशालाई भाव इनका प्रयोग अनुसंधान लिए किया विरें में विद्यमान चे मागी मनुष्य के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते है. इस पर काफी अनुसंधान हो सास आवास की सुविधा श्री प्रदान करते।

(iii) विषको आन्दोलन र संरक्षण के लिए गढ़वाल क्षेत्र में सुन्दरलाल नाग द्वारा बताया गया था। इसके अंतर्गत नियों वृक्षों से चिपक गयी थी जिससे कोई भीलों को अपने स्वार्थवश न काट पायें। चिपको आन्दोलन की प्रेरणा सुन्दरलाल बहाणा को आज से लगभग 300 साल पूर्व राजस्थान में चलने गए वन संरक्षण आन्दोलन से मिली थी। इस आन्दोलन में भी औरतों पक्षों से चिपककर उनकी रक्षा की थी। खंजरी’ के नाम से प्रसिद्ध आन्दोलन में अमतादेवी विश्नोई नेताब में सियों ने पंडों की रक्षा के लिए नया से विकरकर पक्षों की रक्षा की थी।

Bihar Board Class 11 Geography निर्माण उद्योग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन विषय अध्ययन ने भूगोल को पतिय चरित्र दिया।
उत्तर:
सौरमण्डल पच्चीका आकार, शव्या देशान्तर।

प्रश्न 2.
अवारहवी शताब्दी में विद्यालयों में भूगोलको लोकप्रियता क्यों मिली?
उत्तर:
भूगोल का विद्यालय में एक लोकप्रिय विषय बनने का मुख्य कारण यह है कि इसके अध्ययन से पच्ची के निवासियों तथा मानों के विषय में जानकारी प्राण होती है। इससे प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक कार होता है। इस अध्ययन से मनुष्य तथा पर्यावरण सम्बन्धों का अनुमान होता है।

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प्रश्न 3.
उस भूगोलवेत्ता का नाम बताइए जिन्होंने ‘भौतिक तथा मानव भूगाल के संश्लेषण का समर्थन किया था।
उत्तर:
एच. मेकिंडर (H. J. Mac-kinder)।

प्रश्न 4.
भूगोल में कौन-सा आधुनिकतम विकास हुआ है।
उत्तर:
पूर्वसमिकीच विश्लेषण का उपयोग निरन्तर नहा है।

प्रश्न 5.
प्रकृतिक भदाय के मुख्य लक्ष्य बताएं।
उत्ता:
सरिया बनामी आदि।

प्रश्न 6.
बातावरण को कौन-से दो मुख्य भागों में बांटा जाता है।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक
  2. मानवीय

प्रश्न 7.
भौतिक भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान
  2. जल विज्ञान

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

प्रश्न 8.
18 वीं शताबी में जर्मनी के दो प्रसिद्ध भूगोल-बेताओं के नाम लिखें।
उत्तर:
हम्बोला तथा रिटर।

प्रश्न 9.
भूगोल के हो स्पष्ट क्षेत्र कौन-से है।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल।

प्रश्न 10.
भौतिक भूगोल के दो उपक्षेत्र बताएं।
उत्तर:

  1. भू-आकृतिक विज्ञान
  2. जलवायु विज्ञान

प्रश्न 11.
मानवीय भूगोल के दो उप-क्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. आर्थिक भूगोल
  2. सांस्कृतिक भूगोला

प्रश्न 12.
बाबुमण्डल दशाओं का अध्ययन करने वाले दो विज्ञान बताएँ।
उत्तर:

  1. जलवा
  2. मौसम विज्ञान

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प्रश्न 13.
‘मनुष्य के कार्य प्रकृति द्वारा निर्धारित होते हैं। वह किस भूगोलवेत्ता का कथन है?
उत्तर:
रैसेल (Ratael) का।

प्रश्न 14.
भूगोल किन तीन प्रमुख विषयों का अध्ययन है?
उत्तर:

  1. भौतिक वातावरण
  2. मारलीय क्रियाएं
  3. दोनों का अंतक्रियात्मक सम्बन्य।

प्रश्न 15.
Geography किन दो शब्दों के सुमेल वे बना है?
उत्तर:
यह शब्द ग्रीक भाषा के दो गल (Geo) पुच्ची तय ‘Graphor’ वर्णन से प्राप्त हुआ है।

प्रश्न 16.
मानव भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. सांस्कृतिक भूगोल
  2. भार्षिक भूगोल
  3. जनसंख्या भूगोल
  4. ऐतिहासिक भूगोला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘पृथ्वी की सतह एक सप नहीं है।’ दो उदाहरण दो।
उत्तर:

  1. पृथ्वी के श्रीनिक स्वरूप में भिन्नता होती है। वहाँ पर्वत, पहाड़ियाँ, पारियाँ, मैदान पठार, बन, रेगिस्तान मिलते हैं।
  2. यहाँ सामाजिक तथा संस्कृतिक तत्वों में भी भिन्नता है। यहाँ ग्रामों नगरों सड़को. रेलों. बाजारों के रूप में ना पाई जाती है। पृथ्वी पर मैतिक वातावरण, सम्पविक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विभिन्नता पाई जाती है।

प्रश्न 2.
‘भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है।’ स्पष्ट को।
उत्तर:
भूगोल पच्ची पर भौतिक तय समाजिक क्षेत्र में मिलताओं का अध्ययन कराता है। भूगोल उन कारकों का भी अध्ययन कराता है जो इस विभिन्नता को उत्पन करते हैं। उदाहरणार्थ: फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन होता है। यह चिना मिट्टी, जलवायु, तकनीकी निवेश की चिन्नता के कारण प्रकार भूगोल दो तत्वों के मध्य कार्य-कारण (Cause and effect) के सम्बना को ज्ञात करने में सहायक है।

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प्रश्न 3.
भगोल विषय में पच्ची के किन चार परिमण्डलों का अध्ययन होता है?
उत्तर:

  1. स्थल मण्डल
  2. जस पाठल
  3. वायुमण्डल
  4. जैव मण्डल

प्रश्न 4.
हमें भूगोल क्यों पढ़ना चाहिए?
उत्तर:
पृथ्वी मनुष्य का घर है। वहाँ हमारा जीवन अनेक रूपों से प्रभावित होता है। हम आसपास के संसाधनों पर निर्भर करते हैं। हम तकनीकों द्वारा प्राकृतिक संसाधन भूमि, मा, जल का उपयोग करने गए अपच आगार प्राप्त करते हैं। हम मौसमी शाके अनुसार अपना जीवन समायोजित करते है। इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 5.
भूगोल पच्ची पर विविधताओं को सम्माने के लिए क्षमता प्रदान करता है। दो उदाहरण दो।
उत्तर:
पृथ्वी पर भौतिक वातावरण, सामाजिक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विविधता मिलती हैं।

  1. आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक तथा भौगोलिक सूचना नत्र (G.LS) ग्लोब पर स्थिति शात करने में सहायक हैं।
  2. संगणक मानचित्र कला (Computer Cartography) मानचित्र बनाने में कुशलता प्रदान करती है।

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प्रश्न 6.
भौतिक भूगोल किस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों के मयांकन सहायक?
उत्तर:
भौतिक पूल प्रकृतिक संसाधनों के मूल्यांकन एवं प्रबंधन सीधा विषय के रूप में विकसित होतास उद्देश्य की पूर्ति हो भौतिक पर्यावरण वंगालमयसम्मयों को समझना आवश्यक।तिक पर्यावरण संसाधन प्रदान करतीवं सं साधनों का उपयोग करते हुए अपन आर्मिक एवं सांस्कृतिक विकास सुनिश्चिातानीकी की सहायता से संसाधनों के बदले उपयोग में विश्व में पारिस्थतिक असन्तुलन अपन कर दिया है। अतएव सतत विकास (Sustainable development) के लिए मैतिक चालवाण का जन नितान्त आवश्यक जोतिक भूगल के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रश्न 7.
विश्व एक परस्पर निर्भर है। व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व एक प्रदेश दूसरे प्रदेश से उड़े है तथा एक-दूसरे पर निर है। वर्तमान विश्व को एक वैश्विक मास (Global Village) को संज्ञा दी जा सकती है। परिवार के बीच साधनातीर काकी -दृश्य माध्यमों (Audio – visual) सुचना तकनीको कह को बहर समृद्ध का दिया है। प्रकृतिक विज्ञान तथ साजिक विज्ञान एक-खरे र रिचर।

प्रश्न 8.
भूगोल की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पूर्गाल की परिभाषा (Definition of Geography) – पूस पीक विक्षन है (Geography is the science of the Earh)। भूगोल को औजी पवायोग्राफी’ कहा गता है। ज्योपासी राम पूनी भाषा के जी (Ge) तथा ‘चाको’ (Gerpho) शब्दों से मिलकर बना है। (Geography = Ge + Grapho) ‘जी’ (Ge) का अर्थ है ‘पनी का मान करना। जिस प्रकार असनका मूल माल्य है, -गर्भ विज्ञान चट्टान का अमर वनस्पति विज्ञान पेड़-पौधों से इतिहास समय से सम्बन्धित भूगोल ‘स्थान’ से सम्बन्धित है। ‘पृथ्वी-जाल व भूतल का अध्ययन है। भूगोल पृथ्वी को मानव निवास स्थान पाकर उसका अध्ययन करता है (Geography studies the Earth as home of man)।

प्रश्न 9.
भूगोल को ज्ञान का भण्डार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्राचीनकाल में गीत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य पलीकेचारे में सामान्य ज्ञान प्राप्त करना ही बाब शाम यात्रियों, व्यापारियों, वेषकों तथा विजेताओं को कचाओं न. आधारित पाकिएबीमाकार तथा रेशन्ता, और मालरिकी जनकली का सपकेश पुरोल निगम अनर्गत किया। पृथ्वी के बारे में जानकारी अधिकतर विषयों से प्रजटलरोतको ज्ञानका भण्डारात।

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प्रश्न 10.
‘भौतिक पर्यावरण एक मंच प्रदान करती सिपापाव कार्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मफेल पच्ची पर भौतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक लक्षणों के मध्य सम्मका अध्यक्त। अनेकामों में समानता तथा कई में असमाता पाई जाती। भगोल भौतिक वातावरण तथा मानवअन्योन्यक्रिया का अध्ययन है। एक लेखनके अनुहार चौतिक पर्यावरण एक मंच प्रस्तुत करता पर मानव समाज अपने विकाससमाचाकरता. आकनियाँ आश्चर प्रदान करती। जिस पर मानवीय क्रियाएँ होती हैं। गानों परषि , पता, पर खनन, पशुपालन, पर्वतों सेभनि निकलती हैं। जलवाप मारवघरों के प्रकार, सस, भोजन, वनस्पति को प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
भूगोलापानी पुच्ची का अध्ययन किस प्रकार करता है?
उत्तर:
भूगल पवार्यता अध्ययन करता है। पृथ्वी भी पचायतको मातिापायी है। इसलिए इस अध्ययन अनेक प्रकृतिक विज्ञान जैसे-भौमिको मया विद्यार, समुद्र पिताल, वनस्पति शास्त्र, जीवन ग्ज्ञिान, मैसम न्जिान महापक हैं। अन्य सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास. समाज शास्त्र, राजनीतिक विज्ञान -विज्ञान की पराल की बचाता का अध्ययन करते हैं। भूगोल सभी प्राकृतिक तथा सामाजिक विपनों से सुचनाधार प्राप्त करके संश्लेषण करता है।

प्रश्न 12.
भूगोल हमें एक अच्छा नागरिक बनने में कसे सहायता करता है?
उत्तर:
प्रायः यह समझा जाता है कि इतिहास, नागरिक शास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञान हमें अच्छा नागरिक बनाने में सहायता करते हैं। भूगोल भी इसी उरद की पूर्ति करता है।
इसके अध्ययन द्वारा हमें भौतिक पर्यावरण तथा मानवीय क्रियाओं के सम्बन्ध (Man environment relation) की जानकारी होती है।

  1. भूगोल हमें भू-मण्डल पर अपने मिति के बारे में जानकारी देते हए संसार के अन्य देश के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के बारे में अवगत कराता है। अतः भूगोल का अध्यापन एक अन्तर्राष्ट्रीय भावना को जन्म देता है।
  2. भूगोल मानव भूगोल का आधार है। इससे हमें संसार की विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक तक्ष आर्थिक समस्याएं हल करने में सहायता मिलती है।
  3. भूगोल मानवीय कल्याण के लिए विश्व साधनों के उचित उपयोग में सहायता करता है।
  4. भूगोस हमें विभिन्न देशों के विकास स्तर (Stage of development) में अन्तर क कारण समझने में सहायता करता है, इस प्रकार अन्य सामाजिक शास्त्रों की भांति एक अच्छा नागरिक बनने में सहायता करता है।

प्रश्न 13.
भूगोल के अध्ययन में तबादका महत्व बलाएँ।
उत्तर:
भूगोल का अध्ययन दो उपागमों के आधार पर किया जाता है –

  1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)
  2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)

1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)-इस उपागम में एक वष्य का पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। इसके पश्चात् क्षेत्रीय स्वरूप के बाँकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। उदाहरणार्थ यदि कोई प्राकृतिक बनस्पति के अध्ययन में रुचि रखता है, तो सर्वप्रथम विश्व स्तर पर उसका अध्ययन किया जायेगा, फिर प्रकारात्मक वर्गीकरण जैसे-विषुवत् रेखीय सदाबहार बन, नाम लकड़ी वाले कोणधारी वर अथवा मानसूनी वन इत्यादि की पहचान उनका विवेचन तथा सीनकन करना होगा।

2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)-प्रादेशिक उपागम में विश्व को विभिन पदानक्रमिक स्तर के प्रदेशों में विभक्त किया जाय और फिर एक विशेष प्रदेश में सभी भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। ये प्रदेश प्राकृतिक राजनतिक चा निर्दिष्ट (मित) प्रदेश हो सकते हैं। एक प्रदेश में तथ्यों का अध्ययन समता से विविधता में एकता की खोज कर हए किया जाता है।

दैतवाद का महत्त्व-दैतवाद भरोल की एक मुख्य विशेषता है। इसका प्रारम्भ से ही विषय में प्रवर्तन हो चुका है। बैतवाद (दिया) अध्ययन में महल रिये जाने वाले पक्ष पर निर्भर करते हैं। पहले निदान भौतिक भूगोत पर बल देते थे परनवार में स्वीकार किया गया था कि मानव धरातलका समकलित भागमा प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। इस प्रकार मनवीय क्रियाओं पर बल देने के साथ मानव भूगोल का विकास हुआ।

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प्रश्न 14.
मानव प्रकृति का वास है।” इस कथन की व्याख्या कौटि।
उत्तर:
मनुष्य तथा प्रकृति के घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रकृति के विभिन्न लक्षण ये भूमि की बनावट, जलवायु, मिट्टी, पदार्थ, जल तथा वनस्पति मनुष्य के रहन-सहन तथा आदिक सामाजि क्रियाओं पर प्रभाव डालते हैं। प्रकृति मनुष्य के कार्य एवं जीवन को निश्चित पा निर्धारित करती है। इस विचारधारा को नियतिवार (determinism) कहा जाता है। जैसे रैसेल के अगसार “मानव अपने बातावरण की उपज है। (Man is the product of environment)। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मानव प्रकृति का दास है।

मानव जीवन प्राकृतिक साधनों पर आधारित है। मानव वातावरण को एक सीमा तक ही बदल सकता है। उसे वातावरण के साथ समायोजन करना आवश्यक है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति एक – दूसरे के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रतिक्रिया द्वारा ही सम्पूर्ण जीवन प्रभावित होता है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति के साबन्धों को देखकर प्रकृति में मनष्य (Man in Nature) कहना ही उचित है। जैसे कि विख्यात भूगोलवेता विडाल-डि-बनाश (Vidal – de -Blach) ने कहा है ‘प्रकृति मानव को मंच प्रदान करती है और यह मनुष्य पर निर्भर है कि बह इस पर कार्य करे।’ (Nature provides the stage and it is for man to act on it.)

प्रश्न 15.
क्रमबद्ध भूगोल से क्या अभिप्रायजसकी उप-शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
भूगोल में भू-पृष्ठ का अध्ययन दो विधियों द्वारा किया जाता है –

(क) क्रमबद्ध भूगोल
(ख) क्षेत्रीय भूगोल।

क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) – विशिष्ट प्रकृतिक अथवा समरिक घटनाओं से पृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले क्षेत्रीय प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का अध्ययन क्रमबद्ध भूगोल कहलाता है। इस संदर्भ में किसी एक भौगोलिक कारक को चन कर (जैसे जलवाय) अध्ययन किया जाता है। भगोल के उस कारक के क्षेत्रीय वितरण के कारण तथा प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। मुख्य उद्देश्य जलवायु तथा जलवायके प्रकार होते है। कृषि का अध्ययन कृषि प्रदेशों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार यह किसी एक परक का विस्तृत अध्ययन होता है। साधारणतः क्रमबद्ध भूगोल को चार प्रमण शाखाओं में बांटा गया है

  • भू-आकृतिक भूगोल-परम्परा अनुसार इसे भौतिक भगोल कहते है।
  • मानव-भूगोल-इसे संस्कृतिक भूगोल भी कहते है।
  • जैव-भगोल-इसमें पर्यावरण भगोल शामिल है।
  • भौगोलिक विधियाँ और तकनीकें-यह विधियों मानचित्र बनाने में प्रयोग की जाती हैं।

प्रश्न 16.
“भूगोल प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान दोनों ही व्याख्या करें।
उत्तर:
भूगोल एक समकलन का विज्ञान है। भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल के विभिन्न पक्षों का अध्यवन करके किसी क्षेत्र का एक भौगोलिक चित्र प्रस्ता किया जात है। भौतिक बातावरण का अध्यपन करने के लिए प्राकृतिक विज्ञान जैसे भौतिकी, रसायन विज्ञान आदि बहुत उपयोगी हैं। सामाजिक विज्ञान में मानवीय क्रियाओं भौतिक तत्वों का कृषि, मानव बस्तियों आदि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार पुगोल प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों को परस्पर जोड़ता है तो दोनों वर्ग के विज्ञान में गिना जाता है।

प्रान 17.
‘भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान कड़ा जाता है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध है। विभिन्न शाखाओं के कई तलों का अध्ययर भूगोल में उपयोगी होता है। इसमें केवल उन्ही घटकों का अध्ययन किया जाता है जो हमारे उद्देश्य के लिए प्रासंगिक हो। विभिन्न घटकों को आपस में संयुक्त रूप में अध्ययन करने को क्रिया को समाकलन कहते हैं। इन विभिन्न घटकों को संयुक्त (Composite) तथा सश्लिष्ट रूप (Synthetic form) में सम्झना अधिक उपयोग तथा महत्वपूर्ण होता है।

भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान (Science of Integration of Synthesis) कहा जाता है। विभिन्न शाखाओं के अंश भौगोलिक अध्ययन में सहायक होते है। वह घरक अलग-अलग पहचाने जाते हैं। इन घटकों को आपस में संयुक्त करने को ही समाकलन कहा जाता है। किसी भी प्रदेश के धरातल, कपि, यातायात, जलवान अदि के अलग-अलग मानचिों में सम्बन्ध स्थापित करने से का उपयोगी परिणाम निकल पाते हैं।

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प्रश्न 18.
भौतिक भूगोल की विषय वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
यहाँ भूगल की इस शाखा के महत्व को बताना युकिा संगा होगा। भौतिक भूगोल में भूखण्ड (भू-आकृतियाँ, प्रवाह, उच्चावच), वायुमण्डल (इसकी बनावट, संरचना तत्व एवं मौसम तथा जलवायु तापक्रम, वायुपाय, वायु वर्षा, जलवायु के प्रकार इत्यादि) जलमण्डल में संबद्ध तत्व जैव मण्डल (जीव स्वरुप-मास तथा नद) जीव एवं उनके पोषक प्रक्रम जैस-पाय शृंखला पारिस्पैतिक प्राचल (Ecological parameters) एवं परिस्थिति सन्तुलन) का सम्मिलित प्राचत (Ecological parameters) एवं पारिस्थितिक सन्तुलन का अध्ययन सम्मिलित होता है। मिट्टियाँ मृदा-निर्माण प्रक्रिया के माध्यम को निर्मित होती है क्या वे मूल चट्टान, जलवायु जैविक प्रक्रिया एवं कालावधि पर निर्भर करती है। कालावधि मिदियों को परिपक्वता प्रदान करती तथा मृदा धाविका (Profile) के विकास में सहायक होती हैं। माना के लिए प्रत्येक तत्व महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 19.
“भूगोल भू-पृष्ठ पर बदलते हए लक्षणों का अध्ययन है।” व्याख्या करें।
उत्तर:
भू-पृष्ठ निरंतर बदल रहा है, कभी धीरे-धीरे तथा अदृश्य रुप में तो कभी बड़ी शीघ्रता से और दृश्य रूप में मान्यता प्राकतिक लक्षण जैसे-पा, नदियाँ गीरों आदि धीरे-धीरे परिवर्तित होते हैं. जबकि सांस्कृतिक लक्षण जैसे भवन, सहर्क, फसलें आदि शीघ्रता से बदलते हैं। भूगोल इन बदलते हुए लक्षणों की उत्पति तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है वो इन लक्षणों को वर्तमान स्वरूप में लाने और बारित करने के लिए उत्तरदायी है। इन लक्षणं की अवस्थिति तथा व्यवस्थाओं का मानवों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है, उसका भी अध्ययन करता है।

प्रश्न 20.
क्षेत्रीय भूगोल से क्या अभिप्राय उसकी शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
बोजीय भूगोल किसी क्षेत्रका समूचा अध्ययर होता है। इसे किसी क्षेत्र, राज्य या नदी घाटी के अध्ययन से आरम्भ किया जा सकता है। फिर इसे विभिन्न विधियों द्वारा अध्यायन किया जाता है। प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र का एक समूचे अध्ययन (Total Setting) के रूप में अध्ययन किया जाता है। प्रदेशों का आधार केवल एक अकेला कारक जैसे उच्चावच वर्षा, बनस्पति साक्षरता हो सकता है। इसी प्रकार बहकारक प्रदेश भी हो सकते हैं। प्रशासनिक क्षेत्र को भी एक प्रदेश लिया जा सकता है। योजना प्रदेश भी बनाए जाते हैं। क्षेत्रीय भूगेल की निम्नलिखित प्रमुख उप-शवाई हैं-

  1. प्रादेशिक अध्ययन
  2. प्रादेशिक विश्लेषण
  3. प्रादेशिक विकास
  4. योजना प्रदेश

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प्रश्न 21.
मानव ने प्रकृति के साथ अनक्ल न (Adaptation) तथा आपरिवर्तन (Modification) द्वारा सम्ता कर लिया है। व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी मानव का घर है। आदिम मानव समान प्रकृति वा पर्यावरण पर सीधे तौर पर निर्भर था। मानव प्रकृति का एक अंग है तब वह भी प्रकति पर अपनी छाप छोड़ता है। मनन ने तकनीकी खोजों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके प्रकृति के बंधन को डीला किया है। मानव ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो सीमित क्षेत्र में जलवायु को अपरिवर्तित कर देती हैं। जैसे-मानानकलक (Air conditioner) वायु शीतक आदि । वर्षा, भूमिगत जल पटक, प्रस्तर (Aquifer) को पुनरावेशित करके कृषि आदि के लिए जल प्राप्त करना । समदी बोत्रों में तेल तथा मैंगनीज पिड प्राप्त काला, मृदा को पुनः नयीकरणीय बनाकर कृषि को स्थापित करन इत्यादि। इस प्रकार मानय ने प्रकृति से समझौता किया है।

प्रश्न 22.
वातावरण एवं मानव के अन्योन्यक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव और वातावरण में एक अटूट सम्बन्ध है। मानस बालय में प्रकृति की उपल है क्या आ कुछ मा परिवर्तन करता है। मानव विपरीत भौतिक परिमितियों के साथ सदा प्रयत्नशील हा एक कविता संक्षेप में मानस संचाच सिमानालाप के माध्यम से इस सम्बन्धको मल किया गया है। आपने मिट्टी का पूजन किया मैंने कप का निर्माण किया आपने पत्रिकाएर किया मैंने दीपक बनाया, आपरेचरम पहाडी भू-भाग एवं मरुस्थलोका राजन किया मैंने फलों की स्यारी तथा बाग बगीचे बनाए । इस प्रकार मानव ने तकनीकी की लापता से एक स्वतन्त्र साप छोडी तथा प्रकृति के सागसाधावनाओं का सुजन किया। भूगोल इसी अनक्रियात्मक सम्बन्ध का अध्ययर करता है।

प्रल 23.
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएँ दें –

  1. भौतिक विज्ञान
  2. जैव-भूगोल
  3. भू-आकृति
  4. जलवायु विज्ञान
  5. जल-विज्ञान
  6. मृदया- भूगोल
  7. बनापति भूगोल
  8. प्राणि भूगोल
  9. मानव पारिस्थितिकी
  10. पर्यावरण भूगोल।

उत्तर:

  1. भौतिक विज्ञान (Physiography) – पह वास्तव में मैतिक भूगोल है जो -पृष्ठ -आकारों का पर करत है।
  2. जैव-भूगोल (Bio-Geography) – यह पर्यावरण पर्थमजीव-जन्तुओं का अध्यक्त।
  3. भू-आकृतिक विज्ञान (Geo morphology) – अकारों का अध्यन
  4. जालवायु विज्ञान (Climatology) – यह जलवायु तथा इसके तत्वों का अपन।
  5. जल-विज्ञान hydrology) – यह महासागरों, नदियों हिम नदियों आदि जल की भूमिका का अध्ययन है।
  6. पदा-भूगोल (Soil Geography) – मृदा भूगल मृदा के निर्माण, प्रा या लिलाण का अध्यायन है।
  7. बनायी भूगोल (Plant Geography) – यह परदेशमा चार मैदानों के वितरण का विज्ञान
  8. प्राणि भूगोल (zoo Geography) – यह बीच जनुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं के
  9. मानव याशियतिकी (Human Ecology) – मामी बालो सम्बयों का अध्ययन करतो।
  10. पर्यावरण भूगोल (Environmental Geography) – जीवन पर्यावरण की गुणवता तथा मानव उसके प्रभाव का अध्ययन है।

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प्रश्न 24.
भौतिक भूगोल के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल का महत्त-भौतिक भूगोल में सभी त्यों को सम्मिलित किया गया है जो प्राकृतिक उथलमाण, वागमण्डल, जलमण्डल एवं रमाला सलमण्डल में भू-आकृति शमित। वायुमण्डल का सम्बन्ध सभी जीवन वस्तु जैसे-बड़-पौधे, पशुओं सूक्ष्म जीव और मनुष्य अध्ययन से है। मथा भौतिक भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले इन चारों तत्वों यामाहाका उत्पाद है।

पर्यावरण निर्धारणहरका सामाजिक निर्धारण के विद्वान एक ऐसी मनोति को जन्म दिया जिसने प्राकृतिक पर्यावरण-भूमि, जल, वायु मुदा, वनस्पति, पशु आदि को कंवस आधिक प्रगति प्राप्तकरलेबले सपना देखा। समापनका हर कांजनेय किया बस गई इससे वायु सहित लगभग सभी प्रकार के प्राकृतिक संसाधन का विनाश प्रदूषण और अधाय मानव ने महसूस किया कि पृथ्वी पर प्रकृतिक संसाधन जीवन को आधार मान करते हैं। उनके निास से पथ्वी पर समस्त जीवन समाप हो सकता है। पान्नु पर्यावरण संकट से उत्पन ह, नवीन परिस्थिति को देखते हुए भूगोल फिर से अपने भौतिक आधार पर सौट आया।

प्रश्न 25.
भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल में अनार स्पष्ट करो।
उत्तर:
मबद्ध भूगोत तथा प्रादेशिक भूगोल अन्तर:
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प्रश्न 26.
प्राकृतिक वातावरण तथा समा वातावरण में अना समट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक वातावरण तथा समग्र जतावरण में अन्तर –
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प्रश्न 27.
भूगोल को सभी विद्वानों का जनक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
भूगोल को सभी विद्याओं का जनक कहा जाता है इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. आज भूगोल मात्र एक ऐसा विषय शेष है जो भूतनी मानिक रूपरेखा की परिवर्तनशीलता को समझाने हेतु सभी प्राकृतिक तथा मानव विज्ञान के विद्वानों को एक प्लेटफार्म पर लाता है।
  2. यह एक अन्नविषयक तथा समाकलात्मक (विभिन्न विषयों को जोड़ने वाला) विज्ञान है, जिसकी अनेक शाखायें हैं।
  3. भौगोलिक शब्दावली में दिक, स्थान भूपृष्ठ के सोने का सामूहिक स्वरूप है जिससे प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का जन्म होता है और जो जीवन विशेष कर मार जीवन को आधार प्रदान करते है।

प्रश्न 28.
भौतिक भूगोल तथा जैव भूगोल में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा जैव गोल में अन्नर –
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प्रश्न 29.
भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल में अंतर बतायें।
उत्तर:
भौतिक पूोल-इसाय प्राकृतिक वातावरण को विहोचता वितरण चिनताओं और जटिलता अध्ययन किया जाता है। इसके चार प्रमुख विभाग –

  1. आकृतिक विज्ञान
  2. समुद्र विज्ञान
  3. जलवायु विज्ञान और
  4. वनस्पति एवं जन्तु भूगोल।

मानव भूगोल – नसमें अनुमके विधिन कार्यकलापों, आर्थिक, राजनीतिक एतिहासिक, समाजिक और सांस्कृतिक एवं स्वयं मनुष्य के वितरण और उसके आवास का अध्ययन भौतिक बातमरण के संदर्भ में किया जाता है। इसके कई उपविभाग है जिसमें प्रमुख जनसंख्या भूगोल, आवासीय भूगोल, संसाधन भूगोल आदि हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भूगोल एक प्राकृतिक एवं मानवीय विज्ञान है।’ व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राचीन समाज में मानव और प्रकृति के बीच की अंतःक्रिया एक-दूसरे के साथ प्रावध रूप में घों पर जैसे-जैसे समय गुजरता गया, अनुभवों के संचय में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों को जन्म दिया। संस्कृतियों केवल मानव और प्रकृति के बीच क्रियाओं का ही नहीं बल्कि बिभिन्न प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण में रहने वाले लोगों के बीच होने वाली: क्रियाओं का भी परिणाम हैं। यह एक निस्तर विकासशील तथा परिवर्तनशील घटना है। यही कारण है कि समान प्रकृतिक वातावरण में हमेश एक ही प्रकार की संस्कृति और सध्यता नहीं, मिलती। इसलिए वह मुष्ठ जिसका अध्ययन भूगोलवेता करता है, एक समान नहीं है।

इसके अतिकमा सांस्कृतिक दोनों ही लक्षणं में शान अंतर है। इस प्रकार भूगोल एक प्राकृतिक तथा मालोष विज्ञान है, जो भूपृष्ठ को आकृति, और विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं को जम सेवाले, प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही कारकों एवं प्रक्रियाओं का अध्यक्त करता है। यह भोप प्रतिरूप तथा मोचन को जानने के लिए -लक्षणों का वर्गीकरण तथा चित्रण करता है। यह वर्तमान प्राप को बदलने में कार्यरत कारकों तथा प्रक्रियाओं की पहचान भी कराया इनसे होने वाले संभावित परिण की भविष्यवाणी भी करता है।समा भूगोल इन प्रमों का उत्तर देने का प्रयास करता है

  1. भूपृष्ठ पर कौन-कौग में प्रकृतिक तथा सांस्कृतिक लक्षण है?
  2. ये किस प्रकार मास्तित्व में आए?
  3. किस प्रकार वितरित और ऐसे क्यों हैं?
  4. एक-दूसरे से संबंधित हैं?
  5. क्या इनका पर्तमान वितरण-प्रतिरूप मानव कल्याण के अनुकूल है।
  6. रूपांतरित करने के लिए क्या किया जा सकता है।
  7. प्रस्तावित परिवर्तनों का माना पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस प्रकार पूल एक विज्ञान प्रकृति और मानव के बीच गतिशील अनक्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन गाम लक्षणों को स्थानिक व्यवस्था का अध्ययन करता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

प्रश्न 2.
“भूगोल के अनेक उप-विषय विज्ञान पर आधारित है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। अघवा, भूगोल का अन्य विषयों से क्या सम्बन्ध हैं?
उत्तर:
मानवीय विकास भौतिक तत्त्वों के सदुपयोग पर आधारित है। इसलिस भूगोल भौतिक वातावरण तथा सामाजिक वातावरण के विभिन्न तत्त्वों का अध्ययन करता है। भूगोल काफी हद तक प्राकृतिक विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान दोनों पर निर्भर है। कई उप-विषयों (Allied Sciences) में भूगोल अन्य विज्ञान शाखाओं के निकट है। प्राकृतिक विज्ञान के अन्तर्गत भूगोल तथा अन्य विषयों का निम्नलिखित सम्बन्ध है –

1. जीव – भू विस्तार विज्ञान (Chrological Science) – इस विज्ञान का मुम सम्बन्ध क्षेत्रीय अध्ययन (Study of an area) प्रादेशिक अध्ययन से होता। नितान (Astronomy) तथा भूगोल मिलकर जीव-विवार विज्ञान की रचना करते हैं। गया विज्ञान में कई विषय, को-औरमण्डल, पच्ची का आकार, अक्षांश-देशाला भूगोल को एक विज्ञान का रूपरे।

2. कालानुक्रमिक विज्ञान (Chronological Science) – तिहास में समय का तत्व महत्वपूर्ण होता है।तिहास भूगोलके समय के साथ सामन्य स्थापित करता सो प्राचीन काल से लेकर वर्तमाम तक मानवीय विकास को समझने में सहायता मिलती है । इस विज्ञान से भू-संघटनाओंकामानुसार अध्ययन किया जाता है।

3. क्रमबद्ध विज्ञान (Systematic Science) – सके मा पृथ्वी की घरकों का अब अपर किया जाता है। भौतिक विज्ञान, रसायन विधान, पारि विकार ज्या प्रांग विधान किसी प्रदेश के मानव एवं कावरणमयों को सर कर समझनेसहायता करते हैं। यह अमन वर्गकरण (Classification System) के आचरम किया जाता है।

4. अर्थशास्त्र से सम्बन्ध (Relation with Economics Science) – मनुष्य के अधिक कल्याण मनदेशिक विकास सम्बन्धी समाना अध्ययन के लिए भूगोत का सम्बन्ध अर्थशालो किटतम तम उपयोगी होत जाता है।

5. अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध – भूगोल के उप-विषय अन्न विज्ञानों निकर हैं, जैसे- आकृतिक विज्ञान का भूगर्ण विज्ञान से निकर का सम्बम। आर्थिक भूगोल का अर्थशास्त्र से सम्मान भूगोल का प्रामी विज्ञान से गहरा सम्बनी,स्था राजनीतिक भगोरण का राजनीतिक सिरसावा है।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Political Science स्वतंत्रता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता से क्या आशय है? क्या व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता और राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता में कोई संबंध है?
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ (The meaning of Freedom):
सामान्य अर्थों में स्वतंत्रता का अर्थ ‘प्रतिरोध रहित’ अवस्था से लिया जाता है। प्रतिरोधों के लगने पर स्वतंत्रता छिन जाती है। स्वतंत्रता अंग्रेजी भाषा के लिबर्टी (Liberty) शब्द के लिए प्रयुक्त होता है जो लैटिन भाषा के (Liber) शब्द से निकला है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘बंधनों का अभाव’। इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ हुआ ‘बंधन रहित अवस्था’ अर्थात् मनुष्य के व्यवहार पर किसी प्रकार का अंकुश न होना।

वह जैसा चाहे व्यवहार करे। किन्तु यहाँ यह विचारणीय है कि यदि इच्छानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता दे दी जाएगी तब केवल शक्तिशाली मनुष्य ही इस स्वतंत्रता का उपभोग कर सकेंगे और स्वतंत्रता केवल कुछ व्यक्तियों को ही मिल सकेगी। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि अंकुशरहित अथवा ‘अनियंत्रित स्वतंत्रता’ वास्तव में स्वतंत्रता है।

प्रतिरोध रहित अवस्था’ और उच्छृखलता में कोई अंतर नहीं है। हमें स्वतंत्रता पर कुछ न कुछ बंधन अवश्य लगाने पड़ेंगे जिससे कि वह सम्पूर्ण समाज के लिए हितकर बन सके। वास्तव में स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी अवस्थाओं से है जिससे मनुष्य अपना पूर्ण विकास कर सकता है। अतः कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता से तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता पर बंधन लगना चाहिए जिनसे किसी दूसरे व्यक्ति अर्थात् समाज को हानि पहुँचती हो। मैकेंजी ने कहा है कि ‘स्वतंत्रता सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं है बल्कि अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों की स्थापना है।”

(“Freedom is not the absence of all restraints, but rather the substitution of rational ones for the irrational”)

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता में संबंध:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र व्यक्ति का समूह होता है जो एक व्यक्ति के समान होता है। इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता और देश का समूह होता है जो एक व्यक्ति के समान होता है। इसलिए व्यक्तिगत की स्वतंत्रता और देश की स्वतंत्रता के योगदान में विशेष अंतर नहीं होता। राष्ट्र एक जीवित जीव की तरह कार्य करता है और व्यक्ति पर नियंत्रण रखता है। देश की हानि, उसके देशवासियों की हानि होती है। व्यक्ति राष्ट्र स्तर पर दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध संघर्ष करता है। सामुदायिक हानि व्यक्ति स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के मध्य की हानि है।

विश्व के अन्य देशों के समान भारत ने शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। उसने विदेशी शक्तियों के साथ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष किया और बड़े शानदार तरीके से 15 अगस्त, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की। नेल्सन मंडेला और उसके साथियों ने जातीयता की ब्रिटिश नीति के खिलाफ कालों के हित के लिए लम्बे समय तक संघर्ष किया। इन संघर्षों द्वारा दक्षिण अफ्रीका के लोगों के स्वतंत्रता में आने वाले बाधाओं को भी दूर किया। मंडेला ने अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता के लम्बे कदम’ (Long Walk to Freedom) में स्वतंत्रता की विस्तृत व्याख्या की है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की माँग राष्ट्रीय स्वतंत्रता या राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता की माँग का पथ प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता की नकारात्मक और सकारात्मक अवधारणा में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वतंत्रता की अवधारणा के नकारात्मक पक्ष और सकारात्मक पक्ष में अंतर –

1. स्वतंत्रता की अवधारणा का नकारात्मक पक्ष:
प्राचीन विचारक नकारात्मक स्वतंत्रता को महत्व देते हैं। उनके अनुसार “स्वतंत्रता से अभिप्राय, ‘बंधनों के अभाव’ से है अर्थात् मनुष्य पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। उसकी इच्छा तथा उसके कार्यों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। मनुष्य को अपने अंत:करण के अनुसार कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।

उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र-राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक तथा धार्मिक क्षेत्र में स्वतंत्र होना चाहिए। व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार जो कुछ करना चाहता है, उसे करने देना चाहिए। राज्य उस पर किसी प्रकार की रुकावट नहीं लगाएगा। जॉन लॉक, एडम स्मिथ और मिल आदि विचारक स्वतंत्रता के इसी रूप के समर्थक थे। लॉक को नकारात्मक स्वतंत्रता का प्रतिपादक माना जाता है।

स्वतंत्रता का नकारात्मक दृष्टिकोण निम्नलिखित विचारों पर आधारित है –

  • स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव है।
  • व्यक्ति पर राज्य द्वारा कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
  • वह सरकार सर्वोत्तम है जो कम से कम शासन करे।
  • सम्पत्ति और जीवन की स्वतंत्रता असीमित होती है।

2. स्वतंत्रता का सकारात्मक पक्ष (Positive Aspects of Liberty):
मैक्नी (Mekechine) के अनुसार, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण होता है।” ये विचार स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप को दर्शाते हैं। स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप को 20 वीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों में महत्व दिया। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता विवेक के अनुसार कार्य करने में है।

लास्की और मेकाइवर स्वतंत्रता के सकारात्मक सिद्धांत के प्रमुख समर्थक हैं। उनका कहना है कि स्वतंत्रता केवल बंधनों का अभाव है। मनुष्य समाज में रहता है और समाज का हित ही उसका हित है। समाज हित के लिए सामाजिक नियमों तथा आचरणों द्वारा नियंत्रित रहकर व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए अवसर की प्राप्ति ही स्वतंत्रता है। लास्की के शब्दों में, स्वतंत्रता एक सकारात्मक चीज है। इसका तात्पर्य केवल बंधनों का अभाव नहीं है।

स्वतंत्रता के सकारात्मक पक्ष की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं है। सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक उचित ” प्रतिबंधों को स्वीकार करते हैं परंतु वे अनुचित प्रतिबंधों के विरुद्ध हैं। सामाजिक हित के लिए व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं।
  • स्वतंत्रता और राज्य के कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करते बल्कि स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
  • स्वतंत्रता का अर्थ उन सामाजिक परिस्थितियों का विद्यमान होना है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।

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प्रश्न 3.
सामाजिक प्रतिबंधों से क्या आशय है? क्या किसी भी प्रकार के प्रतिबंध स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है?
उत्तर:
सामाजिक प्रतिरोध (Social constraints) शब्द का तात्पर्य सामाजिक बंधन और अभिव्यक्ति पर जातीय एवं व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण से है। ये बंधन (Restructions) प्रभुत्व और बाह्य नियंत्रण से आता है। ये बंधन विभिन्न विधियों से थोपे जा सकते हैं। ये बंधन कानून, रीतिरिवाज, जाति, असमानता, समाज की रचना आदि हो सकते हैं। स्वतंत्रता या मुक्ति (Liberty) के वास्तविक अनुभव के लिए सामाजिक और कानूनी बंधन (Constraints) आवश्यक है। प्रतिरोध और प्रतिबंध न्यायसंगत और उचित होना चाहिए। लोगों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिरोध जरूरी है क्योंकि बिना उचित प्रतिरोध या बंधन के समाज में आवश्यक व्यवस्था नहीं होगी जिससे लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

प्रश्न 4.
नागरिकों की स्वतंत्रता को बनाए रखने में राज्य की क्या भूमिका है?
उत्तर:
नागरिकों के स्वतंत्रता की सुरक्षा में राज्य की भूमिका-राज्य के सम्बन्ध में कई लोगों का कहना है कि राज्य लोगों की स्वतंत्रता का बाधक है। इसलिए उनकी राय में राज्य के समान कोई संस्था नहीं होनी चाहिए। व्यक्तिवादियों का मानना है कि राज्य एक आवश्यक बुराई है। इसलिए वे एक पुलिस राज्य चाहते हैं जो मानव की स्वतंत्रता की रक्षा बाहरी आक्रमणों और भीतरी खतरों से कर सके। इसलिए आधुनिक स्थिति में स्वतंत्रता की अवधारणा और स्वतंत्रता के आवश्यक अवयव बदल गए हैं।

इसलिए राज्य की भूमिका बदल गयी है। आज इस तथ्य को स्वीकार किया जाता है कि प्रतिरोध और उचित बंधन आवश्यक हैं। यह स्वतंत्रता की सुरक्षा और रक्षा के लिए जरूरी है। उचित प्रतिरोध (Reasonable Constraints) राज्य द्वारा उपलब्ध कराया जाता है क्योंकि राज्य इसके लिए अधिकृत है। राज्य लोगों द्वारा समर्पित एक संस्था है। इसलिए वे राज्य के निर्देशों को स्वीकार करते हैं और उसके अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं। लोगों के जीवन को आरामदायक और व्यवस्थित रखने के लिए राज्य उपयोगी नीतियों और कल्याणकारी कानूनों का निर्माण करता है। ये सब स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार राज्य स्वतंत्रता के उत्थान में सकारात्मक भूमिका निभाता है।

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प्रश्न 5.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? आपकी राय में इस स्वतंत्रता पर समुचित प्रतिबंध क्या होगा? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ (The meaning of freedom expression):
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्ति की मौलिक आवश्यकता है जो प्रजातंत्र को सफल और उपयोगी बनाता है। इसका अर्थ है कि एक पुरुष या स्त्री को अभिव्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। उसे लिखने, कार्य करने, चित्रकारी करने, बोलने या कलात्मक काम करने की पूर्ण आजादी होनी चाहिए। अभिव्यक्ति के भाव या अभिव्यक्ति की स्वतंत्र प्रजातंत्र की जरूरत है। हमें यह भी मानना पड़ेगा कि अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता प्रजातंत्र के लिए हानिकारक है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्वीकृति उचित बंधन के द्वारा उत्तरदायित्वपूर्ण एवं नियंत्रित होना चाहिए। जब हम यह कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन होना चाहिए तब यह निश्चित करना होगा। अधिक बंधन तर्कसंगत होना चाहिए। वह मानवता पर आधारित न्यायपूर्ण हो जिससे बंधन लादते समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कोई हानि न पहुँचे। न्यायसंगत बंधन के उदाहरण-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बंधनों (Restrictions) को उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, परंतु साथ ही कानून-व्यवस्था, नैतिकता, शांति और राष्ट्रीय सुरक्षा.को यदि नागरिक द्वारा हानि होने की आशंका की अवस्था में न्यायसंगत बंधन लगाने का प्रावधान है। इस प्रकार विद्यमान परिस्थितियों में न्यायसंगत प्रतिबंध लगाया जा सकता है। परंतु इस प्रतिबंध का विशेष उद्देश्य होता है और यह न्यायिक समीक्षा के योग्य हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Political Science स्वतंत्रता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है? (What is meant by Political Liberty?)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता से अभिप्राय ऐसी स्वतंत्रता से है जिसके अनुसार किसी राज्य के नागरिक अपने यहाँ की सरकार में भाग ले सकें। नागरिकों को मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, आवेदन देने का अधिकार तथा सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किए जाते हैं। रंग, जाति, नस्ल धर्म व लिंग आदि के आधार पर किसी नागरिक को उसके राजनीतिक अधिकारों से वाचत नहीं किया जाता है।

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प्रश्न 2.
भाषण तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है? (What do you understand by freedom of speech and expression?)
उत्तर:
लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में जन सहभागिता तथा लोकमत का विशेष प्रभाव होता हैं। लोकमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को अपने विचारों को भाषण या विचार अभिव्यक्ति द्वारा प्रकट करने का अधिकार होना चाहिए। भाषण तथा विचार अभिव्यक्ति लोकतंत्र की आधारशिला है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन तथा चलचित्र का प्रयोग शामिल है। शब्दों, लेखों, चित्रों, मुद्रण अथवा किसी अन्य प्रकार से अपने विचारों को व्यक्त करना इस प्रकार की स्वतंत्रता में आता है।

आज के वैज्ञानिक युग में नये आविष्कारों के कारण जो भी अभिव्यक्ति के साधन विकसित हो रहे हैं, वे भी अभिव्यक्ति की परिभाषा में शामिल हो रहे हैं। समाचार-पत्रों पर सेन्सरशिप लगाना प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात है, जो विचार अभिव्यक्ति को रोकता है। हाँ, यदि कोई भाषण, लेख या विचार अभिव्यक्ति समाज के अंदर हिंसा, घृणा, साम्प्रदायिकता आदि को बढ़ावा दे तो उस पर रोक लगायी जा सकती है। भारत के संविधान में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों में सम्मिलित की गई है।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any two kinds of Liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता के बहुत प्रकार होते हैं जैसे –

  1. राजनीतिक स्वतंत्रता
  2. आर्थिक स्वतंत्रता
  3. धार्मिक स्वतंत्रता
  4. नागरिक स्वतंत्रताएँ
  5. प्राकृतिक स्वतंत्रता
  6. राष्ट्रीय स्वतंत्रताएँ
  7. निजी स्वतंत्रता

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प्रश्न 4.
क्या प्रतेक कानून स्वतंत्रता का समर्थक है? (Does each and every law support Liberty?)
उत्तर:
यद्यपि कानून और स्वतंत्रता का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का समर्थक है। ब्रिटिश काल में अनेक कानून भारतीयों की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए ही बनाए गए थे।

प्रश्न 5.
राजनीतिक स्वतंत्रता के दो लक्षण बताइए। (Mention two features of Political Liberty)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता के दो लक्षण (Two feature of Political Liberty):

  1. प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार होता है।
  2. प्रत्येक नागरिक को सरकारी नौकरी पाने का अधिकार होता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो:
(क) नैतिक स्वतंत्रता
(ख) नकारात्मक स्वतंत्रता (Write short notes on (a) Moral Liberty, (b) Negative concept of Liberty)
उत्तर:
(क) नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
काण्ट (Kant) के अनुसार नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्तिगत स्वायत्तता ताकि हम अपने आप में मालिक बन सकें। नैतिक स्वतंत्रता केवल राज्य में ही प्राप्त हो सकती है क्योंकि राज्य ही उन परिस्थितियों की स्थापना करता है जिनमें मनुष्य नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है।

(ख) नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Aspect of Liberty):
स्वतंत्रता के नकारात्मक पहलू का अर्थ है कि व्यक्ति पर किसी प्रकार का बंधन न हो। हॉब्स के अनुसार-स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों का अभाव है। मिल के अनुसार-व्यक्ति के जो कार्य स्वयं से सम्बन्धित हैं, उन पर किसी प्रकार का बंधन नहीं होना चाहिए परंतु स्वतंत्रता की यह नकारात्मक अवधारणा अव्यावहारिक है। समाज में इस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती।

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प्रश्न 7.
स्वतंत्रता की परिभाषा दीजिए। (Define Liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता जिसे अंग्रेजी में Liberty कहते हैं, लैटिन भाषा के लाइबर (Liber) शब्द ‘से बनी है, जिसका अर्थ होता है ‘बंधनों का अभाव’। इस प्रकार शब्द-उत्पत्ति के आधार पर स्वतंत्रता का अभिप्राय है ‘किसी भी बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना सोचने-विचारे और सोचे हुए काम की करने की शक्ति’। परंतु इस प्रकार की चरम स्वतंत्रता सदा संभव नहीं है।

प्रश्न 8.
लास्की के द्वारा दी गयी स्वतंत्रता की परिभाषा बताइए। (How has Laski defined Liberty?)
उत्तर:
लास्की (Laski) के अनुसार “आधुनिक सभ्यता में मनुष्यों की व्यक्तिगत प्रसन्नता की गारंटी के लिए जो सामाजिक परिस्थितियाँ आवश्यक हैं उनके अस्तित्व में किसी प्रकार के प्रतिबंध का अभाव ही स्वतंत्रता है।” इसी बात को लास्की ने इस प्रकार भी प्रकट किया है – “स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि उस वातावरण की उत्साहपूर्वक रक्षा की जाए जिसमें कि मनुष्यों को अपना सर्वोत्तम रूप प्रकट करने का अवसर मिलता है।”

प्रश्न 9.
स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by Liberty?) अथवा, स्वतंत्रता की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। (Explain the concept of Liberty)
उत्तर:
मनुष्य जो चाहे कर सके, इसे स्वतंत्रता नहीं कहते। स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति को अपने विकास के लिए पूर्ण अवसर सुलभ हों। लास्की के अनुसार-“स्वतंत्रता का अर्थ उस वातावरण की स्थापना से है जिसमें व्यक्ति को अपने पूर्ण विकास के लिये अवसर प्राप्त हों।” गैटेल के अनुसार-“स्वतंत्रता से अभिप्राय उस सकारात्मक शक्ति से है जिससे उन बातों को करके आनंद प्राप्त होता है जो करने योग्य हैं। कोल के अनुसार-“बिना किसी बाधा के अपने व्यक्तित्व को प्रकट: रने का नाम स्वतंत्रता है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“स्वतंत्रता का निहितार्थ है जंजीर से मुक्ति, बन्दीकरण से मुक्ति, दासता से मुक्ति।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (“Liberty implies freedom from chains, from imprisonment and from ensalyement” Discuss)
उत्तर:
स्वतंत्रता क अर्थ है व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक या सामाजिक दबाव नहीं होना। जे. एस. मिल इसी प्रकार की स्वतंत्रता के समर्थक थे परंतु ऐसी पूर्ण स्वतंत्रता समाज में संभव नहीं। शासको एवं अधिकारियों को भी कानून के अनुसार चलना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता तभी मिल सकती है जबकि उसके कार्यों पर सामाजिक हित में उचित प्रतिबंध भी हो। वास्तविक स्वतंत्रता में अनुचित प्रतिबंधों का अभाव है, सभी प्रकार के कानूनों तथा सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं।

लॉक का कहना है, “जहाँ कानून नहीं वहाँ स्वतंत्रता नहीं। (Where there is no law there is no freedom)। इस प्रकार स्वतंत्रता अनुचित प्रतिबंधों का अभाव है, उनसे मुक्ति है दासता, बन्दीकरण तथा बैड़ियाँ ऐसे अनुचित प्रतिबंध हैं जिनके कारण व्यक्ति स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं कर सकता। इसीलिए कहा गया है कि स्वतंत्रता के अर्थों में यह बात निहित है कि व्यक्ति को बेड़ियों से मुक्ति प्राप्त हो, बंदी बनाए जाने के डर से मुक्ति हो, दासता की बेड़ियों से छुटकारा प्राप्त हो।

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प्रश्न 2.
क्या स्वतंत्रता असीम है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बिना किसी बाधा के अपने व्यक्तित्व को प्रकट करने का नाम स्वतंत्रता है परंतु यदि प्रत्येक को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता दे दी जाए तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। एक-दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा पहुँचेगी। असीमित स्वतंत्रता अपने आप में विरोधाभास है। सभ्य समाज में स्वतंत्रता बंधन व कानूनों की सीमा में ही होनी चाहिए। जब भी स्वतंत्रता असीम हो जाती है, तो वह वह नकारात्मक स्वतंत्रता बन जाती है और व्यक्ति के ऊपर किसी प्रकार का बंधन नहीं होता।

इस प्रकार की स्वतंत्रता के अन्तर्गत व्यक्ति कुछ भी कर सकता हैं जिससे दूसरे व्यक्तियों की स्वतंत्रता नष्ट हो सकती है। अत: व्यक्ति को केवल ऐसे कार्य करने चाहिए, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता पर चोट न पहुँचती हो। बार्कर ने लिखा है, “जिस प्रकार कुरूपता का न होना सुन्दरता नहीं है, उसी प्रकार बंधनों का न होना स्वतंत्रता नहीं है।” (“As beauty is not the absence of ugliness so liberty is not the absence of restraints”) अतः स्वतंत्रता असीम नहीं हो सकती।

प्रश्न 3.
क्या प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का रक्षक है? (Does every law defend liberty?)
उत्तर:
प्रत्येक कानून से स्वतंत्रता की रक्षा होती है ऐसा आवश्यक नहीं है। ब्रिटिश काल के अनेक कानून भारतीय जनता की स्वतंत्रता को कुचलने वाले थे। रौलेट एक्ट, सेफ्टी एक्ट, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट आदि इस प्रकार के कानून बनाए गए थे जिनके विरुद्ध भारतीयों ने घोर संघर्ष किया। गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ने के लिए सत्याग्रह किया।

यदि कानून अच्छे हों तो जनता उनका खुशी से पालन करती है, परंतु यदि कानून जनता के हित में नहीं है तो ऐसे कानूनों का जनता सख्ती से विरोध करती है। स्वतंत्रता और प्रभुता के सामंजस्य से जो कानून बनते हैं वे अधिक अच्छे हैं। गेटेल ने लिखा है-“प्रभुत्ता की अधिकता से स्वतंत्रता का नाश होता है। वह अत्याचार में बदल जाती है। इसी प्रकार स्वतंत्रता की अति से अराजकता फैल जाता है और प्रभुता का नाश होता है।” कई बार मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए कानून बनाए जाते हैं। वे कानून स्वतंत्रता में बाधा नहीं पहुँचाते वरन् स्वतंत्रता के समर्थक होते हैं।

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प्रश्न 4.
राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता तथा नैतिक स्वतंत्रता क्या हैं? (What are political, economic and moral liberties?)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है ऐसी स्वतंत्रता जिसके द्वारा नागरिकों को राज्य के कार्यों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। लास्की के अनुसार, “राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ राज्य के कार्यों में क्रियाशील होना है।” लीकॉक के अनुसार, “राजनीतिक स्वतंत्रता संवैधानिक स्वतंत्रता है और इसका अर्थ यह है कि लोगों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार होना चाहिए।

“राजनीतिक स्वतंत्रता में नागरिकों को मतदान करने का अधिकार प्राप्त रहता है। इसके अतिरिक्त चुने जाने का अधिकार तथा सार्वजनिक पद पाने का अधिकार एवं सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करने का अधिकार भी राजनीतिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं। प्रो. लास्की का मत है कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सबको शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हो। साथ ही स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रेस भी आवश्यक है।

आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty):
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है-बिना दूसरों पर निर्भर हुए जीवन-यापन की सभी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति। व्यक्ति की भूख तथा बेरोजगारी से मुक्ति, आर्थिक स्वतंत्रता कहलाती है। मनुष्य को अपनी आर्थिक उन्नति के लिए समान अवसर प्राप्त हों। काम करने का अधिकार, न्यूनतम वेतन, काम के निश्चित घंटे, अवकाश पाने का अधिकार, बेकारी, बीमारी तथा बुढ़ापे में सहायता प्राप्त होना आदि आर्थिक स्वतंत्रता की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं।

एक निर्धन व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिलने से ही उसकी स्वतंत्रता पूरी नहीं हो जाती, क्योंकि जब तक वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होगा तब तक वह अपनी इस राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग भी नहीं कर पायेगा, क्योंकि वह मतदान में या तो भाग ही नहीं ले पाता या अपने मत का प्रयोग स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार नहीं कर पाता; धनी व्यक्ति उसके मत को खरीद लेते हैं अथवा धनी एवं बाहुबली उसको डराकर उसे अपने पक्ष में कर लेते हैं। अत: आर्थिक समानता आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का होना भी निरर्थक होता है।

नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
काण्ट (Kant) के अनुसार नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्तिगत स्वायत्तता अर्थात् हम स्वयं अपने मालिक हैं। व्यक्ति में समाज के प्रति प्रेम, त्याग, सहानुभूति, सहयोग आदि भावनाओं का विकास होना चाहिए। नैतिक स्वतंत्रता केवल राज्य में ही प्राप्त हो सकती है, क्योंकि राज्य ही उन परिस्थितियों की स्थापना करता है जिसमें व्यक्ति नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के लिए तो नैतिक स्वतंत्रता और भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि नैतिक स्वतंत्रता व्यक्ति की मानसिक स्थिति से संबद्ध है जिससे वह बिना लोभ-लालच के अपना सामाजिक जीवन-यापन करता है और अपनी विवेकपूर्ण शक्ति का प्रयोग समाज के हित में करता है।

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता और समानता के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें। (What is the relationship between liberty and equality?)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता के बीच वैचारिक स्तर पर कोई समानता न होकर स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के सिद्धांतों को लागू करने का माध्यम बनते हैं। हालांकि स्वतंत्रता और समानता को कुछ विचारक एक समान मानते हैं लेकिन उनकी यह धारणा पूर्णतया इस आधार पर गलत है कि समानता अपने मूल अभिप्राय से किसी को स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती है, वैसे ही स्वतंत्रता अपने उद्देश्यों के लिए किया जाता है जिससे कि स्वतंत्रता को समानता के सिद्धांत के अनुरूप सबको समान रूप से वितरित किया जाए।

अब इस समानता के आधार पर प्राप्त होने वाली स्वतंत्रता को लोग कैसे इस्तेमाल करते हैं, यह उनकी क्षमता पर निर्भर करता है। इसीलिए स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे की विचारधारा की विरोधी नहीं अपितु स्वतंत्रता और समानता की विचारधारा एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी यह दोनों विचारधारा एक दूसरे के साथ सहयोग करके ही स्वतंत्रता को समानातापूर्वक लोगों के बीच क्रियान्वित किया जा सकता है। इस कारण स्वतंत्रता और समानता के बीच का सम्बन्ध स्वतंत्रता को समानतापूर्वक लोगों के बीच लागू करने का एकमात्र माध्यम बनता है अर्थात् बिना समानता के स्वतंत्रता लोगों पर समान रूप से लागू नहीं हो सकती है।

प्रश्न 6.
स्वतंत्रता का अर्थ और कार्य क्षेत्र को वर्णित करें। (Describe the meaning and scope of liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता के अर्थ को सामान्यत: इस रूप से जाना जाता है कि स्वतंत्रता वह सब कुछ करने की शक्ति है जिससे किसी दूसरे को आघात न पहुँचे। स्वतंत्र व्यक्ति को अपनी इच्छा स्वरूप कार्य करने की स्वतंत्रता होती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में मूल सहायक तत्व स्वतंत्रता, जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा को पहचानता है और अपनी अच्छी अनुरूप अपने कार्य को पूर्ण करता है। अगर स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकार व्यक्ति को प्राप्त न हो तो निश्चित है कि व्यक्ति का विकास होना सम्भव नहीं है।

इस मूल तथ्य को स्वीकारते हुए कि स्वतंत्रता व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है, स्वतंत्रता को मूल रूप से व्यक्ति द्वारा निर्मित किया गया है। इसीलिए स्वतंत्रता व्यक्ति का मूल अधिकार है। भारतीय संविधान में स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद 19 से लेकर अनुच्छेद 22 तेक में वर्णित किया गया है। स्वतंत्रता के क्षेत्र में दो प्रकार की स्वतंत्रता व्यक्ति के संदर्भ में आती है। पहली व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दूसरी सामाजिक स्वतंत्रता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता दोनों ही मनुष्य के विकास के लिए अनिवार्य होती हैं। बिना इन दो तत्वों के संतुलन के व्यक्ति न तो स्वयं अपना स्वतंत्रतापूर्वक विकास कर सकता है और न ही व्यक्ति अपने को स्वतंत्र समझ सकता है। इस कारण स्वतंत्रता व्यक्ति की आवश्यकता का मूल आधार बन जाती है।

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प्रश्न 7.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को स्पष्ट करें। (Define the Personal Liberty)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल अभिप्राय है कि व्यक्ति के वह कार्य जो उसकी निजी आवश्यकताओं से संबंधित हों, तथा इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए वह अपनी निजी इच्छा अनुरूप स्वतंत्र हो। व्यक्तिगत स्वतंत्रता में भोजन, वस्त्र, धर्म, पारिवारिक जीवन, निजी सम्पत्ति आदि सम्मिलित हैं। मिल ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “मानव समाज को केवल आत्मरक्षा के उद्देश्य से ही किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से हस्तक्षेप करने का अधिकार हो सकता है। अपने ऊपर, अपने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा पर व्यक्ति सम्प्रभु है।”

उपरोक्त कथन यह स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यक्ति की स्वयं की इच्छा से संबंधित होती है तथा ऐसी इच्छा को हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता कह सकते हैं जो अपने निर्णय के अनुरूप कार्य कर सकने में अपने को स्वतंत्र महसूस कर सके। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का निर्धारण स्वयं व्यक्ति की अपनी निजी परिस्थितियों और निजी आवश्यकताओं के अनुरूप होता है। व्यक्तिवादी स्वतंत्रता सम्बन्धी अवधारणा को बहुलवादी और उदारवादी विचारकों द्वारा किया गया, तथा यह भी सत्य है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सैद्धान्तिक और उसका व्यावहारिक पक्ष केवल लोकतंत्रीय राजनीतिक विचारधारा से सम्बद्ध है।

प्रश्न 8.
नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता के बीच अंतर को स्पष्ट करें। (Distinguish between Civil Liberty and Political liberty)
उत्तर:
नागरिक स्वतंत्रता का मूल तात्पर्य यह है कि ऐसी स्वतंत्रता को राज्य के माध्यम से दिया जाता है। यह स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता होती है, जिसका संरक्षण और प्रभाव राज्य द्वारा संरक्षित अवश्य होना चाहिए, तभी इस मूलभूत स्वतंत्रता को व्यक्ति अपने विकास में प्रयोग करेगा, बिना किसी की स्वतंत्रता को बाधित किए हुए। नागरिक स्वतंत्रता को दो भागों में विभक्त किया गया है –

  1. शासन के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतंत्रता और
  2. व्यक्ति की व्यक्ति से और व्यक्तियों के समुदाय से स्वतंत्रता।

लास्की ने राजनीतिक स्वतंत्रता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लेने की शक्ति को राजनीतिक स्वतंत्रता कहा जाता है।” लेकिन यह राजनीतिक स्वतंत्रता लोकतांत्रिक पद्धति में ही सम्भव है, न कि अन्य किसी निरंकुश रूप में। लीकॉक द्वारा राजनीतिक स्वतंत्रता को संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में देखा गया जिसका विस्तृत अर्थ यह था कि जनता अपने शासक को अपनी इच्छा के अनुसार चुन सके और चुने जाने के उपरांत यह शासक वर्ग जनता के प्रति उत्तरदायी हो। इस कारण राजनीतिक स्वतंत्रता ने व्यक्ति को दो अधिकार दिए –

  1. मतदान का अधिकार और
  2. निर्वाचित होने का अधिकार। इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता लोगों को राज्य के संदर्भ में सक्रिय रूप से भाग लेने का अधिकार देती है।

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प्रश्न 9.
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ और क्षेत्र वर्णित कीजिए। (Describe the meaning and scope of Economic Liberty)
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता के अर्थ और सिद्धांत को उदारवाद के संदर्भ में जाना जाता है। आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य उदारवाद के संदर्भ में यह है कि व्यक्तियों के आर्थिक जीवन में राज्य के माध्यम से किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यह धारणा उदारवादियों में इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि मध्य युग में सामंती राज्यों ने भूमि, वस्तुओं तथा सम्पत्ति के क्रय-विक्रय, ‘श्रमिक, धन के लेन-देन आदि पर काफी प्रकार के कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे, जिसके कारण आर्थिक सम्पन्नता का सारा केन्द्र राज्य और शासक वर्ग बना तथा राज्य का शासक वर्ग राज्य शक्ति और धन शक्ति को अपने नियंत्रण में रखकर इससे लोगों पर वह अपनी निरंकुशता स्थापित करता था।

इसलिए इस पद्धति को बदलने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता में आर्थिक न्याय और आर्थिक समानता की धारणा आर्थिक तत्व का मूल आधार बन गयी। इसलिए राज्य की उदारवादी आर्थिक स्वतंत्रता की धारणा व्यक्ति को स्वतंत्रतापूर्वक आर्थिक विकास करने पर विशेष बल देने लगी और इस आर्थिक स्वतंत्रता में संतुलन की वास्तविक सीमा स्वयं उभरना स्वाभाविक हुई और इसी धारणा ने राज्य के आर्थिक स्वतंत्रता को संतुलित रूप में पेश करने में महत्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त किया। इस कारण आर्थिक स्वतंत्रता का उपरोक्त तथ्य आर्थिक स्वतंत्रता विकास का मूल मंत्र बन गया लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता की अवधारणा केवल लोकतांत्रिक राज्यों से ही सम्बद्ध हुई न कि निरंकुश राज्य से सम्बद्ध हुई।

प्रश्न 10.
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के परस्पर सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए। (Explain the mutual relationship between economics and political liberties)
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है जीवन-यापन की सभी सुविधाओं या अवसरों की प्राप्ति होना। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर ही व्यक्ति अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का उचित रूप से प्रयोग कर सकता है। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है, अपने प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता का अर्थात् मतदान का अधिकार प्राप्त हो।

सार्वजनिक पद पाने का अधिकार हो तथा सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना राज्य के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले सकता। एक धनी व्यक्ति निर्धनों के मत खरीद कर सत्ता पर अपना अधिकार प्राप्त कर लेता है और तब वह गरीबों का शोषण करता है। वास्तव में राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता।

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प्रश्न 11.
राष्ट्रीय स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by national liberty?)
उत्तर:
राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty):
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है स्वराज्य। व्यक्ति की भाँति राष्ट्र को भी स्वतंत्र रहने का अधिकार है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के अन्तर्गत प्रत्येक राष्ट्र का यह अधिकार है कि वह स्वतंत्रतापूर्वक अपनी नीतियों का निर्धारण कर सके तथा उन्हें लागू कर सके। दास देशों द्वारा अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता की माँग करना राष्ट्रीय स्वतंत्रता है। 20 वीं शताब्दी में अफ्रीकी व एशिया के बहुत देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया तथा अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त की।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by Personal Liberty?)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ है कि मनुष्यों को व्यक्तिगत मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र होनी चाहिए। भोजन, वस्त्र, शादी तथा रहन-सहन आदि व्यक्ति के व्यक्तिगत मामले हैं। राज्य को चाहिए कि वह उन मामलों में हस्तक्षेप न करे। जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार, “उस सीमा तक व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वंतत्रता प्राप्त होनी चाहिए जहाँ तक कि उसके कार्यों से अन्य व्यक्तियों को हानि न पहुँचती हो।” मिल के अतिरिक्त बर्नार्ड रसेल तथा रूसो आदि राजनीतिक दार्शनिकों ने भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया है।

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प्रश्न 13.
किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपभोग के लिए आवश्यक दो दशाएँ बताइए। (Describe any two conditions which are essential for the individual to enjoy liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ है ‘प्रतिबंधों का अभाव’, परंतु सकारात्मक रूप में स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति पर उन प्रतिबंधों को हटाना जो अनैतिक और अन्यायपूर्ण हों। किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपभोग की दो आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. स्वतंत्रता समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से होनी चाहिए। समाज के एक वर्ग को स्वतंत्रता प्राप्त होने और दूसरे को प्राप्त न होने से स्वतंत्रता का उपभोग कठिन होता है।
  2. जिनके पास राजसत्ता है उनके द्वारा सत्ता का दुरुपयोग न हो। यदि किसी देश या समाज में ऐसा हो तो वहाँ के लोग स्वतंत्रता का उपभोग ठीक प्रकार से नहीं कर सकते।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क दीजिए। अथवा, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण का होना है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (Give arguments in favour of Positive Liberty) Or, (“Liberty does not mean absence of restraints but imposition of rational restraints. “Explain)
उत्तर:
गैटेल (Gatel) का कथन है कि स्वतंत्रता का केवल नकारात्मक रूप ही नहीं है वरन् सकारात्मक रूप भी है। उसके शब्दों में, “स्वतंत्रता वह सकारात्मक शक्ति है जिसके द्वारा उन कार्यों को करके आनंद प्राप्त किया जाता है जो करने योग्य हैं।”

(Liberty is the positive power of doing and enjoying those thing which are worthy of enjoyment and work-Gettel)
इस कथन से स्पष्ट है कि केवल बंधनों को दूर करने मात्र से ही सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। जिस प्रकार कुरूपता के अभाव को सौन्दर्य नहीं कह सकते, सौन्दर्य के लिए कुछ और अधिक भी चाहिए। उसी प्रकार स्वतंत्रता के लिए बंधनों के अभाव के अतिरिक्त भी किसी और वस्तु की आवश्यता है; जो वह है अवसर की उपस्थिति। इसीलिए मैकेन्जी (Machenjie) ने कहा है, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण का होना है।”

(Liberty does not mean absence of restraints but imposition of rational restraints)

सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क (Arguments in favour of positive liberty):

सकारात्मक स्वतंत्रता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं, स्वतंत्रता को वास्तविक बनाने के लिए उस पर उचित प्रतिबंध आवश्यक है।
  2. समाज और व्यक्ति के हितों में कोई विरोध नहीं है।
  3. स्वतंत्रता और राज्य के कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करते वरन् स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
  4. स्वतंत्रता का अर्थ उन सामाजिक परिस्थितियों का विद्यमान होना है जो व्यक्ति के विकास में सहायक हों।
  5. स्वतंत्रता अधिकारों के साथ जुड़ी हुई है। जितनी अधिक स्वतंत्रता होगी उतने अधिक अधिकार होंगे। अधिकारों के बिना व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।
  6. राजनीतिक व नागरिक स्वतंत्रता का मूल्य आर्थिक स्वतत्रंता के अभाव में निरर्थक है।
  7. राज्य का कार्य ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करना है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।
  8. वांछनीय व उचित कार्यों को करने की सुविधा होती है। यदि अवांछनीय एवं अनुचित कार्य करने की स्वतंत्रता हो तो स्वतंत्रता स्वेच्छाचारिता बन जाएगी।

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प्रश्न 2.
“स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? (“Liberty means absence of restraints.” Do you agree with this view?)
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ दो प्रकार से लिया जाता है। एक अर्थ ‘प्रतिबंधों का अभाव’ और दूसरे अर्थ में व्यक्ति के कार्यों पर उचित प्रतिबंध लगाना।

1. स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव है (Liberty is the absence of restraints):
कुछ विचारकों का मत है कि व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब उसके कार्यों से सभी प्रतिबंध हटा लिए जाएँ और उसे इच्छानुसार कार्य करने दिया जाए। जे. एस. मिल इस प्रकार की स्वतंत्रता के समर्थक थे। उनका कहना है कि “व्यक्ति अपना भला-बुरा स्वयं सोच सकता है और पूर्ण स्वतंत्रता मिलने पर वह अपना सर्वोत्तम विकास कर सकता है।

“यदि व्यक्ति के आचरण या कार्यों पर किसी प्रकार का भी प्रतिबंध है तो उसकी स्वतंत्रता वास्तविक नहीं हो सकती और ऐसी दशा में वह अपना सर्वोत्तम विकास नहीं कर सकता। इस प्रकार की विचारधारा को मानने वाले विद्वान नैतिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक सभी प्रकार के तर्कों के आधार पर इस बात पर जोर देते हैं कि व्यक्ति के कार्यों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

2. व्यक्ति के कार्यों पर उचित प्रतिबंध लगाना ही स्वतंत्रता है (Liberty is the imposition of rational restraints):
प्रतिबंधों के अभाव में समाज में जंगल जैसा वातावरण हो सकता है। शक्तिशाली निर्बलों को सताने लगते हैं, अव्यवस्था फैलने लगती है। अतः स्वतंत्रता सबको तभी मिल सकती हैं जबकि सभी व्यक्तियों के कार्यों और आचरण पर उचित प्रतिबंध हो। कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को हानि न पहुँचा सके। कानून द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। लॉक के अनुसार, “जहाँ कानून नहीं वहाँ स्वतंत्रता नहीं।” कानून द्वारा ही ऐसा वातावरण स्थापित किया जा सकता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार स्वतंत्रतापूर्वक कार्य कर सके; परंतु मनमानी नहीं करे।

स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति को करने योग्य कार्य करने की छूट और भोगने योग्य वस्तु को भोगने की स्वतंत्रता या शक्ति प्राप्त करना। परंतु मनमानी (निरंकुशता) करना नहीं। यह तभी हो सकता है जब प्रत्येक व्यक्ति पर उचित प्रतिबंध लगाए जाएँ, जिससे कि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप न करे। प्रतिबंधों के अभाव में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ होने लगती है। अतः यह सत्य है कि वास्तविक स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव नहीं वरन् अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों को लगाना है। तभी प्रत्येक व्यक्ति अपना सर्वोत्तम विकास कर सकता है।

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प्रश्न 3.
“राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक समानता के अभाव में निरर्थक है।” इस कथन पर टिप्पणी कीजिए। (“Political liberty is meaningless without economic equality.” Comment)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता प्रजातंत्र के दो स्तंभ माने जाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए लास्की और सामानला धजातंत्र कोके दो स्तंभम्बन्धबातो हैं या डोयों एक-दसुरे के प्रका (Laski) ने कहा है, “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक धोखा मात्र है, मिथ्या है, पाखण्ड है और कहने की ही बात है।” लोस्की के इस कथन की सत्यता जानने के लिए यह आवश्यक है कि हम पहले राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता का अर्थ समझें।

राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता का अभिप्राय है कि व्यक्ति देश के शासन में भाग ले सकता है। नागरिकों को मतदान का अधिकार होता है। प्रतिनिधि चुने जाने का अधिकार है। सार्वजनिक पद पाने का अधिकार है। सरकार की नीतियों की आलोचना का अधिकार है।

आर्थिक समानता (Economics Equality):
आर्थिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को अपनी आजीविका कमाने हेतु समान अवसर उपलब्ध हों। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन प्राप्त होने चाहिए। आर्थिक असमानता कम से कम होनी चाहिए। आर्थिक शोषण नहीं होना चाहिए तथा उत्पादन और वितरण के साधनों की ऐसी व्यवस्था हो जो सबके हित में हों।

राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता में संबंध (Relationship between Liberty and. Economic Equality)

1. निर्धन व्यक्ति के लिए मताधिकार अर्थहीन है (Right to vote is meaningless for a poor person):
राजनीतिक अधिकारों में वोट का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है परंतु एक निर्धन व्यक्ति के लिए, जिसे रोटी खाने को नहीं मिलती, रोटी का वोट के अधिकार से अधिक मूल्य है। राजनीतिक स्वतंत्रता के समर्थक यह भूल जाते हैं कि व्यक्ति के लिए वोट डालने और चुनाव लड़ने के अधिकार से अधिक आवश्यक रोटी, कपड़ा और मकान है।

2. निर्धन व्यक्ति द्वारा मत का सदुपयोग असंभव (Proper use of vote is impossible for a poor person):
मताधिकार न केवल अधिकार है वरन् परम कर्तव्य भी है। निर्धन व्यक्ति न तो शिक्षा प्राप्त कर सकता है, न ही देश की समस्याओं को समझ सकता है। अतः वह अपने मत का सदुपयोग भी नहीं कर सकता।

3. निर्धन व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना असंभव है (Contesting an Election is impossible for a poor man):
आजकल चुनाव लड़ने में लाखों रुपया खर्च होता है। निर्धन व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं कर सकता। चुनाव लड़ना तो दूर रहा, वह चुनाव लड़ने का स्वप्न भी नहीं देख सकता।

4. राजनीतिक दलों पर भी धनियों का ही नियंत्रण रहता है (Political parties are controlled by the rich):
राजनीतिक दल धनी व्यक्तियों के निर्देशन पर ही चलते हैं। निर्धन व्यक्ति का राजनीतिक दल पर भी कोई प्रभाव नहीं होता। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक समानता के अभाव में निरर्थक है।

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प्रश्न 4.
“कानून तथा स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (“Law and liberty are not antagonistic.” Comment, अथवा, कानून तथा स्वतंत्रता के परस्पर संबंधों का वर्णन कीजिए। (Discuss the mutual relationship between law and liberty)
उत्तर:
राजनीतिक विज्ञान के कुछ विचारकों का मत है कि कानून और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं। वे कहते हैं कि कानूनों द्वारा स्वतंत्रता पर अंकुश लगता है और स्वतंत्रता कम हो जाती है। राजनीतिक विज्ञान के कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि कानून स्वतंत्रता विरोधी नहीं है बल्कि कानून के द्वारा ही व्यक्ति को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

कानून स्वतंत्रता का विरोधी है (Law is opposed to Liberty):
इस विचार को मानने वालों का मत है कि राज्य जितने अधिक कानून बनाता है व्यक्ति की स्वतंत्रता उतनी ही कम हो जाती है। व्यक्तिवादियों व अराजकतावादियों का यही मत है।

1. व्यक्तिवादियों का मत (Views of Individualists):
18 वीं शताब्दी में व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दिया और यह कहा था कि राज्य के कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक प्रतिबंध हैं, इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग कम से कम करे अर्थात् उनके अनुसार वह सरकार सबसे अच्छी है जो कम से कम शासन करती है।

2. अराजकतावादियों का मत (Views of Anarchists):
अराजकतावादियों के अनुसार राज्य प्रभुसत्ता का प्रयोग करके नागरिकों की स्वतंत्रता को नष्ट करता है, अतः अराजकतावादियों ने राज्य को समाप्त करने पर जोर दिया ताकि राज्यविहीन समाज की स्थापना की जा सके।

कानून स्वतंत्रता का रक्षक है (Law protects the Liberty):
राजनीति विज्ञान के जो विचारक स्वतंत्रता का सकारात्मक अर्थ स्वीकार करते हैं और स्वतंत्रता पर उचित बंधनों को आवश्यक मानते हैं, वे कानून को स्वतंत्रता की पहली शर्त समझते हैं और सत्ता को आवश्यक मानते हैं। हॉब्स जो निरंकुशवादी माना जाता है, स्वीकार करता है कि कानून के अभाव में व्यक्ति हिंसक पशु बन जाता है।

अतः सत्ता व कानून का होना आवश्यक है, ताकि व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक जीवन बिता सके । लॉक (Locke) ने कहा कि “जहाँ कानून नहीं है वहाँ स्वतंत्रता नहीं है” रिची (Rithce) के शब्दों में, “कानून आत्म विकास के सुअवसर के रूप में स्वतंत्रता को संभव बनाते हैं और सत्ता के अभाव में इस प्रकार की स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती।”

आदर्शवादी विचारकों ने कानून व स्वतंत्रता में गहरा संबंध स्वीकार किया है और उनके अनुसार स्वतंत्रता न केवल कानून द्वारा सुरक्षित है अपितु कानून की देन है। हीगल के अनुसार, “राज्य में रहते हुए कानून के पालन में ही स्वतंत्रता निहित है।” हीगल ने राज्य को सामाजिक नैतिकता की साक्षात् मूर्ति कहा है और कानून चूँकि राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है, अत: नैतिक रूप से भी स्वतंत्रता कानून के पालन में ही निहित है। अन्त में निष्कर्ष कहा जा सकता है कि कानून स्वतंत्रता का विरोधी नहीं वरन् कानून के पालन से ही स्वतंत्रता संभव है। यदि कानून समाज के प्रबल व्यक्तियों पर अंकुश लगाए तो समाज के बहुत से व्यक्तियों को किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।’

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं? व्याख्या कीजिए। (What are the different kinds of liberty? Explain)
उत्तर:
स्वतंत्रता के प्रकार (Kinds of Liberty):

1. प्राकृतिक स्वतंत्रता (Natural Liberty):
प्राकृतिक स्वतंत्रता वह स्वतंत्रता है जिसका मनुष्य राज्य की स्थापना से पहले प्रयोग करता था। रूसो (Rousseau) के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र पैदा होता है, परंतु समाज में आकर वह बंधन में बंध जाता है। प्रकृति की ओर से व्यक्ति पर किसी प्रकार के बंधन नहीं होते परंतु अधिकतर राजनीति शास्त्री इस मत से सहमत नहीं हैं। हरबर्ट स्पेन्सर कहता है, “स्वतंत्रता का अर्थ उस व्यवस्था से है जिसमें प्रत्येक मनुष्य को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता रहे, यदि वह दूसरों की उतनी ही स्वतंत्रता का उल्लंघन न कर रहा हो।”

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty):
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ है कि मनुष्यों को व्यक्तिगत मामलों में पूरी तरह से स्वतंत्रता होना चाहिए। भोजन, वस्त्र, शादी-विवाह, रहन-सहन आदि मामलों में राज्य को दखल नहीं देना चाहिए।

3. राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता ऐसी स्वतंत्रता को कहते हैं जिसके अनुसार किसी देश के नागरिक अपने देश की सरकार में भाग लेने का अधिकार रखते हैं। नागरिकों को मताधिकार, चुनाव में खड़े होने का अधिकार, आवेदन देने का अधिकार तथा सरकारी नौकरी पाने का अधिकार रंग, जाति व धर्म आदि के भेदभाव के बिना सबको प्रदान किए जाते हैं।

4. आर्थिक स्वतंत्रता (Economics Liberty):
आर्थिक स्वतंत्रता से अभिप्राय ऐसी स्वतंत्रता से है जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रुचि व योग्यतानुसार व्यवसाय करने की स्वतंत्रता हो, देश में उद्योग-धंधों को सुचारू रूप से चलाने की स्वतंत्रता हो और उनको सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था बनायी जाए। धन का उत्पादन व वितरण ठीक ढंग से हो व बेरोजगारी न हो।

5. धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Liberty):
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है-प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता हो। राज्य का कोई विशेष धर्म नहीं होता। विभिन्न धर्म के मानने वालों में कोई भेद नहीं किया जाता। इसी भावना के अनुसार भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है।

6. राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty):
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है कि राष्ट्र को विदेशी नियंत्रण से स्वतंत्रता प्राप्त होती है। एक स्वतंत्र राष्ट्र ही अपने नागरिकों को अधिकार तथा स्वतंत्रता प्रदान कर सकता है जिससे नागरिक अपना सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विकास कर सकें।

7. नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
व्यक्ति पूर्ण रूप से तभी स्वतंत्र हो सकता है जबकि वह नैतिक रूप से भी स्वतंत्र हो। नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि तथा विवेक के अनुसार निर्णय ले सके। हीगल तथा ग्रीन ने नैतिक स्वतंत्रता पर बल दिया है। उनके अनुसार राज्य ऐसी परिस्थितियों की स्थापना करता है, जिससे मनुष्य नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है।

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प्रश्न 6.
स्वतंत्रता की परिभाषा दें। इसके नकारात्मक एवं सकारात्मक पहलुओं के अंतर की व्याख्या कीजिए। (Define liberty Discuss the difference between negative and positive aspects of liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता शब्द जिसे अंग्रेजी में Liberty कहते हैं, लैटिन भाषा के शब्द लिबर (Liber) से लिया गया है। जिसका अर्थ है किसी प्रकार के बंधनों का न होना। इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ है – व्यक्ति के ऊपर किसी प्रकार का बंधन न होना जिससे कि वह अपनी इच्छानुसार कार्य कर सके, परंतु यह उचित नहीं है कि यदि एक जेबकतरे को जेब काटने की पूर्ण स्वतंत्रता दे दी जाए या एक डाकू को नागरिकों को लूटने के लिए स्वतंत्रता दे दी जाए तो समाज में कुव्यवस्था फैल जाएगी। वास्तव में स्वतंत्रता का वास्तविक एंव औचित्यपूर्ण अर्थ यह है कि व्यक्ति को उस सीमा तक कार्य करने की स्वतंत्रता हो जिससे अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अतिक्रमण न हो, इसके साथ ही सभी व्यक्तियों को विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

गैटेल (Géttel) का कथन है कि “स्वतंत्रता वह सकारात्मक शक्ति है जिसके द्वारा उन कार्यों को करके आनंद प्राप्त किया जाता है, जो करने योग्य है।” (“’Liberty is the positive power of doing and enjoining those things which are worthy of enjoyment and work.”)। स्वतंत्रता के नकारात्मक तथा सकारात्मक पहलुओं में अंतर (Difference between Negative and positive aspects of Liberty)
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प्रश्न 7.
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। (Discuss the relations between Economic Liberty and Political Liberty)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता तथा आर्थिक स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक कि उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है नागरिकों को राज्य के कार्यों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होना। राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग है कि नागरिक शासन कार्यों में सहयोग करें तथा सहभागी बनें तथा राजनीतिक गतिविधियों में अपना योगदान दें। परंतु राजनीतिक स्वतंत्रता उस समय तक अर्थहीन है जब तक कि नागरिक को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिलती।

कोई भी नागरिक आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना राज्य की राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता। वह अपने मत का प्रयोग भी उचित प्रकार से नहीं कर सकता। लालच में पड़कर भूखा व्यक्ति अपना मत बेच सकता है और इस प्रकार स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। धनी व्यक्ति लालच देकर निर्धन व्यक्तियों के मत अपने पक्ष में प्राप्त करके सत्ता पर अधिकार कर लेते हैं और फिर प्रजा का शोषण करते रहते हैं। धीरे-धीरे क्रांति की सम्भावना बढ़ने लगती है।

1917 ई. में रूस की क्रांति इन्हीं कारणों से हुई थी। आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है-व्यक्ति की बेरोजगारी तथा भूख से मुक्ति। प्रो. लास्की ने आर्थिक स्वतंत्रता की परिभाषा देते हुए कहा है “आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति को अपनी जीविका कमाने के लिए समुचित सुरक्षा तथा सुविधा प्राप्त हो।” आर्थिक स्वतंत्रता कसी भी स्वतंत्र समाज का मूल आधार है। आर्थिक स्वतंत्रता में यह बात भी निहित है कि जहाँ व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी कमा सके, वहाँ वह अपने बच्चों को भी साक्षर बना सके जिससे कि वे राष्ट्र के प्रति अपने नागरिक कर्तव्यों की पूर्ति कर सकें।

आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर ही व्यक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता का उपयोग कर सकता है। जो व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए दूसरों की दया पर निर्भर है वह कभी भी नागरिकता के कर्तव्यों को पूरा नहीं कर सकता। आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में व्यक्ति समाज में अपना श्रेष्ठ योगदान नहीं कर सकता।

राज्य में भले ही किसी भी प्रकार की व्यवस्था हो किसान व मजदूर को आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। देश में बेरोजगारी नहीं होनी चाहिए। संसार में आर्थिक दृष्टि से विकसित राज्यों में जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था अपनायी गयी है, नागरिकों को आर्थिक स्वतंत्रता देने का प्रयत्न किया गया है। ऐसी राज्यों में मजदूर संगठित हैं और वे राष्ट्र की राजनीति में सक्रिय भाग लेते हैं। स्पष्ट है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

प्रश्न 8.
स्वतंत्रता का अर्थ समझाइए। क्या आप स्वतंत्रता और समानता को पूरक मानते हैं? (Explain the meaning of the term Liberty Do you think that Liberty and Equality are complementary?)
उत्तर:
स्वतंत्रता को अंग्रेजी में ‘बिलर्टी’ कहा जाता है। यह लैटिन भाषा के ‘लिबर’ शब्द से बना है। इसका अर्थ है बंधनों का न होना। परंतु स्वतंत्रता का यह अर्थ पूर्णतः उचित नहीं है। गाँधीजी के अनुसार, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु व्यक्तित्व के विकास की अवस्थाओं की प्राप्ति है।” लास्की का कथन है कि “अधिकारों के अभाव में स्वतंत्रता का होना असंभव है, क्योंकि अधिकारों से रहित जनता कानून का पालन करती हुई भी अपने व्यक्तित्व की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती।”

स्वतंत्रता और समानता (Liberty and Equality):
स्वतंत्रता और समानता में गहरा संबंध है। जब तक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती तब तक समानता भी स्थापित नहीं हो सकती। भारत जब पराधीन था तो शासक वर्ग के लोग अपने आपको भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे परंतु 15 अगस्त, 1947 ई. में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया। भारत का अपना संविधान बना और राजनीतिक तथा सामाजिक समानता की स्थापना की गई।

प्रत्येक वयस्क को जाति, नस्ल, रंग, धर्म, लिंग आदि के भेदभाव के बिना वोट का अधिकार दिया गया। छुआछूत समाप्त कर दी गई। आर. एच. टोनी ने सत्य ही कहा है कि “समानता स्वतंत्रता की विरोधी न होकर इसके लिए आवश्यक है।” वास्तव में स्वतंत्रता और समानता इकट्ठी चलती हैं। एक के बिना दूसरी निरर्थक है। प्रो. पोलार्ड के अनुसार-“स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक समाधान है और वह है समानता।”

स्वतंत्रता और समानता का सम्बन्ध जन्म से है। जब निरंकुशता और समानता के विरुद्ध मानव ने आवाज उठायी और क्रांतियाँ हुई तो स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों का जन्म हुआ। स्वतंत्रता और समानता दोनों का एक ही उद्देश्य है और वह है व्यक्ति के विकास के लिए सुविधाएँ प्रदान करना। अतः एक के बिना दूसरे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के बिना समानता असंभव है और समानता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है। निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक भूख से मरते हुए व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का क्या लाभ है ? वह स्वतंत्रता को न खा सकता है और न पी सकता है। यह कथन किसका है –
(क) हाब्स
(ख) लास्की
(ग) मिल
(घ) आर्शिवादम
उत्तर:
(क) हाब्स

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प्रश्न 2.
जहाँ कानून नहीं है वहाँ स्वतंत्रता नहीं है। यह किसने कहा था?
(क) ग्रीन
(ख) लॉक
(ग) हाब्स
(घ) मेकाइवर
उत्तर:
(ख) लॉक

प्रश्न 3.
लांग वाक टू फ्रीडम (स्वतंत्रता के लिए लंबी यात्रा)’ किसकी आत्म कथा है?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) दलाई लामा
(ग) नेल्सन मंडेला
(घ) मार्टिन लूथर किंग
उत्तर:
(ग) नेल्सन मंडेला

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन सकारात्मक स्वतंत्रता का पक्षधर था?
(क) मार्क्स
(ख) ग्रीन
(ग) बेंथम
(घ) जे. एस. मिल
उत्तर:
(ख) ग्रीन

प्रश्न 5.
‘स्वतंत्रता एवं समानता’ को किसने पूरक माना है?
(क) रूसो ने
(ख) लास्की ने
(ग) मेकाइवर ने
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) लास्की ने

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प्रश्न 6.
‘आर्थिक न्याय’ से क्या आशय है?
(क) वर्गीय आय का अंतराल कम करना
(ख) सभी की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति
(ग) उपरोक्त दोनों ही
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) उपरोक्त दोनों ही

प्रश्न 7.
टी. एच. ग्रीन किस प्रकार की स्वतंत्रता के पोषक हैं?
(क) नकारात्मक
(ख) सकारात्मक
(ग) आर्थिक
(घ) राजनीतिक
उत्तर:
(ख) सकारात्मक

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प्रश्न 8.
नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है?
(क) अराजकता
(ख) बंधनों का अभाव
(ग) लोगों के बीच भेदभाव
(घ) स्वच्छन्दता
उत्तर:
(ख) बंधनों का अभाव

प्रश्न 9.
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक विचारक हैं:
(क) रूसो
(ख) ग्रीन
(ग) हीगल
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा (भोला पासवान शास्त्री)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा (भोला पासवान शास्त्री)

मेरी वियतनाम यात्रा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
हो-ची-मीन्ह की तस्वीर अंतःसलिला फल्गू नदी की तरह लेखक के हृदय को . सींचती रही। लेखक हो-ची-मीन्ह से इतना प्रभावित क्यों है?
उत्तर-
लेखक श्री भोला पासवान शास्त्री ने जब हिन्दी के मासिक पत्रिका में पेंसिल स्केच से बनी हो-ची-मीन्ह की तस्वीर देखी, तो देखते ही रह गये। दुबली-पतली काया सादगी का नमूना प्रदर्शित कर रही थी। व्यक्तित्व बड़ा ही प्रेरक, ओजस्वी, तेजस्वी एवं जादुई प्रभाव से युक्त। चेहरे पर लहसुननुमा दाढ़ी बड़ी फब रही थी। बाह्य आकृति से आंतरिक प्रतिकृति परिलक्षित हो रही थी। उसे देखकर लेखक अभिभूत ही नहीं वशीभूत भी हो गये।

बहुत देर तक उस तस्वीर को देखते रह गये। उस तस्वीर का जादुई प्रभाव लेखक के मानस-पटल पर हमेशा अंकित रहा और उनके हृदय-प्रदेश को अंत:सलिला फल्गू नदी की भाँति सींचती रही। अभिप्राय यह कि लेखक के मन को उस महामानव की तस्वीर हमेशा प्रेरित-अनुप्राणित करती रहती है।

प्रश्न 2.
‘अंतर्राष्ट्रीयता पनप नहीं सकती, जब तक राष्ट्रीयता का पूर्ण विकास न हो।’ इस कथन पर विचार करें और अपना मत दें।
उत्तर-
हमारी पाठ्य-पुस्तक दिगंत भाग-I में संकलित ‘मेरी वियतनाम यात्रा’ शीर्षक पाठ में लेखक भोला पासवान शास्त्री ने वियतनाम के महान नेता हो-ची-मीन्ह के प्रति बड़े सम्मान और श्रद्धा का भाव प्रदर्शित किया है। उन्होंने उनके महान व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें न केवल एक अप्रतिम देशभक्त कहा है, अपितु विश्वद्रष्टा भी बताया है।

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इस संदर्भ में ही लेखक ने अपना यह सारगर्भित और सत्यपूर्ण विचार व्यक्त किया है कि जब तक राष्ट्रीयता का पूर्ण विकास न हो, तब तक अंतर्राष्ट्रीयता भी नहीं पनप सकती। लेखक का यह अभिमत अनुभव सिद्ध व्यावहारिक एवं युक्ति-युक्त है। अंतर्राष्ट्रीयता यह भी वस्तुतः राष्ट्रीयता की भावना का ही परिधि-विस्तार है। अतः जब तक हमारे अंदर राष्ट्रीयता की भावना बलवती न होगी, हम अंतर्राष्ट्रीयता की भावना को भी आत्मसात न कर सकेंगे।

यद्यपि कुछ लोगों के अनुसार राष्ट्रीयता अंतर्राष्ट्रीयता की बाधिका है, पर हमें ऐसा एकदम नहीं लगता। वास्तव में जो व्यक्ति अपने राष्ट्र को अपना नहीं समझ सकता, वह व्यापक विश्व समाज को अपना कदापि नहीं समझ सकता। अतः हम लेखक की उपर्युक्त कथन से पूरी तरह सहमत हैं।

प्रश्न 3.
हो-ची-मीन्ह केवल वितयनाम के नेता बनकर नहीं रहे। वे विश्वद्रष्टा और विश्वविश्रुत हुए। पाठ के आधार पर उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
हो-ची-मीन्ह को यदि वितयनाम का गाँधी कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति न होगी। हो-ची-मीन्ह एक महान् वियतनामी नेता थे। उन्होंने विदेशी साम्राज्यवाद के शिकंजे में जकड़े वितयनाम को मुक्त कराने में अमूल्य योगदान किया, वितयनाम की जनता को गुलामी से छुटकारा दिला कर निरंतर उन्नति की दिशा में अग्रसर होने के लिए मार्गदर्शन किया। उन्होंने एक प्रकाश से संपूर्ण विश्व को क्रांति, त्याग और बलिदान का पाठ पढ़ाया। फलतः उनकी लोकप्रियता वियतनाम तक ही सीमित न रहकर विश्व भर में फैली और वे विश्वविख्यात हुए।

वस्तुतः हो-ची-मीन्ह एक महापुरुष थे, महामानव। उनके व्यक्तित्व में अनेक उच्च मानवीय गुणों का वास था। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। वे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे तथा ‘अपना काम स्वयं करो’ की नीति पर चलते थे। अपने कठिन एवं अनथक संघर्षों के परिणामस्वरूप जब वे स्वतंत्र वियतनाम के राष्ट्रपति बने, तब भी शाही महल को छोड़ एक साधारण मकान में जीवन-स्तर किये। वे अपनी जरूरत के चीजें स्वयं टाइप कर लेते थे तथा कम-से-कम साधनों से अपना जीवन-निर्वाह करते थे। व्यक्तित्व के ये सभी गुण सचमुच सबके लिए आदर्श और अनुकरणीय हैं।

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प्रश्न 4.
‘जिन्दगी का हर कदम मंजिल है। इस मंजिल तक पहुँचने से पहले साँस रुक सकती है।’ इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
हमारी पाठ्य-पुस्तक के दिगंत भाग-1 में संकलित ‘मेरी वियतनाम यात्रा’ शीर्षक यात्रावृत्तांत के लेखक भोला पासवान शास्त्री ने वियतनाम यात्रा के आरंभ की अपनी मन:स्थिति के संदर्भ में विवेच्य कथन कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि जिन्दगी का हर कदम अपने-आप में एक मंजिल के समान है। मंजिल पर पहुँचने के पश्चात् व्यक्ति क्षण भर विश्राम करता है। परंतु किस कदम पर व्यक्ति के जीवन में विराम लग जाए, नहीं कहा जा सकता। अर्थात् जीवन कब, कहां और कैसे रुक जाएगा-यह सर्वथा अज्ञात रहता है। अतः लेखक को व्यक्ति का हर कदम एक मंजिल जैसा प्रतीत होता है।।

प्रश्न 5.
वियतनामी भाषा में ‘हांग खोंग’ और ‘हुअ सेन’ का क्या आदर्श है?
उत्तर-
वियतनामी भाषा हांग खोंग में ‘हांग’ का अर्थ मार्ग और ‘खोंग’ का अर्थ हवा होता है। इस प्रकार हांग खोंग का अर्थ हुआ-हवाई मार्ग।

हुआ सेन-वितयनामाी भाषा में ‘हुअ सेन’ का अर्थ है-कमल का फूल।

प्रश्न 6.
लेखक को ऐसा क्यों लगता है कि मैकांग नदी के साथ उसका पहरा भावनात्मक संबंध है?
उत्तर-
हमारी पाठ्य-पुस्तक के विंगत भाग-1 में संकलित ‘मेरी वियतनाम यात्रा’ के लेखक भोला पासवान शास्त्री जब बैंकाक, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से वितयनाम की राजधानी हानोई विमान द्वारा जा रहे थे, तो रास्ते में उन्हें अचानक एक बड़ी नदी दिखाई पड़ी। तत्पश्चात् पार्थ सारथी से उन्हें यह मालूम हुआ कि मैकांग नदी है। यह सुनकर लेखक उस नदी के प्रति भाव-विभोर हो गये। उन्हें लगने लगा कि उसके साथ उनका बहुत पुराना नाता-रिश्ता है। ऐसा इसलिए अनुभूल हुआ, क्योंकि लेखक उस नदी का नाम पहले से सुन चुके थे।

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अमेरिका बनाम वियतनाम के युद्ध में उस नदी का जिक्र दुनिया भर के समाचार पत्रों में हो चुका था। इस प्रकार, उसका साक्षात् दर्शन कर लेखक उसके साथ गहरे भावनात्मक स्तर पर जुड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त एक यह भी विचित्र संयोग है कि उस नदी को वहाँ के लोग ‘महागंगा’ के नाम से जानते-पहचानते हैं। गंगा अपने देश की पवित्रतम नदी है। इन्हीं सब बातों के कारण लेखक मैकांग नदी के साथ अपना प्रगाढ़ भावनात्मक संबंध महसूस करता है।

प्रश्न 7.
हानोई साइकिलों का शहर है। हम इस बात से क्या सीख सकते हैं?
उत्तर-
हानोई वियतनाम जैसे देश की राजधानी है। उसकी अन्य अनेक विशेषताओं में एक प्रमुख विशेषता है साइकिल की सवारी। वहाँ के सभी लोग साइकिलों पर ही सवार होकर यत्र-तत्र-सर्वत्र आते-जाते, घूमते-फिरते हैं। वहाँ ट्रक, बस और मोटरगाड़ियों का राष्ट्रीयकरण हो चुका है, अतएव कोई इन चीजों को निजी संपत्ति के तौर पर नहीं रख सकता। इस प्रकार हानोई साइकिलों का शहर है। इससे हमें यह सीख लेनी चाहिए कि हमें भी अपनी सवारी के लिए प्रदूषण फैलाने वाली मोटरगाड़ियों को छोड़कर साइकिल का ही अधिक-से-अधिक प्रयोग करना चाहिए।

इससे हमारा स्वास्थ्य भी बनेगा, बचत भी होगी और प्रदूषण भी नहीं होगा।

प्रश्न 8.
लेखक ने हो-ची-मीन्ह के घर का वर्णन किस प्रकार किया है? इससे हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर-
लेखक भोला पासवान शास्त्री ने विश्वद्रष्टा एवं विश्वविश्रुत नेता हो-ची-मीन्ह के घर का वर्णन बड़ी अंतरंगता के साथ किया है। उन्होंने आत्मीयतापूर्वक वर्णन-क्रम में बताया है कि वह साधारण-सा छोटा मकान है। उसमें कुल दो कमरे हैं और चारों ओर बरामदें हैं। एक कमरे में उनकी खाट रखी है, जिस पर वे सोते थे। खाट पर बिछावन और ओढ़ने के कपड़े भी समेट कर रखे हुए हैं। एक तकिया और एक छड़ी भी है। ऐसी ही छोटी-मोटी कुछ और चीजें भी रखी हैं। दूसरे कमरे में उन्हीं द्वारा रचित कुछ पुस्तकें हैं। बरामदे में लकड़ी की बनी बेंच रखी हुई थी, जिस पर मुलाकाती लोग आकर बैठते थे।

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इस प्रकार, उस महान् नेता का मकान सब तरह से साधारण था। इससे यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी अपना जीवन सादगीपूर्ण ढंग से बिताना चाहिए। हमें कम-से-कम साधनों से अपना काम चलाना चाहिए तथा व्यर्थ के ताम-झाम या तड़क-भड़क में नहीं पड़ना चाहिए। इसी में हमारी भलाई और महत्ता निहित होती है।

मेरी वियतनाम यात्रा भाषा की बात।

प्रश्न 1.
लेखक ने हो-ची-मीन्ह के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है? पाठ से उन विशेषणों को चुनें।
उत्तर-
‘मेरी वियतनाम यात्रा’ शीर्षक पाठ में लेखक ने हो-ची-मीन्ह के लिए निम्नलिखित विशेषणों का प्रयोग किया है-महामानव, मसीहा, प्रेरणाप्रद, चमत्कारी, तेजस्वी, सव्यसाची, महापुरुष, विश्वद्रष्टा, विश्वविश्रुत, सर्वप्रिय नेता इत्यादि।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग द्वारा लिंग-निर्णय करें:
उत्तर-

  • नीधि (पुलिंग)-यह मेरी एकमात्र निधि है।
  • स्केच (पुलिंग)-उग्रवादियों का स्केच जारी किया गया।
  • प्रण (स्त्रीलिंग)-उसके प्राण निकल गये।
  • सुधि (पुलिंग)-उसने मेरी सुधि न ली।
  • तस्वीर (स्त्रीलिंग)–यह तस्वीर पुरानी है।
  • विभूति (स्त्रीलिंग)-यह दुर्लभ विभूति कहाँ थी?
  • संपत्ति (स्त्रीलिंग)-यह किसकी संपत्ति है?
  • संरक्षण (स्त्रीलिंग)-हमें राष्ट्रीय धरोहरों का संरक्षण करना चाहिए।
  • दाढ़ी (स्त्रीलिंग)-उनकी दाढ़ी पक गई।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के प्रत्यय निर्दिष्ट करें:
उत्तर-
Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा 1

प्रश्न 4.
इन शब्दों के उपसर्ग निर्दिष्ट करें:
उत्तर-
Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा 2

प्रश्न 5.
अर्थ की दृष्टि से निम्नलिखित वाक्यों की प्रकृति बताएँ:
उत्तर-
(क) दिन बीतते गए। – विधानवाचक वाक्य।।
(ख) हो सकता है दो-चार वर्ष और पहले ही हो। – संदेहवाचक वाक्य।
(ग) इसमें संदेह नहीं कि उनका जीवन कभी नहीं सूखने वाले प्ररेणा-स्रोत के समान बना रहेगा। – विधानवाचक वाक्य।
(घ) वे कौन हैं, कहाँ के हैं और क्या हैं, जानने की सुधि भी नहीं रही। – उद्गारवाचक वाक्य।

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प्रश्न 6.
पाठक से प्रत्येक कारक के कुछ उदाहरण चुनकर लिखें।
उत्तर-
[ज्ञातव्य-संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका संबंध सूचित होता है, उसके कारक कहते हैं। हिंदी में कारक के आठ भेद माने जाते हैं- कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण और संबोधन कारक।]

प्रस्तुत पाठ में प्रयुक्त कारकों के उदाहरण निम्नवत हैं :

  • कर्ता कारक-मित्रों ने ‘यात्रा शुभ हो’ कहकर विदा किया।
  • कर्मकारक-बिछावन पर आज का ‘बैंकाक पोस्ट’ रखा था।
  • करण कारक-हमलोग एयर इंडिया के विमान से वियतनाम के लिए रवाना हुए।
  • संप्रदान कारक-अधिकांश यात्री पहले ही एयरपोर्ट से शहर के लिए प्रस्थान कर चुके थे।
  • अपादान कारक-जब बिहार से दिल्ली आया तो सबसे पहले मुझे मॉरीशस जाने का मौका मिला।
  • संबंध कारक-हमलोगों की घड़ी में डेढ़ बज रहे थे।
  • अधिकरण कारक-हम एयर इंडिया के बोइंग विमान 707 में आ गए।
  • संबोधन कारक-यात्रा शुभ हो, भारत और वियतनाम की मित्रता दृढ़ हो।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

मेरी वियतनाम यात्रा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
होचीमीन्ह कौन थे? वियतनाम में उनके योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
होचीमीन्ह वियतनाम के महान नेता और राजनीतिज्ञ थे। वियतनाम की राजनीति में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। आज से लगभग 90 वर्ष पहले जब वियतनाम विदेशी साम्राज्यवाद के शिकंजे में जकड़ा हुआ था तं. इस महान राजनेता ने उनसे वियतनाम के लोगों को स्वतंत्र कराया। उन्होंने वियतनाम की जनता को गुलामी से मुक्ति दिलाकर देश की उन्नति कराने में मार्ग-दर्शन किया। वियतनाम की आजादी और उसकी प्रगति में होचीमीन्ह ने प्रमुख भूमिका निभाया। इसीलिए वियतनाम में लोग इन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं।

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प्रश्न 2.
लेखक भोला पासवान शास्त्री का बिहार में कैसा स्थान है?
उत्तर-
भोला पासवान शास्त्री का बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। ये बिहार के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, प्रबुद्ध पत्रकार और राजनेता थे। वे सिद्धांतों और मूल्यों की राजनीति करने वाले राजनेता थे। बिहार के प्रबुद्ध नागरिकों, राजनीतिकर्मियों और बुजुर्ग पत्रकारों के बीच अपनी सादगी, लोकनिष्ठा, देशभक्ति, पारदर्शी ईमानदारी और विचारशीलता के लिए वे बहुत महान राजनेता माने जाते हैं। बिहार की राजनीति में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मेरी वियतनाम यात्रा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेरी वियतनाम यात्रा नामक पाठ की रचना किस लेखक ने की है:
उत्तर-
मेरी वियतनाम यात्रा नामक पाठ की रचना भोला पासवान शास्त्री ने की है। .

प्रश्न 2.
भोला पासवान शास्त्री कौन थे?
उत्तर-
भोला पासवान शास्त्री बिहार के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, प्रबुद्ध पत्रकार एवं राजनेता थे।

प्रश्न 3.
मेरी वियतनाम यात्रा किस प्रकार की रचना है?
उत्तर-
मेरो वियतनाम यात्रा एक संस्मरण है।

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प्रश्न 4.
भोला पासवान शास्त्री कितनी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने?
उत्तर-
भोला पासवान शास्त्री मार्च 1968 से जनवरी 1972 तक की अवधि में तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।

प्रश्न 5.
होचीमीन्ह कौन थे?
उत्तर-
होचीमीन्ह वियतनाम के एक प्रमुख राजनेता थे।

प्रश्न 6.
होचीमीन्ह का क्या योगदान था?
उत्तर-
होचीमीन्ह ने वियतनाम को विदेशी साम्राज्यवाद के शिकंजे से मुक्ति दिलायी। उन्होंने वियतनाम की जनता को गुलामी से मुक्ति दिला कर विकास की दिशा के आगे बढ़ने के लिए मार्ग-दर्शन किया।

मेरी वियतनाम यात्रा वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग, या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘मेरी वियतनाम यात्रा’ के लेखक कौन हैं?
(क) राम विलास पासवान
(ख) भोला पासवान शास्त्री
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 2.
‘मेरी वियतनाम यात्रा’ क्या है?
(क) संस्मरण
(ख) निबंध
(ग) यात्रावृत्तांत
(घ) रेखा चित्र
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
हो-ची-मीन्ह कहाँ के नेता थे?
(क) वियतनाम
(ख) चीन
(ग) जापान
(घ) मलेशिया
उत्तर-
(क)

प्रश्न 4.
हुअ-सेन का क्या अर्थ है?
(क) नदी
(ख) कमल का फूल
(ग) झरना
(घ) समुद्र
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 5.
‘मेरी वियतनाम यात्रा’ का प्रकाशन कब हुआ?
(क) 1973 ई० में
(ख) 1983 ई० में.
(ग) 1993 ई० में
(घ) 1995 ई० में
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
अन्तर्राष्ट्रीय पनप नहीं सकती जब तक…………..का पूर्ण विकास न हो।
उत्तर-
राष्ट्रीयता

प्रश्न 2.
मित्रों ने……………….कहकर विदा किया।
उत्तर-
‘यात्र शुभ हो’

प्रश्न 3.
वियतनामी भाषा में ‘हाँग का अर्थ……..और खोंग का अर्थ……..होता है।
उत्तर-
मार्ग, हवा

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प्रश्न 4.
अब भी वह एक युग का……………करता दीखता है।
उत्तर-
प्रतिनिधित्व

प्रश्न 5.
श्री हो-ची-मीन्ह…………..के सर्वप्रिय नेता रहे।
उत्तर-
वियतनाम

मेरी वियतनाम यात्रा भोला पासवान शास्त्री (1914-1984)

एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, प्रबुद्ध पत्रकार एवं लोकप्रिय राजनेता भोला पासवान शास्त्री का जन्म सन् 1914 ई० में बिहार राज्य के पूर्णिया जिलान्तर्गत ‘बैरगाछी’ नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री धूसर पासवान था। भोला पासवान शास्त्री की शिक्षा बिहार विद्यापीठ, पटना एवं तदनंतर काशी विद्यापीठ, वाराणसी से हुई। बिहार के एक पिछड़े हुए सुदूर अंचल के वंचित वर्ग का होते हुए भी शास्त्रीजी अपने नैतिक योग्यता, बौद्धिक क्षमता और व्यक्तिगत गुणों के बल पर देश के राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन में काफी आगे बढ़े और अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया।

शास्त्रीजी में बचपन से ही देशभक्ति, समाज-सेवा, ईमानदारी, सच्चरित्रता, विचारशीलता जैसी उदान्त भावनाएँ कूट-कूट कर भरी हुई थीं। वे छात्र-जीवन से ही स्वाधीनता आंदोलन और राजनीति में सक्रिय रहे। 1942 ई० के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें 21 माह का कठोर कारावास का दंड मिला। अपनी कर्मठता एवं जन-सेवा के बल पर वे 1946 ई० में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सदस्य बने।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा (भोला पासवान शास्त्री)

जनता में पर्याप्त प्रसिद्ध शास्त्रीजी 1952 ई० के पहले आम चुनाव में धमदाहा-कोढ़ा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गये और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल हुए। इसी प्रकार, 1957, 1962 एवं 1967 के आम चुनावों में वे विधायक चुने जाते रहे और मार्च, 1968 से जनवरी, 1972 तक की अवधि में तीन बार बिहार क मुख्यमंत्री चुने गये और फरवरी, 1973 के केन्द्र सरकार के मंत्री बने और 1982 ई० तक संसद सदस्य के रूप में राष्ट्र एवं समाज की सेवा करते रहे। उनका निधन 10 सितंबर, 1984 ई० को हुआ।

शास्त्रीजी सच्चे अर्थों में बिहार के एक श्रेष्ठ राजनेता एवं समाजसेवी थे। वे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के कायल थे। राजनीतिक हलकों में उन्हें आज भी बड़े आदर और सम्मान के साथ याद किया जाता है। वे सिद्धांतों और मूल्यों की राजनीतिक करने वाले तपे-तपाए नेता थे, स्वार्थसिद्धि हेतु गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले अवसरवादी नेता नहीं। उनकी सादगी, लोकनिष्ठा, देशभक्ति, सेवापरायणता आदि की आज भी दाद दी जाती है। कोई भी प्रलोभन उन्हें कर्तव्यपथ से विचलित नहीं कर सकता था।

उनकी दृष्टि से सभी देशवासी समान थे। उनके लिए जाति अथवा वर्ग-विशेष प्रधान न था, बल्कि वे संपूर्ण समाज एवं उनकी मुख्य धारा को साथ ले चलने वाले थे। भारतीय परंपरा के प्रति उनके मन में गहरा अनुराग था तथा वे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की भी गहरी समझ रखते थे। उनका आदर्श सामाजिक समानता और सद्भाव के स्वप्न को साकार करना था। इसके लिए जीवन भर सजग एवं सचेष्ट रहे। विशेषकर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए किया गया उनका संघर्ष सदैव स्मरणीय रहेगा।

शास्त्रीजी अपने जीवन में न केवल राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहे, अपितु रचनात्मक सृजन में भी संलग्न रहें। उन्होंने पूर्णिया से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक पत्रिका ‘राष्ट्र-संदेश’ का संपादन किया था तथा पटना के दैनिक ‘राष्ट्रवाणी’ एवं कोलकाता के दैनिक पत्र ‘लोकमान्य’ के संपादक-मंडल में भी सदस्य के रूप में रहे। उनकी प्रमुख कृति ‘वियतनाम की यात्रा’ 1983 ई० में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। उनके अन्य लेख, टिप्पणियाँ अब तक अप्रकाशित रूप में यत्र-तत्र बिखरे हैं, जिन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 मेरी वियतनाम यात्रा (भोला पासवान शास्त्री)

मेरी वियतनाम यात्रा पाठ का सारांश

हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मेरी वियतनाम यात्रा’ शीर्षक यात्रावृत्त के लेखक बिहार के एक प्रमुख राजनेता स्व० भोला पासवान शास्त्री हैं। यह पाठ उनकी पुस्तक ‘वियतनाम की यात्रा’ का एक अंश है, जिसमें यात्रा-लेखक के रूप में शास्त्रीजी ने अपनी वियतनाम यात्रा का अत्यंत रोचक एवं प्रभावकारी अंकन किया है।

पाठारंभ बड़ा ही रोचक, कुतूहलजनक एवं जिज्ञासावर्द्धक है। लेखक बताता है कि लगभग 40-42 वर्ष पहले एक दिन जब वह हिंदी की किसी मासिक पत्रिका के पन्ने उलट-पुलट रहा था कि अचानक पेंसिल स्केच की एक अनोखी तस्वीर देख ठिठक गया। वह तस्वीर वियतनाम के विश्वद्रष्टा एवं विश्वविश्रुत व्यक्ति हो-ची-मीन्ह की थी। लेखक उनके व्यक्तित्व से अभिभूत हो उठता है।

वह व्यक्तित्व अपनी सादगी और सरलता में अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली था। आज भी वर्षों पूर्व देखी गई वह तस्वीर अक्षुण्ण है तथा अंतः सलिला फल्गू नदी की भाँति उनके. हृदय-प्रदेश को सींचती रहती है। तत्पश्चात् हो-ची-मीन्ह के प्रेरणादायी व्यक्तित्व एवं कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर वर्णन को आगे बढ़ा देता है।

लेखक ने बताया है कि जब वे बिहार से दिल्ली आये तो सबसे पहले उन्हें मॉरीशस जाने का मौका मिला और मौका पाते ही वहाँ चले जाते हैं। वियतनाम यात्रा के साथ भी यही बात है। उनकी जीवनयात्रा के करीब दस दिन वियतनाम में व्यतीत हुए हैं। लेखक एयर इंडिया के बोइंग विमान-707 में वियतनाम की यात्रा के लिए सवार हुए। विमान तेज गति से बैंकाक की ओर चल पड़ा। बैंकाक तक की उनकी विमान यात्रा सुखद रही।

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वहाँ होटल ओरिएंट में उन्हें ठाहराया गया। होटल में रात्रि विश्राम के पश्चात् वे लोग बैंकाक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँचे। वहीं से उन लोगों को वियतनाम की राजधानी हानोई पहुंचना था। बैंकाक से हानोई के लंबे सफर में मैकांग नदी (जो वहाँ महागंगा के नाम से मशहूर है) को देख लेखक बड़ी आत्मीयता महसूस करते हैं, क्योंकि वे उसका नाम सुन चुके थे। देखते-देखते विमान वेंचियन हवाई अड्डा पहुंचा।

वहाँ सभी यात्री विमान से उतरकर कैंटिन में चावल की बनी पावरोटी और चाय लेते हैं और पुनः विमान में अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं। कुल डेढ़ घंटे में विमान जियालाम हवाई अड्डा जा पहुंचा। यही हवाई अड्डा हानोई से नजदीक है। वहाँ इन लोगों के स्वागत की अच्छी-खासी तैयारी थी। वितयनामी ‘कमिटी ऑफ सोलिडिरेटी एंड फ्रेंडशिप विद दी पीपुल्स ऑफ ऑल कंट्रीज’ के पदाधिकारियों और उनके सहयोगियों ने बड़े प्रसन्न भाव से गुलदस्ता भेंट कर इनका स्वागत-सत्कार किया।

जियालाम अंतर्देशीय हवाई अड्डे से निकलकर लेखक शास्त्रीजी वहाँ की सरकार द्वारा भेजी गई मोटरगाड़ी पर सवार होकर हानोई के लिए रवाना होते हैं। उनके साथ उक्त कमिटी के एक वरीय सदस्य और दुभाषिए के रहने का भी प्रबंध था। सड़क-मार्ग से गुजरते हुए रास्ते के अनेक स्थलों को निहारते हुए वे अतिथिशाला के पास आये। यह अतिथिशाला औपनिवेशक काल में ही बनी थी। वहाँ इनके स्वागत में भव्य तैयारी थी।

सड़क के दोनों ओर रंग-बिरंग वेश में बालक-बालिकाएँ जवान और वृद्ध हाथों में गुलदस्ता लिखे खड़े थे और अपनी मातृभाषा में गाना गाकर स्वागत करते हुए ‘भारत और वियतनाम की मित्रता दृढ़ हो’ के नारे भी लगा रहे थे। शास्त्रीजी वहाँ बड़े प्रेम-भाव से सबसे मिले और थोड़ी देर बाद फिर जुलूस के रूप में नयी बनी राजकीय अतिथिशाला में पहुंचे। वहीं उनलोगों के रहने की व्यवस्था थी। वहाँ उन्हें बिना दूध की चाय दी गई, जो अच्छी न लगी। भोजनोपरांत थोड़ी देर के विश्राम के बाद शाम को ठीक पाँच बजे वे लोग शहर की ओर निकले।

वहाँ उनके साथ वियतनाम पीपुल्स पार्टी के एक वरीय सदस्य और दुभाषिया बराबर रहते थे। वे लोग शहर के सामान्य दृश्यों को देखते हुए वेस्ट लेक पहुँचे। वहाँ के सन्दर्भ में दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-पहली, चूँकि हानोई शहर में चार-पाँच झीलें हैं, इसलिए वह झीलों का नगर कहलाता है तथा दूसरे, वहाँ की निजी सवारी है साइकिल। अत: वह साइकिलों का शहर लंगता है।।

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दूसरे दिन शास्त्रीजी खूब तड़के जगे और साढ़े छह बजे घूमने के लिए पूरी तरह तैयार हो गये। इस दिन का उनका कार्यक्रम अतिशय प्रेरक और महत्त्वपूर्ण रहा। इसी दिन उन्होंने हो-ची-मीन्ह मसालियम जाकर उस महान नेता के पार्थिक शरीर के दर्शन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उस समय लेखक की मनःस्थिति अवर्णनीय थी। वहाँ से वे लोग उस शाही महल को देखने गये, जिसमें, फ्रांसीसी गवर्नर जनरल रहते थे।

तत्पश्चात् वे लोग राष्ट्रपति हो-ची-मीन्ह जहाँ रहते थे, उस साधारण मकान को देखने गये। वहाँ पर उन्हें जो-जो चीजें देखने को मिलीं, उनसे राष्ट्रपति हो-ची-मीन्ह के महान व्यक्तित्व की झांकी सहज ही मिलती है। इसके बाद उन लोगों ने उस महान को भी देखा, जिसमें हो-ची-मीन्ह राष्ट्रपति बनने से पूर्व रहा करते थे। फिलहाल वहाँ कोई नहीं रहता है और उसे राष्ट्र का संरक्षण प्राप्त है। वह स्थान लेखक के अंतर्मन को छू जाता है। वहा वियतनाम की जनता की धरोहर और प्रेरणास्रोत है। वहाँ जाकर सुप्त आत्मा भी जाग्रत हो जाता है। वास्तव में हो-ची-मीन्ह वियतनाम के सर्वप्रिय नेता थे।

उनका महत्त्व वहाँ जाने पर ही जाना जा सकता है और इन्हीं हार्दिक उद्गारों के साथ पइित यात्रा-वृत्तान्त समाप्त हो जाता है। इस प्रकार, लेखक ने इस यात्रा-वृत्त में अपनी वियतनाम यात्रा के सारे अनुभवों, व्यक्तियों, वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों का वर्णन बड़ी अंतरंगता से प्रस्तुत किया है।

मेरी वियतनाम यात्रा कठिन शब्दों का अर्थ

स्मृति-याद। अन्यमनस्क भाव-अनमने भाव से। सव्यसाची-बायाँ-दायाँ दोनों हाथ से निशाना साधने वाला, अर्जुन के लिए रूढ़। फबना-शोभित होना। परिलक्षित-प्रकट दिखाई पड़ना। निधि-खजाना। गुलदस्ता-पुष्पगुच्छ, फूलों का गुच्छा। औपनिवेशिक काल-जब वियतनाम पर दूसरे देश का शासन था। तेजस्वी-तेजपूर्ण। मैजेस्टिक-जादुई। सद्यःस्नात-तुरंत स्नान किया हुआ। सुधि-स्मृति, ध्यान। हरफों-अक्षरों। अंत:सलिला-अन्दर-ही अन्दर प्रवाहित होने वाली नदी। विभूति-ऐश्वर्यमय व्यक्ति। विश्व-विश्रुत-विश्वविख्यात। पार्थिव-लौकिक। दुभाषिया-ऐसा व्यक्ति जो दो भिन्न भाषा-भाषियों के बीच बातचीत करता है। शिकंजा-कैद, पकड़। पैगाम-संदेश।

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महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. अन्तर्राष्ट्रीयता पनप नहीं सकती, जब तक राष्ट्रीयता का पूर्ण विकास न हो। इसके लिए उन्होंने क्रांति, बलिदान और त्याग का पैगाम किया। इसीलिए वे विश्वद्रष्टा कहलाए और विश्व-विश्रुत हुए।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ भोला पासवान शास्त्री द्वारा लिखित मेरी वियतनाम यात्रा नामक संस्मरण से ली गयी है। इन पंक्तियों में लेखक ने वियतनाम के महान नेता होचीमीन्ह के व्यक्तित्व के बारे में वर्णन किया है। होचीमीन्ह एक महान क्रांतिकारी नेता थे और उन्होंने विदेशी साम्राज्यवाद से वियतनाम को स्वतंत्र कराया। उन्होंने अपने जीवन-काल में क्रांति, बलिदान और त्याग का पैगाम दिया। इसीलिए लेखक के अनुसार होचीमीन्ह विश्वद्रष्टा और विश्व प्रसिद्ध हुए। जब वियतनाम स्वतंत्र हुआ तो वे यहाँ के राष्ट्रपति बने। वास्तव में, वे वियतनाम के निर्माता थे।

2. होचीमीन्ह मसोलियम राष्ट्र को समर्पित है, उसे राष्ट्र का संरक्षण प्राप्त है, वह वियतनाम की जनता की धरोहर है, प्रेरणा-स्त्रोत है।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ भोला पासवान शास्त्री द्वारा लिखित मेरी वियतनाम यात्रा नामक संस्मरण से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने होचीमीन्ह मसोलियम को आधार बनाकर होचीमीन्ह के व्यक्तित्व को उजागर किया है। इस महान राजनेता ने वियतनाम की जनता को गुलामी से मुक्ति दिलाकर प्रगति की दिशा में अग्रसर करने के लिए मार्ग-दर्शन किया। वे वियतनाम के निर्माता और राष्ट्रपति बने। उनके मसोलियम को देखकर होचीमीन्ह की स्मृति हो आती है। यह मसोलियम राष्ट्र को समर्पित है, जिसे राष्ट्र का संरक्षण भी प्राप्त है। वास्तव में, वह वियतनाम की जनता की धरोहर और प्रेरणा स्त्रोत है। इस मसोलियम से होचीमीन्ह के महान योगदान का ज्ञान होता है।

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Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 6 I Pass the Delhi Test

Bihar Board Class 11th English Book Solutions Prose Chapter 6 I Pass the Delhi Test Text Book Questions and Answers.

Rainbow English Book Class 11 Solutions Chapter 6 I Pass the Delhi Test

Bihar Board Class 11 English I Pass the Delhi Test Textual Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss the following questions :

Question 1.
Do you play cricket ? How much do you like it ?
Answer:
Yes, I play cricket. I like it very much.

Question 2.
Where and how did the game of cricket originate ?
Answer:
Cricket developend in the early 18th century from the ‘bat and ball’ game played a century earlier, mainly by boys. Its rules were formulated by the Maiylebone Cricket Club (MCC), which was founded in 1787 and was for many years the governing body of the game.

Question 3.
How many countries play Test Cricket ? Can you make a list of these countries ?
Answer:
Ten countries play Test Cricket. The following countries play Test cricket: Australia, New Zealand, South Africa, India, Pakistan, Sri Lanka, West Indies, England, Zimbabwe, Bangladesh.

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Question 4.
What is the difference between a Test Match and a limited over one day match ?
Answer:
A Test Match usually goes on for five days. There is no limit to overs. A team can go no batting till it is out or it decides to declare. A one day match is limited usually to 50 overs and it is only one day show.

Question 5.
Which form of cricket do you like more ? Give reasons.
Answer:
I like a Test Match. It is more interesting and each team/player has a chance to display its best.

B. 1. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Which boook of Gavasker was released on the eve of the test ? Who released the book ?
Answer:
Gavaskar’s second book Idols was released on the eve of the test. It was released by Kapil Dev.

Question 2.
Who was the chief guest ? Who were the other important guests ?
Answer:
Clive Lloyed was the chief guest. Michael Holding and Jeff Dujon were the other important guests.

Question 3.
Gavaskar could not take good rest, as he had intended. Why ?
Answer:
Gavaskar went to his hotel to rest. But his wife’s friend Bijoya, her sisters and brothers with their spouses came to see them. A party was immediately arranged. So Gavaskar could not take rest.

Question 4.
‘Within hours the battle was to be resumed, so we went back to the hotel to rests.’ What does the ‘battle’ refer to ?
Answer:
The battle here refers to the Second Test in Delhi.

Question 5.
Why did Gavaskar leave the nets early during practice ? What was Kapil’s reaction ?
Answer:
Gavaskar was upset because a part of the crowd had passed nasty remarks on him. He left the nets early because he wanted to keep him cool and relax.

Kapil did not like Gavaskar’s leaving the nets but he did not say anything.

Question 6.
What did the young girls ask Gavaskar ? Why did he laugh at their request ? What does it suggest about the level of his confidence ?
Answer:
The girls asked Gavaskar to score the fastest century of his career. Gavaskar laughed at their request because he did not hope to score even half a century. This shows that his level of confidence was very low.

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Question 7.
How far, do you think, is it proper to make derisive comments when a good player is struggling to regain his form ? Does it help the player anyway ?
Answer:
It is improper to make derisive comments on a player who is struggling to regain him from, but spectators expect good game. When they are disappointed resort to criticrse a player. Such they comments seldom help the player. He is only demoralised.

Question 8.
A couple of messages meant a lot’ What does Gavaskar mean by this ?
Answer:
Gavaskar means to say that a couple of messages were sufficient to cheer him up. He felt relaxed and encouraged.

Question 9.
How do you feel when your friends or relatives offer their best wishes when you are getting ready for exams ? Does it help you any way ?
Answer:
Yes, good wishes and words of cheer do help me to feel better.

Question 10.
What are your feelings on the eve of an important examination ? Do you feel any sort of anxiety even after a good preparation ? If so, why ?
Answer:
An examination naturally causes anxiety. Inspite of good preparation, I do not feel that I am fully prepared to face it.

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B. 2. Answer the following questions briefly :

Question 1.
Why was Gavaskar finding it easy to play ?
Answer:
Gavaskar found it easy to play because he was feeling relaxed. Secondly, Delhi wicket is favourable to batting.

Question 2.
Give two instances when luck favoured Gavaskar during the match.
Answer:
Gavaskar was lucky twice. Once when he was 16, he missed the shot. The ball brushed his hat. The umpire did not signal anything. Perhaps he was misled by the sound of the ball brushing Gavaskar’s cap. Gavaskar got some runs.

Again, he hit a ball off the middle. It went quite high. A tall fielder like i Roger Harper or Joel Gamer could have leapt and caught it. But the fielder was not so tall. Gavaskar got six runs.

Question 3.
What is ‘another hurdle’ Gavaskar talks about ?
Answer:
No player would like to score a duck, that is zero. This means one is going to be a utter failure. It is a hurdle and Gavaskar crossed it when he had got a couple of runs after Marshall’s third ball.

Question 4.
“I don’t look at the scoreboard or the clock when I am batting.” What light does it throw on Gavaskar’s way of batting ?
Answer:
It shows that Gavaskar wanted to play the game in a relaxed manner unmindful of his score. He was more relaxed like this than he was if he were aware that he was close to a century.

Question 5.
“Bloody-hell! It’s your twenty-ninth.” Who said this ? What does the ‘twenty-ninth’ refer to ? Why did it bring delight to the countrymen ?
Answer:
This was said by Dilip Vengasarkar ‘Twenty-ninth’ refers to the 29th century scored by Gavaskar. It broght delight to the countrymen because they were eagerly waiting for it to happen.

Question 6.
How does applause help a performer ? Have you ever experienced it ?
Answer:
Applause gives delight to the performer. He feels he has been rewarded for his performance. Once I experienced it when I delivered a speech in the school assembly.

Question 7.
Which one did Gavaskar consider to be his best test century and why?
Answer:
Gavaskar considers his best test century that he scored in the first I test at Old Trafford in 1974. He considers it the best because batting conditions there were against batting, and it had come after three and a half years.

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C. 1. Long Answer Questions :

Question 1.
‘Right’ Today you bounce and I am going to hook.’ What does it suggest about Gavaskar’s plan to tackle West Indian bowling ?
Answer:
It shows that Gavaskar planned his strategy correctly, and it helped him to score quickly.

Question 2.
‘I do not think I have ever played so many shots to get a century. I Most of my centuries have a liberal sprinkling of ones and twos and take their time coming and this was definitely the quickest in terms of time as well as deliveries faced.’ Does the statement suggest any change in Gavaskar’s batting in his particular match ? If yes, what kind of change is suggested here ?
Answer:
This shows that Gavaskar had been slow at making runs. He had hardly shot sixers and fours before. He got ones and twos. But in the Delhi Test he must have shot sixers and fours. That is why he made mns quickly by facing fewer deliveries.

Question 3.
Pick up sentences as the ones quoted in the earlier two questions and evaluate how far it is justified to say that Gavaskar was a good planner of the game.
Answer:
The following sentences show that it was not Gavaskar’s planning that helped him but a couple of chances. When he was at 16 he could have been injured but he got some runs. He might have been caught out if the fielder was tall enough to leap and catch the ball.

(i) When I was 16, a bouncer came ………………….. and I missed my shot, but luckily ball brushed my hat ………………….. The umpire did not signal anything the umpire was misled by the sound of the ball brushing my cap ………………….. I got some runs.

(ii) The second alarm came when I hit the ball off the middle but it went – at a height where Roger Harper Joel Gamer could have leapt and caught the ball. Fortunately, the fielder was not as tall as those and I got six runs instead.

Question 4.
Notwithst anding that it was his quickest century, Gavaskar does not think it was his best century Why ?
Answer:
He considers his best century that he scored at Old Trafford in 1974. The century he scored at Delhi came easy. But the one at old Trafford was difficult. Conditions there were against batting, and he had not scored a century for over three years. He doubted his ability to score. This century gave him a new lease of his career.

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Question 5.
How much did the countrymen admire and love Gavaskar ? Give evidence from the lesson.
Answer:
Countrymen admired Gavaskar. Some young girls asked him to score the fastest century of his career. He got a few messages wishing him success at the test match. In fact, since his return from West Indies, people were eager for him to score the 29th century. Where he went they offered him their good wishes. They had eagerly waited and prayed for it.

Question 6.
‘Crowds allover India are basically the same and are particularly adept at kicking a man when he is down.’ How far do you agree with Gavaskar’s observations ? Can you cite examples-from cricket or eisewhere-in favour of or against the observation ?
Answer:
I do not agree that Indian corwds criticise a player when he is down. In fact, there is hardly any sportsman spirit anywhere in the world. Players play to win because there is much money involved. Audience do not appreciate the game. They seldom praise a good player of a team playing against their country. They want victory for their team.

When their team is not doing well, they are disppointed, and become restless. There are examples when audience broke into the field and smashed everything. Sometimes they even accuse the umpire of being partial. Gavaskar himself confesses that his countrymen loved and admired him. I think the man that criticised for his play also loved him and had great expectations.

Question 7.
Who among the modern cricketers, in your opinion, show the kind of concentration and application that Gavaskar used to show ?
Answer:
I think Tendulkar shows the same concentration and application as Gavaskar used to show.

Question 8.
‘Offence is the best strategy of defence.’ How does Gavaskar’s century prove this ?
Answer:
Marshall threw a bouncer which Gavaskar hooked. At first Marshall frowned and then smiled cunningly. He had planned his offence. But Gavaskar did not think of playing safe. He decided to hook every ball and send it flying to the boundary. In this way by offensive strategy he scored a century.

Question 9.
A good autobiography is honest. The author describes success and admits failures, accepts blame and claims credit. In what ways do you think Sunil Gavaskar is honest in writing about his experiences ? Use specific references from the lesson as examples.
Answer:
Gavaskar has described his feeling honestly. He has confessed that he whs upset when a part of the crowed citicised him for his bad play. He went away to keep cool. He also tells us about his lack of confidence before the test began.

He honestly tells us how he was lucky when he was at 16 and when he was about to be caught out. He does not claim credit for those scores. But he also tells us how easy he found to score runs. We also learn that he did not look at clock or the scoreboard during the game. Some people may consider it his’ superstition but he says he does so to avoid tension. He is critical of the crowds in India but he also owes gratitude to them for their love and appreciation and good wishes that helped him to score the 29th century.

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C. 2. Group Discussion :

Discuss the following in groups or pairs :

Question a.
Fortune favours the brave.
Answer:
Hints : Many people believe in fate or luck. But luck comes to those who act. If a person is a coward and runs away from action, how can luck favour him. Many people avoid action because they are afraid of the consequences. Indeed action means risks and dangers. But those who dare, win. Fortune favours them. Those who run away lose and suffer. Ill luck dogs them.

Question b.
Modelling affects sportsperson’s performance.
Answer:
Hints : These days players are highly paid. Business companies want successful and popular sportspersons to promote their sales. So they appear on products and on mass media. They are paid well for this. Allurement of money makes them to. modelling. They have to give sufficient time for the shooting of a commercial. Naturally they cannot pay full attention to game and their performance suffers.

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C. 3. Composition :
Write a paragraph in about 100 words on each of the following :

Question a.
The sportperson you like most
Answer:
I am found of playing chess and Vishwanathan Anand is the sportsperson I like most. He is the current world Champion and has done his country proud.

Anand was bom in 1969. He picked his early lessons in chess from his mother at the age of six. In 1984 he became the youngest Indian to win the International Master title at the age of fifteen. Next year he became the National Champion. He became India’s first Grandmaster in 1988.

Anand won the FIDE World Chess Championship in 2000 for the first time after defeating Alexei Shirov in the final match held at Tehran. He became Chess World Champion again by winning the FIDE World Championship Tournament held in Mexico City. He is one of four players in history to break the 2800 mark on the FIDE rating list.

He was awarded the Padma Bhushan in 2000.

Question b.
Performing in unfavourable condition is the test of a genius.
Answer:
Everyone can perform under favourable conditions. And chose who do so seldom go down in history. We admire and remember only those who do something great in difficult and unfavourable conditions. Abraham Loncolon wanted to abolish slave trade from America, and set the Negroes free. The southern states were against him. There was the risk of the disintegration of the country.

But Lincoln was determined to do this noble work. He did it and the world acknowledges him as a champion of liberty and democracy Gandhiji tried to liberate the peasants from the tyranny of the British landlords in Champaran. Conditions were unfavourable. But he did wonders and liberated the peasants from the fear of the British oppression. The world looks upon him as a great genius.

Question c.
Where there is will there is a way:
Answer:
Most of us find excuses when we do not have the will to do something. We can count a number of hurdles and difficulties that make accomplishment impossible. But poeple who have strong will achieve that looks impossible to others. Napoleon said that word impossible was found in the dictionary of fools. People with strong determination have climbed up Everest, reached the south pole, crossed the Atlantic on a raft. Columbus sailed to the unknown continent. People with will have achieved what they wanted to achieve. Nothing is difficult if we have the will If we have the will we will find ways, wide open to Welcome us.

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D. Word-Study:

D – 1. Dictionary Use :

Ex – 1. Correct the spelling of the following words :
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 6 I Pass the Delhi Test 1
Answer:
Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 6 I Pass the Delhi Test 2

Ex – 2. Look up a dictionary and write two meanings of each of the following, words the one in which it is used in the lesson and the other which is more common :
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Answer:
look : (i) to turn eyes in a particular direction.
(ii) to watch a game.

fnction : (i) a special activity or purpose of a person.
(ii) a social event or ceremony.

plan : (i) something that one intend to do or achieve.
(ii) a detailed map of a building

Strident: (i) unpleasant sound.
(ii) aggressive and determined.

name : (i) a word or words that a particular person, animal, place or thing is known by.
(ii) a reputation that somebody has.

Surprise : (i) an event, piece of news that is unexpected or that happens suddenly.
(ii) to surprise somebody suddenly in a way that slightly shocks or frightens him.

Test: (i) test match.
(ii) an examination

Lease : (i) the chance to live or last longer.
(ii) a legal agreement that allows one to use building or some land for a period of time.

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D. 2. Word-meaning :

Ex-1 Find from the lesson words the meaning of which have been given on the left hand side. The last part of each word is given on the right hand side:

  1. a big smile that sows your teeth : …………………. in
  2. skiful at doing something ………………….
  3. to someone in am angry way. ………………….
  4. the time a performer or player appears in public ………………….
  5. an event or achievement that marks an important stage in a process: …………………. stone
  6. an expression on your face by moving eye-brows : …………………. own
  7. to push someone or something with force …………………. ove
  8. the act of throwing a coin into the air in order to make a decision …………………. ss

Answer:

  1. grin
  2. adept
  3. inside
  4. debut
  5. milestone
  6. frown
  7. shoved
  8. toss

Bihar Board Class 11 English Book Solutions Chapter 6 I Pass the Delhi Test

D. 4. Phrases :

Ex-1 Read the lesson carefully and find out the sentences in which the following phrases have been used. Then use them in sentences of your own.
drop in, at times, look after, pick up at ease
Answer:
The sentences in the lesson in which the phrases have been used :
Bijoya, dropped in to see her. (Para-2)

………………. a skipper gets a suite and so is able to look after his gues better. (Para-2)
………………. having informed Kapil that rather then pick up a fight with the crowd (Para-4)
………………. I was feeling relaxed and completely at ease. (Para-5)
………………. and at times chided me during my career. (Para-5)

drop in – Ramesh dropped in to see me.
at times – He used to threaten me at times.
look after – She is able to look after her children.
pick up – He must not try to pick up a fight with them.
at ease – She feels relax and completely at ease.

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E. Grammar :

I had left the net. He had won the toss.
In the above examples, the sentences are in Past Perfect Tense.
Change the following sentences into Past Perfect Tense.

  1. I read a book.
  2. He cleans the floor.
  3. They have played for India.
  4. You will do the work.
  5. The boy is eating a mango.

Answer:

  1. I had read a book.
  2. He had cleaned the floor.
  3. They had played for India.
  4. You would have done the work.
  5. The boy had eaten a mango.

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F. Activity :

Ex – 1. Registers :

Words like run, pitch, cover are used in special sense in cricket. In other words, they are the registers of cricket Read the lesson carefully and And out the registers of cricket used in the lesson. Find out the meaning of each of these registers with the help of your game-teacher or reference books/dictionaries.
Answer:
Run – score
Pitch – an area of ground specially prepared and marked for playing a game.
Cover – to spread the ground.

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